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‘आशा’ से

आज फिर से प्रस्तुत है एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट|

आज भी मैं विख्यात अंग्रेजी कवि जॉन कीट्स की अंग्रेजी भाषा में लिखी गई एक और कविता का भावानुवाद और उसके बाद मूल अंग्रेजी कविता प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। आज के लिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-


जॉन कीट्स

‘आशा’ से


जब मैं अपने अकेले दिल के साथ बैठा होता हूँ,
और उदासी भरे परिवेश में, घृणापूर्ण विचार दिल को घेर लेते हैं;
जब मेरे ‘मन की आंखों’ के सामने कोई सुंदर स्वप्न नहीं आते हैं,
और जीवन की खाली बंजर जमीन पर कोई फूल नहीं खिलते;
ओ मीठी आशा, मेरे दिल पर आकाशीय मरहम लगा दे,
और अपने चमकीले पंख मेरे माथे पर लहरा दे!

जब कभी भी मैं रात घिरने पर भटकता हूँ,
जहाँ आपस में गुंथी हुई टहनियां चंद्रमा की चमकती किरण को ढक लेती हैं,
क्या निराशा भरे मेरे चिंतन से मुझे डरना चाहिए,
और गुस्सा करना चाहिए, जिससे मेरी सहज प्रसन्नता दूर हो जाए,
चंद्रमा की किरणों के साथ, पत्तों की छत से झांको,
और अपनी उस मित्र- मायूसी को कोसों दूर रखो!

अगर निराशा- मायूसी की जननी,
यह प्रयास करे कि उसकी संतान मेरे लापरवाह दिल पर कब्ज़ा कर ले;
जब, किसी बादल की तरह, वह हवा पर सवार हो जाए,
इस तैयारी के साथ कि मौका मिलते ही वह-
अपने शिकार पर झपट पड़े:
उसका पीछा कर सके, मीठी आशा और दमकते चेहरे के साथ,
और उसे डरा सके, जैसे सुबह डराती है रात को!

जब कभी उन लोगों का भाग्य, जो मुझे बहुत प्रिय हैं,
मेरे भयभीत दिल को निराशा की कहानी सुनाता है,
तब अरी ओ चमकती आंखों वाली आशा,
मेरी रुग्ण कल्पना को खुश करने वाली;
जरा मुझे कुछ देर के लिए, अपने मधुरतम आराम उधार लेने दे:
अपनी स्वर्ग में उपजी चमक मेरे चारों ओर बिखर जाने दे,
और अपने चमकीले पंख मेरे माथे पर लहरा दे!

अगर कभी अप्रिय प्रेम से मेरे हृदय में पीड़ा हो,
क्रूर परिस्थितियों से, अथवा अप्रिय वातावरण से;
अरे तब मुझे सोचने दो कि यह बेकार न जाए,
मैं मध्यरात्रि की वायु में, अपने गीत तैरा सकूं!
मीठी आशा, मेरे दिल पर आकाशीय मरहम लगा दे,
और अपने चमकीले पंख मेरे माथे पर लहरा दे!

आने वाले वर्षों की लंबी कतार सामने है,
मैं नहीं चाहता कि मुझे कभी अपने देश का सम्मान फीका होते देखना पड़े:
अरे, मुझे यह देखने दो कि मेरा देश अपनी आत्मा को बनाए रखे,
उसका गौरव, उसकी स्वतंत्रता और स्वतंत्रता की छाया-मात्र नहीं।
तुम अपनी दमकती आंखों की अद्भुद चमक बरसाओ—
और अपने पंखों की छतरी से मेरा सिर ढककर रखो!

मुझे देश-प्रेमियों की महान विरासत देखने दो,
महान मुक्ति! कितनी महान, सामान्य वेशभूषा में!
राजसत्ता के ज़ुल्मों के सामने लाचार, ,
अपना मस्तक झुकाते हुए, शहीद होने को तैयार:
लेकिन मैं चाहता हूँ कि तुम स्वर्ग से अपने पंखों पर उड़कर आ जाओ,
जिससे पूरा आकाश तुम्हारी चमक से भर जाए!

