Categories
Uncategorized

सूर्यास्त : एक इंप्रेशन

आज एक बार फिर से मैं स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| दुष्यंत कुमार जी को आपातकाल में लिखी गई उनकी गज़लों के कारण विशेष रूप से प्रसिद्धि मिली थी, जिनको उनके संकलन ‘साये में धूप’ में शामिल किया गया था और मैंने उनकी कुछ गज़लें पहले शेयर भी की हैं| आज मैं उनकी अलग तरह की कविता शेयर कर रहा हूँ, जो उन्होंने सूर्यास्त के अनुभव को लेकर लिखी है|


लीजिए प्रस्तुत है दुष्यंत कुमार जी की यह कविता-

सूरज जब
किरणों के बीज-रत्न
धरती के प्रांगण में
बोकर
हारा-थका
स्वेद-युक्त
रक्त-वदन
सिन्धु के किनारे
निज थकन मिटाने को
नए गीत पाने को
आया,

तब निर्मम उस सिन्धु ने डुबो दिया,
ऊपर से लहरों की अँधियाली चादर ली ढाँप
और शान्त हो रहा।


लज्जा से अरुण हुई
तरुण दिशाओं ने
आवरण हटाकर निहारा दृश्य निर्मम यह!
क्रोध से हिमालय के वंश-वर्त्तियों ने
मुख-लाल कुछ उठाया
फिर मौन सिर झुकाया
ज्यों – ‘क्या मतलब?’
एक बार सहमी
ले कम्पन, रोमांच वायु
फिर गति से बही
जैसे कुछ नहीं हुआ!


मैं तटस्थ था, लेकिन
ईश्वर की शपथ!
सूरज के साथ
हृदय डूब गया मेरा।
अनगिन क्षणों तक
स्तब्ध खड़ा रहा वहीं
क्षुब्ध हृदय लिए।
औ’ मैं स्वयं डूबने को था
स्वयं डूब जाता मैं
यदि मुझको विश्वास यह न होता –-
‘मैं कल फिर देखूँगा यही सूर्य
ज्योति-किरणों से भरा-पूरा

धरती के उर्वर-अनुर्वर प्रांगण को
जोतता-बोता हुआ,
हँसता, ख़ुश होता हुआ।’


ईश्वर की शपथ!
इस अँधेरे में
उसी सूरज के दर्शन के लिए
जी रहा हूँ मैं
कल से अब तक!


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
******

Categories
Uncategorized

चाय-सी ठंडी हँसी, आँखें तराजू!

एक बार फिर से मैं अपने एक प्रिय कवि और नवगीत विधा के प्रमुख हस्ताक्षर स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| रंजक जी ने हर प्रकार के गीत लिखे हैं और वे जुझारूपन और बेबाकी के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं|

लीजिए प्रस्तुत है रंजक जी का यह गीत-

मरने दे बन्धु!
उसे मरने दे

एक रोगी की तरह जो दोस्ती
रोज़ खाती है दवाई चार सिक्के की
और फिर चलती बड़े अहसान से
चाल इक्के की
जो अँगूठी
रोज़ उँगली में करकती है
उतरने दे


मोल के ये दिन, मुलाक़ातें गरम
सामने भर का घरेलूपन
चाय-सी ठंडी हँसी, आँखें तराजू,
एक टुकड़ा मन
खोलने इस बन्दगोभी को
एक दिन तो बात करने दे

मरने दे बन्धु!
अरे! मरने दे


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
******

Categories
Uncategorized

नए तीर हैं, निशाने ढूँढते हैं !

प्रसिद्ध शायर अहमद फ़राज़ साहब की एक गजल आज प्रस्तुत कर रहा हूँ| फ़राज़ साहब भारतीय उपमहाद्वीप के बहुत मशहूर शायर हैं, वैसे विभाजन के बाद वे पाकिस्तान में रहते थे |

शायरी की दुनिया में फ़राज़ साहब बहुत मशहूर हैं और उनकी अनेक गज़लें जगजीत सिंह जी और गुलाम अली जी ने भी गायी हैं-


