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42. इस धरती से उस अम्बर तक,दो ही चीज़ गज़ब की हैं, एक तो तेरा भोलापन है,एक मेरा दीवानापन।

मैंने लखनऊ प्रवास का ज्यादा लंबा ज़िक्र नहीं किया और ऊंचाहार के सात वर्षों को तो लगभग छोड़ ही दिया, क्योंकि मुझे लगा कि जो कुछ वहाँ हुआ, वह पहले भी हो चुका था। राजनीति की कोई कितनी बात करेगा!

ऊंचाहार में भी मुझे भरपूर प्यार मिला, कवि सम्मेलनों के आयोजन, पहले की तरह नियमित रूप से होते रहे। जैसा मैंने पहले भी अनेक बार उल्लेख किया है, कवि सम्मेलन में शिष्ट हास्य भी मैंने समुचित मात्रा में रखने की हमेशा कोशिश की है, लेकिन मेरे प्रिय रहे हैं गीत कवि, जैसे- नीरज, सोम ठाकुर, किशन सरोज आदि, भारत भूषण जी का मंचों पर आना तो उस समय तक लगभग बंद हो गया था।

एक बात मैंने ऊंचाहार में रहते हुए नोट की, कि नीरज, सोम ठाकुर, किशन सरोज जैसे महान गीतकारों को लोग सुन भर लेते हैं, कोई प्रतिक्रिया नहीं, कोई उत्साह नहीं, जैसे हास्य कविता को सुनकर होता है। मुझे इससे पीड़ा होती थी। शायद वहाँ का श्रोता समुदाय अधिक युवा था। जो भी कारण हो, मुझे यह ठीक नहीं लगता था।

ऐसे में, मैं मानता हूँ कि यह अन्याय होगा कि मैं डॉ. कुमार विश्वास का ज़िक्र न करूं। मुझे कुछ ऐसा लगा कि जिस प्रकार राज कपूर ने, मेरा नाम जोकर के अपेक्षित सफलता प्राप्त न करने पर, बॉबी बनाकर यह चुनौती दी थी कि इसको फेल करके दिखाओ, उसी प्रकार हमने डॉ. कुमार विश्वास को अपने कवि सम्मेलनों का हिस्सा बनाकर, श्रोताओं को यह चुनौती दे डाली और हम इसमें पूरी तरह सफल हुए थे।

मैं यह मानता हूँ कि गीतों के प्रति डॉ. कुमार विश्वास के समर्पण में कोई कमी नहीं है। उन्होंने भी बहुत संघर्ष किया है। शुरू में जब वे सीधे गीत पढ़ने के लिए मंच पर जाते थे, तब कुछ स्थापित गीतकारों ने उनको आगे नहीं बढ़ने दिया।

बाद में डॉ. कुमार विश्वास ने मंच संचालन में अपनी वाक-पटुता और जो कुछ भी मसाला संचालन के लिए आवश्यक हो उसका प्रयोग करके, अपनी ऐसी जगह बनाई कि मंच पर उनका होना, आयोजन की सफलता की गारंटी बन गया।

डॉ. कुमार विश्वास हमारे आयोजनों में तीन बार ऊंचाहार आए और उनके सहयोग से हमने ऐसे अनेक कवि-शायरों को भी सुनने का अवसर प्राप्त किया, जिनसे मेरा संपर्क नहीं था और यह भी बात है कि भरपूर हास-परिहास के बाद वो ऐसा वातावरण बनाते हैं, इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं कवियों को, कि लोग मधुर गीतों, रचनाओं को भी पूरे मन से सुनते हैं।

एक और बात कि हमने तीन बार उनको बुलाया, पहली बार उन्होंने कुछ मानदेय लिया, अगली बार उसका दो-गुना, और तीसरी बार तीन गुना। आज जितनी राशि वो लेते हैं, उसको देखते हुए, परियोजनाओं में उनको बुलाना बहुत कठिन है। मुझे खुशी है इस बात की, कि कोई गीत कवि सुरेंद्र शर्मा जैसे लोगों को टक्कर दे रहा है, जो कवि न होते हुए भी बहुत मोटी रकम लेते हैं।

डॉ. कुमार विश्वास के संचालन में जहाँ हमने ज़नाब मुनव्वर राना जी को दो-तीन बार सुना, ओम प्रकाश आदित्य जी भी उनके द्वारा संचालित आयोजन में आए थे, वहीं कुछ ऐसे प्रतिभावान कवि-शायर भी उनके माध्यम से हमारे आयोजनों में आए, जिनसे हमारा कोई संपर्क नहीं था। मेरे खयाल में, कम से कम ऊंचाहार में तो डॉ. कुमार विश्वास द्वारा संचालित ये तीन कवि सम्मेलन सर्वश्रेष्ठ थे।

डॉ. कुमार विश्वास आज देश-विदेश के श्रोताओं के दिलों पर राज करते हैं, उनकी कुछ रचनाओं की बानगी प्रस्तुत है, इनमें मैंने जान-बूझकर उनके सर्वाधिक लोकप्रिय मुक्तक शामिल नहीं किए हैं।

 

वो जिसका तीर चुपके से, जिगर के पार होता है,

वो कोई गैर क्या, अपना ही रिश्तेदार होता है,

किसी से अपने दिल की बात न कहना तू भूले से,

यहाँ तो खत भी थोड़ी देर में अखबार होता है।

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कोई खामोश है इतना, बहाने भूल आया हूँ,

किसी के इक तरन्नुम में, तराने भूल आया हूँ,

मेरी अब राह मत तकना कभी ऐ आस्मां वालों,

मैं इक चिड़िया की आंखों में उड़ानें भूल आया हूँ।

********************

जो धरती से अम्बर जोड़े , उसका नाम मोहब्बत है ,
जो शीशे से पत्थर तोड़े , उसका नाम मोहब्बत है ,
कतरा कतरा सागर तक तो ,जाती है हर उम्र मगर ,
बहता दरिया वापस मोड़े , उसका नाम मोहब्बत है ।

***************

बस्ती बस्ती घोर उदासी पर्वत पर्वत खालीपन,
मन हीरा बेमोल बिक गया घिस घिस रीता तनचंदन,
इस धरती से उस अम्बर तक दो ही चीज़ गज़ब की हैं,
एक तो तेरा भोलापन है एक मेरा दीवानापन।

*******************

बहुत बिखरा बहुत टूटा थपेड़े सह नहीं पाया,
हवाओं के इशारों पर मगर मैं बह नहीं पाया,
अधूरा अनसुना ही रह गया यूं प्यार का किस्सा,
कभी तुम सुन नहीं पायी, कभी मैं कह नहीं पाया।

आज का ब्लॉग डॉ. कुमार विश्वास को समर्पित है।

नमस्कार।

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41. मधु का सागर लहराता था, लघु प्याला भी मैं भर न सका!

