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58. वहाँ पैदल ही जाना है…..

आज ऐसे ही, गीतकार शैलेंद्र जी की याद आ गई। मुझे ये बहुत मुश्किल लगता है कि किसी की जन्मतिथि अथवा पुण्यतिथि का इंतज़ार करूं और तब उसको याद करूं।

मैंने कहीं पढ़ा था कि शैलेंद्र जी इप्टा से जुड़े थे और वहीं किसी नाटक के मंचन के समय पृथ्वीराज कपूर जी उनसे मिले, बताया कि उनके बेटे राज कपूर अपनी पहली फिल्म बनाने वाले हैं और उनसे फिल्म में गीत लिखने का अनुरोध किया। शैलेंद्र उस समय अपनी विचारधारा के प्रति पूरी तरह समर्पित थे और उन्होंने कहा कि वे फिल्म के लिए गीत नहीं लिखेंगे। पृथ्वीराज जी ने उनसे कहा कि जब उनका मन हो तब वे आकर मिल लें, अगर वे आएंगे तो उनको बहुत अच्छा लगेगा। इत्तफाक़ से वह घड़ी बहुत जल्द आ गई और हमारी फिल्मों को शैलेंद्र जैसा महान गीतकार मिल गया। सिर्फ इतना ही नहीं, शैलेंद्र, हसरत जयपुरी, मुकेश, शंकर जयकिशन का राजकपूर के साथ मिलकर एक ऐसा समूह बना, जिसने हमारी फिल्मों अनेक अविस्मरणीय गीत दिए, जिनमें सिर्फ महान विचार और भावनाएं नहीं अपितु आत्मा धड़कती है। संगीतकार के तौर पर इस समूह में कल्याण जी-आनंद जी और शायद लक्ष्मीकांत प्यारे लाल भी जुड़े। कुछ ऐसा संयोग बन गया कि शैलेंद्र अथवा हसरत गीत लिखेंगे, शंकर जयकिशन उसका संगीत देंगे, मुकेश उसके पुरुष कंठ होंगे और पर्दे पर पर राज कपूर की प्रस्तुति इस सभी का संयोग बनकर वह गीत अमर बन जाएगा-

तुम आज मेरे संग हंस लो

तुम आज मेरे संग गा लो,

और हंसते-गाते इस जीवन की

उलझी राह संवारो।

अथवा

तुम जो हमारे मीत न होते

गीत ये मेरे- गीत न होते।

तुम जो न सुनते,

क्यों गाता मैं,

दर्द से घुट कर रह जाता मैं।

सूनी डगर का एक सितारा-

झिलमिल झिलमिल रूप तुम्हारा।

एक बहुत बड़ी शृंखला है ऐसे गीतों की, जिनमें बहुत गहरी बात को बड़ी सादगी से कह दिया गया है। नशे का गीत है तो उसमें भी बड़ी सरलता से फिलॉसफी कह दी गई है-

मुझको यारो माफ करना, मैं नशे में हूँ-

कल की यादें मिट चुकी हैं, दर्द भी है कम

अब जरा आराम से आ-जा रहा है दम,

कम है अब दिल का तड़पना, मैं नशे में हूँ।

है जरा सी बात और छलके हैं कुछ प्याले,

पर न जाने क्या कहेंगे, ये जहाँ वाले,

तुम बस इतना याद रखना, मैं नशे में हूँ।

शराबियों से ही जुड़ी एक और बात, वो रोज तौबा करते हैं और रोज भूल जाते हैं, इन बातों को इस गीत में कितनी खूबसूरती से कहा गया है-

याद आई आधी रात को, कल रात की तौबा,

दिल पूछता है झूम के, किस बात की तौबा!

जीने भी न देंगे मुझे, दुश्मन मेरी जां के,

हर बात पे कहते हैं कि- इस बात की तौबा! 

बातों में वफा और वो मर मिटने की कस्में,

क्या दौर था, उस दौर के जज़्बात की तौबा।

और फिर सादगी और मानवीयता के दर्शन से भरे ये गीत-

किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार,

किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार,

किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार-

जीना इसी का नाम है।

रिश्ता दिल से दिल के ऐतबार का,

जिंदा है हमीं से नाम प्यार का,

किसी के आंसुओं में मुस्कुराएंगे,

मर के भी किसी को याद आएंगे,

कहेगा फूल हर कली से बार-बार

जीना इसी का नाम है।

या फिर-

इन काली सदियों के सिर से, जब रात का आंचल ढ़लकेगा,

जब दुख के बादल छिटकेंगे, जब सुख का सागर छलकेगा,

जब अंबर झूमके नाचेगा, जब धरती नगमे गाएगी-

वो सुबह कभी तो आएगी।

एक और-

जेबें हैं अपनी खाली, क्यों देता वर्ना गाली,

ये संतरी हमारा, ये पासबां हमारा।

चीन-ओ-अरब हमारा, हिंदोस्तां हमारा,

रहने को घर नहीं है, सारा जहाँ हमारा।

और अंत में-

तुम्हारे महल- चौबारे, यहीं रह जाएंगे सारे,

अकड़ किस बात की प्यारे, ये सर फिर भी झुकाना है।

सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है,

न हाथी है न घोड़ा है, वहाँ पैदल ही जाना है।

ये सब मैंने कहा, कवि शैलेंद्र जी को याद करके, हालांकि मुझे इस बात की जानकारी नहीं है कि जिन गीतों की पंक्तियां मैंने यहाँ लिखी हैं, उनमें कौन सा गीत शैलेंद्र जी का है, कौन सा नहीं, लेकिन इतना ज़रूर है कि ये सभी गीत उसी परंपरा के हैं, जिसके शैलेंद्र जी प्रतिनिधि थे। हाँ इन सभी गीतों को मुकेश जी ने अपनी सीधे दिल में उतर जाने वाली आवाज़ दी है।

मुझे नहीं मालूम कि आपको यह आलेख कैसा लगेगा, लेकिन मुझे इस सफर से गुज़रकर बहुत अच्छा लगा और आगे भी जब मौका मिलेगा, मैं इस प्रकार की बातें करता रहूंगा। हर गीत की कुछ पंक्तियां लिखने के बाद मुझे लगा है कि जो पंक्तियां मैंने यहाँ नहीं दी हैं, उनको लिखता तो और अच्छा रहता। इन अमर गीतों की कुछ पंक्तियों के बहाने मैं शैलेंद्र जी को और इन गीतों से जुड़े सभी महान सर्जकों, कलाकारों को याद करता हूँ।

