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दूसरा बनवास !

कैफ़ी आज़मी साहब हमारे देश के ऐसे मशहूर शायरों में शामिल थे, जिनका नाम शायरी की दुनिया में बहुत आदर के साथ लिया जाता है| आज उनकी जो नज़्म मैं शेयर कर रहा हूँ उसमें उन्होंने बताया है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी यदि बाबरी मस्जिद का गिराया जाना देखते तो उनको कैसा महसूस होता|


लीजिए आज प्रस्तुत है कैफ़ी साहब की यह भावपूर्ण नज़्म-


राम बन-बास से जब लौट के घर में आए,
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आए|

रक़्स-ए-दीवानगी आँगन में जो देखा होगा
छः दिसम्बर को श्रीराम ने सोचा होगा
इतने दीवाने कहाँ से मिरे घर में आए|

जगमगाते थे जहाँ राम के क़दमों के निशाँ
प्यार की कहकशाँ लेती थी अंगड़ाई जहाँ,
मोड़ नफ़रत के उसी राहगुज़र में आए|


धर्म क्या उनका था, क्या ज़ात थी, ये जानता कौन
घर न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन
घर जलाने को मिरा लोग जो घर में आए|

शाकाहारी थे मेरे दोस्त तुम्हारे ख़ंजर
तुम ने बाबर की तरफ़ फेंके थे सारे पत्थर
है मिरे सर की ख़ता, ज़ख़्म जो सर में आए|


पाँव सरजू में अभी राम ने धोए भी न थे
कि नज़र आए वहाँ ख़ून के गहरे धब्बे
पाँव धोए बिना सरजू के किनारे से उठे
राम ये कहते हुए अपने द्वारे से उठे,

राजधानी की फ़ज़ा आई नहीं रास मुझे
छः दिसम्बर को मिला दूसरा बनबास मुझे|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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आँख बच्ची की पनीली है!

आज अदम गोंडवी जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| ठेठ देहाती अंदाज़ में आम जनता के जीवन की सच्चाइयों को अदम गोंडवी जी ने बड़े सलीके के साथ बेबाक़ी के साथ अभिव्यक्त किया है|


लीजिए आज अदम गोंडवी जी की इस ग़ज़ल का आनंद लीजिए-

घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है।
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फाल्गुन की नशीली है।।

भटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारन-सी।
सुबह से फरवरी बीमार पत्नी से भी पीली है।।

बग़ावत के कमल खिलते हैं दिल के सूखे दरिया में।
मैं जब भी देखता हूँ आँख बच्चों की पनीली है।।

सुलगते जिस्म की गर्मी का फिर एहसास हो कैसे।
मोहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है।।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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आना-जाना रहे, रहे ना रहे!

आज फिर से प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग,जो मेरे लिए अविस्मरणीय है।


दिल्ली में सरकारी सेवा के दौरान ही मैंने स्टाफ सेलेक्शन कमीशन की एक और परीक्षा दी, जो हिंदी अनुवादक के पद पर चयन के लिए थी। इस परीक्षा में मैं सफल हुआ और उसके आधार पर ही आकाशवाणी, जयपुर में अनुवादक पद के लिए मेरा चयन हुआ।
इस परीक्षा के प्रश्न-पत्र का एक प्रश्न मुझे आज तक याद है। प्रश्न शायद‌ था ‘लोकतंत्र बनाम भीड़तंत्र’। इस प्रश्न के उत्तर में मैंने एच.जी.वेल्स के विज्ञान आधारित उपन्यास ‘द आइलैंड ऑफ डॉ. मोया’ का उदाहरण देते हुए इसकी व्याख्या की थी। मैंने लिखा था कि जैसे कि यह माना जाता है कि हमारे पूर्वज बंदर थे और विकसित होते-होते आज के मानव का परिष्कृत रूप सामने आया है।

उपर्युक्त उपन्यास के आधार पर मैंने लिखा था कि डॉ. मोया इसमें विभिन्न प्रजातियों के जानवरों को लाकर एक द्वीप पर रखते हैं और उनको इंसान की तरह व्यवहार करना सिखाते हैं। किस तरह उठना-बैठना है, किस तरह खाना-पीना है। इस प्रकार सभी जानवर इंसान जैसा व्यवहार करने लगते हैं, लेकिन धीरे-धीरे उनकी संख्या बढ़ती है, उनको अनुशासित रखना मुश्किल होता जाता है, जहाँ मौका मिलता है, कुत्ता जीभ निकालकर उसी तरह पानी पीने लगता है, जैसे पहले पीता था, हिंसक जानवरों की मूल प्रवृत्ति वापस लौटने लगती है और डॉ. मोया वहाँ से अपनी जान बचाकर भागते हैं।


उपर्युक्त उदाहरण देकर मैंने यह लिखा था कि यह माना जाता है कि हम पशु से विकसित होकर मनुष्य बने थे लेकिन जैसे-जैसे भीड़ बढ़ती जा रही है, हमारे अंदर की पाशविक प्रवृत्ति पुनः पनपने लगी है।