मैंने कितनी नौकरियों और अलग-अलग स्थानों पर तैनाती के बहाने से अपनी राम-कहानी कही है, याद नहीं। लेकिन आज दो नौकरियों की याद आ रही है, जिनका ज़िक्र नहीं हुआ। जाहिर है ये काम मैंने शुरू के समय में, बेरोज़गार रहते हुए, शाहदरा में निवास के समय ही किए थे।

एक नौकरी थी फिल्म देखने की, और इस नौकरी के दौरान मैंने एक सप्ताह तक फिल्म देखी, फिल्म थी ‘हमराज़’,   हर रोज़ फिल्म के चारों शो! मैं तैनात था फिल्म वितरक की तरफ से, डिस्ट्रीब्यूटर के नाम से ज्यादा जानते हैं शायद उसको, और मेरा काम था कि हर शो शुरू होने के बाद, प्रत्येक श्रेणी में कितनी सीटें खाली बची थीं यह देखना और यह विवरण मैंने दे दिया संबंधित व्यक्ति को, उसके बाद मैं चाहूं तो फिल्म देखता रहूं या बाहर टहलकर अगला शो शुरू होने का इंतज़ार करूं।

मैं रहता था शाहदरा में, और यह ड्यूटी मेरी गांधी नगर के किसी सिनेमा हॉल में लगी थी, इस प्रकार शो के बीच में घर जाकर वापस आने की तो गुंजाइश नहीं थी। मैंने एक-दो बार तो फिल्म लगभग पूरी देखी, उसके बाद अक्सर मैं गाने सुनने के लिए हॉल में आ जाता था, जबकि सामान्यतः लोग इसका उल्टा करते हैं। शायद पहली बार महेंद्र कपूर के कई गाने इस फिल्म में आए थे और वे बहुत लोकप्रिय भी हुए थे। ‘न मुंह छुपा के जियो और न सर झुका के जियो’ आदि।

अगर मुझे सही याद है तो इसी फिल्म के लिए महेंद्र कपूर को फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था और जैसा मैंने पढ़ा है, उस समय के किसी स्थापित गायक ने उनको बधाई तक नहीं दी थी। लेकिन इस घटना के अगले दिन, उदार हृदय वाले अमर गायक मुकेश जी महेंद्र कपूर जी के घर बधाई देने चले गए थे। इस घटना का महेंद्र कपूर जी ने बड़े आदर के साथ उल्लेख किया है।

खैर, मैं अपनी ड्यूटी की बात कर रहा था, फिल्म के नायक राजकुमार तो अपनी अदाओं के लिए जाने ही जाते हैं, फिल्म में एक नई हीरोइन भी आई थी, जो बाद में पता नहीं कहाँ चली गई। फिल्म की कहानी तो बिल्कुल याद नहीं है (वैसे मेरा कहानी सुनाने का इरादा बिल्कुल नहीं है) हाँ राजकुमार के सफेद जूते ध्यान में आते हैं, शायद उनकी कहानी के सस्पेंस में, विशेष भूमिका थी।

यह किस्सा मैंने सुनाया एक सप्ताह की नौकरी का, उसका पैसा कितना मिला था याद नहीं और शायद बाद में वितरक को मेरी ज़रूरत नहीं पड़ी।

अब दूसरी नौकरी की कहानी सुना देता हूँ, ये नौकरी चली सिर्फ एक दिन। कोई टायर री-ट्रेडिंग कंपनी थी, उसकी तरफ से अन्य लोगों की तरह मुझे भी तैनात कर दिया गया था, एक पैट्रोल पंप पर। शायद झंडेवालान के पास था पेट्रोल पंप, सही याद नहीं।

तो हमको वहाँ पेट्रोल पंप पर रहना था, ऐसा दिखाना था कि हम पेट्रोल पंप के ही लोग हैं। जो लोग पेट्रोल भरवाने आते हैं, उनसे ठीक से बात करनी थी, कोई सहायता संभव हो तो करनी थी और निगाह टिकाये रखनी थी उनकी गाड़ी के टायरों पर, अगर कोई टायर घिसा हुआ मिल गया, तब हमारा काम था कि उनके शुभचिंतक बनकर उनको बताएं कि आपको टायर रीट्रेड कराने की ज़रूरत है, और हम आपकी सहायता के लिए मौज़ूद हैं, हम यहीं घिसा हुआ टायर निकालकर, उसके स्थान पर एक काम-चलाऊ टायर लगा देंगे और अगले दिन आप अपना री-ट्रेड किया हुआ टायर ले जा सकते हैं।

कुल मिलाकर किस्सा इतना कि दिन भर के प्रयास के बाद मुझे एक ग्राहक मिल गया। मुझसे काफी देर तक मालिक ने पूछा कि आपने उसको कैसे तैयार किया।

मैं इस सफलता से काफी उत्साहित था, लेकिन शाम के समय कुछ ऐसा हुआ कि मैं फिर से काम पर नहीं गया। कंपनी के मालिक शायद सरदार जी थे, उन्होंने मुझसे कहा- “मि. शर्मा, यू मे नॉट बी वेल ड्रेस्ड, बट यू मस्ट बी वेल प्रेस्ड”।

अब फक़ीरी का स्वभाव है, नौकरी रहे न रहे, लेकिन मेरा अपना स्वभाव रहा है और उसको बदलना आसान नहीं है।

मैंने कभी लिखा भी था-

‘क्रीज़ बनाए रखने की कोशिश में,

बिता देते हैं पूरा दिन-

इस्तरी किए हुए लोग

ऐसा लगता है कई बार कि इस्तरी बंदे के कपड़ों पर नहीं, बल्कि उसकी पर्सनैलिटी पर हुई है। इस प्रकार, एक दिन की उस नौकरी का समापन हुआ।

आज हरिवंश राय बच्चन जी का एक गीत पढ़ लेते हैं-

मैं जीवन में कुछ न कर सका!

जग में अँधियारा छाया था,
मैं ज्‍वाला लेकर आया था
मैंने जलकर दी आयु बिता, पर जगती का तम हर न सका!
मैं जीवन में कुछ न कर सका!

अपनी ही आग बुझा लेता,
तो जी को धैर्य बँधा देता,
मधु का सागर लहराता था, लघु प्‍याला भी मैं भर न सका!
मैं जीवन में कुछ न कर सका!

बीता अवसर क्‍या आएगा,
मन जीवन भर पछताएगा,
मरना तो होगा ही मुझको, जब मरना था तब मर न सका!
मैं जीवन में कुछ न कर सका!

 

नमस्कार।

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40. चर्बी वारो बटर मिलैगो, फ्रिज में हे बनवारी!

पता नहीं क्या सोचकर यह ब्लॉग लिखने की शुरुआत की थी। और इसको शेयर करता हूँ ट्विटर पर, फेसबुक पर!

जैसे गब्बर सिंह ने सवाल पूछा था, क्या सोचा था सरदार बहुत खुश होगा, शाबाशी देगा! यहाँ पर सरदार कौन है!