नमस्कार।

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57. जब से गए हैं आप, किसी अजनबी के साथ

आज एक बार फिर संगीत, विशेष रूप से गज़ल की दुनिया की बात कर लेते हैं। भारतीय उप महाद्वीप में जब गज़ल की बात चलती है तब अधिकतम स्पेस गुलाम अली जी और जगजीत सिंह जी घेर लेते हैं। हालांकि इनसे बहुत पहले बेगम अख्तर जी से गज़ल गायकी लोकप्रिय हुई थी। इसके बाद जिस नाम को सबसे ज्यादा शोहरत मिली, वो थे पाकिस्तान के मेहंदी हसन साहब। एक समय था जब गज़ल की दुनिया में उनका कोई मुकाबला नहीं था।

सुना है गुलाम अली साहब, जो मेहंदी हसन जी के साथ तबला बजाते थे, उन्होंने उनसे कहा- उस्ताद मैं भी गाना चाहता हूँ, इस पर मेहंदी हसन बोले आप तबला बजाओ, यही ठीक है। लेकिन बाद में एक समय ऐसा आया कि गुलाम अली जी ने लोकप्रियता के मामले में, मेहंदी हसन साहब को पीछे छोड़ दिया। वैसे मेहंदी हसन साहब का अपना एक बहुत ऊंचा मुक़ाम था। उनकी एक लोकप्रिय गज़ल के कुछ शेर याद आ रहे हैं, जिनमें उनकी गायकी की विशेष झलक मिलती है-

देख तो दिल कि जां से उठता है,

ये धुआं सा कहाँ से उठता है।

यूं उठे आज उस गली से हम,

जैसे कोई जहाँ से उठता है।

बैठने कौन दे भला उसको,

जो तेरे आस्तां से उठता है।

इसके बाद तो गज़ल की दुनिया में गुलाम अली जी और जगजीत सिंह जी छाए रहे। गुलाम अली जी ने जहाँ सीमित साज़ों के साथ अपनी गायकी की धाक जमाई, वहीं जगजीत सिंह जी ने अच्छी गायकी के साथ, आर्केस्ट्रा का भी भरपूर इस्तेमाल किया है।

इनकी गज़लों में से कोई एक दो शेर चुनना तो बहुत मुश्किल है, लेकिन फिर भी कुछ उदाहरण दे रहा हूँ|  पहले जगजीत सिंह जी की गाई गज़ल के प्रसिद्ध शेर, जिनमें उनकी गायकी की झलक मिलती है-

जवां होने लगे जब वो तो हमसे कर लिया परदा,

हया बरलक्स आई और शबाब आहिस्ता-आहिस्ता।

एक और-

होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज़ है,

इश्क कीजे फिर समझिए, ज़िंदगी क्या चीज़ है।

या फिर-

दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है,

मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है।

अब गुलाम अली जी-

छेड़कर तब्सिरा ए दौर ए जवानी रोया,

रात यारों को सुनाकर मैं, कहानी रोया।

जब भी देखी है किसी चेहरे पे एक ताज़ा बहार,

देखकर मैं तेरी तस्वीर पुरानी रोया।

एक और-

सो गए लोग उस हवेली के,

 एक खिड़की मगर खुली है अभी।

कुछ तो नाज़ुक मिजाज़ हैं हम भी,

और ये चोट भी नई है अभी।

अब गज़ल की दुनिया में तो इतने लोग हैं कि कुछ नाम ले लूं, तो ये होगा कि बहुत सारे छूट जाएंगे। मेरे प्रिय फिल्मी गायक मुकेश जी ने भी कुछ गज़लें गाई हैं, एक गज़ल के एक दो शेर याद आ रहे हैं-

जरा सी बात पे, हर रस्म तोड़ आया था,

दिल-ए-तबाह ने भी क्या मिजाज़ पाया था।

शगुफ्ता फूल सिमटकर कली बने जैसे,

कुछ इस कमाल से तूने बदन छुपाया था।

गुज़र गया है कोई लम्हा-ए-शरर की तरह,

अभी तो मैं उसे पहचान भी न पाया था।

एक गज़ल चंदन दास जी की गाई हुई मुझे बहुत अच्छी लगती है-

अपना गम लेके कहीं और न जाया जाए,

घर की बिखरी हुई चीज़ों को सज़ाया जाए।

घर से मस्ज़िद है बहुत दूर चलो यूं कर लें,

किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए।

असल में गाने वाले तो इतने हैं, और फिल्मों में बहुत अच्छी गज़लें आई हैं, उनका ज़िक्र करते हुए कई ब्लॉग लिखे जा सकते हैं, रफी साहब ने बहुत अच्छी गज़लें गाई हैं, जैसे-

रंग और नूर की बारात किसे पेश करूं

ये मुरादों की हसीं रात किसे पेश करूं।

अनूप जलोटा जी ने भजनों के अलावा बहुत सी गज़लें भी गाई हैं, उनमें से कुछ काफी अच्छी बन पड़ी हैं। जैसे एक है-

अशआर मेरे यूं तो ज़माने के लिए हैं,

कुछ शेर फक़त तुमको सुनाने के लिए हैं।

आंखों में जो रख लोगे तो कांटों से चुभोगे,

ये ख्वाब तो पलकों पे सज़ाने के लिए हैं।

एक गज़ल जिसमें काफी दर्द उभरा है, जो भोगा हुआ यथार्थ लगता है! जैसा सुना है कि रूप कुमार राठौर, अनूप जलोटा के साथ तबला बजाते थे और अनूप जी और सोनाली जलोटा, एक साथ गाते थे। बाद में सुरों का तालमेल कुछ ऐसा हुआ कि सोनाली जलोटा, रूप कुमार राठौर के साथ मिलकर सोनाली राठौर बन गईं और उनका सिंगिंग पेयर बन गया। इसके बाद अनूप जी ने ये गज़ल गाई थी, जिसमें पूरा दर्द उभरकर आया है-

जब से गए हैं आप, किसी अजनबी के साथ,

सौ दर्द जुड़ गए हैं, मेरी ज़िंदगी के साथ।

खैर ये किस्सा तो चलता ही जाएगा, क्योंकि गाने वाले एक से एक हैं, और बहुत अच्छे हैं, कुछ का नाम लेना ठीक नहीं रहेगा। फिर कभी बात करेंगे और लोगों के बारे में, आज के लिए इतना ही।

 

नमस्कार।

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56. दैर-ओ-हरम में बसने वालो —

यह जानकर, हर किसी को अच्छा लगता है कि कुछ लोग हमको जानते हैं। लेकिन दुनिया में हर इंसान अलग तरह का है, कितने लोग वास्तव में ऐसे होते हैं, जो किसी व्यक्ति को ठीक से जानते हैं।

कुछ लोग हैं, जो हमारे साथ मुहल्ले में रहते हैं, वे हमें इस लिहाज़ से जानते हैं कि हम किस प्रकार के पड़ौसी हैं, कैसे नागरिक हैं, सामुदायिक गतिविधियों में क्या हमारी कोई भूमिका होती है?