किताबों में मेरे फ़साने ढूँढते हैं,
नादां हैं गुज़रे ज़माने ढूँढते हैं ।

जब वो थे, तलाशे-ज़िंदगी भी थी,
अब तो मौत के ठिकाने ढूँढते हैं ।


कल ख़ुद ही अपनी महफ़िल से निकाला था,
आज हुए से दीवाने ढूँढते हैं ।

मुसाफ़िर बे-ख़बर हैं तेरी आँखों से,
तेरे शहर में मैख़ाने ढूँढते हैं ।

तुझे क्या पता ऐ सितम ढाने वाले,
हम तो रोने के बहाने ढूँढते हैं ।


उनकी आँखों को यूँ ना देखो ’फ़राज़’,
नए तीर हैं, निशाने ढूँढते हैं ।



आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
******

Categories
Uncategorized

तरक्की के पैमाने!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है और मैं 2018 में हुई एक दुखद घटना की प्रतिक्रियास्वरूप लिखी अपनी एक पोस्ट, फिर से शेयर कर रहा हूँ|

आज हम वर्ष 2018 में जी रहे हैं, सुना है हिंदुस्तान दुनिया की बड़ी ताक़त बन गया, आर्थिक शक्तिसंपन्न देशों में भारत की गिनती होने लगी है। कितने पैमाने होते हैं किसी देश की तरक्की को मापने, उन सबका उदाहरण देते हुए बताया जाता है कि भारतवर्ष कितना आगे बढ़ गया है!

एक बहुत पुराना पैमाना है, गोस्वामी तुलसीदास जी का बताया हुआ-


जासु राज सुन प्रजा दुखारी, सो नृप अवस नरक अधिकारी


और हम रामराज्य की कल्पना करते हैं, एक गाय को मारने अथवा ऐसा प्रयास करने में हमारे यहाँ लोग, कुछ इंसानों को मारने में भी संकोच नहीं करते।
रामराज्य के बारे में एक और उद्धरण गोस्वामी जी का याद आता है-


दैहिक, दैविक, भौतिक तापा
रामराज्य नहीं काहुई व्यापा।

मैं दलगत राजनीति की बात नहीं करना चाहता, सीधे बात करना चाहूंगा- देश की राजधानी दिल्ली में, तीन बच्चे भूख से मर गए। ये किसी भी समाज के लिए डूब मरने की बात है।


दिल्ली में- नगर की, केंद्र शासित क्षेत्र की और केंद्र की, दोनो सरकारें हैं। लेकिन मैं इस घटना को किसी पार्टी अथवा सरकार से नहीं जोड़ना चाहता। सबसे पहली बात तो यह है कि हमारे समाज में, आस-पड़ौस के लोगों को यह जानकारी होनी चाहिए कि उनके आस पास किसी परिवार में ऐसी स्थिति है कि बच्चों के भूख से मरने की नौबत आ रही है।


यह तीन बच्चों की नहीं, ये इंसानियत की मौत है, बेशक हमारी सरकारों को भी ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए कि कहीं ऐसी नौबत आने वाली है तो उसको पहचाना जाए और जरूरी कदम उठाए जाएं। और हाँ आस-पड़ौस के लोगों को भी सहायता के लिए तत्पर रहना चाहिए।


आज गुरुदत्त जी की फिल्म का एक गीत याद आ रहा है, जिसे यहाँ शेयर कर रहा हूँ। फिल्म प्यासा के इस गीत को साहिर लुधियानवी जी ने लिखा है और एस.डी.बर्मन जी के संगीत निर्देशन में मोहम्मद रफी साहब ने गाया है। प्रस्तुत है ये गीत-


ये कूचे, ये नीलामघर दिलकशी के
ये लुटते हुए कारवां जिंदगी के
कहाँ है, कहाँ है मुहाफ़िज़ खुदी के
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है


ये पुरपेच गलियां, ये बदनाम बाज़ार
ये गुमनाम राही, ये सिक्कों की झंकार
ये इस्मत के सौदे, ये सौदे पे तकरार
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …


ये सदियों से बेखौफ़ सहमी सी गलियां
ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलियां
ये बिकती हुई खोखली रंगरलियाँ
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …

वो उजले दरीचों में पायल की छन-छन
थकी हारी सांसों पे तबले की धन-धन
ये बेरूह कमरो में खांसी की ठन-ठन
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …


ये फूलों के गजरे, ये पीकों के छींटे
ये बेबाक नज़रें, ये गुस्ताख फ़िक़रे
ये ढलके बदन और ये बीमार चेहरे
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …


यहाँ पीर भी आ चुके हैं, जवां भी
तनूमन्द बेटे, अब्बा मियां भी
ये बीवी भी है और बहन भी, माँ भी
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …


मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी
यशोदा की हम्जिन्स, राधा की बेटी
पयम्बर की उम्मत , जुलेखां की बेटी
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …

ज़रा इस मुल्क के रहबरों को बुलाओ
ये कूचे ये गलियां ये मंज़र दिखाओ
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर उनको लाओ
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
********

Categories
Uncategorized

खेल का मेरा साथी- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। आज भी मैंने अनुवाद के लिए अंग्रेजी कविता को ऑनलाइन उपलब्ध कविताओं में से लिया है, पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘My Playmate’ का भावानुवाद-


गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

My Playmate!



अब मेरे मुख से , कोई शोर भरे स्वर नहीं निकलेंगे, ऐसी है मेरे स्वामी की इच्छा| अब मैं केवल धीमे स्वर में ही बात करूंगा|
मेरे हृदय की ध्वनि, किसी गीत को गुनगुनाने में ही अभिव्यक्त होगी| लोग तेज़ी से आगे बढ़ते हैं, राजा के बाजार की तरफ, सभी विक्रेता और खरीदार वहाँ हैं| परंतु मुझे असमय ही दूर जाना है, भरी दोपहरी में, कार्य की व्यस्तता के बीच|
चलो फिर पुष्पों को मेरे बगीचे में खिलने दो, यद्यपि ये उनके खिलने का समय नहीं है, और दोपहरी में मधुमक्खियों को अपनी सुस्त धुन में गुनगुनाने दो|
मैंने कितने ही घंटे बिताए हैं, अच्छे और बुरे की पहचान करने में, परंतु अब मेरे पास आनंद है, जब खाली दिनों में मेरे खेल का साथी, मेरे हृदय को अपनी ओर खींचता है, मुझे नहीं मालूम कि अचानक आया यह बुलावा, किस निरर्थक असंगति के लिए है!


-रवींद्रनाथ ठाकुर




और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


My Playmate




No more noisy, loud words from me, such is my master’s will. Henceforth I deal in whispers. The speech of my heart will be carried on in murmurings of a song.
Men hasten to the King’s market. All the buyers and sellers are there. But I have my untimely leave in the middle of the day, in the thick of work.
Let then the flowers come out in my garden, though it is not their time, and let the midday bees strike up their lazy hum.
Full many an hour have I spent in the strife of the good and the evil, but now it is the pleasure of my playmate of the empty days to draw my heart on to him, and I know not why is this sudden call to what useless inconsequence!




-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


******

Categories
Uncategorized

अपनी रात की छत पर, कितना तन्हा होगा चांद!

प्रसिद्ध लेखक, उपन्यासकार, पटकथा लेखक और गीतकार स्वर्गीय डॉक्टर राही मासूम रज़ा साहब की एक प्रसिद्ध ग़ज़ल मैं आज शेयर कर रहा हूँ| उनके उपन्यास – आधा गाँव, दिल एक सादा कागज, टोपी शुक्ला, मैं एक फेरीवाला आदि बहुत प्रसिद्ध हुए थे और बड़ी भावुकता और राजनीति पर पैनी दृष्टि के साथ उन्होंने ये उपन्यास लिखे हैं| उनको पद्मश्री, पद्मभूषण आदि प्रतिष्ठित पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया था| उनके लिखे कई गीत भी काफी लोकप्रिय हुए हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है डॉक्टर राही मासूम रज़ा साहब की ये खूबसूरत ग़ज़ल, जिसे जगजीत सिंह जी ने भी गाया है-

हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद,
अपनी रात की छत पर, कितना तन्हा होगा चांद|

जिन आँखों में काजल बनकर, तैरी काली रात,
उन आँखों में आँसू का इक, कतरा होगा चांद|

रात ने ऐसा पेंच लगाया, टूटी हाथ से डोर,
आँगन वाले नीम में जाकर, अटका होगा चांद|

चांद बिना हर दिन यूँ बीता, जैसे युग बीते,
मेरे बिन किस हाल में होगा, कैसा होगा चांद|



आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
******

Categories
Uncategorized

मोहब्बत रास्ता ही रास्ता है!