यह बहस तो शुरू से चली आ रही है कि कुछ भी लिखने से कुछ फर्क पड़ता है क्या? खास तौर पर उसको ट्विटर और फेसबुक पर शेयर करने से। यहाँ सबकी अपनी-अपनी सोशल हैसियत के हिसाब से फैन-फॉलोविंग है। यहाँ क्या कोई ऐसा है, जो खुद को दूसरों से कम विद्वान मानता है? मैं तो कई बार इन प्लेटफॉर्म्स को ‘आत्ममुग्ध सभा’ के नाम से जानना पसंद करता हूँ!

वो तो पढ़े जाने के लिए कुछ पढ़ना भी पड़ता है, वरना यहाँ हर विद्वान दूसरों को शिक्षित करने के पावन उद्देश्य से ही अपना अमूल्य समय दे रहा है।

यहाँ कोई भी कोहली को खेलना और कप्तानी करना सिखा सकता है और बड़े से बड़े पॉलिटिशियन को राजनीति के दांवपेच भी बता सकता है।

ऐसी महान ऑडिएंस के बीच कभी मन होता है कि हम भी कुछ बात कहें और कुछ लोग कर्त्तव्य भावना से, कुछ विशेष लिहाज़ करते हुए पढ़ लेते हैं।

ऐसा करते-करते 39 आलेख हो गए, अपने जीवन के कुछ प्रसंगों को याद करते हुए, मुझे अचंभा हो रहा है कि मैंने 39 दिन तक लगातार यह आलेख लिखे हैं, आज चालीसवां दिन है।

मुझे एक पुराने कवि-मित्र श्री राजकुमार प्रवासी जी याद आ रहे हैं, उनकी पत्नी ने उनके एक मित्र को एक बार बताया था, “भैया पहले तो इनकी कविता थोड़ी-बहुत समझ में आती थी, अब बिल्कुल नहीं आती। लेकिन ये रात में भी कागज़-कलम साथ लेकर सोते हैं, कि पता नहीं कब सरस्वती जी दौरे पर हों और इनसे कुछ लिखवा लें।”

खैर अब इन ऊल-जलूल बातों को छोड़कर मैं उनके प्रति आभार अवश्य व्यक्त करना चाहूंगा जिन्होंने मेरे इन  ब्लॉग्स को पढ़ा है और उन पर अपनी अमूल्य सम्मति दी है। आगे भी ब्लॉग्स लिखूंगा, पर जब कभी मन होगा तब, दैनिक स्तंभ बनाकर नहीं लिखूंगा।

श्रेष्ठ हास्य-व्यंग्य के कवि जिनको अपने आयोजनों में बुलाने का अवसर मिला, उनमें से एक थे श्री अल्हड़ बीकानेरी, वे भी आज हमारे बीच नहीं हैं। आज अल्हड़ बीकानेरी जी की लिखी एक लोकगीत की पैरोडी की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

कान्हा बरसाने में आ जाइयो,

बुला गई राधा प्यारी।

असली माखन कहाँ मिलैगो, शॉर्टेज है भारी,

चर्बी वारो बटर मिलैगो, फ्रिज में हे बनवारी,

आधी चम्मच मुख लपटाय जाइयो

बुला गई राधा प्यारी।

नंदन वन के पेड़ कट गए, बने पार्क सरकारी,

ट्विस्ट करत गोपियां मिलैंगी, जहाँ तुम्हें बनवारी

संडे के दिन रास रचा जाइयो

बुला गई राधा प्यारी।

इसी के साथ आज की कथा यहाँ संपन्न होती है।

नमस्कार।

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39. उनके पर्चम भले ही किलों पर रहे, पर दिलों पर हुक़ूमत हमारी रही।

लगभग ढाई वर्ष के लखनऊ प्रवास और सात वर्ष के ऊंचाहार प्रवास की कुछ छिटपुट घटनाएं याद करने का प्रयास करता हूँ।

अब घटनाओं की या व्यक्तियों की उस प्रकार विस्तार में बात नहीं करूंगा, समझिए कि कहानी सुनाने का सिलसिला समाप्त हुआ।

एक घटना जो याद आ रही है, वह है लखनऊ के पिकप प्रेक्षागृह में आयोजित कवि सम्मेलन, जिसमें श्री सोम ठाकुर, माणिक वर्मा जी, पं. चंद्रशेखर मिश्र, ओम प्रकाश आदित्य जी आदि के अलावा डॉ. वसीम बरेलवी भी शामिल हुए थे।

इस आयोजन के समय पं. चंद्र शेखर मिश्र जी से काफी विस्तार से बातचीत हुई थी और कुछ समय बाद ही शायद उनका देहांत भी हो गया था। मुझे वाराणसी में अस्सी घाट के निकट उनके आवास पर जाने का भी अवसर मिला था। बहुत श्रेष्ठ रचनाकार थे और विशेष रूप से भोजपुरी साहित्य को उनकी भेंट अतुल्य है। ओम प्रकाश आदित्य जी और माणिक वर्मा जी तो इसके बाद भी हमारे एक-दो आयोजनों में ऊंचाहार आए थे। हास्य-व्यंग्य में जिस गरिमा को उन्होंने बनाए रखा, वह बेमिसाल है। आज वे भी हमारे बीच नहीं हैं, उनको मेरी विनम्र श्रंद्धांजलि।

इस आयोजन की प्रमुख विशेषताओं में डॉ. वसीम बरेलवी की शायरी और श्री सोम ठाकुर जी का काव्य पाठ रहे थे। मुझे आज भी याद है सोम जी ने जब इस आयोजन में अपने गीत ‘ये प्याला प्रेम का प्याला है’ का पाठ किया था तब श्रोता मदमस्त हो गए थे।

मुझे ऊंचाहार के लिए एक आयोजन निश्चित करने का प्रसंग याद आ रहा है। भोजपुरी अभिनेता और गायक (जो अभी राजनेता बन गए हैं) श्री मनोज तिवारी का कार्यक्रम निश्चित करना था। जैसा कि एनटीपीसी में होता है, इसके लिए मानव संसाधन, वित्त और शायद क्रय विभाग के सदस्यों को शामिल करते हुए एक कमेटी बनाई गई। सुल्तानपुर में रामलीला के मंच पर, श्री मनोज तिवारी का कार्यक्रम था, यह निश्चित हुआ कि वहाँ जाकर ही हम उनसे बात करेंगे।

इसमें कोई संदेह नहीं कि श्री मनोज तिवारी बहुत लोकप्रिय जन-गायक रहे हैं। यह निश्चित हुआ कि वे कार्यक्रम के बाद चुपचाप अपनी जीप में एक देहाती टाइप रेस्टोरेंट में आ जाएंगे और हम लोग वहीं उनसे मिलकर बात कर लेंगे। इस प्रकार हम लोग कुछ उसी अंदाज में उस रात मिले, जैसे फिल्मों में गैंग्स्टर मिलते हैं। फर्क इतना है कि हमारे हाथों में बंदूकों की जगह कागज़-कलम थे।