इसी प्रकार में दफ्तर में हमारे साथ काम करने वाले, हमको हमारे पद, विभाग और अन्य लोगों के साथ हमारे व्यवहार, दफ्तर में होने वाली गतिविधियों में हमारी भागीदारी तथा एक कर्मचारी के रूप में हमारी भूमिका उनको किस प्रकार प्रभावित करती है अथवा हमारी कैसी छवि बनाती है, उसके आधार पर जानते हैं।

एक और आधार होता है लोगों के मन में हमारी छवि बनाने का, यह आधार कुछ जगहों पर बहुत प्रभावी होता है, जैसे बिहार में जब मैं कार्यरत था तब एक अधिकारी बता रहे थे कि उनको वहाँ के कोई स्थानीय पत्रकार मिले और उनसे पूछा, जी आप कौन हैं? अब पत्रकार तो काफी जागरूक माने जाते हैं। उन्होंने अपना नाम बताया, वो संतुष्ट नहीं हुए, पद बताया वे नहीं माने, उन्होंने कहा कि मैं अमुक स्थान का रहने वाला हूँ, इंसान हूँ, वो फिर बोले वैसे आप क्या हैं?  वैसे मतलब, उन्होंने पूछा, तब पत्रकार महोदय बोले, आपकी जाति क्या है जी!

कुछ लोगों के लिए यह जानकारी सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है। आप अच्छे इंसान हैं या नहीं, जहाँ आप हैं, आप अपनी भूमिका का निर्वाह कितनी ज़िम्मेदारी से, कितनी इंसानियत के साथ करते हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं होता कुछ लोगों के लिए, पहले तो आपका धर्म और उसके बाद आपकी जाति, यही दो बातें उनके लिए महत्वपूर्ण होती हैं।

तो इस आधार पर अगर पूछा जाए कि मैं क्या हूँ, तो मुझे बताना होगा कि मैं हिंदू हूँ, ब्राह्मण हूँ। हालांकि इन दोनों पहचानों को विकसित करने में मेरी कोई भूमिका नहीं है। मेरा यज्ञोपवीत संस्कार विवाह से पहले तो कभी हुआ नहीं, विवाह के समय पंडित जी ने जनेऊ पहनाया था, जो मैंने आयोजन के बाद उतार दिया और उसके पहले अथवा बाद में कभी नहीं पहना। ईश्वर में मेरी गहरी आस्था है, लेकिन मैं कभी-कभार औपचारिक आयोजनों के अलावा कभी पूजा-पाठ नहीं करता।

मैं अक्सर देखता हूँ कि ब्राह्मण महासभा, क्षत्रिय महासभा आदि-आदि अनेक आयोजन होते रहते हैं, वास्तव में जहाँ यह भाव पनपना चाहिए कि सभी मनुष्य एक जैसे हैं, सभी का उनके गुणों के आधार पर सम्मान होना चाहिए, इस प्रकार के आयोजन आपस में विभाजन पैदा करने वाले होते हैं। आज आधुनिक समय की मांग है कि इंसानों को बांटने वाले इस प्रकार के संगठनों को समाप्त किया जाए।

न किसी धर्म के नाम पर, न जाति के नाम पर, अगर लोग इकट्ठा होते हैं, तो वे मानव-जाति के नाम पर एकत्र हों।

मुझे जगजीत सिंह जी की गाई एक गज़ल याद आ रही है, इस मौके पर-

दैर-ओ-हरम में बसने वालो

मय-ख्वारों में फूट न डालो।

तूफां से हम टकराएंगे

तुम अपनी कश्ती को संभालो।

आरिज़-ओ-लब सादा रहने दो

ताजमहल पर रंग न डालो।

मैखाने में आए वाइज़,

इनको भी इंसान बना लो।

नमस्कार।

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55. मोहसिन मुझे रास आएगी शायद सदा आवारगी।

संगीत की एक शाम याद आ रही है, कई वर्ष पहले की बात है, दिल्ली के सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम में गज़ल गायक- गुलाम अली जी का कार्यक्रम था। मेरे बेटे ने मेरे शौक को देखते हुए मेरे लिए एक टिकट खरीद लिया था, रु.5,000/- का, अब टिकट आ गया था तो जाना ही था।

खैर कार्यक्रम तो अच्छा होना ही था, पूरी दुनिया में वे अपनी गायकी के लिए जाने जाते हैं। एक बात और है, पिछले 10-20 वर्षों में गज़ल काफी लोकप्रिय हुई हैं, कविगण भी गीत छोड़कर गज़लें लिखने लगे हैं। यह वास्तव में समय की मांग है।

जैसे पहले तो लोग शास्त्रीय संगीत सुनते थे,घंटों कोई गाने वाला ‘बाजूबंद खुल-खुल जाए’ गाता रहे और लोग उसका आनंद लेते रहें। अब किसी फिल्मी गायक के गाने सफल होने की कसौटी यह हो गई है कि लोग उसके गाने का दौड़ते- भागते भी आनंद ले सकें। पहले के जो गीत आज भी जीवित हैं, उनको बैठकर, ध्यान से सुनना पड़ता है।

यह तो अति हो गई, लेकिन गज़ल के लोकप्रिय होने का कारण क्या है? असल में कविता में हम क्या पाते हैं, उसे साहित्य के पंडितों ने कहा ‘दिव्य अर्थ प्रतिपादन’, यानि सुनकर सब लोग कहें, वाह क्या बात कही है! सभी कवि अपनी क्षमता के अनुसार यह काम करते हैं।

फर्क यह है कि गीत में यह दिव्य अर्थ प्रतिपादन छंद के अंत में होता है और कई बार छंद काफी लंबा होता है, उस पर कवि महोदय पंक्ति को दोहराते भी रहते हैं, सामान्य श्रोता के पास इतनी फुर्सत नहीं होती कि वह कविता में रस की निष्पत्ति के लिए इतना इंतज़ार करे।