आज मैं प्रसिद्ध उर्दू शायर जनाब असद भोपाली जी की एक खूबसूरत सी ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| इस छोटी सी ग़ज़ल में कुछ असरदार शेरों के माध्यम से शायर ने मुहब्बत के जज़्बे और हौसले को अभिव्यक्त किया है|

लीजिए प्रस्तुत है ये खूबसूरत ग़ज़ल-

न साथी है न मंज़िल का पता है,
मोहब्बत रास्ता ही रास्ता है|

वफ़ा के नाम पर बर्बाद होकर,
वफ़ा के नाम से दिल काँपता है|

मैं अब तेरे सिवा किसको पुकारूँ,
मुक़द्दर सो गया ग़म जागता है|

वो सब कुछ जानकर अनजान क्यूँ हैं,
सुना है दिल को दिल पहचानता है|


ये आँसू ढूँढता है तेरा दामन,
मुसाफ़िर अपनी मंज़िल जानता है|


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
******

Categories
Uncategorized

बेहतरीन कलाकार- पंकज त्रिपाठी

भारतीय फिल्म और सीरियलों की दुनिया में अनेक बेहतरीन कलाकार रहे हैं और आज मैं इस समय के एक अत्यंत प्रतिभाशाली कलाकार- श्री पंकज त्रिपाठी के बारे में बात करना चाहता हूँ|

अभी पिछले एक सप्ताह में ही मैंने उनकी दो टेलीफ़िल्म, वेब सीरीज़ – देखीं- ‘कागज’, जो कल ही मैंने देखी और उससे पहले वेब सीरीज़- ‘क्रिमिनल जस्टिस- बिहाइन्ड क्लोज्ड डोर्स’| इस वेब सीरीज़ में पंकज जी ने एक वकील की भूमिका निभाई, ऐसा वकील जो रहन-सहन और मन से एकदम देहाती है, जब थाने से उसका कोई जानने वाला उसे केस के बारे में बताता है, तब वह चला जाता है, और बड़ी सादगी से, बिना किसी चालाकी के वकील की भूमिका निभाता है और इत्तेफाक से, बहुत बड़े वकील के मुक़ाबले जीत भी जाता है|


‘कागज’ फिल्म में पंकज जी ने एक ऐसे सीधे-साधे देहाती व्यक्ति की भूमिका निभाई है, जिसको उसके संबंधी जमीन हड़पने के लिए सरकारी अभिलेखों में मृत घोषित करा देते हैं| इन परिस्थितियों में वह सीधा-सादा व्यक्ति कैसे स्वयं को जीवित घोषित कराने के लिए संघर्ष करता है, उसको पंकज जी ने बहुत मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त किया है| एक बात और, इस फिल्म में पंकज जी वेश-भूषा और दिखाई देने में, बिलकुल ‘तीसरी कसम’ के राज कपूर लगते हैं|


आज के लिए ये दो भूमिकाएँ अचानक याद आयीं, वैसे तो उनकी हर भूमिका अत्यंत प्रभावशाली रही है, मिर्जापुर सीरीज़ के भाग 1 और 2 में भी, एक गैंगस्टर- अखंडानन्द त्रिपाठी बनाम ‘कालीन भैया’ के रूप में उनकी भूमिका के लिए उन्हें बहुत पसंद किया गया| उनकी इस भूमिका को देखकर फिल्मों के विख्यात खलनायक अजीत की याद आती है, जो सामने वाला जब चिल्लाकर उनको धमकी देता है, तब बड़े सहज भाव से बोलते है, ‘जरा अपने पीछे तो देख लो’, जहां उनके गुंडे उसको घेरे खड़े होते हैं| मतलब खलनायक या गैंगस्टर होने के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि आप चिल्लाकर बोलें|


पंकज जी की यादगार भूमिकाएँ अनेक हैं, यहाँ बस कुछ का ही उल्लेख कर रहा हूँ, जैसे- ओंकारा, गैङ्ग्स ऑफ वासेपुर, गुंजन सक्सेना, लूडो, बरेली की बर्फी, स्त्री, न्यूटन, सुपर 30, मसान आदि-आदि|


मैं यही शुभकामना करता हूँ कि पंकज जी इसी प्रकार बेहतरीन भूमिकाएँ निभाते रहें और सफलता की नई ऊंचाइयों को छुएँ|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

Categories
Uncategorized

यह अँधेरे की पिटारी, रास्ता यह साँप-सा!