बाद में तिवारी जी ने यह भी बताया कि फिल्मों में जाने से पहले वे भी ओएनजीसी में हिंदी अनुवादक के रूप में कार्य करते थे। खैर यह कार्यक्रम भी अन्य कार्यक्रमों की तरह अत्यंत सफल रहा।

अंत में सोम ठाकुर जी का एक श्रेष्ठ गीत प्रस्तुत है, जिसमें बताया गया है कि अमर तो कवि-कलाकार ही होते हैं, क्योंकि वे हमारे दिलों पर राज करते हैं-

 

यूं दिये पर हरेक रात भारी रही, रोशनी के लिए जंग जारी रही

 

हम कि जो रात में भोर बोये रहे, सीप में मोतियों को संजोए रहे।

क्या करें हम समंदर के विस्तार का, जिसके पानी की हर बूंद खारी रही।

 

वक्त का जो हरेक पल भुनाते रहे, जो सदा जग-सुहाती सुनाते रहे,

वो हैं शामिल ज़हीनों की फेहरिस्त में, सरफिरों में हमारी शुमारी रही।

 

लोग थे जो ज़माने पे छाए रहे, जिनके घर सत्य भी झुकाए रहे।

उनके पर्चम भले ही किलों पर रहे, पर दिलों पर हुक़ूमत हमारी रही।

 

वक्त के वो कदम चूमकर क्या करे, राजधानी में वो घूमकर क्या करे।

वो किसी शाह के घर मिलेगा नहीं, सोम की तो फक़ीरों से यारी रही।

 

नमस्कार।

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38. यह पूजन अपनी संस्कृति का, ये अर्चन अपनी भाषा का।

अभी तक मैं वर्षों के हिसाब से बात कर रहा था, जो घटना पहली हुई वह पहले और जो बाद में हुई वह बाद में। पिछले ब्लॉग में, मैं काफी पीछे चला गया था।

वैसे मैंने लखनऊ पहुंचने तक की बात की थी, जिसके बाद लगभग 10 वर्ष की सेवा एनटीपीसी में रही।

समय क्रम को छोड़ते हुए, चलिए अब राजभाषा हिंदी की बात कर लेते हैं। इसके साथ तो मैं एनटीपीसी की सेवा में आने के समय से अंत तक जुड़ा रहा था।

एक बात में मुझे शुरू से कहीं कोई संदेह नहीं रहा कि राजभाषा नीति के अनुपालन की पूरी ज़िम्मेदारी परियोजना या कार्यालय प्रधान की है और ऐसा करने की क्षमता भी अगर है तो उनके पास ही है। इसी को सही मानते हुए मैंने शुरू से ही राजभाषा कार्यान्वयन समिति की बैठकों में और महाप्रबंधक की ओर से समय-समय पर जारी निर्देशों के माध्यम से इस पर बल दिया और महाप्रबंधक- श्री दुआ के समय, काफी हद तक इसका असर भी हुआ।

एक बात स्पष्ट है कि हिंदी में काम यदि सभी या अधिकांश कर्मचारी करेंगे तभी होगा, राजभाषा अधिकारी के करने से नहीं होगा।

अब राजभाषा कार्यान्वयन के मामले में सरकारें कितनी गंभीर रही हैं और एनटीपीसी प्रबंधन कितना गंभीर है, यह किसी से छिपा नहीं है।

कभी जब कोई महाप्रबंधक, राजभाषा अधिकारी से पूछता है कि हिंदी की प्रगति क्यों नहीं हो रही है, तो यह मज़ाक ही लगता है। केंद्रीय कार्यालय से आने वाले अधिकारी भी ऐसे प्रश्न परियोजना प्रधान से नहीं पूछते हैं।

कुल मिलाकर राजभाषा कार्यान्वयन का मामला रिपोर्टें तैयार करने तक रह गया है। शुरू में लोगों ने सोचा भी हो कि परिस्थिति में परिवर्तन किया जाए, लेकिन अब यही रह गया है कि रिपोर्टों में परिवर्तन किया जाए।

एक उदाहरण याद आ रहा है, श्री एस.आर.एस.पांडेय, जो विधि के क्षेत्र में कार्यरत थे, ऊंचाहार में हमारे साथ काफी समय रहे, किस्सा उनके साथ जुड़ा है। शुरू के दिनों में जब वे बदरपुर थर्मल पॉवर स्टेशन में विधि के साथ ही राजभाषा का भी काम देख रहे थे, तब राजभाषा विभाग की ओर से निरीक्षण के लिए आने वाले कोई अधिकारी उनको राजभाषा के कार्यान्वयन संबंधी कोई पुरस्कार देना चाहते थे और पांडेय जी उस पुरस्कार को लेने के लिए तैयार नहीं थे। इस पर उन सज्जन ने केंद्रीय कार्यालय के राजभाषा वीर डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र को इसकी शिकायत की।

मिश्र जी ने उनसे कहा कि जैसे वे कह रहे हैं, वैसी रिपोर्ट तैयार कर दो और पुरस्कार ले लो, इस पर श्री पांडेय ने बताया कि मैं 10% पत्राचार को हद से हद 20% दिखा सकता हूँ, लेकिन मैं पुरस्कार पाने के लिए उसको 80% नहीं दिखा सकता।

एनटीपीसी में राजभाषा शील्ड देने का चलन चला, तब शुरू में तो हमारी विंध्याचल परियोजना को यह शील्ड मिली, क्योंकि उस समय पत्राचार के आंकडों के अलावा, गतिविधियों के और कई क्षेत्र थे, जो निर्णय को प्रभावित करते थे, लेकिन बाद में जब पत्राचार के आंकडों की मुख्य भूमिका हो गई, अर्थात झूठ ही पुरस्कृत होने का आधार बन गया,  तब से हम तो पूरी तरह रेस से बाहर हो गए।

अचंभा इसी बात का है कि माननीय सांसदों की जो समिति किसी होटल में बैठकर निरीक्षण की कार्यवाही में, जो कुछ उनको दिखा दिया जाता है, उसके आधार पर निर्णय लेती है, किसको ऐसा लगता है कि इससे राजभाषा हिंदी की कोई प्रगति होगी। यह तो कुल मिलाकर हिम्मत के साथ झूठ बोलने की प्रतियोगिता बनकर रह गई है। अगली बार यदि आपके संस्थान को राजभाषा हिंदी संबंधी कोई पुरस्कार मिलता है तो इस पर गर्व मत कीजिए, जांच कराइए।

सरकार को भी सोचना चाहिए कि यदि वास्तव में राजभाषा हिंदी की प्रगति करनी है तो मूल्यांकन और प्रोत्साहन का कोई अलग व्यावहारिक पैमाना तैयार किया जाए।