और जिस तरह, अपनी शानदार चमक से, कोई सितारा
किसी अंधियारे बादल के शिखर को सुनहरा बना देता है;
सुदूर स्वर्ग के घूंघट में आधे ढके चेहरे को चमकाते हुए:
इसलिए,जब निराशापूर्ण विचार मेरी आत्मा को घेर लें,
मधुर आशा, तुम अपना आकाशीय प्रभाव मुझ पर डालो
और अपने चमकीले पंखों को मेरे माथे पर लहराओ!



और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



John Keats

To Hope

WHEN by my solitary hearth I sit,
And hateful thoughts enwrap my soul in gloom;
When no fair dreams before my “mind’s eye” flit,
And the bare heath of life presents no bloom;
Sweet Hope, ethereal balm upon me shed,
And wave thy silver pinions o’er my head!

Whene’er I wander, at the fall of night,
Where woven boughs shut out the moon’s bright ray,
Should sad Despondency my musings fright,
And frown, to drive fair Cheerfulness away,
Peep with the moonbeams through the leafy roof,
And keep that fiend Despondence far aloof!

Should Disappointment, parent of Despair,
Strive for her son to seize my careless heart;
When, like a cloud, he sits upon the air,
Preparing on his spell-bound prey to dart:
Chase him away, sweet Hope, with visage bright,
And fright him as the morning frightens night!

Whene’er the fate of those I hold most dear
Tells to my fearful breast a tale of sorrow,
O bright-eyed Hope, my morbidfancy cheer;
Let me awhile thy sweetest comforts borrow:
Thy heaven-born radiance around me shed,
And wave thy silver pinions o’er my head!

Should e’er unhappy love my bosom pain,
From cruel parents, or relentless fair;
O let me think it is not quite in vain
To sigh out sonnets to the midnight air!
Sweet Hope, ethereal balm upon me shed,
And wave thy silver pinions o’er my head!

In the long vista of the years to roll,
Let me not see our country’s honour fade:
O let me see our land retain her soul,
Her pride, her freedom; and not freedom’s shade.
From thy bright eyes unusual brightness shed—
Beneath thy pinions canopy my head!

Let me not see the patriot’s high bequest,
Great Liberty! how great in plain attire!
With the base purple of a court oppress’d,
Bowing her head, and ready to expire:
But let me see thee stoop from heaven on wings
That fill the skies with silver glitterings!

And as, in sparkling majesty, a star
Gilds the bright summit of some gloomy cloud;
Brightening the half veil’d face of heaven afar:
So, when dark thoughts my boding spirit shroud,
Sweet Hope, celestial influence round me shed,
Waving thy silver pinions o’er my head!



नमस्कार।

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मौला जाने क्या होगा आगे!

पुराने जमाने के अमर फिल्मी गीतों को शेयर करने के क्रम में आज मुकेश जी का गाया एक और नायाब गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ, जो मनोज कुमार जी की फिल्म से है|

लीजिए प्रस्तुत है फिल्म- ‘हरियाली और रास्ता’ के लिए हसरत जयपुरी जी का लिखा यह गीत, जिसका संगीत दिया था शंकर जयकिशन की सुरीली जोड़ी ने और इस गीत को मुकेश जी ने अपने जादुई स्वर से सजाया है-


इब्तिदा-ए-इश्क़ में हम सारी रात जागे
अल्लाह जाने क्या होगा आगे
मौला जाने क्या होगा आगे
दिल में तेरी उलफ़त के बंधने लगे धागे,
अल्लाह जाने क्या होगा आगे|

क्या कहूँ कुछ कहा नहीं जाए
बिन कहे भी रहा नहीं जाए
रात भर करवट मैं बदलूँ
दर्द दिल का सहा नहीं जाए|
नींद मेरी आँखों से दूर-दूर भागे,
अल्लाह जाने क्या होगा आगे
|

दिल में जागी प्रीत की ज्वाला
जबसे मैंने होश सम्भाला
मैं हूँ तेरे प्यार की सीमा
तू मेरा राही मतवाला
मेरे मन की बीना में तेरे राग जागे,
अल्लाह जाने क्या होगा आगे|

तूने जब से आँख मिलाई
दिल से इक आवाज़ ये आई
चलके अब तारों में रहेंगे
प्यार के हम तो हैं सौदाई
मुझको तेरी सूरत भी चाँद-रात लागे|
अल्लाह जाने क्या होगा आगे|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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हम चल रहे थे, वो चल रहे थे!