हिन्दी साहित्य में मेरी विशेष रुचि है और मैं अक्सर इसी विषय में लिखता हूँ और कविताएं आदि शेयर करता हूँ| लेकिन मेरी एक कमजोरी है, मुझे गीत-कविताओं से ज्यादा लगाव है और मैं उनको ज्यादा शेयर करता हूँ|

लीजिए मैं आज स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ, जो कविता के प्रमुख हस्ताक्षरों में से एक थे और ‘दिनमान’ नामक समाचार पत्रिका में कार्य कराते थे| पहले अज्ञेय जी और बाद में रघुवीर सहाय जी द्वारा संपादित यह पत्रिका, भारतवर्ष में इस प्रकार की पहली ‘समाचार पत्रिका’ थी|


लीजिए आज मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की यह कविता, जो जीवन के दौरान की जाने वाली भौतिक और आंतरिक यात्राओं के संघर्ष को अभिव्यक्ति देती है-

यह सिमटती साँझ,
यह वीरान जंगल का सिरा,
यह बिखरती रात, यह चारों तरफ सहमी धरा;
उस पहाड़ी पर पहुँचकर रोशनी पथरा गयी,
आख़िरी आवाज़ पंखों की किसी के आ गयी,
रुक गयी अब तो अचानक लहर की अँगड़ाइयाँ,
ताल के खामोश जल पर सो गई परछाइयाँ।


दूर पेड़ों की कतारें एक ही में मिल गयीं,
एक धब्बा रह गया, जैसे ज़मीनें हिल गयीं,
आसमाँ तक टूटकर जैसे धरा पर गिर गया,
बस धुँए के बादलों से सामने पथ घिर गया,
यह अँधेरे की पिटारी, रास्ता यह साँप-सा,
खोलनेवाला अनाड़ी मन रहा है काँप-सा।


लड़खड़ाने लग गया मैं, डगमगाने लग गया,
देहरी का दीप तेरा याद आने लग गया;
थाम ले कोई किरन की बाँह मुझको थाम ले,
नाम ले कोई कहीं से रोशनी का नाम ले,
कोई कह दे, “दूर देखो टिमटिमाया दीप एक,
ओ अँधेरे के मुसाफिर उसके आगे घुटने टेक!”


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
******

Categories
Uncategorized

सौ बातों की एक बात है !

लीजिए आज फिर से मैं कभी काव्य-मंचों के अत्यंत लोकप्रिय कवि रहे स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिसमें उन्होंने बड़ी भावुकता के साथ यह चित्रण किया है, कि किस प्रकार हमको जीवन के सभी रंगों, सभी प्रकार की परिस्थितियों, कभी साथ और कभी अकेलेपन का सामना करना पड़ता है|

लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत-



सौ बातों की एक बात है ।

रोज़ सवेरे रवि आता है।
दुनिया को दिन दे जाता है,
लेकिन जब तम इसे निगलता,
होती जग में किसे विकलता|
सुख के साथी तो अनगिन हैं,
लेकिन दुःख के बहुत कठिन हैं|

सौ बातो की एक बात है |


अनगिन फूल नित्य खिलते हैं,
हम इनसे हँस-हँस मिलते हैं|
लेकिन जब ये मुरझाते हैं,
तब हम इन तक कब जाते हैं|
जब तक हममे साँस रहेगी,
तब तक दुनिया पास रहेगी|

सौ बातों की एक बात है |


सुन्दरता पर सब मरते हैं,
किन्तु असुंदर से डरते हैं|
जग इन दोनों का उत्तर है,
जीवन इस सबके ऊपर है|
सबके जीवन में क्रंदन है,
लेकिन अपना-अपना मन है|

सौ बातों की एक बात है ।



आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
******