अंत में इतना ही कहना चाहूंगा कि आंकडों की बाज़ीगरी से किसी का भला नहीं हुआ है, कुछ लोगों को सैर-सपाटे का मौका भले ही मिल जाए।

हिंदी की प्रगति के लिए गहरी भावना की ज़रूरत है, जो इन आंकड़ेबाज़ों में नहीं होती, सोम ठाकुर जी की भाषा वंदना में है, जो मैं यहाँ दे रहा हूँ-

भाषा वंदना

करते हैं तन मन से वंदन, जन गण मन की अभिलाषा का,

अभिनंदन अपनी संस्कृति का, आराधन अपनी भाषा का।

ये अपनी सत्य सर्जना के, माथे की है चंदन-रोली,

मां के आंचल की छाया में, हमने जो सीखी है बोली,

ये अपनी बंधी हुई अंजुरी, ये अपने गंधित शब्द-सुमन,

यह पूजन अपनी संस्कृति का, ये अर्चन अपनी भाषा का।  

 

 अपने रत्नाकर के रहते, किसकी धारा के बीच बहें,

हम इतने निर्धन नहीं कि वाणी से औरों के ऋणी रहें।

इसमें प्रतिबिंबित है अतीत, आकार ले रहा वर्तमान,

ये दर्शन अपनी संस्कृति का, ये दर्पण अपनी भाषा का।

 

यह ऊंचाई है तुलसी की, यह सूर सिंधु की गहराई,

टंकार चंद्रबरदाई की, यह विद्यापति की पुरवाई,

जयशंकर का जयकार, निराला का यह अपराजेय ओज,

यह गर्जन अपनी संस्कृति का, यह गुंजन अपनी भाषा का।  

करते हैं तन मन से वंदन, जन गण मन की अभिलाषा का,

अभिनंदन अपनी संस्कृति का, आराधन अपनी भाषा का।

नमस्कार।

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37. हम सदा जिए झुककर सामने हवाओं के

मेरे न चाहते हुए भी, एनटीपीसी में आने के बाद की मेरी कहानी मुख्य रूप से कुछ नकारात्मक चरित्रों पर केंद्रित होकर रह गई है। वैसे मेरे जीवन में इन व्यक्तियों का बिल्कुल महत्व नहीं है। मैं बस कुछ प्रवृत्तियों को रेखांकित करना चाहता था, आगे भी करूंगा।

जैसा मैंने कहा कि अच्छे व्यक्तियों को ज्यादा फुटेज नहीं मिल पाता। मैंने एनटीपीसी से पहले के प्रसंगों में तो ऐसे व्यक्तियों का उल्लेख किया है, एनटीपीसी में नहीं किया क्योंकि यहाँ यह नेगेटिव गैंग छा गया। लेकिन मैं यहाँ  कुछ पॉज़िटिव लोगों का उल्लेख अभी करना चाहूंगा। यहाँ मैं ऐसे कुछ लोगों का ही ज़िक्र करूंगा जो मेरे विभाग में थे या मुझसे ऊपर थे। अन्य विभागों के अधिकारियों / साथियों का ज़िक्र किया तो ये किस्सा बहुत लंबा हो जाएगा।

जैसे मेरे पहले बॉस श्री आर.एन.रामजी, बहुत जानकार और पॉज़िटिव इंसान थे, श्री सुधीर चतुर्वेदी जी भी अच्छे इंसान थे और एनटीपीसी छोड़ने के बाद बहुत ऊपर तक गए। श्री एस.के.कपाई और श्री एस.के.आचार्य का ज़िक्र मैं एक साथ करना चाहूंगा। दोनों बहुत अच्छे इंसान थे। फर्क इतना था कि श्री कपाई बहुत भावुक थे और श्री आचार्य बिल्कुल प्रैक्टिकल। श्री कपाई को कंपनी में बहुत झेलना पड़ा वरना उनको डायरेक्टर स्तर तक तो पहुंचना ही चाहिए था।

श्री अविनाश चंद्र चतुर्वेदी ने मुझे भरपूर सहयोग प्रदान किया और वे मेरे साथ हो रहे अन्याय से दुखी भी थे।

यहाँ एक किस्सा सुना देता हूँ, एक पॉज़िटिव अधिकारी का। विंध्याचल परियोजना में रहते हुए ही, जब श्री एस.के.आचार्य हमारे बॉस थे, उस समय केंद्रीय कार्यालय द्वारा सूचित किया गया कि वहाँ पर काफी अधिक अतिरिक्त फर्नीचर है, जो वे परियोजनाओं को देना चाहते हैं। परियोजना की तरफ से मुझे वहाँ भेजा गया, फर्नीचर चुनने और लाने की व्यवस्था के लिए।

केंद्रीय कार्यालय में यह कार्य श्रीमती वेंकटरमण देखती थीं जो वहाँ वरिष्ठ प्रबंधक थीं। मैं उस समय शायद उप प्रबंधक (राजभाषा) के पद पर कार्यरत था। श्रीमती वेंकटरमण से मैं पहले कभी नहीं मिला था और उनके पति उस समय काफी ऊंचे पद पर थे जो कि मेरे कार्यग्रहण के समय हमारे महाप्रबंधक थे।

मैं यहाँ श्रीमती वेंकटरमण की सज्जनता और शालीनता के लिए उनका ज़िक्र कर रहा हूँ। उन्होंने मेरा भरपूर मार्गदर्शन किया, बार-बार ये कहती रहीं कि कोई दिक्कत हो तो मैं उनको बताऊं।

अब सरकारी कामों में ऐसा हो जाता है, मैं 3-4 दिन का अनुमान लगाकर आया था और मुझे वहाँ लगभग एक सप्ताह ज्यादा रहना पड़ा। मेरे पास पैसे खत्म हो चुके थे और मुझे वहाँ से दौरा बढ़ाने का अनुमोदन और एडवांस लेना था। उस समय तक डेबिट कार्ड भी नहीं होते थे। मैं इसके लिए फॉर्म भरकर केंद्रीय कार्यालय में प्रबंधक (राजभाषा) – डा. राजेंद्र प्रसाद मिश्र के पास गया, ऐसा मानते हुए कि वे तो इस पर तुरंत हस्ताक्षर कर देंगे। ये श्रीमान बोले- ‘पंडित जी, कोई और काम हो तो बोलिये, ये तो मैं नहीं कर पाऊंगा। मैं जन संपर्क का काम भी देखता था, सो उसके प्रभारी श्री हिंडवान जी के पास गया, उनसे अनेक बार मीटिंग्स में मुलाकात हुई थी। वे बोले कि मुझको वो जानते ही नहीं हैं।

मैं बिना पैसे के दिल्ली में परेशान था, तब श्रीमती वेंकटरमण के पास गया तो उन्होंने तुरंत हस्ताक्षर कर दिए। इसके बाद जब वित्त विभाग का अधिकारी पैसा देने में आनाकानी कर रहा था, तब श्रीमती वेंकटरमण स्वयं मेरे साथ वहाँ चली गईं। उनको देखते ही वह बोला- ‘अरे आप किनको ले आए!’, फिर श्रीमती वेंकटरमण से बोला, ‘मैडम मैं कर ही रहा था बस!’