खैर, जो भी हो मैं परीक्षा में सफल हुआ और आकाशवाणी, जयपुर में मेरी हिंदी अनुवादक के पद पर नियुक्ति हुई। उद्योग मंत्रालय तथा संसदीय राजभाषा समिति में 6 वर्ष सेवा करने के बाद 30 सितंबर,1980 की रात में मैंने दिल्ली छोड़ी और 1 अक्तूबर को आकाशवाणी, जयपुर में कार्यग्रहण किया।

जयपुर के साहित्यिक मित्रों और वहाँ के परिदृश्य के संबंध में, मैं शुरू के ही एक ब्लॉग में लिख चुका हूँ, कुछ और बातें, जो पहले नहीं कह पाया था अब कहूंगा।

आकाशवाणी में मैं प्रशासन शाखा में था और मेरी मित्रता वहाँ कार्यक्रम विभाग के लोगों से अधिक थी।


प्रशासन शाखा में, मेरे सामने बैठते थे- श्री राम चंद्र बैरवा, जो हेड क्लर्क थे, कार्यक्रम विभाग के सभी लोगों की फाइलें, सर्विस-बुक आदि उनके पास ही आती थीं और वो पूरा समय इस बात को लेकर कुढ़ते रहते थे कि कार्यक्रम विभाग के लोगों को कितनी अधिक तनख्वाह मिलती है।


मेरे बगल में श्री राम प्रताप बैरवा थे, जो क्लर्क थे और बाहरी कलाकारों को अन्य केंद्रों पर प्रोग्राम आदि के अनुबंध वही जारी करते थे अतः कलाकार उनके पास आते रहते थे। मुझे याद है कि उनके पास आने पर मैंने ज़नाब अहमद हुसैन, मुहम्मद हुसैन के साथ अनेक बार चाय पी है।

आकाशवाणी के बाहर ही एम. आई. रोड पर एक चाय की दुकान थी और अक्सर ऐसा होता था कि हेड क्लर्क महोदय किसी एक के साथ चाय पीकर वापस लौटते थे और किसी दूसरे के साथ वापस चले जाते थे।

आकाशवाणी में एक उद्घोषक थे, नाम याद नहीं आ रहा है, उन्होंने अपने कमरे में यह शेर लिखकर लगाया हुआ था-

हर दौर में हम हाफिज़-ए-किरदार रहेंगे
खुद्दार थे, खुद्दार हैं, खुद्दार रहेंगे।


वैसे पता नहीं वो खुद्दारी का मतलब क्या समझते थे, क्योंकि उनका सबसे झगड़ा रहता था।
एक और मित्र थे, कार्यक्रम विभाग में- श्री बैजनाथ गौतम, जो ईसुरी के प्रसिद्ध लोकगीत बड़े मन से गाते थे. जैसे-

हम खें जुगनिया बना गए, अपुन जोगी हो गए राजा।
दस दरवाज़ों का महल बना गए,
ताही में पिंजरा टंगा गए, अपुन जोगी हो गए राजा।

पिंजरे में तोता और मैना बिठा गए,
बोली अनेकों रटा गए, अपुन जोगी हो गए राजा।


शायद ईसुरी के लोकगीत के आधार पर ही राज कपूर जी ने अपनी फिल्म में यह गीत रखा था-

रंगमहल के दस दरवाजे,
ना जाने कौन सी खिड़की खुली थी,
सैंया निकस गए, मैं ना लड़ी थी।


तीन साल के जयपुर प्रवास में जहाँ मैंने हिंदी में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की, वहीं केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो के तीन माह के प्रशिक्षण में प्रथम स्थान प्राप्त करके, डा. कर्ण सिंह जी के कर कमलों से सिल्वर मैडल भी प्राप्त किया। इस प्रशिक्षण के प्रतिभागियों में मैं बहुत जूनियर था तथा यह मेरे लिए एक बड़ी उपलब्धि थी और यह मैडल बाद में मेरे काफी काम आया।

जयपुर प्रवास के दौरान हम तीन मकानों में बहुत थोड़ी अवधि के लिए और एक मकान में लंबे समय रहे, जिसमें टीन की छत थी, लेकिन हमारे मकान मालिक का प्रेम ऐसा था कि हम उसे छोड़ ही नहीं पाते थे। इस मकान में जाने की कहानी भी विशेष थी, हम यह मकान देख चुके थे लेकिन टीन की छत होने के कारण जाना नहीं चाहते थे। हमने एक मकान पसंद करके, पहला मकान छोड़ दिया और हम अपना घर का सामान, जो कि उस समय एक ठेले पर ही आ गया था, साथ लेकर नए मकान की ओर चल दिए, जिसके बारे में एक दिन पहले ही बात हो चुकी थी। लेकिन उस लालची आदमी को हमारे बाद शायद किसी ने ज्यादा पैसे ऑफर कर दिए और उसने वह मकान उसको दे दिया।


अब हम, ठेले पर अपने सामान के साथ सड़क पर थे, तब हम अचानक टीन की छत वाले इस मकान पर गए और उन्होंने हमारा भरपूर स्वागत किया। मेरे मकान मालिक मुझे भाई साहब कहते थे और मेरी पत्नी को बेटी कहते थे। जयपुर प्रवास का अधिकतम समय हमने इसी घर में बिताया।

अब अंत में श्री बलबीर सिंह रंग जी के एक दो शेर याद आ रहे हैं –

आब-ओ-दाना रहे, रहे ना रहे
ये ज़माना रहे, रहे ना रहे,
तेरी महफिल रहे सलामत यार,
आना-जाना रहे, रहे ना रहे।

हमने गुलशन की खैर मांगी है,
आशियाना रहे, रहे ना रहे।


फिलहाल इतना ही, नमस्कार।
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मोह मोह के धागे!