इसके विपरीत गज़ल में ऐसा है कि एक पंक्ति कही और अगली पंक्ति में श्रोता रस के बरसने का इंतज़ार करता है बल्कि अक्सर इसका अनुमान भी हो जाता है कि क्या आने वाला है। इस तरह आज फुर्सत रहित ज़िंदगी के लिए, गज़ल ज्यादा सही लगती है।

जो आज रौनक-ए-महफिल दिखाई देता है,

नए लिबास में क़ातिल दिखाई देता है।

फिर से आते हैं गुलाम अली जी के कार्यक्रम पर, इस कार्यक्रम में उन्होंने अनेक यादगार गज़लें सुनाईं। एक श्रोता ने फर्माइश की –

इतनी मुद्दत बाद मिले हो …

इस पर गुलाम अली बोले- मैं तो आता ही रहता हूँ, आप कहाँ रहते हैं? उस समय तक शायद शिव सैनिकों का पराक्रम इतना नहीं बढ़ा था, वैसे शायद दिल्ली में तो अब भी उतनी हालत खराब नहीं हुई है।

पहली बार मैंने गुलाम अली जी की गाई गज़ल जयपुर में सुनी थी, जब मैं 1980 से 1983 तक वहाँ आकाशवाणी में कार्यरत था। एकदम अलग तरह की गज़ल थी यह, बहुत अच्छी लगी थी उस समय-

ये दिल, ये पागल दिल मेरा

क्यों बुझ गया आवारगी,

इस दश्त में एक शहर था

वो क्या हुआ आवारगी।

कल रात तनहा चांद को

देखा था मैंने ख्वाब में,

मोहसिन मुझे रास आएगी

शायद सदा आवारगी।

उस शाम गुलाम अली साहब को सुनना एक अलग तरह का अनुभव था, हमारे दो पड़ौसी देशों के बीच जो दुश्मनी पनप रही है, उसके कारण हम ऐसे श्रेष्ठ कलाकारों को भी सुनने से वंचित हो जाते हैं, जबकि कलाकार तो सिर्फ प्रेम का ही प्रसार करते हैं।

नमस्कार।

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54. जीवों का साहचर्य

आज गोवा में आए एक महीना हो गया। 3 जुलाई को दोपहर बाद यहाँ पहुंचे थे, गुड़गांव से। बहुत से फर्क होंगे जीवन स्थितियों में, जिनके बारे में समय-समय पर, प्रसंगानुसार चर्चा की जा सकती है।

एक फर्क जो आज अचानक महसूस किया, सुबह अपनी बालकनी में टहलते हुए, उस पर चर्चा कर रहा हूँ। मुझे अचानक खयाल आया कि यहाँ तो हमारे बालकनी के दरवाजे अधिकांश समय खुले ही रहते हैं, जहाँ से हम बारिश का आनंद लेते रहते हैं, बंद करते हैं तो बस तेज धूप से अथवा रात में मच्छरों के आक्रमण से बचने के लिए।

गुड़गांव में आखिरी 6 महीने हम एक बहुत सुंदर सोसायटी में, नवीं मंज़िल पर रहे, उस अवधि को छोड़ दें तो बालकनी अथवा छत का दरवाज़ा अधिक देर तक खुला रखने की हमारी हिम्मत ही नहीं थी। एकाध बार तो यह हुआ कि दरवाज़ा कुछ देर खुला रहा तो वानरराज आकर, फ्रिज में से कुछ फल आदि निकालकर खा गए, बाकी काफी कुछ फैला गए। यहाँ अभी तक मुझे वानर जाति के दर्शन नहीं हुए हैं। वैसे यहाँ भी हम सोसायटी में हैं, जहाँ इसकी संभावना कम है, लेकिन बाहर भी जितने इलाके में घूमा हूँ, कोई बंदर नहीं दिखा है।

यहाँ जो दिखा है, वह ये कि जिस प्रकार वाराणसी में अथवा उत्तरी भारत के अन्य नगरों में भी, गायों का सम्मेलन सड़क अथवा चौराहे के बीचोंबीच चलता रहता है, यहाँ पर कुत्ते उसी तरह बैठे रहते हैं। कुत्ते उधर भी बहुत हैं, लेकिन उनके बीच भाईचारा मुझे यहाँ ज्यादा लगा, वैसे  कुछ कहते नहीं हैं, लेकिन डर तो बना ही रहता है।

फिर से दिल्ली-गुड़गांव को याद करता हूँ, बंदरों और कुत्तों के कारण होने वाली अप्रिय घटनाएं वहाँ काफी समय से बहुत अधिक हो गई हैं, लेकिन कोई इस तरफ ध्यान देने वाला नहीं है। पिछले दिनों एक खबर पढ़ी थी कि हरियाणा में लंबे समय से कुत्तों की नसबंदी का कार्यक्रम चल रहा है और इस पर बहुत बड़ी राशि खर्च की जा चुकी है। जिस प्रकार वहाँ कुत्तों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है, उसे देखते हुए तो यही लगता है कि नसबंदी कुत्तों की नहीं, उन महान लोगों की, किए जाने की ज़रूरत है, जो इस बजट को खपाने में लगे हैं।

वैसे हमारे लोकतंत्र में सभी प्राणियों का कितना आदर है, यह तो अमरीकी राष्ट्रपति ने उस समय महसूस कर लिया होगा, जब राष्ट्रपति भवन में उनके सम्मान के दौरान एक श्वान महोदय वहाँ टहलते हुए आ गए थे। सभी जीवों से प्रेम, दया करना अलग बात है। लेकिन यह भी फैसला करना होगा कि हमारे शहरों में आज़ादी के साथ इंसानों को रहना है या कुत्तों और बंदरों को! इतना ही नहीं, जो गाय आदि आवारा घूमती हुई पाई जाते हैं, उनको गौ-शालाओं में भेज दिया जाना चाहिए और उनके मालिकों पर भारी जुर्माना किया जाना चाहिए।

मैंने कहीं पढ़ा था कि किसी व्यक्ति की गाय या भैंस ट्रेन के नीचे आकर मर गई, उसने रेलवे पर केस किया। न्यायालय ने उसको लताड़ लगाई कि उसकी लापरवाही के कारण ट्रेन के यात्रियों को जान का खतरा पैदा हो गया था।