अब मैं पॉज़िटिव अधिकारियों की बात कर रहा था, तो इतना ही बता दूं कि श्रीमती वेंकटरमण जैसे बहुत से अधिकारी होंगे, जिनको हम सामान्यतः नोटिस ही नहीं कर पाते, क्योंकि हमारे मस्तिष्क पर कुछ नकारात्मक अधिकारी डेरा जमाए रहते हैं।

शारू रांगनेकर के मैनेजमेंट संबंधी व्याख्यानों में से एक है- ‘दीपशिखा मैनेजर्स’, ये ऐसे प्रबंधक होते हैं, कि नकारात्मकता के वातावरण में, जहाँ-जहाँ ये चलते हैं, सकारात्मकता की रोशनी इनके साथ चलती है।

मैं ऐसे सभी, वास्तव में सकारात्मक आचरण वाले कार्यपालकों और कर्मचारियों को अपनी शुभकामनाएं देता हूँ। ऐसे लोगों के दम पर ही प्रतिष्ठानों की साख बनती है।

मुझे लगा कि कब तक मैं घटिया लोगों का गाना गाता रहूं, इसलिए आज ये किस्सा सुना दिया।

आज मन हो रहा है अपना एक गीत शेयर करने का। पृष्ठभूमि बता दूं, जिस प्रकार कोई संगीतकर साज़ छेड़कर वातावरण में अपनी मनचाही संगीत तरंगे पैदा करता है, वैसे ही माना जाता है कि लोकतंत्र में जनता अपना मन चाहा स्ट्रक्चर तैयार करती है, लेकिन लगता है कि ऐसा हो नहीं पाता, बाकी आप लोग समझदार हैं-

 

हमने कब मौसम का वायलिन बजाया है। 

 

हम सदा जिए झुककर, सामने हवाओं के,

उल्टे ऋतुचक्रों, आकाशी घटनाओं के,

अपना यह हीनभाव, साथ सदा आया है।

 

छंद जो मिला हमको, गाने को

घायल होंठों पर तैराने को,

शापित अस्तित्व और घुन खाए सपने ले,

मीन-मेख क्या करते-

गाना था, गाया है।

 

नत हैं हम अदने भी, शब्द हुए रचना में,

भीड़ हुए सड़कों पर, अंक हुए गणना में,

तस्वीरें, सुर्खियां सदा से ही-

ईश्वर है या उसकी माया है।

हमने कब मौसम का वायलिन बजाया है।

                                                                                                               (श्रीकृष्ण शर्मा)

 नमस्कार।

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36. थोड़ी बहुत तो ज़ेहन में नाराज़गी रहे।

पश्चिमी क्षेत्र मुख्यालय, मुंबई से स्थानांतरित होकर मैंने जनवरी,2001 में उत्तरी क्षेत्र मुख्यालय,लखनऊ में कार्यग्रहण किया, पिकप भवन, गोमती नगर में कार्यालय था और गोमती नगर में सहारा सिटी के पास ही गेस्ट हाउस था, जहाँ मैं लखनऊ पहुंचने पर रुका था।

यहाँ पर कार्यपालक निदेशक थे- श्री जी.पी.सिंह, जिनकी छवि मेरे मस्तिष्क में महात्मा वाली थी। विंध्यनगर में मैं उनके साथ काम कर चुका था। वे भी उस समय तक गेस्ट हाउस में ही रुके थे और शाम के समय वे टहलते हुए मिल गए।

मेरे नमस्कार करने पर वे बोले- ‘मुंबई से क्यों भाग आए?’ यह सवाल मुझे बहुत जोर से झटका देने वाला लगा, खास तौर पर उसके मुख से, जिसकी छवि मेरे मन में महात्मा वाली थी। खैर कुछ समय में ही मुझे मालूम हो गया कि वे भाषण देते समय तो अब भी महात्मा ही होते थे, परंतु व्यवहार के मामले में, वे महात्मा छोड़कर कुछ भी हो सकते थे।

लखनऊ में भी बहुत अच्छे मित्र मिले, दिक्कत यही है कि अच्छे लोगों का ज्यादा ज़िक्र नहीं होता, भले ही वे कितनी भी बड़ी संख्या में हों। छोटे- बड़े, सभी प्रकार के पदों पर बहुत सज्जन लोग मिले, लेकिन फिर भी बड़े पदों पर बैठे कुछ छोटे लोगों का ज़िक्र ज्यादा लंबा हो जाता है, ये मेरा कुसूर नहीं है, बाबा तुलसीदास जी ने भी सबसे पहले खल-वंदना की है, क्योंकि वे बिना बात दायें-बायें होते रहते हैं। कहानी तो तभी बनती है न!

लखनऊ में जाकर पहली बार यह खयाल गंभीरता के साथ आया कि अपना मकान होना चाहिए, वैसे ये खयाल मेरे मन में कभी नहीं आया, मेरी पत्नी के मन में आया और पत्नी और बच्चों ने मिलकर मकान खोजा एक मंज़िल वाला, उसे खरीदा गया और फिर बड़ी हसरतों से उसको ऊपर की ओर बढ़ाया गया, मतलब दो मंज़िला।

अब दफ्तर में क्या है, जो काम है वो करना है वह होता जाता है, अगर कुछ दुष्ट लोग न हों तो कैसे कहानी सुनाएगा कोई। अब यह भी जान लीजिए कि मेरी कहानी में कोई दुष्ट प्राणी था, वो ऊपर भी चला गया मान लो, तब उसकी कहानी कहने से क्या फायदा?

असल में किसी की बुराई करना मेरा उद्देश्य नहीं है। आज और इसके बाद, कोई ऐसा प्राणी अपनी मनमानी न कर पाए, उसको समय पर माकूल जवाब मिल जाए तो कुछ शरीफ लोग बिना बात कष्ट झेलने से बच जाएंगे।

एक दो किस्से, महात्मा जी.पी.सिंह जी के बता देता हूँ। ये मान्यवर पश्चिमी क्षेत्र मुख्यालय के प्रधान थे, दो-तीन ड्राइवर थे मुख्यालय में, जिन्हें कायदे से अन्य लोगों की भी सेवा करनी चाहिए थी, लेकिन वे इनके लिए ही कम पड़ते थे। एक गाड़ी तो इनके यहाँ दो शिफ्ट में चलती थी, मतलब दो ड्राइवर उसमें लगते थे।

श्रीमान जी के पास एक ड्राइवर सुबह 4 बजे पहुंच जाता था, वे उठते 5 बजे तक, गाड़ी में 3-4 किलोमीटर दूर एक पार्क तक जाते, वहाँ गाड़ी से उतरकर दो-चार चक्कर लगाते, फिर वापस घर आते। इस प्रकार उस गरीब की ड्यूटी सुबह 4 बजे से प्रारंभ हो जाती थी।