हमारी फिल्मों में भी कविता/गीतों को महत्वपूर्ण स्थान मिला है| फिल्मों की कहानी को आगे बढ़ाने में गीतों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है| हमारे समय के अनेक प्रसिद्ध रचनाकारों- कवियों और शायरों ने फिल्मों में अपने गीतों/ग़ज़लों के माध्यम से महत्वपूर्ण योगदान दिया है| फिल्मों एक बात यह भी होती है कि गीत सिचुएशन पर आधारित होते हैं| कहीं प्रेम मे मगन नायक-नायिका, कहीं विरह में तड़पते और भी अनेक रंग होते हैं, जैसे एक रंग आप इस गीत में देखेंगे|

लीजिए आज प्रस्तुत है फिल्म ‘दुनिया ना माने’ के लिए राजिंदर किशन जी का लिखा यह गीत, जिसका संगीत दिया था मदन मोहन जी ने और इस गीत को मुकेश जी ने अपने जादुई स्वर से सजाया है-


हम चल रहे थे, वो चल रहे थे
मगर दुनियावालों के दिल जल रहे थे
हम चल रहे थे—

वही हैं फिज़ायें वही है हवायें
मगर प्यार कि अब नही वो अदायें
बुलायें हम उनको, मगर वो न आयें|
हम चल रहे थे, वो चल रहे थे—

उन्हें भूलकर भी, भुला ना सकूंगा
जो दिल में लगी है बुझा ना सकूंगा
मैं सपनों की दुनिया सजा ना सकूंगा|


हम चल रहे थे, वो चल रहे थे
मगर दुनियावालों के दिल जल रहे थे
हम चल रहे थे—



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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हरी हरी दूब पर!

आज मैं भारत के पूर्व प्रधान मंत्री, महान राजनेता, अनूठे वक्ता और एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय वाजपेयी जी ने हर भूमिका में अपनी अमिट छाप छोड़ी है| जहां आज भी हम उनके ऐतिहासिक भाषणों को यदा-कदा सुनते रहते हैं वहीं उनकी कविताएं भी हमें उस महान व्यक्तित्व की याद दिलाती रहती हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की यह कविता-


हरी हरी दूब पर
ओस की बूंदें
अभी थीं,
अभी नहीं हैं|
ऐसी खुशियाँ
जो हमेशा हमारा साथ दें
कभी नहीं थी,
कहीं नहीं हैं|


क्काँयर की कोख से
फूटा बाल सूर्य,
जब पूरब की गोद में
पाँव फैलाने लगा,
तो मेरी बगीची का
पत्ता-पत्ता जगमगाने लगा,
मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूँ
या उसके ताप से भाप बनी,
ओस की बूंदों को ढूंढूँ?


सूर्य एक सत्य है
जिसे झुठलाया नहीं जा सकता
मगर ओस भी तो एक सच्चाई है
यह बात अलग है कि ओस क्षणिक है
क्यों न मैं क्षण क्षण को जिऊँ?
कण-कण में बिखरे सौन्दर्य को पिऊँ?


सूर्य तो फिर भी उगेगा,
धूप तो फिर भी खिलेगी,
लेकिन मेरी बगीची की
हरी-हरी दूब पर,
ओस की बूंद
हर मौसम में नहीं मिलेगी|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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सिर्फ अंगूठे हैं हम लोग!