मैं मानता हूँ कि इस संबंध में गंभीरतापूर्वक विचार किया जाना चाहिए कि आवारा पशुओं को सड़कों और धार्मिक, सार्वजनिक स्थलों से दूर किया जाए, इसके साथ धार्मिक भावनाओं को न जोड़ा जाए।

गौशालाओं जैसे प्रबंध अन्य आवारा पशुओं के लिए तात्कालिक रूप से करके, उनकी प्रभावी नसबंदी की जानी चाहिए, जिससे उनकी संख्या क्रमशः कम होती जाए।

ऐसा भी कई बार हुआ है कि हवाई जहाज के रनवे पर कोई जानवर आ गया है और दुर्घटना होते-होते बची है। रेलवे लाइन पर तो आवारा पशु घूमते ही रहते हैं, लोगों को कुत्ते अथवा बंदर द्वारा काटे जाने की घटनाएं भी होती रहती हैं। इस संबंध में सरकारें मज़बूत कदम उठाएं, लेकिन सरकार खुद कभी कुछ नहीं करती है, उसको मज़बूर करना होगा। जब आरक्षण की मांग करने से फुर्सत मिले तब इस बारे में भी सोचिएगा।

नमस्कार।

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53. पहाड़ों के कदों की खाइयां हैं

आज दुष्यंत कुमार का एक शेर याद आ रहा है-

पहाडों के कदों की खाइयां हैं

बुलंदी पर बहुत नीचाइयां हैं। 

यह शेर दुष्यंत जी की एक गज़ल से है, जो आपातकाल  के दौरान प्रकाशित हुए उनके संकलन ‘साये में धूप’ में शामिल था और बहुत उसने जनता पर बहुत  प्रभाव छोड़ा था।

वैसे तो समुद्र के बारे में कहा जाता है कि उसमें पहाड़ समा सकते हैं, इतनी गहराई होती है उसमें! किसी की धीर-गंभीरता के लिए भी समुद्र जैसी शांति की संज्ञा दी जाती है, भूगर्भ वैज्ञानिक ऐसा भी कहते हैं कि पृथ्वी पर जब उथल-पुथल होती है, तब जहाँ पहाड़ थे वहाँ समुद्र बन जाते हैं और जहाँ समुद्र है वहाँ पर पहाड़ !

फिर लौटते हैं शेर पर, समुद्र की गहराई तो उसकी महानता है, गहनता है, लेकिन खाई तो जितनी कम गहरी हो, उतना अच्छा है। क्योंकि खाई का मतलब ही बांटना, अलग करना है। श्री रमेश रंजक के एक गीत की पंक्तियां हैं-

घर से घर के बीच कलमुंही गहरी खाई है, 

छोटे-छोटे पांव ज़िंदगी लेकर आई है। 

असल में बांटने वाली ताकतें आज बहुत अधिक बढ़ गई हैं। मैंने कुछ ताकतों का ज़िक्र पहले भी किया है, एक ताकत जिस पर आज बात करना चाहूंगा वह है आरक्षण। जो पिछड़े हैं उनको आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए, इसमें कोई संदेह नहीं है, लेकिन यह व्यवस्था ऐसा नहीं कर रही है। एक विशेष  सुविधा-भोगी वर्ग पैदा हो गया है, आरक्षण का पात्र माने जाने वाले वर्ग के बीच और आरक्षण की यह सुविधा बार-बार कुछ चुने हुए परिवारों को प्राप्त हो रही है। जो वास्तव में पिछड़े हैं, वे आज भी इस सुविधा से उतने ही दूर हैं, जितना प्रारंभ में थे।

इसके अलावा अब हर कोई यह मांग करने लगा है कि हमारी जाति या समुदाय को आरक्षण का लाभ दिया जाए। फिर इस पर तुर्रा यह कि जो जितना ज्यादा नुकसान करेगा, तोड़-फोड़ करेगा, आगजनी करेगा, सड़कें खोद देगा, उसके बारे में मान लिया जाएगा कि यह कमज़ोर तबका है और कोई राज्य सरकार उसके बारे में कानून पारित कर देगी, भले ही बाद में न्यायालय उसको निरस्त कर दे।

असल में होना यह चाहिए कि जो किसी भी दृष्टि से पिछड़े हैं, उनको तैयारी के लिए, अध्ययन के लिए विशेष सुविधा एवं सहायता दी जाए लेकिन उसके बाद उनको प्रतियोगिता का सामना करना चाहिए, वहाँ कुछ आंशिक छूट दी जा सकती है।

लेकिन ऐसा करेगा कौन? किसी राजनैतिक दल में इतनी हिम्मत है? सीधे-सीधे वोट है इसमें जी! ऐसे कानून इस प्रकार की व्यवस्थाओं के संबंध में बने थे कि इतने वर्ष तक यह व्यवस्था रहेगी, लेकिन लगातार इनको बढ़ाया जाता है और बढ़ाया जाता रहेगा, क्योंकि जिनके लिए यह व्यवस्था है,  उनकी स्थिति में न बदलाव आया है न आएगा, बस इतना है कि कुछ सुविधा-भोगी हिस्सा है इन समुदायों का, जिसको इन व्यवस्थाओं का लाभ मिल रहा है और राजनैतिक दलों को वोटों का लाभ मिल रहा है।

है कोई राजनेता जो इस संबंध में कोई निर्णायक फैसला ले सके, जिससे जो वास्तव में पिछड़े हैं उनका भला भी हो और लोगों के बीच में खाइयां बनाने वाली यह वोट दिलाऊ व्यवस्था खत्म हो सके।

नमस्कार।

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52. ज़िंदगी ख्वाब है, था हमें भी पता, पर हमें ज़िंदगी से बहुत प्यार था,

मेरे एक पुराने मित्र एवं सीनियर श्री कुबेर दत्त का एक गीत मैंने पहले भी शेयर किया है, उसकी कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

करते हैं खुद से ही, अपनी चर्चाएं

सहलाते गुप्प-चुप्प बेदम संज्ञाएं, 

बची-खुची खुशफहमी, बाज़ारू लहज़े में, 

करते हैं विज्ञापित, कदम दर कदम। 

चलिए आज खुद से एक सवाल पूछता हूँ और उसका जवाब देता हूँ।

सवाल है, आपको ब्लॉग लिखने की प्रेरणा किससे मिलती है?