आज अपने एक मित्र और सहकर्मी के प्रसंग में बात करना चाहूँगा| ये मेरे साथी मेरे बॉस थे, परंतु उनसे बात करते हुए मुझे कभी यह लगा ही नहीं कि वो मेरे बॉस थे| वैसे इस तरह का अनुभव मेरा बहुत से लोगों के साथ रहा है, परंतु उन सबमें शायद ये सबसे सज्जन व्यक्ति थे|

लीजिए मैं उनका सरनेम बता देता हूँ- मिस्टर मूर्ति, हैदराबाद के रहने वाले थे, इतना जान लेने के बाद ही हम अक्सर किसी व्यक्ति को दक्षिण भारतीय अथवा यहाँ तक कि ‘मद्रासी’ भी कह देते हैं|

मूर्ति जी को इस पर सख्त आपत्ति थी, उनको अपनी अलग पहचान बहुत प्यारी थी, वे कहते थे कि वे मध्य भारत से हैं| एक-दो बार तो हमारी कंपनी के उच्च पदाधिकारियों ने उन पर एहसान जताते हुए उनका चेन्नई अथवा केरल स्थानांतरण करने का प्रस्ताव किया| उनका कहना था कि जहां वे मेरे साथ तैनात थे, उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में, वहाँ से अपने घर जाना उनके लिए ज्यादा आसान है, बनिस्बत केरल अथवा चेन्नई के अनेक इलाकों से वहाँ जाने के!

खैर मैं और मूर्ति जी हमउम्र भी थे और मैनेजमेंट द्वारा समान रूप से सताए गए भी| हम अक्सर अपने मन की बात खुलकर किया करते थे| हाँ मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि हम दोनों समान रूप से संवेदनशील भी थे| एक प्रसंग उनका बताया हुआ याद आ रहा है, कुल मिलाकर एक दृश्य है इस घटना में!

मूर्ति जी विशुद्ध रूप से शाकाहारी थे, मेरी ही तरह और उनके घर में उन्होंने किसी समय एक श्वान अथवा ‘डॉगी’ भी पाला हुआ था, दूसरा नाम लेने पर मुझे घर में डांट पड़ सकती है, वो तो बेचारे सड़क पर हुआ करते हैं| हाँ तो उनका यह डॉगी, नस्ल मुझे याद नहीं, उन्होंने बताई तो थी, ऐसे आकार का था, जैसा कोई घोड़े का बच्चा होता है| वे उसको घर पर सब्जियाँ आदि ही खिलाते थे, और वह उनको ही खाता था|

अब यह पता नहीं कि मूर्ति जी ने कब और कैसे यह डॉगी रख लिया था क्योंकि उनकी धर्मपत्नी को इस प्रजाति से बिल्कुल प्रेम नहीं था| जैसे-तैसे मूर्ति जी का प्रेम उसके प्रवास को खींचता रहा लेकिन अंत में संभवतः डॉगी को दूर करने की अपनी मांग के लिए उनकी धर्मपत्नी को, ऐसा मजबूत आधार मिल गया कि डॉगी को अब विदा किया ही  जाए, और अंततः मूर्ति जी उसको शायद उसी तरह जंगल में छोड़कर आ गए, जैसे शायद लक्ष्मण जी सीता-माता को वन में छोड़कर आए होंगे|

मैंने बताया था कि यह प्रसंग एक क्षण का, अथवा कहें कि एक दृश्य का है| जैसा अभी तक हुआ वह तो बहुत बार हो चुका होगा शायद! मूर्ति जी भी धीरे-धीरे इसको भूल रहे थे| तभी की बात है कि कार द्वारा कहीं जाते समय वे एक सिग्नल पर रुके और कुछ सोच रहे थे, तभी उनको अपने गाल पर कुछ गीला स्पर्श महसूस हुआ, देखा तो उनका वही पुराना डॉगी, उसकी ऊंचाई तो अच्छी थी ही, उसने कार की विंडो में मुंह डालकर उनका मुंह चूम लिया था|

इस प्रसंग में, वास्तव में मुझे याद करते ही आँखों में आँसू आ जाते हैं, लेकिन यह संतोष की बात है कि वह डॉगी अपने नए परिवेश में ठीक से एडजस्ट हो गया था, हम ऐसे ही सोचते हैं, ऊपर वाला भी तो है ना सभी प्राणियों की रक्षा करने के लिए|  

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट, फिर से शेयर कर रहा हूँ|

चलिए पुराने पन्ने पलटते हुए, एक क़दम और आगे बढ़ते हैं।
आज फिर से जीवन का एक पुराना पृष्ठ, कुछ पुरानी यादें, एक पुराना ब्लॉग!