आज किसी ब्लॉग पोस्ट में ही शेरजंग गर्ग जी का उल्लेख देखा तो सोचा कि उनकी ही रचना आज शेयर की जाए| बहुत पहले जब मैं दिल्ली में रहता था (1980 तक) तब कुछ कवि गोष्ठियों में उनका रचना पाठ सुनने का मौका मिला था, श्रेष्ठ रचनाकार हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री शेरजंग गर्ग जी की लिखी एक ग़ज़ल-

ख़ुद से रूठे हैं हम लोग।
टूटे-फूटे हैं हम लोग॥

सत्य चुराता नज़रें हमसे,
इतने झूठे हैं हम लोग।

इसे साध लें, उसे बांध लें,
सचमुच खूँटे हैं हम लोग।

क्या कर लेंगी वे तलवारें,
जिनकी मूँठें हैं हम लोग।

मय-ख़्वारों की हर महफ़िल में,
खाली घूंटें हैं हम लोग।


हमें अजायबघर में रख दो,
बहुत अनूठे हैं हम लोग।

हस्ताक्षर तो बन न सकेंगे,
सिर्फ़ अँगूठे हैं हम लोग।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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काहे को दुनिया बनाई!

एक बार फिर से आज सामान्य जन के कवि, शैलेन्द्र जी की बात करते हैं और उनके ड्रीम प्रोजेक्ट, फिल्म- ‘तीसरी कसम’ का एक गीत शेयर करूंगा| शैलेन्द्र जी की इस नायाब फिल्म की खास बात यह है कि फणीश्वरनाथ रेणु जी की कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर ऐसी फिल्म बनाना एक बहुत बड़ा जोखिम था, जिसे शैलेन्द्र जी ने उठाया और सखा रआज कपूर जी ने , जो ड्रीम मर्चेन्ट थे, भव्य सेट्स पर बनने वाली फिल्मों के लिए जाने जाते थे, उन्होंने इस फिल्म के लिए एक सीधे-सादे देहाती की भूमिका निभाई, और यह भूमिका उन्होंने मांग कर ली, शैलेन्द्र किसी कम प्रसिद्ध कलाकार को यह भूमिका देना चाहते थे, जिसकी ग्लैमरस इमेज न हो, लेकिन मानना पड़ेगा कि रआज कपूर जी ने इस भूमिका के साथ पूरा न्याय किया|

फिल्म के बारे में बहुत सी बातें की जा सकती हैं, फिलहाल मैं जो गीत शेयर कर रहा हूँ, उसकी ही बात करूंगा और उसे शेयर करूंगा| शैलेन्द्र जी के लिखे इस गीत के लिए संगीत शंकर जयकिशन की सुरीली जोड़ी ने दिया है और इसे सीधे-साधे गाड़ीवान बने रआज कपूर पर फिल्माया गया है| गीत में शैलेन्द्र जी ने जैसे एक सरल और निष्कपट ग्रामीण के मन को जैसे खोलकर रख दिया है, किस तरह सरलता के साथ वह ईश्वर से संवाद और शिकायत करता है| बाकी तो गीत अपने आप बयान करता है| लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-


दुनिया बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई
काहे को दुनिया बनायी
तूने काहे को दुनिया बनायी|

काहे बनाये तूने माटी के पुतले
धरती ये प्यारी प्यारी मुखड़े ये उजले
काहे बनाया तूने दुनिया का खेला
जिसमें लगाया जवानी का मेला
गुप-चुप तमाशा देखे वाह रे तेरी खुदाई|
काहे को दुनिया बनायी|



तू भी तो तड़पा होगा मन को बनाकर
तूफां ये प्यार का मन में छुपाकर
कोई छवि तो होगी आँखों में तेरी
आंसू भी छलके होंगे पलकों से तेरी
बोल क्या सूझी तुझको
काहे को प्रीत जगाई
काहे को दुनिया बनायी
तूने काहे को दुनिया बनायी|



प्रीत बनाके तूने जीना सिखाया
हँसना सिखाया, रोना सिखाया
जीवन के पथ पर मीत मिलाये
मीत मिला के तूने सपने जगाए
सपने जगा के तूने, काहे को दे दी जुदाई
काहे को दुनिया बनायी तूने
दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई
काहे को दुनिया बनाई|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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झूठी कहानी पे रोये!

