कभी चांद नगर के हम हैं!

जिस्म से रूह तलक अपने कई आलम हैं,
कभी धरती के, कभी चांद नगर के हम हैं |

निदा फ़ाज़ली

कहाँ के हैं, किधर के हम हैं!

वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से,
किसको मालूम, कहाँ के हैं, किधर के हम हैं |

निदा फ़ाज़ली

दूसरे घर के हम हैं!

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है,
अपने ही घर में, किसी दूसरे घर के हम हैं |

निदा फ़ाज़ली

चला गया मटरू!

बहुत लंबा समय नहीं हुआ है, शायद सात-आठ माह हुए हों, मैंने अपनी ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से अपने घर की बॉलकनी में आकर एक मेहमान के स्थापित होने की सूचना दी थी| उसी समय गोवा में तूफान आया था, शायद उससे भी इस मेहमान के आने का संबंध हो, यह एक श्वेत कपोत था, जिसे हमने ‘मटरू’ नाम दिया| बीच में एक दो बार ऐसा हुआ कि मटरू एक-दो दिन दिखाई नहीं दिया, इस पर भी मैंने एक ब्लॉग-पोस्ट लिखी थी ‘आना और जाना मटरू का’|

हमारी बॉलकनी पर लगे स्पलिट एसी के हवा फेंकने वाले भाग, शायद उसे वेंटीलेटर कहते हैं न!, उसके ऊपर मटरू का निवास बन गया| वह रात भर उस पर ही बैठकर सोता और सुबह नाश्ता करने के बाद वह भ्रमण पर निकल जाता और फिर शाम को सूर्यास्त से काफी पहले वह वापस अपने स्थान पर होता था, जहां अपने पक्षी स्वभाव के अनुसार वह सूर्यास्त से पहले ही शाम का भोजन करता था|

वैसे हमारे यहाँ पक्षियों को दाना डालने की परंपरा तो काफी पुरानी है लेकिन इस तरह का संबंध किसी पक्षी के साथ तो नहीं बना था, वैसे वो था भी बिल्कुल अलग श्वेत कपोत, देखने में सबके बीच बिल्कुल अलग दिखता था, जैसे सामान्य जनता के बीच कोई अभिजात व्यक्तित्व, वैसे तो हम उसको वेंटीलेटर के ऊपर ही खाना दे देते थे, ऐसा कम ही होता था कि वह नीचे सामान्य-जन के साथ भोजन करने के लिए उतर आता था, तब लगता था कि वह बड़ी शान के साथ उनके बीच वीआईपी की तरह भोजन करता था, ऐसे में यह भी हो जाता था कि कभी कोई दूसरा सामान्य कबूतर ऊपर उसके स्थान पर बैठ जाता था, तब हमें तुरंत उसको वहाँ से उड़ाना होता था और वह वापस जाकर अपने स्थान पर बैठ जाता था|

यह भी हुआ कि मटरू के साथ हमें कुछ अन्य पक्षियों से भी परिचित होने का अवसर मिला, जो किसी प्रकार दूसरों से अलग थे| जैसे एक कबूतर बहुत सुंदर है लेकिन उसका पंजा कटा हुआ है| पता नहीं ऐसे पक्षी तो कई हैं जिनका कोई एक पंजा कटा हुआ है, शायद इसमें किसी इंसान का योगदान होगा| एक कौआ है जिसका एक पैर ही नहीं है| मैं उसकी तरफ रोटी या बिस्कुट का टुकड़ा उछाल देता हूँ जिसे वह कैच कर लेता है| कभी ऐसा भी होता है कि दो-तीन बार उछालने पर भी वह उसे कैच नहीं कर पाता, तब वह शायद मान लेता है कि आज यह उसकी किस्मत में नहीं है|

खैर फिर मटरू की बात करता हूँ, आज शाम जब मेरी पत्नी मटरू को शाम की खुराक देने के लिए बाल्कनी में गई तो पाया कि वह फर्श पर लुढ़का हुआ था, कोई चोट का निशान नहीं था, लगता है स्वाभाविक मौत ही मरा था, बहुत बार खयाल आता था कि यह कब तक हमारे साथ रहेगा, उसका जवाब भी मिल गया, अब जब वह दिखाई नहीं देगा तो यह इंतजार नहीं रहेगा कि कब आएगा|

जिस प्रकार मटरू फर्श पर पड़ा था, उसे देखकर श्रीलाल शुक्ल जी के उपन्यास ‘राग दरबारी’ का प्रसंग याद या गया, शायद यह अंतिम दृश्य था, जैसा अभी तक याद है, उपन्यास में एक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी अपना पेंशन संबंधी स्वीकृति आदेश देखने के लिए प्रतिदिन दफ्तर के नोटिस बोर्ड तक जाता है और उसे नहीं पाकर वापस लौट आता है| एक दिन दूसरे लोग देखते हैं कि वह नोटिस बोर्ड के नीचे मृत पड़ा है और उस बोर्ड पर एक कागज फड़फड़ा रहा है, जो उसका पेंशन स्वीकृति आदेश है|

मटरू को क्या प्रतीक्षा थी, ये तो वही जाने, बस वह भी चला गया| कुछ पंक्तियाँ जो दिल्ली में बहुत पहले ट्रेन में साथ चलने वाले कुछ कविता प्रेमी सज्जनों से सुनी थीं, ऐसे ही याद आ रही हैं, किसकी लिखी हुई हैं, मुझे मालूम नहीं है –

उधर वो घर से निकल चुके हैं,
इधर मेरा दम निकल रहा है,
अजब तमाशा है ज़िंदगी का
वो आ रहे हैं, मैं जा रहा हूँ|

वह एक पक्षी था, आता था उड़ जाता था, मोह के कारण फिर लौट आता था, जैसे जहाज का पंछी! इस बार जिन्होंने उड़ान भरी, वह मटरू नहीं, उसके प्राण-पखेरू थे| उनका भी तो पक्षी रूप में ही ज़िक्र करते हैं हम!
ईश्वर उसकी आत्मा को शांति दें|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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नई तहज़ीब के पेशे-नज़र हम!

अब नई तहज़ीब के पेशे-नज़र हम,
आदमी को भून कर खाने लगे हैं|

दुष्यंत कुमार

क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है!

एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है,
जिसमें तहख़ानों में तहख़ाने लगे हैं|

दुष्यंत कुमार