जयपुर पहुंच गए लेकिन काफी कुछ पीछे छूट गया। मेरी मां, जिनके लिए हमारा वह पुराना मोहल्ला अपने गांव जैसा था, बल्कि मायका भी था क्योंकि उनके भतीजे- वकील साहब वहीं रहते थे। वो दिल्ली नहीं छोड़ पाईं। एक-दो बार हमारे साथ गईं भी, जहाँ भी हम थे, लेकिन वहाँ नहीं रुक पाईं।


एक और बात हम दिल्ली से जयपुर ट्रेन में बैठकर चले गए थे, एक दो अटैची साथ लेकर, कोई और लगेज नहीं था हमारे साथ। जो सामान हमारा छूटा, घरेलू सामान थोड़ा बहुत मां के पास रहा, बाकी 50-60 किलो तो रहा ही होगा, किताबों और पत्रिकाओं के रूप में। पत्रिकाओं में सबसे बड़ा भाग था सारिका के अंक, जिनमें बहुत से कथा- ऋषि विशेषांक भी थे, जिनमें दुनिया भर के श्रेष्ठ लेखकों की रचनाएं शामिल थीं।
पता नहीं क्यों मुझे एक पाकिस्तानी लेखक की रचना याद आ रही है, जो ऐसे ही एक अंक में छपी थी। कहानी संक्षेप में यहाँ दोहरा देता हूँ-
महानगर पालिका में बहस हो रही थी कि ‘रेड-लाइट एरिया’, शहर के बीचों-बीच क्यों बना है। काफी लंबी बहस के बाद फैसला हुआ कि इन लोगों को नगर की सीमा के बाहर बसा दिया जाए। ऐसा ही किया गया, पहले वहाँ एक पान वाले ने अपनी दुकान खोली, चाय वाला आया, फिर कुछ और दुकानें खुलीं।


दस साल बाद, महानगर पालिका में फिर से बहस हो रही थी कि ‘रेड-लाइट एरिया’, शहर के बीचों-बीच क्यों बना है!


खैर, ये तो मुझे याद आया और मैंने संक्षेप में कहानी शेयर कर ली। मैं बता यह रहा था कि हम अपना साहित्य भंडार वकील साहब के यहाँ छोड़ आए, जो मेरे बड़े भाई लगते थे। उन्होंने कुछ वर्षों तक इस अमानत की बंधी हुई पोटलियों को संभालकर रखा, बाद में चूहों में साहित्य पिपासा कुछ अधिक जाग गई तो उन्होंने यह सब लायब्रेरी में दे दिया।


दिल्ली के जो महत्वपूर्ण वृतांत छूट गए, उनमें एक यह भी है कि हमने बच्चों की एक पत्रिका ‘कलरव’ के कुछ अंक भी प्रकाशित किए थे। दिल्ली प्रेस में मेरे एक साथी थे- श्री रमेश राणा, जिनको मेरी साहित्यिक प्रतिभा में कुछ ज्यादा ही विश्वास था, उन्होंने यह प्रस्ताव रखा। इसमें संपादन की ज़िम्मेदारी मेरी थी, बाकी सब उनके जिम्मे था। मैं सामग्री का चयन करता था और ‘नन्हे नागरिक से’ शीर्षक से संपादकीय भी लिखता था। यह संपादकीय सबसे सुरक्षित था, क्योंकि नन्हे पाठकों से कोई शिकायत मिलने की गुंजाइश नहीं थी। श्री बालकवि वैरागी ने इस पत्रिका के लिए कई रचनाएं भेजीं और उपयोगी सुझाव भी दिए।


अब याद नहीं कि इस पत्रिका के कितने अंक छपे थे और इस प्रयास में कितना आर्थिक नुकसान हुआ ये तो भाई रमेश राणा ही जानते होंगे क्योंकि मेरा तो एक धेला भी खर्च नहीं हुआ था। बस एक अनुभव था-


किन राहों से दूर है मंज़िल, कौन सा रस्ता आसां है,
हम जब थककर रुक जाएंगे, औरों को समझाएंगे।


जयपुर के बाद हम बिहार के संथाल परगना इलाके में गए, जो अब झारखंड में आता है। कुछ प्रसंग तो ऐसे हैं, जो जैसे समय आता है, मुझे याद आते हैं और मैं शेयर करता जाता हूँ, लेकिन बिहार में कार्यग्रहण का किस्सा ऐसा है, जिसे सुनाने की मुझे भी बेचैनी रहती है, वो सब मैं अगले ब्लॉग में बताऊंगा। (यह पोस्ट मैंने पिछले सप्ताह ही शेयर की है|)


फिलहाल मैं यह बता दूं कि ईश्वर की कृपा से मुझे कभी किसी नौकरी के लिए सिफारिश की ज़रूरत नहीं पड़ी और मैं जब इंटरव्यू देने जाता था तब मैं बता देता था कि मैं यहाँ ज्वाइन करने वाला हूँ। हाँ मैं मुकेश जी का गाया यह भजन भी अक्सर गाता था और गाते-गाते मेरी आंखों में आंसू निकल आते थे-

तुम कहाँ छुपे भगवान करो मत देरी।
दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।


यही सुना है दीनबंधु तुम सबका दुःख हर लेते,
जो निराश हैं उनकी झोली, आशा से भर देते,
अगर सुदामा होता मैं तो दौड़ द्वारका आता,
पांव आंसुओं से धोकर मैं, मन की आग बुझाता,
तुम बनो नहीं अनजान सुनो भगवान, करो मत देरी।

दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।


जो भी शरण तुम्हारी आता, उसको धीर बंधाते,
नहीं डूबने दाता, नैया पार लगाते,
तुम न सुनोगे तो किसको मैं, अपनी व्यथा सुनाऊं,
द्वार तुम्हारा छोड़ के भगवन, और कहाँ मैं जाऊं।
प्रभु कब से रहा पुकार, मैं तेरे द्वार करो मत देरी।
दुख हरो द्वारकानाथ शरण मैं तेरी।


सब कुछ देता है ऊपर वाला, लेकिन फिर-

बहुत दिया देने वाले ने तुझको,
आंचल ही न समाए तो क्या कीजे।



फिलहाल इतना ही,
नमस्कार।
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कौवों ने खुजलाईं पांखें, कई दिनों के बाद!

बंगाल के चुनाव परिणामों को लेकर कुछ कहने का मन हो रहा है| कल देखा कि राजदीप सरदेसाई बहुत दिनों के बाद, अपनी दीदी के बंगाल चुनावों में विजयी होने के उपलक्ष्य में प्रसन्नचित्त होकर उनका इंटरव्यू ले रहे थे| बहुत दिनों के बाद ऐसा मौका आता है जब राजदीप, बरखा दत्त, रवीश कुमार, विनोद दुआ जैसे गए जमाने के लाडले पत्रकारों को अपनी खुशी ज़ाहिर करने का मौका मिलता है|

सचमुच मोदी जी ने बहुत सारे लोगों की दुकान पर ताला लगा दिया है| बहुत से नेता, जैसे – यशवंत सिन्हा, शरद यादव, अरुण शौरी, शत्रुघ्न सिन्हा आदि-आदि तो कुर्सी न मिलने पर यह सोचकर बाहर गए थे कि अभी विपक्ष को एक करेंगे और मोदी जी को बाहर करके फिर से कोई अच्छी सी गद्दी पा जाएंगे! कुछ नहीं हुआ, तब ऐसा कोई मौका आने से, इनको लगता है कि शायद अंतिम यात्रा से पहले इनको, कुछ समय कुर्सी मैया की गोद में सोने का मौका मिल जाए|


पता नहीं क्यों ऐसे में बाबा नागार्जुन जी की ‘अकाल के बाद’ कविता याद आती है, जिसमें बताया गया है कि अकाल के बाद जब घर में अनाज के दाने आते हैं, तब घर से जुड़े प्राणियों में कैसे फिर से जान आ जाती है, जैसे चूल्हा- चक्की से होने वाले उत्पादन के आधार पर- छिपकलियाँ, चूहे, कानी कुतिया और कौए भी, सब सक्रिय हो जाते हैं |

और यहाँ जबरन लगभग रिटायर हो चुके राजनेता और राजदीप जैसे स्तरहीन पत्रकार, जो आंदोलन के दौरान स्पष्ट रूप से दुर्घटनावश हुई मृत्यु के मामले में भी संदेह पैदा करना चाहते हैं, नए सपने देखने लगते हैं|


अभी देखा जाए तो 5 राज्यों के चुनाव में हुआ क्या है? किसने क्या खोया है? कांग्रेस लगातार अस्तित्वहीन होती जा रही है| मेरा खयाल है कि भाजपा ने हर जगह अपनी स्थिति में सुधार किया है| सबसे ज्यादा सुधार तो बंगाल में ही हुआ है, जहां भाजपा पिछली विधान सभा में 3 सीटों से बढ़कर 77 पर आ गई है| ये कितने प्रतिशत बढ़ोतरी है जी|

हाँ उन्होंने सपने कुछ ज्यादा ही ऊंचे देखे थे, तो सपने तो ऊंचे ही देखने चाहिएं ना! और इसके लिए मेहनत भी बहुत की गई, शायद इसीलिए वे इतना आगे भी बढ़ पाए| लेकिन ये महान पत्रकार और राजनेता इस बारे में तो बात ही नहीं करते कि बंगाल में कम्युनिस्टों और कांग्रेसियों का क्या हुआ? कहाँ है अब उनकी दुकान?


भाजपा के हिंदुत्ववादी कट्टर समर्थकों की भाषा मुझे बिलकुल पसंद नहीं है, लेकिन शायद यह उनकी रणनीति है उनके विरुद्ध, जिनका पूरा चुनावी गणित इस बात पर निर्भर है कि एक समुदाय विशेष के वोट कहीं बंट न जाएँ, और वास्तव में यदि बंगाल में ओवैसी और कम्युनिस्ट-कांग्रेस कुछ वोट ले पाते तो शायद परिणाम वैसा ही होता, जैसा भाजपा वाले सपना देख रहे थे|


मैं ऐसा नहीं मान पाता कि जो भी सत्ता में है वो खराब है और जो सत्ता से बाहर हो गया, वो स्वतः पवित्र हो गया| मैं मानता हूँ कि सरकारों के निष्पादन का विश्लेषण, हर मामले में, गुण-दोष के आधार पर किया जाना चाहिए और इस दृष्टि से मैं मानता हूँ कि मोदी सरकार का निष्पादन पहले की सरकार के मुक़ाबले काफी अच्छा है|