आज जो गीत शेयर कर रहा हूँ वह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर रची गई एक संभवतः काल्पनिक प्रेम कहानी पर आधारित फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ से है, जो अपने आप में ही एक ऐतिहासिक फिल्म थी| उस समय तक शायद ऐसे भव्य सेट्स और ऐसी स्टार-कास्ट वाली और फिल्में नहीं बनी थीं| इस फिल्म में पृथ्वी राज कपूर साहब, दिलीप कुमार जी, मधुबाला जी, दुर्गा खोटे जी और अनेक अन्य कलाकारों ने लाजवाब अभिनय किया था| के. आसिफ साहब की यह फिल्म, हिन्दी फिल्मों के इतिहास में एक मील का पत्थर थी|

लीजिए अब मैं लता मंगेशकर जी के गाये इस मधुर गीत को शेयर कर रहा हूँ, जो प्रेम में मिली भयंकर चोट को बयां करता है| गीत लिखा है- शकील बदायुनी साहब ने और इसका मधुर संगीत दिया है नौशाद अली साहब ने| प्रस्तुत है यह गीत-



मोहब्बत की झूठी
कहानी पे रोये,

बड़ी चोट खाई
जवानी पे रोये
जवानी पे रोये|

मोहब्बत की झूठी
कहानी पे रोये

न सोचा न समझा
न देखा न भाला
तेरी आरज़ू ने हमें मार डाला
तेरे प्यार की मेहरबानी
पे रोये, रोये|


मोहब्बत की झूठी
कहानी पे रोये|

खबर क्या थी होठों
को सीना पड़ेगा,
मोहब्बत छुपा
के भी जीना पड़ेगा,
जिए तो मगर
ज़िंदगानी पे रोये रोये|

मोहब्बत की झूठी
कहानी पे रोये|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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कोयल से!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पुरानी पोस्ट|

आज मैं विख्यात अंग्रेजी कवि जॉन कीट्स की अंग्रेजी भाषा में लिखी गई एक और कविता के कुछ भाग का भावानुवाद और उसके बाद मूल अंग्रेजी कविता का वह भाग प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। आज के लिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-


जॉन कीट्स

कोयल से


मेरे हृदय में पीड़ा होती है, और सुस्ती भरी सुन्नता दर्द पैदा करती है,
मेरी चेतना को लगता है, जैसे मैंने कोई विषैला पेय पी लिया हो,
अथवा कुछ नशीला पदार्थ नाली में उगल दिया हो,
एक मिनट बीता और याद्दाश्त भुला देने वाली पौराणिक ‘लीथी’ नदी डूब गई :

ऐसा इसलिए नहीं कि मुझे तुम्हारी खुशी से बहुत जलन होती है,
बल्कि इसलिए क्योंकि मैं तुम्हारी खुशी में बहुत खुश हूँ,-
कि हल्के पंखों के साथ तुम हरे-भरे पेड़ों पर बसी आत्मा जैसी हो,
गीतों भरा परिवेश बनाती तुम
हरियाली और असंख्य छायाओं के बीच,
खुले कंठ से ग्रीष्म ऋतु के गीत, बहुत सहजता से गाती हो।


अरे वो, अंगूरी शराब जो लंबे समय तक
धरती के भीतर गहरी दबी रहकर ठंडी हुई थी,
उसमें से फूल-पौधों और हरियाली का स्वाद आता है,
यह नृत्य की थिरकन, जमीन से जुड़े गीत के स्वर
और धूप से भरे उल्लास का वातावरण बनाती है।

दक्षिण का उष्ण सत्व, जैसे किसी ने समुद्र तट की हवा बोतल में भर ली हो,
जिसमें ग्रीक पौराणिक फव्वारे का वास्तविक सुर्ख चमत्कारी जल हो।
ऐसी मदिरा जिसमें निरंतर बुलबुले उठ रहे हों,
और जिसको पियें तो होठों पर बैंगनी निशान बन जाएं।