अब इसका जवाब देता हूँ।

आज इंटरनेट का युग है और इसमें लोग अन्य तरीकों के अलावा ब्लॉग लिखकर भी खुद को अभिव्यक्त करते हैं।

मेरी दृष्टि में तो ब्लॉगिंग की सबसे बड़ी प्रेरणा तो गोस्वामी तुलसीदास जी थे। रामकथा के बहाने उन्होंने दुनिया की किस समस्या अथवा किस भाव पर अपने विचार नहीं रखे हैं। उनकी लिखी हजारों टिप्पणियों पर आधारित ब्लॉग लिखे जा सकते हैं। जैसे-

वंदऊं खल अति सहज सुभाए, जे बिनु बात दाहिने-बाएं। 

पराधीन सपनेहु सुख नाही। 

मैं यहाँ यही उदाहरण दे रहा हूँ, अन्यथा उदाहरण तो लगातार याद आते जाएंगे।

जो अच्छे फिल्म निर्माता हैं, वे भी ब्लॉगिंग के लिए बहुत बड़ी प्रेरणा माने जा सकते हैं। मेरे लिए इस श्रेणी में राज कपूर सबसे पहले आते हैं। कई बार उनकी फिल्में, ऐसा लगता है कि अपने आप में एक सुंदर सी कविता अथवा ब्लॉग की तरह लगती हैं। ‘आवारा’ और ‘श्री 420’ से शुरू होकर उनकी शुरुआती फिल्में अनेक संदेश देती लगती हैं। एक देहाती व्यक्ति जो शहर में आता है, शुरू में खूब धोखा खाता है, बाद में चुनौती स्वीकार करता है और सबको अपनी चालाकी के सामने फेल कर देता है।

कुछ लाइनें जो मन में अटकी रह जाती हैं-

उल्टी दुनिया को, सीधा करके देखने के लिए, सिर के बल खड़ा होना पड़ता है।

रोना सीख लो, गाना अपने आप आ जाएगा। 

यहाँ भी, दो ही उदाहरण दे रहा हूँ, क्योंकि ये तो लगातार याद आते जाएंगे।

आज का ब्लॉग लिखने के लिए, दरअसल मुझे एक फिल्म याद आ रही थी। फिल्म के नायक थे- मोती लाल । यह फिल्म मैंने देखी नहीं है लेकिन याद आ रही थी।

असल  में इस फिल्म का एक गीत है, मुकेश जी की आवाज़ में, यह गीत मुझे मेरे एक मित्र- श्री शेज्वल्कर ने सुनाया था, बहुत पहले, जब मैं अपनी शुरुआती सरकारी नौकरी कर रहा था, उद्योग भवन में जहाँ वे मेरे साथ काम करते थे। कहानी भी शायद उन्होंने ही बताई थी।

एक आम आदमी की कहानी, जो लॉटरी का टिकट खरीदता है, मान लीजिए एक लाख के ईनाम वाला (उस जमाने के हिसाब से बोल रहा हूँ) । पत्नी बोलती है कि ईनाम आया तो मेरे लिए यह लाना, कुछ बेटा बोलता है, कुछ बेटी बोलती है, ईनाम की पूरी राशि का हिसाब हो जाता है, उस गरीब के, खुद के लिए कुछ नहीं बचता।

फिल्म का पहला सीन है कि उस व्यक्ति की शव-यात्रा निकल रही है, लॉटरी का ईनाम मिल जाने के बाद, सारी कहानी  फ्लैश-बैक में है, उस शव-यात्रा के साथ मुकेश जी का यह गीत है, ‘रिसाइटेशन’ के अंदाज़ में, ‘रिसाइटेशन’ यह शब्द मैैं  इसलिए जान-बूझकर  इस्तेमाल कर रहा हूँ क्योंकि बच्चा जब कोई कविता पढ़ता है तो उसकी पूरी आस्था और निष्ठा उसमें शामिल होती है। वैसे मुकेश जी के गायन के साथ भी हमेशा मुझे ऐसा लगा है, कि उसमें यह गुण शामिल रहता है।

मैं भी उसी आस्था और निष्ठा के साथ यह पूरा गीत यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ-

ज़िंदगी ख्वाब है, था हमें भी पता

पर हमें ज़िंदगी से बहुत प्यार था,

सुख भी थे, दुख भी थे-दिल को घेरे हुए,

चाहे जैसा था, रंगीन संसार था।

आ गई थी शिकायत लबों तक मगर

इसे कहते तो क्या, कहना बेकार था,

चल पड़े दर्द पीकर तो चलते रहे,

हारकर बैठ जाने से इंकार था।

चंद दिन का बसेरा था अपना यहाँ,

हम भी मेहमान थे, घर तो उस पार था।

हमसफर एक दिन तो बिछड़ना ही था-

अलविदा, अलविदा, अलविदा,अलविदा।

आज के लिए इतना ही, नमस्कार।

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51. कितने दर्पण तोड़े तुमने, लेकिन दृश्य नहीं बदला है

आज बहादुरी के बारे में थोड़ा विचार करने का मन हो रहा है।

जब जेएनयू में,  करदाताओं की खून-पसीने की कमाई के बल पर, सब्सिडी के कारण बहुत सस्ते में हॉस्टलों को बरसों-बरस पढ़ाई अथवा शोध के नाम पर घेरकर पड़े हुए, एक विशेष विचारधारा के विषैले प्राणी हाथ उठाकर देश-विरोधी नारे लगाते हैं, तब एक बार खयाल आता है कि क्या इसको ही बहादुरी कहते हैं!

वैसे आजकल सेना के बारे में उल्टा-सीधा बोलने को भी काफी बहादुरी का काम माना जाता है। कुछ लेखक और पत्रकार इस तरह के लेख, रिपोर्ताज आदि के बल पर अपने विज़न की व्यापकता की गवाही देने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते।

शिव सैनिकों की बहादुरी भी यदा-कदा उत्तर भारतीयों पर और कभी टोल-नाकों पर काम करने वालों पर निकलती रहती है। इसमें और बढ़ोतरी हो जाती है जब अपने को बालासाहब का सच्चा वारिस मानने वाले दोनों भाइयों के बीच प्रतियोगिता हो जाती है कि किसके चमचे ज्यादा बहादुरी दिखाएंगे।

अभी पिछले दिनों मध्य प्रदेश में किसान आंदोलन के दौरान, कांग्रेसी नेताओं ने बड़ी बहादुरी भरी भूमिका निभाई, कांग्रेस की एक विधायक ने जब अपने चमचों से खुले आम यह कह दिया कि थाने में आग लगा दो, तब शायद वे अपने आप को अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ रही एक महान सेनानी मान रही थीं। वैसे देखा जाए तो वह उस महिला की बेवकूफी ही थी, ऐसी बहादुरी लोग चोरी-छिपे करते हैं।