एक बात और बहुत स्पष्ट है कि जहां दिल्ली में आए परिणामों के लिए कांग्रेस द्वारा की गई आत्महत्या की बहुत बड़ी भूमिका थी, वहीं बंगाल में कांग्रेस और कम्युनिस्ट दोनों पार्टियों ने आत्महत्या करके इस परिणाम को संभव बनाया| यदि ये पार्टियाँ ऐसा ही करते रहने वाली हैं, तो भविष्य की राजनीति के निर्माण में इनकी इस शहादत की महान भूमिका होगी|


ऐसे ही मन हुआ कि हाल ही के चुनाव परिणामों पर अपनी प्रतिक्रिया दे दूँ, बाकी तो जनता मालिक है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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यूं ही ना तोड़ अभी बीन रे सपेरे!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट शेयर कर रहा हूँ|

अपनी शुरू की ब्लॉग पोस्ट्स में, मैंने अपनी जीवन यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ावों का ज़िक्र किया था, आज उनमें से ही एक पोस्ट को दोहरा रहा हूँ, क्योंकि इसमें आदरणीय बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक प्यारा सा गीत शामिल है और प्रसंग भी मुझे आशा है कि आपको पसंद आएगा|
जयपुर में रहते हुए ही मैंने हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की एक वैकेंसी देखी, हिंदी अनुवादक के लिए, यह कार्यपालक श्रेणी का पद था, जबकि आकाशवाणी में, मैं पर्यवेक्षकीय स्तर पर था, हालांकि पदनाम वही था। इसके अलावा वेतन में काफी अंतर था। मैंने आवेदन किया और चयन परीक्षा एवं साक्षात्कार के लिए मुझे बुलावा भी आ गया।

इस बीच मेरे दूसरे पुत्र का जन्म जयपुर में हो चुका था। और आगे की यात्रा पर जाने वाले हम चार लोग थे।


मुझे जाना था बिहार के संथाल परगना क्षेत्र में, जो अब झारखंड में आता है। टाटानगर से लगभग 40 कि.मी. दूर है यह इलाका। जाने से पहले ही मैंने अखबार में यह खबर पढ़ी कि वहाँ गैर आदिवासी लोगों को 10 इंच छोटा करने (गर्दन काटने) की घटनाएं हो रही थीं। परम आदरणीय शिबू सोरेन जी का इलाका है वह।


खैर मैं वहाँ पहली बार जा रहा था और इत्तफाक से मुझे कोई सही मार्गदर्शन करने वाला भी नहीं मिला, बल्कि एक सज्जन ने अधूरे ज्ञान के आधार पर मुझे जो बताया वह मुझे बहुत महंगा पड़ सकता था। मैंने वहाँ जाने के लिए टाटानगर एक्सप्रेस पकड़ी, जो बताया गया था कि सुबह 6 बजे पहुंचेगी, लेकिन वह 9 बजे के बाद पहुंची। वहाँ से मुझे हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के कार्यालय, मऊभंडार जाना था, जहाँ जाने के लिए केवल टेम्पो मिलते हैं, जो सवारियां ठूंसकर भरने पर चलते हैं, और 40 किलोमीटर का वह जंगली रास्ता भी माशाअल्ला था।


खैर रोते-धोते मैं 11 बजे के बाद वहाँ पहुंचा, जबकि उम्मीदवारों की लिखित परीक्षा वहाँ 10 बजे से प्रारंभ होकर पूरी हो चुकी थी और अब साक्षात्कार होना था। मैंने अपनी परिस्थितियां बताईं और मुझे अनुमति दे दी गई, जबकि अन्य लोगों का साक्षात्कार शुरु हो रहा था, मुझे टेस्ट देने के लिए बिठा दिया गया और अंत में मेरा साक्षात्कार हो गया।

जैसा मैंने बताया था कि केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो के प्रशिक्षण के उपरांत मुझे मिला मेडल मेरे काफी काम आया बाकी चयन परीक्षा का निष्पादन तो होगा ही।
बाद में जब मैं गेस्ट हाउस में रुका तो मुझे मालूम हुआ कि प्रत्याशियों में एक ऐसे सज्जन भी शामिल थे, जो केंद्रीय मंत्री रहीं श्रीमती राम दुलारी सिन्हा के पर्सनल स्टॉफ में शामिल रहे थे और वे यह मान रहे थे कि उनका चयन तो कोई रोक नहीं सकता। बाद में मुझे बताया गया कि वहाँ के उप महाप्रबंधक (का. एवं प्रशा.)- श्री राज सिंह निर्वाण ने वहाँ के वरि. प्रबंधक (राजभाषा)- डॉ. राम सेवक गुप्त से कहा था कि वह मिनिस्टर का आदमी है अतः उसका चयन कर लें वरना दिक्कत हो जाएगी। इस पर गुप्ता जी ने कहा था कि आप कर लीजिए, मैं तो उसी को चुनूंगा, जो मुझे ठीक लग रहा है। खैर निर्वाण जी भी गलत काम करना नहीं चाहते थे।


