सायों को गले लगा रहा हूँ!

आया न ‘क़तील’ दोस्त कोई,
सायों को गले लगा रहा हूँ|

क़तील शिफ़ाई

दर अपना ही खटखटा रहा हूँ!

मुमकिन है जवाब दे उदासी,
दर अपना ही खटखटा रहा हूँ|

क़तील शिफ़ाई

जज़्बात के ज़ख़्म खा रहा हूँ!

है शहर में क़हत पत्थरों का,
जज़्बात के ज़ख़्म खा रहा हूँ|

क़तील शिफ़ाई

प्यासा ही पलट के जा रहा हूँ!

दरिया-ए-फ़ुरात है ये दुनिया,
प्यासा ही पलट के जा रहा हूँ|

क़तील शिफ़ाई

चेहरे पे ख़ुशी सजा रहा हूँ!

अहबाब को दे रहा हूँ धोखा,
चेहरे पे ख़ुशी सजा रहा हूँ|

क़तील शिफ़ाई

सूरज से बदन छुपा रहा हूँ!

सीने में मिरे है मोम का दिल,
सूरज से बदन छुपा रहा हूँ|

क़तील शिफ़ाई

शीशे के महल बना रहा हूँ!

हालात से ख़ौफ़ खा रहा हूँ,
शीशे के महल बना रहा हूँ|

क़तील शिफ़ाई

जिससे अपनी पीर कहूँ मैं!

आज मैं एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ, जो मेरे अत्यंत प्रिय कवि से संबंधित है|
लीजिए फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय गीत कवि स्व. भारत भूषण जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। कविता, गीत आदि स्वयं अपनी बात कहते हैं और जितना ज्यादा प्रभावी रूप से कहते हैं, वही उसकी सफलता की पहचान है।

लीजिए आज के लिए स्व. भारत भूषण जी का यह गीत आपको समर्पित है-

जिस पल तेरी याद सताए, आधी रात नींद जग जाये,
ओ पाहन! इतना बतला दे, उस पल किसकी बाहँ गहूँ मैं।
अपने अपने चाँद भुजाओं,
में भर भर कर दुनिया सोये।
सारी सारी रात अकेला,
मैं रोऊँ या शबनम रोये।
करवट में दहकें अंगारे, नभ से चंदा ताना मारे,
प्यासे अरमानों को मन में दाबे कैसे मौन रहूँ मैं।

गाऊँ कैसा गीत कि जिससे,
तेरा पत्थर मन पिघलाऊँ,
जाऊँ किसके द्वार जहाँ ये,
अपना दुखिया मन बहलाऊँ।
गली गली डोलूँ बौराया, बैरिन हुई स्वयं की छाया,
मिला नहीं कोई भी ऐसा, जिससे अपनी पीर कहूं मैं।


टूट गया जिससे मन दर्पण,
किस रूपा की नजर लगी है।
घर घर में खिल रही चाँदनी,
मेरे आँगन धूप जगी है।
सुधियाँ नागन सी लिपटी हैं, आँसू आँसू में सिमटी हैं।
छोटे से जीवन में कितना, दर्द-दाह अब और सहूँ मैं।

फटा पड़ रहा है मन मेरा,
पिघली आग बही काया में।
अब न जिया जाता निर्मोही,
गम की जलन भरी छाया में।
बिजली ने ज्यों फूल छुआ है, ऐसा मेरा हृदय हुआ है।
पता नहीं क्या क्या कहता हूँ, अपने बस में आज न हूँ मैं।



(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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रास्ते में सितारे लुटाएँ हम!

तू इतनी दिल-ज़दा तो न थी ऐ शब-ए-फ़िराक़,
आ तेरे रास्ते में सितारे लुटाएँ हम|

अहमद फ़राज़