एक गाड़ी मुख्यतः उनकी एक बेटी की सेवा में रहती थी अधिकतम समय, कभी उनकी मां भी साथ चली जाती थी। कभी बेटी किसी से नाराज़ हो गई तो ऑफिस में फोन करती, पापा उसका ट्रांसफर कर दो, उसने मेरा कहना नहीं माना।

अब लगे हाथ उनकी पत्नी की भी तारीफ कर दें, देहाती महिला थीं लेकिन काम लेने में माहिर थीं। उनके बंगले पर कंपनी की तरफ से एजेंसी का एक चौकीदार रहता था। घनघोर सर्दियों में, जब वह चौकीदार सामने बने छ्ज्जे के नीचे बैठकर ड्यूटी कर रहा था तब यह भद्र महिला बोली कि मेन गेट के पास खुले में बैठो और डंडा बजाते रहो, जिससे मालूम हो कि जाग रहे हो।

वह चौकीदार मुझसे बोला कि अगर यह बुढ़िया एक दिन इस तरह ड्यूटी कर ले तो मैं अपनी पूरी तनख्वाह दे दूंगा।

कितनी कहानी सुनाएं! एक बात और, हमारे मानव संसाधन के बॉस ने ही उनको एक गलत आदत डाल दी थी। वे सप्ताह में एक बार तो दिल्ली स्थित केंद्रीय कार्यालय जाते ही थे। हर बार जाते और वापस आते समय, एक अधिकारी की ड्यूटी लगती थी उनके साथ एयरपोर्ट जाने या वहाँ से उनको लेकर आने के लिए। कुछ लोग तो खैर ऐसे कामों के लिए ही बने होते हैं। एक बार कोई गए और उनकी फ्लाइट मिस हो गई, अब उन्होंने उस अधिकारी को मनहूस की श्रेणी में डाल दिया।

एक बार मेरी भी ड्यूटी लगा दी गई। मैं उनके साथ जाने के लिए, उनके ड्राइंग रूम के एक किनारे पर गेस्ट एरिया में था और उनकी पत्नी काफी दूर किचेन के बाहर, मैंने काफी देर तक देखा कि वे मेरी तरफ मुड़कर देखें तो मैं नमस्कार करूं। लेकिन उन्होंने मेरी तरफ नहीं देखा और मैं नमस्कार नहीं कर पाया। वैसे जिस तरह के लोग उनको प्रिय हैं वे तो अंदर घुसकर चरण-स्पर्श कर आते हैं।

एक बात और कि उनकी पुत्री, जिसका जन्म उस समय हुआ था जब हम लोग एक साथ विंध्यनगर में थे, तो वह मेरे सामने आकर खड़ी हुई, अपनी कमर पर हाथ रखकर। वो यह उम्मीद कर रही थी कि मैं उसको नमस्कार करूंगा और मेरा मानना है कि नमस्कार अगर करना है तो उसको ही करना चाहिए।

खैर इसके बाद मेरे बॉस को शिकायत की गई कि कैसे आदमी को भेज दिया, उसने मेरी बीवी को नमस्ते नहीं की।

और बातें बाद में, फिलहाल निदा फाज़ली साहब की एक गज़ल के कुछ शेर शेयर कर लेते हैं-

बदला न अपने आप को, जो थे वही रहे

मिलते रहे सभी से मगर अजनबी रहे।

दुनिया न जीत पाओ तो हारो न खुद को तुम,

थोड़ी बहुत तो ज़ेहन में नाराज़गी रहे।

अपनी तरह सभी को किसी की तलाश थी,

हम जिसके भी करीब रहे, दूर ही रहे।

गुज़रो जो बाग से तो दुआ मांगते चलो,

जिसमें खिले हैं फूल वो डाली हरी रहे। 

 

 

नमस्कार।

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35. जहां जाएं वहीं – सूखे, झुके मुख-माथ रहते हैं।

पश्चिम क्षेत्र मुख्यालय, मुंबई में मैंने मई 2000 में कार्यग्रहण किया, यहाँ मेरा दायित्व मुख्य रूप से जनसंपर्क का काम देखने का था।

मुझे पवई क्षेत्र में 14 मंज़िला इमारत में, टॉप फ्लोर पर क्वार्टर मिला, सामने सड़क के पार पवई लेक और एक तरफ हीरानंदानी की अत्यंत आकर्षक सड़कें और इमारतें। पहली बार देखने पर लगा कि जैसे यह यूरोप का कोई इलाका है। कुछ आगे चलकर आईआईटी, पवई थी।

मैं तो दिन में ऑफिस में रहता था लेकिन मेरे परिजनों को अक्सर ऊपर से किसी शूटिंग के दृश्य देखने को मिल जाते थे।

पवई का यह इलाका, अंधेरी पूर्व में आता था और मेरा ऑफिस भी अंधेरी पूर्व में ही था, सीप्ज़ के पास। मुंबई में मैंने यह खास बात देखी कि ऑटो स्टैण्ड पर ही लोग ऑटो शेयर कर लेते थे। 10-12 रुपये लगते थे एक शेयर्ड  सवारी के रूप में ऑफिस जाने के लिए।

इस प्रकार मैं एक संकट से बचा हुआ था, भारी भीड़ के समय लोकल ट्रेन में यात्रा करने का संकट, वास्तव में इसके लिए विशेष कौशल की ज़रूरत है। शुरू के दिनों में एक बार तो मैंने अपना चश्मा गंवा दिया था। मुंबई की लोकल में चश्मा और मोबाइल संभालकर रखना आसान काम नहीं है।

ड्यूटी जाने के लिए मुझे लोकल में यात्रा करने की आवश्यकता नहीं थी, लेकिन मैं मुंबई घूमना तो चाहता था, विशेष रूप से समुंदर का किनारा। इसलिए वहाँ पहुंचने के एक-दो महीने बाद ही मैंने लोकल ट्रेन का मासिक पास बनवा लिया था, मैं अक्सर शाम को ऑफिस के बाद अंधेरी से लोकल पकड़कर आखिरी स्टेशन तक चला जाता था, समुंदर के किनारे कुछ समय टहलकर वापस घर आता था।

अब कुछ बात ऑफिस की कर लेते हैं, मुंबई पहुंचने के बाद मैंने वहाँ के कुछ स्थानीय अखबारों के साथ अच्छे संबंध बना लिए थे, विशेष रूप नवभारत के महाप्रबंधक तथा एक-दो और पत्रकारों के साथ प्रेस क्लब जाता था और अपने ईडी- श्री आर.डी. गुप्ता के कई साक्षात्कार, काफी प्रमुखता से छपवाए। वहाँ की गृह पत्रिका तो नियमित रूप से छपती ही थी।