मेरा मन होता है कि मैं इसे पीकर, दुनिया से गायब हो जाऊं
और तुम्हारे साथ घने जंगलों में खो जाऊं।
कहीं दूर जाकर गायब हो जाऊं, अंतरिक्ष में घुल जाऊं, पूरी तरह भूल जाऊं,
वह सारी परेशानियां, जिनको तुमने पत्तों के बीच रहकर जाना ही नहीं है।

थकान, ज्वर और तनाव,
यहाँ लोग बैठते हैं और एक दूसरे के दुख, उनकी कराह सुनते हैं
जहाँ पक्षाघात वृद्ध लोगों को पूरी तरह लाचार बना देता है
जहाँ युवा पीले पड़ते हैं, दुबले होते हैं और मर जाते हैं।
जहाँ सोचने का मतलब है उदासी से भर जाना,
जहाँ निराशा से बोझिल पलकों के साथ जीना पड़ता है;
जहाँ सौंदर्य की आंखों की चमक भी बनी नहीं रह पाती,
और ऐसा लगता है कि शायद बाद में कोई उन पर सम्मोहित नहीं होगा।


दूर! दूर! क्योंकि मैं उड़कर तुम्हारे पास आऊंगा,
बैकस (यूनानी सुरा देवता) और उसके मित्रों के साथ नहीं,
अपितु काव्य रचनाओं के अदृश्य पंखों पर सवार होकर,
यद्यपि मेरा मस्तिष्क मेरी गति को रोकता है, हतोत्साहित करता है:
पहले से ही तुम्हारे साथ! रात बहुत मृदुल है,
और रात की रानी की तरह चंद्रमा अपने सिंहासन पर विराजमान है,
चारों तरफ से सितारों के रूप में अपने चारणों से घिरा हुआ;
लेकिन कोई प्रकाश नहीं है
सिवाय उसके, जो स्वर्ग से हवा के साथ बहकर आ पाता है,
(पत्तियों से छनकर, घुमावदार रास्तों से)।




और अब अंग्रेजी कविता का वह अंश , जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-



John Keats

Ode to a Nightingale


My heart aches, and a drowsy numbness pains
My sense, as though of hemlock I had drunk,
Or emptied some dull opiate to the drains
One minute past, and Lethe-wards had sunk:
‘Tis not through envy of thy happy lot,
But being too happy in thy happiness, –
That thou, light-winged Dryad of the trees,
In some melodious plot
Of beechen green, and shadows numberless,
Singest of summer in full-throated ease.

O for a draught of vintage! that hath been
Cooled a long age in the deep-delved earth,
Tasting of Flora and the country-green,
Dance, and Provencal song, and sunburnt mirth.
O for a beaker full of the warm South,
Full of the true, the blushful Hippocrene,
With beaded bubbles winking at the brim
And purple-stained mouth;
That I might drink, and leave the world unseen,
And with thee fade away into the forest dim.

Fade far away, dissolve, and quite forget
What thou among the leaves hast never known,
The weariness, the fever, and the fret
Here, where men sit and hear each other groan;
Where palsy shakes a few, sad, last grey hairs,
Where youth grows pale, and spectre-thin, and dies;
Where but to think is to be full of sorrow
And leaden-eyed despairs;
Where Beauty cannot keep her lustrous eyes,
Or new Love pine at them beyond tomorrow.

Away! away! for I will fly to thee,
Not charioted by Bacchus and his pards,
But on the viewless wings of Poesy,
Though the dull brain perplexes and retards:
Already with thee! tender is the night,
And haply the Queen-Moon is on her throne,
Clustered around by all her starry Fays;
But here there is no light
Save what from heaven is with the breezes blown
Through verdurous glooms and winding mossy ways.


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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तुम्हारी ये जवानी सलामत रहे!