कोई भी आंदोलन हो, तब ऐसे लोगों को महान मौका मिलता है जो जीवन में कुछ नहीं कर पाए हैं और ऐसा लगता भी नहीं कि कुछ करेंगे, कोई उनकी बात नहीं सुनता, कुंठित हैं ऐसे में वे किसी बस में, ट्रक में या कार में आग लगा देते हैं, किसी दुकान को जला देते हैं और यह बताते हैं कि वो भी कुछ कर सकते हैं।

क्या उस समय मौके पर रहने वाले सभी लोग इसी मानसिकता के होते हैं? इस तरह के लोग, यह नीच कार्य करके कैसे बच निकलते हैं? क्या वहाँ कोई ऐसा नहीं होता, जो स्वयं जाकर या गुप्त रूप से पुलिस को यह बता कि इन महान प्राणियों ने यह निकृष्ट कार्य किया है। क्या पुलिस भी ऐसे में जानते हुए कोई कार्रवाई नहीं करती। विरोध करने का हक़ तो सभी को है लेकिन सार्वजनिक या व्यक्तिगत संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले लोगों को ऐसा सबक मिलना चाहिए कि वे दुबारा ऐसी बहादुरी करने के बारे में न सोच सकें।

इस शृंखला में जहाँ शिव सैनिकों की महान भूमिका वहीं भारतीय संस्कृति का रक्षक होने का दावा करने वाले बजरंग दल , गौ रक्षक आदि पर भी जमकर नकेल कसे जाने की ज़रूरत है। सत्तरूढ़ दल को यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि इनके दम पर वे सत्ता में फिर से आ सकते हैं।

सबका साथ- सबका विकास, इस नारे को जरा भी अपनी दृष्टि से ओझल नहीं करना चाहिए बीजेपी को, यदि वे वास्तव में देश की सेवा करना चाहते हैं और इसके लिए आगे भी सत्ता में आना चाहते हैं।

आज अपने एक और लघु गीत को शेयर करने का मन हो रहा है, जो हमारी विकास यात्रा की एक झलक देता है-

 

मीठे सपनों को कडुवाई आंखों को

दिन रात छला है। 

कितने दर्पण तोड़े तुमने

लेकिन दृश्य नहीं बदला है। 

बचपन की उन्मुक्त कुलांचे

थकी चाल में रहीं बदलती, 

दूध धुली सपनीली आंखें

पीत हो गईं- जलती-जलती, 

जब भी छूटी आतिशबाजी-

कोई छप्पर और जला है। 

कितने दर्पण तोड़े तुमने

लेकिन दृश्य नहीं बदला है।।  

नमस्कार।

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50. टांक लिए भ्रम, गीतों के दाम की तरह

आज असहिष्णुता के बारे में बात करने की इच्छा है।

ये असहिष्णुता, उस असहिष्णुता की अवधारणा से कुछ अलग है, जिसको लेकर राजनैतिक दल चुनाव से पहले झण्डा उठाते रहे हैं, और अवार्ड वापसी जैसे उपक्रम होते रहे हैं।

मुझे इसमें कतई कोई संदेह नहीं है कि समय के साथ-साथ सहिष्णुता लगातार कम होती गई है और इसका किसी एक राजनैतिक दल से सीधा संबंध नहीं है, हाँ एक प्रकार की असहिष्णुता दिखाने वाले किसी एक राजनैतिक दल के निकट हो सकतेे हैैं  और दूसरी तरह की असहिष्णुता दिखाने वाले किसी दूसरे दल के निकट हो सकते हैैं।

जैसे मेरे मन में अक्सर ये खयाल आता है कि उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद यदि आज जिंदा होते, जिन्होंने उनके उपन्यासों और  कहानियों को पढ़ा है, वे विचार करके देख लें, मेरा मानना है कि यदि वे आज लिखे गए होते तो शायद प्रेमचंद जी न जाने कितने मुकदमों का सामना कर रहे होते और फिर उनका समय लेखन में नहीं, अदालतों के चक्कर काटने में बीतता। इनमें से ज्यादातर मुकदमे बहन मायावती जी की विचारधारा वाले लोगों की तरफ से हो सकते थे, कुछ अपने को उच्च वर्गीय और कुलीन मानने वालों की तरफ से भी हो सकते थे।

वैसे असहिष्णुता का यह वातावरण बनाने में कुछ ख्याति पाने की चाहत रखने वालों की भी काफी बड़ी भूमिका है। मुझे लगता है कि कुछ वकील जिनका धंधा ठीक से नहीं चलता, या वे किसी भी कीमत पर प्रसिद्धि पाना चाहते हैं, वे इस इंतज़ार में रहते हैं कि किसी नई फिल्म में कुछ तो ऐसा मिल जाए जिसको लेकर विवाद खड़ा किया जा सके। कोई नाम हो- व्यक्ति का या स्थान का या कुछ भी उनके शैतानी दिमाग में ऐसा कारण बन सकता हो, जिसको लेकर मुकदमा ठोका जा सके, वे इसके लिए हमेशा तैयार रहते हैं। इसीलिए तो खयाल आता है कि बेचारे प्रेमचंद जी अथवा अन्य पुराने लेखक इन हालात का सामना कैसे करते।

अभी ‘सामना’ शब्द आ गया पिछली पंक्ति में, तो मुझे खयाल आया कि ‘सामना’ वाले, शिव सैनिक तो मौके के अनुसार कभी भारतीय संस्कृति और कभी क्षेत्रीयता की नफरत भरी भावना के अलंबरदार बन जाते हैं। मुझे अचंभा होता है कि  एक ही व्यक्ति अथवा संस्था द्वारा सर्वसमावेशी भारतीय संस्कृति और संकीर्ण क्षेत्रीयता की भावना, दोनों का प्रतिनिधित्व कैसे किया जा सकता है। हमारे ये महान सड़क छाप सैनिक, फिल्मों के बारे में भी अपनी राय रखते हैं, कि कौन सी फिल्म चलने दी जानी है और कौन सी नहीं। आश्चर्य इस बात का है कि स्वयं को प्रगतिशील मानने वाली पार्टियां ऐसी पार्टी को क्यों बर्दाश्त करती हैं और न्यायालय द्वारा इनको समुचित दंड क्यों नहीं दिया जाता जिससे पुनः ऐसी संस्थागत गुंडागर्दी न की जा सके।