काफी समय बाद जब मैं वहाँ से आ रहा था, तब मुझे वहाँ के सतर्कता प्रभारी ने मुझे वे पत्र दिखाए, जो दो केंद्रीय मंत्रियों- श्री वसंत साठे और श्री एन.के.पी. साल्वे ने मेरी नियुक्ति के विरुद्ध लिखे थे। इन दोनो मंत्रियों ने श्रीमती सिन्हा के स्टाफ में रहे उस व्यक्ति की शिकायत को अग्रेषित किया था। उन सज्जन को भी एक पाइंट यह मिल गया था कि मैं देर से पहुंचा था। खैर इसका मेरे मैडल और निष्पादन का हवाला देते हुए, समुचित उत्तर दे दिया गया था।


हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की इस इकाई का नाम इंडियन कॉपर कॉम्प्लेक्स था, जो पहले अंग्रेजो द्वारा चलाई जाती थी और उस समय उसका नाम था- इंडियन कॉपर कार्पोरेशन था। वहाँ की माइंस थीं मुसाबनी माइंस, जो देश की सबसे गहरी ऑपरेशनल खदानें थीं। किसी जमाने में, अंग्रेजों ने यहाँ से तांबे के अलावा बड़ी मात्रा में सोना, चांदी भी निकाले थे। खदानों के मामले में यह लागू होता है कि खदान जितनी गहरी होती जाएगी, खनन की लागत उतनी ही बढ़ती जाएगी। जबकि खदान में तांबे की मात्रा बहुत कम हो गई थी और खनन लागत बढ़ती जा रही थी। कई बार ऐसा लगता था कि स्टाफ को यदि घर बिठाकर पैसा दिया जाए तो घाटा कम होगा, खनन करने पर ज्यादा। खैर कई उपाय अपनाए जा रहे थे वहाँ पर खनन लागत को कम करने के लिए। वैसे अब स्थिति यह है कि, ये खदानें कई वर्ष पहले बंद की जा चुकी हैं।


अंग्रेजों के समय से ही वहाँ की टाउनशिप बनी थी, और उसे लोगों को बांटने की अंग्रेजों की नीति के अनुसार ही बसाया गया था। ऑफिस के कर्मचारियों को अलग बसाया गया था, उसका नाम था स्टाफ कालोनी, अंग्रेज काफी बड़ी संख्या में नेपालियों को भी मज़दूर के रूप में काम करने के लिए ले आए थे और उनके लिए नेपाली कालोनी बना दी थी, उनके बच्चों का अब कोई भविष्य नहीं था, वे पूरा दिन जुआ खेलते थे। अंग्रेजों ने कर्मचारियों को बांटकर रखा, उनको अच्छी सुविधाएं दीं लेकिन शिक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं की थी।


हिंदुस्तान कॉपर में आने के बाद यहाँ शिक्षा की सुविधाएं विकसित करने का प्रयास किया गया। हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के कलकत्ता स्थित मुख्यालय में श्रेष्ठ कवि डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र कार्यरत थे, उनके एक आशावादी गीत के साथ यह ब्लॉग समाप्त करते हैं, वहाँ के बारे में बाकी बातें बाद में करेंगे-


एक बार और जाल फेंक रे मछेरे
जाने किस मछली में बंधन की चाह हो।
सपनों की ओस गूंथती कुस की नोंक है,
हर दर्पण में उभरा एक दिवालोक है,
रेत के घरौंदों में सीप के बसेरे,
इस अंधेर में कैसे प्रीत का निबाह हो।
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे….


उनका मन आज हो गया पुरइन पात है,
भिगो नहीं पाती यह पूरी बरसात है,
चंदा के इर्द-गिर्द मेघों के घेरे,
ऐसे में क्यों न कोई मौसमी गुनाह हो।
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे….


गूंजती गुफाओं में कल की सौगंध है,
हर चारे में कोई चुंबकीय गंध है,
कैसे दे हंस झील के अनंत फेरे,
पग-पग पर लहरें जब बांध रही छांव हो।
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे…
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कुमकुम सी निखरी कुछ भोरहरी लाज है,
बंसी की डोर बहुत कांप रही आज है,
यूं ही ना तोड़ अभी बीन रे सपेरे,
जाने किस नागिन में प्रीति का उछाह हो।
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे
जाने किस मछली में, बंधन की चाह हो॥

( पुरइन पात- कमल का पत्ता)


डा. बुद्धिनाथ मिश्र
फिलहाल इतना ही,
नमस्कार।

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गति,अगति, सद्गति!

आज का समय मानव जाति के लिए बड़ा कठिन है, खास तौर पर कोरोना की यह दूसरी लहर भारतवर्ष के लिए बड़े कष्ट लेकर आई है| पहली लहर के समय हम कहते थे कि बाहर से लोगों को क्यों आने दे रहे हैं! आज दूसरे अनेक देश भारत से लोगों का वहाँ जाना प्रतिबंधित कर रहे हैं| इस महामारी का हम सबको मिलकर मुक़ाबला करना है, मैं तो कम से कम उन लोगों में से नहीं हूँ जो इस स्थिति के लिए भी किसी एक व्यक्ति को दोष देकर मुक्त हो जाएँ|

जिस गति से आज कोरोना फैल रहा है, उस पर शीघ्र नियंत्रण किया जाना आवश्यक और मुझे उम्मीद है कि एक संकल्प-बद्ध राष्ट्र के रूप में हम ऐसा करने में सफल होंगे|