एक गीत आज फिर से शेयर कर रहा हूँ मुकेश जी का | इस गीत को शेयर करने से पहले ऐसे ही एक शेर याद आ रहा है, वैसे इसका गीत से कोई संबंध नहीं है, ऐसे ही याद आया तो पेश कर रहा हूँ-

गुज़रो जो बाग से तो दुआ मांगते चलो,
जिसमें लगे हैं फूल वो डाली हरी रहे|


एक और शेर था जो अभी याद नहीं आ रहा है, लेकिन उसमें कहा गया था कि छायादार वृक्ष बने रहें|

ऐसे ही खयाल आया कि अब यहाँ पेड़ वाली छाया तो नहीं है, जिसमें राहगीर को ठंडक मिले, ज़ुल्फ़ों के रंगीन साये को लेकर ही कवि/शायर दुआ करता है कि किसी की जवानी सलामत रहे, खैर दुआ ही की है न, तो अच्छी बात है|

लीजिए आज प्रस्तुत है मुकेश जी का गाया 1968 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘अंजाम’ का गीत, जिसे लिखा है हसरत जयपुरी जी ने और इसके संगीतकार शायद ‘गणेश’ थे| लीजिए प्रस्तुत है ये मधुर गीत –


ज़ुल्फ़ों का रंगी साया,
रे तौबा खुदाया,
तुम्हारी ये जवानी सलामत रहे|
ज़ुल्फ़ों का रंगी साया|

भीगी फिजाएं देखो, चंचल हवाएं देखो,
दिल की सदा है यही, चुप ना रहो|
जागे हैं अरमां मेरे, मुखड़े पे गेसू तेरे,
दिन है कि रात बोलो, कुछ तो कहो|
बोलो ना बोलो हमसे, हम तो कहेंगे तुमसे
तुम्हारी ये जवानी सलामत रहे|
ज़ुल्फ़ों का रंगी साया|


दुनिया में होंगे कई, दिल को चुराने वाले
तुम सा ना देखा कोई, माह-ए-नक़ाब
दुनिया बनाने वाला, तुझको बना के गोरी,
रूप बनाना हाय भूल गया,
तुम्हारा है ज़माना, बना दो तुम दीवाना
तुम्हारी ये जवानी सलामत रहे|
ज़ुल्फ़ों का रंगी साया
|

हाए ये अदाएं तेरी, तुझ से ही बहारें मेरी,
गुल भी पुकारें तुझे बाद-ए-सबा
बिगड़ी बनाना सीखो, दिल का लगाना सीखो,
ज़ुल्फ़ें बनाना छोड़ो, जान-ए-वफ़ा,
लबों पे सदा ही आएं हमारे ये दुआएं
तुम्हारी ये जवानी सलामत रहे|
ज़ुल्फ़ों का रंगी साया||




आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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बहारो थाम लो अब दिल!

आज फिर से एक बार मैं एक युगल गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसे लता मंगेशकर जी और मुकेश जी ने गाया है| फिल्म – ‘नमस्ते जी’ के लिए यह गीत लिखा था अंजान साहब ने और इसका संगीत दिया था जी एस. कोहली जी ने| मुकेश जी और लता जी के बहुत से रोमांटिक गीतों में यह गीत भी शामिल है|

लीजिए आज प्रस्तुत है यह मधुर गीत-


बहारो थाम लो अब दिल,
मेरा महबूब आता है,
शरारत कर न नाजुक दिल
शरम से डूब जाता है|

कहर अंदाज़ हैं तेरे,
क़यामत हैं तेरी बातें|
मेरी तो जान लेंगे
ये बातें ये मुलाकातें|
सनम शरमाए जब ऐसे,
मज़ा कुछ और आता है|


शरारत कर न नाजुक दिल
शरम से डूब जाता है|

लबों पर ये हँसी कातिल,
गज़ब जादू निगाहों में,
कसम तुझको मुहब्बत की
मचल ऐसे न राहों में|
मचल जाता है दिल जब
रू-ब-रू दिलदार आता है|

बहारो थाम लो अब दिल,
मेरा महबूब आता है,
शरारत कर न नाजुक दिल
शरम से डूब जाता है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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