पिछले दिनों एक निर्माणाधीन ऐतिहासिक फिल्म की शूटिंग के दौरान जब राजस्थान में गुंडागर्दी की गई, ‘करणी सेना’ नाम दिया गया था इस गुंडों की सेना को, इसका मुखिया टी.वी. पर इंटरव्यू देते भी देखा गया, ऐसा लग रहा था अभी ब्यूटी पार्लर होकर आया है, शुद्ध ढोंगी दिख रहा था, और उसकी मनोकामना भी पूरी हो रही थी क्योंकि टीवी पर लोग उसका इंटरव्यू ले रहे थे। गुंडागर्दी करने के पीछे उसकी जो मनोकामना थी, वह पूरी हो रही थी।

असहिष्णुता का साम्राज्य बहुत लंबा है, निःसंदेह इसमें आरएसएस से जुड़े कुछ संगठन, बजरंग दल, गौ रक्षा दल और न जाने किस-किस नाम से हैं, इनके द्वारा भी आजकल जमकर गुंडागर्दी की जा रही है। मोदी जी समय-समय पर इनके विरुद्ध बोलते हैं, लेकिन इतना काफी नहीं है। इनके विरुद्ध ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए कि दोबारा ये सिर न उठा सकें।

मुझे सचमुच बार-बार ये खयाल आता है कि आज अगर महात्मा गांधी होते तो वे क्या कर पाते और अगर प्रेमचंद होते तो वे क्या लिख पाते।

अंत में, कल ही मेरे मित्र अरुण कुमार मिश्रा जी ने मेरे एक गीत की याद दिलाई, कवि के लिए इससे बड़ी बात क्या हो सकती है, सो आज ही, छोटा सा वह गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

बनवासी राम की तरह 

पांवों से धूल झाड़कर,

पिछले अनुबंध फाड़कर

रोज जिए हम-

बनवासी राम की तरह। 

छूने का सुख न दे सके- 

रिश्तों के धुंधले एहसास, 

पंछी को मिले नहीं पर- 

उड़ने को सारा आकाश। 

सच की किरचें उखाड़कर, 

सपनों की चीरफाड़ कर, 

टांक लिए भ्रम,

गीतों के दाम की तरह। 

आज इतना ही सहन कर लीजिए, नमस्कार।

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49. आज मौसम पे तब्सिरा कर लें

कहते हैं कि मौसम पर बात करना सबसे आसान होता है लेकिन जब मौसम अपनी पर आ जाए तब उसको झेलना सबसे मुश्किल होता है।

मैंने भी अपने कुछ गीतों में और  एक गज़ल में मौसम का ज़िक्र किया था, गज़ल के कुछ शेर यहाँ दे रहा हूँ-

आज मौसम पे तब्सिरा कर लें,

और कुछ ज़ख्म को हरा कर लें। 

जिनके नुस्खों पे रोग पलते हैं, 

उन हक़ीमों से मशविरा कर लें। 

आह के शेर, दर्द की नज़्में, 

इक मुसलसल मुशायरा कर लें। 

अब ये बात तो राजनैतिक मौसम की थी, हालांकि मुझे इस पर आपत्ति है कि ‘राजनैतिक’  में ‘नैतिक’ क्यों आता है।

खैर मेरा मन इस समय चल रहे बरसात के मौसम पर बात करने का है, जो देश भर में बहुत से प्राण ले चुका है। वैसे तो  ये सच्चाई है कि भारत में हर मौसम कुछ जानें लेकर ही जाता है।

यह भी सही है कि  कुदरत की मार जब पड़ती है, तब बड़े से बड़े सूरमा राष्ट्र भी कमज़ोर साबित हो जाते हैं, लेकिन शायद  भारत जैसे देशों में ये मार कुछ ज्यादा घातक होती है।

मैं तो अब गोआ में हूँ, वैसे भी यहाँ के ऊंचे इलाके में हूँ, बहुत बारिश पड़ रही है, यहाँ समुद्र है और ऊंचे-नीचे इलाके हैं। मैंने अभी तक यहाँ, अपने इलाके में, सड़कों पर पानी जमा होते नहीं देखा है। वैसे मैंने पूरा इलाका नहीं देखा है, जितना देखा, उसके आधार पर कह रहा हूँ।

मुझे लगता है, कुदरती तौर पर शहरों में जो ऊंचे-नीचे इलाके होते हैं, बल्कि शहरों की जगह  मैं कहूंगा कि जहाँ शहर बसाए जाते हैं, उन इलाकों में जो चढ़ाइयां और ढलान होते हैं, पानी इकट्ठा होने का जो प्राकृतिक रूट होता है, यदि उसमें अधिक छेड़छाड़ न की जाए, शहरों के किनारे जल संग्रहण के लिए कुछ बड़े-बड़े तालाब- झील आदि बना दिए जाएं, तब कुदरत की यह मार शायद काफी हद तक कम की जा सकती है। इस लिहाज़ से टाउन प्लैनर्स की विशेष भूमिका हो सकती है।

मुझे ऐसा लगता है कि बाढ़ की, सूखे की जो समस्याएं आती हैं, उनका स्थान आधारित अध्ययन किया जाना चाहिए, ऐसा कोई विभाग यदि है, तो उसमें गंभीर और प्रतिभाशाली लोगों को इस भविष्यमूलक योजना की तैयारी में लगाया जाए, जिससे इन आपदाओं का प्रभाव जहाँ ये कम है वहाँ समाप्त हो और जहाँ अधिक हैं वहाँ कम से कम हो सके और जहाँ तक हो सके, इन आपदाओं के कारण किसी के प्राण न जाएं।

डॉ. राही मासूम रज़ा की कुछ पंक्तियां, इस गंभीर माहौल में शेयर करने का मन हो रहा है, जो शायद उनके उपन्यास ‘दिल एक सादा कागज़’ में थीं-

कौन आया दिल-ए-नाशाद, नहीं कोई नहीं

राहरौ होगा, कहीं और चला जाएगा, 

गुल करो शमा, बुझा दो, म-औ-मीना-औ-अयाग,

अपनी आंखों के किवाड़ों को मुकफ्फल कर लो, 

अब यहाँ कोई नहीं, कोई नहीं आएगा। 

आज मौसम की मार पर यह चर्चा यहीं समाप्त करता हूँ।

नमस्कार।

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