असल में, मैं स्वयं को इतना कुशल नहीं मानता कि कोरोना के बारे में कोई उपयोगी सलाह दे सकूँ, वैसे हमारे यहाँ हर घर में ऐसे लोग मिल जाएंगे जो कोरोना को दूर भगाने के कारगर घरेलू नुस्खे बता सकते हैं, परंतु जब उनके किसी अपने को यह रोग लग जाता है, तब वे शांत हो जाते हैं|


खैर आज मैं गति को लेकर कुछ बात करना चाह रहा था| गोवा में हम जिस सोसायटी में रहते हैं, उसमें सभी 6 मंजिला इमारतें हैं, गोवा में शायद सामान्यतः इतनी मंज़िलें बनाने की अनुमति है| और हम छठी मंज़िल पर रहते हैं| अपनी लिफ्ट का इस्तेमाल करते समय अक्सर मुझे ऐसा लगता है कि अपनी यह लिफ्ट दिल्ली मैट्रो की तरह चलती है| जी हाँ, जितने समय में दिल्ली मैट्रो एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक पहुँचती है, उतने समय में अपनी यह लिफ्ट, एक फ्लोर से दूसरे फ्लोर पर पहुँचती है| मैं यही सोचता हूँ कि अगर अपनी बिल्डिंग 20-25 या इससे अधिक फ्लोर वाली होती तो हमें दिल्ली कि एक मैट्रो लाइन- ग्रीन, ब्लू या किसी पर भी पूरी यात्रा का आनंद मिल जाता| अब थोड़ी-बहुत अतिशयोक्ति की तो आप मुझे अनुमति देंगे ही न!

आज कोरोना के इस माहौल में बंबई (मुंबई) की हालत सबसे ज्यादा खराब है, और पूरे देश से वहाँ श्रमिक अपनी ज़िंदगी बनाने के लिए जाते हैं| ऐसे में एक पुराना गाना, नए संदर्भ में याद आता है-

ऐ दिल, मुश्किल-जीना यहाँ,

जरा हटके, जरा बचके, ये है बंबई मेरी जान|


वैसे भी कोरोना ने हमारी ज़िंदगी की गति की ऐसी की तैसी कर रखी है, ऐसे ही मन हुआ कि अपनी इस लिफ्ट के बहाने किसी ओर तरफ ध्यान दिया जाए, वैसे जो चुनौती आज हम सबके सामने है, उससे तो हमको मिलकर निपटना ही है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मैं जहां भी जाऊंगा, उसको पता हो जाएगा !!

आज डॉक्टर बशीर बद्र साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, जिसे जगजीत सिंह और अन्य गायक कलाकारों ने भी गाया है| बद्र साहब अपनी नायाब एक्स्प्रेशन और भाषिक प्रयोगों के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है डॉक्टर बशीर बद्र साहब की ये बेहतरीन ग़ज़ल-

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा,
इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा,

हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है,
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा,

कितनी सच्चाई से मुझसे, ज़िन्दगी ने कह दिया,
तू नहीं मेरा तो कोई दूसरा हो जाएगा,


मैं खुदा का नाम लेकर, पी रहा हूं दोस्तों,
ज़हर भी इसमें अगर होगा, दवा हो जाएगा,

सब उसी के हैं, हवा, ख़ुशबू, ज़मीन-ओ-आसमां
मैं जहां भी जाऊंगा, उसको पता हो जाएगा !!

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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इंसान की ख़ुश्बू आती है!

भारतीय उपमहाद्वीप के एक अत्यंत लोकप्रिय शायर रहे क़तील शिफ़ाई साहब की एक ग़ज़ल आज शेयर कर रहा हूँ| क़तील शिफ़ाई साहब पाकिस्तान के निवासी थे और उन्होंने अत्यंत खूबसूरत ग़ज़लें लिखी हैं जो बहुत लोकप्रिय हुई हैं और ग़ुलाम अली, जगजीत सिंह आदि प्रमुख गायकों ने उनको गाया है|

लीजिए प्रस्तुत है क़तील शिफ़ाई साहब की यह ग़ज़ल-

बेचैन बहारों में क्या-क्या है जान की ख़ुश्बू आती है
जो फूल महकता है उससे तूफ़ान की ख़ुश्बू आती है

कल रात दिखा के ख़्वाब-ए-तरब जो सेज को सूना छोड़ गया
हर सिलवट से फिर आज उसी मेहमान की ख़ुश्बू आती है

तल्कीन-ए-इबादत की है मुझे यूँ तेरी मुक़द्दस आँखों ने
मंदिर के दरीचों से जैसे लोबान की ख़ुश्बू आती है

कुछ और भी साँसें लेने पर मजबूर-सा मैं हो जाता हूँ
जब इतने बड़े जंगल में किसी इंसान की ख़ुश्बू आती है

कुछ तू ही मुझे अब समझा दे ऐ कुफ़्र दुहाई है तेरी
क्यूँ शेख़ के दामन से मुझको इमान की ख़ुश्बू आती है

डरता हूँ कहीं इस आलम में जीने से न मुनकिर हो जाऊँ
अहबाब की बातों से मुझको एहसान की ख़ुश्बू आती है

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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