लेकिन धीरे-धीरे मुझे लगा कि यहाँ अपने निष्पादन से प्रसन्न करने वाले लोगों की ज़रूरत नहीं है। एक तो केंद्रीय कार्यालय में श्रीमान स्वतंत्र कुमार जी बैठे हुए थे, जो इस प्रयास में लगे थे कि मुझे किसी ऐसे स्टेशन पर भेज दें, जिसे एनटीपीसी में काला-पानी माना जाता हो। दूसरे मुंबई कार्यालय में एक थे श्रीमान एस.एस.राजू, जो बहुत बड़े पॉवर ब्रोकर, शुद्ध भाषा में कहें तो दलाल थे।

इन श्रीमान राजू जी को ऐसा लग गया कि चतुर्वेदी जी, मुझको वहाँ इनके खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए ले गए हैं। अब उनके मन में ऐसा रहा भी हो तो मुझे मालूम नहीं, लेकिन मैं किसी के खिलाफ इस्तेमाल की चीज़ नहीं हूँ।

श्री चतुर्वेदी मुंबई से स्थानांतरित होकर लखनऊ जा चुके थे, जहाँ कंपनी का उत्तरी क्षेत्र मुख्यालय है, और इसके बाद श्रीमान राजू के मंत्रजाल में श्री आर.डी.गुप्ता फंस गए और जैसे भी हो, मेरा ट्रांसफर लखनऊ हो गया।

श्रीमान राजू जी के बारे में माना जाता है कि इनकी जान-पहचान मंत्रालय में बड़े अधिकारियों से है। अब कंपनी में उच्च पदों पर बैठे लोग तो ऐसे दलालों की मुट्ठी में रहते हैं।

मुझे मालूम है कि बाद में पश्चिम क्षेत्र के ईडी रहे श्री एच.एल.बजाज, जब सीएमडी बनने की रेस में थे, तब उनकी  तरफ से मंत्रालय में पैरवी करने के लिए, श्रीमान राजू लगभग एक महीने तक, सरकारी दौरे पर दिल्ली में रहे थे। ये अलग बात है कि श्री बजाज सीएमडी नहीं बन पाए, हो सकता है दूसरी तरफ से जो दलाल लगा था, वो ज्यादा मज़बूत रहा हो।

खैर मुंबई में मेरा ऑफिशियल प्रवास रहा- कुल मिलाकर 8 महीना 8 दिन। मुंबई नगरी में रहने का लालच ऐसा कि मैं क्वार्टर में लगभग एक साल तक रहा। एक बात यह भी कि मेरे बेटे ने दिल्ली से पढ़ाई छोड़कर मुंबई यूनिवर्सिटी में ग्रेजुएशन शुरू किया और वहाँ की उसकी एक वर्ष की पढ़ाई बेकार ही गई।

सच्चाई तो यह है कि मुंबई में फिल्मी और टीवी स्टूडियो के जो सपने बुने थे, उस बारे में तो ठीक से सोच भी नहीं पाया कि वहाँ से फिसलकर लखनऊ आ गया।

खैर जो भी हो मुझे एक वर्ष मुंबई में रहना अच्छा लगा। ये लंबा चलता तो और अच्छा लगता।

आज ओम प्रभाकर जी का एक गीत शेयर कर लेता हूँ-

 

यात्रा के बाद भी

 पथ साथ रहते हैं।

खेत, खंभे, तार सहसा टूट जाते हैं,

हमारे साथ के सब लोग हमसे छूट जाते हैं।

फिर भी हमारी बांह, गर्दन, पीठ को छूते

गरम दो हाथ रहते हैं।

 

घर पहुंचकर भी न होतीं खत्म यात्राएं

गूंजती हैं सीटियां, अब हम कहाँ जाएं।

जहां जाएं वहीं सूखे, झुके

मुख-माथ रहते हैं।

                          (ओम प्रभाकर)

 

नमस्कार।

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34. टूटी आवाज़ तो नहीं हूँ मैं

अक्सर मैं ब्लॉग लिखने के बाद, सोचता हूँ कि इसमें कौन सी कविता डालनी है, क्या शीर्षक देना है। आज शुरू में ही कुछ काव्य पंक्तियां याद आ रही हैं और उनमें से ही शीर्षक भी, तो शुरू में ही दे देता हूँ, यहाँ तो अपना ही अनुशासन है ना!

हम सबके माथे पर शर्म,

हम सबकी आत्मा में झूठ,

हम सबके हाथों में टूटी तलवारों की मूठ,

हम हैं सैनिक अपराजेय!

                        ( डा. धर्मवीर भारती)

 

फैली है दूर तक परेशानी,

तिनके सा तिरता हूँ तो क्या है,

तुमसे नाराज़ तो नहीं हूँ मैं।

 

मैं दूंगा भाग्य की लकीरों को

रोशनी सवेरे की,

देखूंगा कितने दिन चलती है

दुश्मनी अंधेरे की।

मकड़ी के जाले सी पेशानी

साथ लिए फिरता हूँ तो क्या है

टूटी आवाज़ तो नहीं हूँ मैं।

                        (श्री रमेश रंजक)

एक कवि थे, गाज़ियाबाद के, रमेश शर्मा जी, मंचों पर सक्रिय नहीं थे परंतु बहुत अच्छे गीत लिखे हैं उन्होंने, दो पंक्तियां तो गांव की दशा का अच्छा खासा बयान करती हैं-

ना वे रथवान रहे, ना वे बूढ़े प्रहरी,

कहती टूटी दीवट, सुन री उखड़ी देहरी।

(दीवट- दिया रखने के लिए बना छोटा सा आला)

 (और जब वे लंबा आलाप लेकर गाते थे, तब दिव्य माहौल बन जाता था)

उनके एक गीत की कुछ पंक्तियां-

तू न जिया न मरा।

ज्यों कांटे पर मछली, प्राणों में दर्द पिरा।

औषधि जल, तुलसी-दल, सिरहाने बिगलाया,

मां ने ईंधन कर दी, अपनी उत्फुल काया,

धरती पर देह धरम, आजीवन हूक भरा।

 

सहजन की डाल कटी, ताल पर जमी काई,

कथा अब नहीं कहता, मंदिर वाला साईं,

वैष्णव जन ही जाने, वैष्णव जन का दुखड़ा।

 

 

एक और –

कैसे बीते दिवस हमारे

हम जानें या राम।

सुन रे जल, सुन री ओ माटी

सुन रे ओ आकाश।

सुन रे ओ प्राणों के दियना,

सुन रे ओ वातास,

दुख की इस तीरथ यात्रा में

पल न मिला विश्राम।

हम जानें या राम।

कविताएं शेयर करने का काम फिलहाल इतना ही। अपनी राम कहानी में यह कि 12 वर्ष तक विंध्याचल परियोजना में रहने के बाद मैं प्रबंधक बन गया था, कोई चांस नहीं लग रहा था यहाँ से कहीं और जाने का, लेकिन मुंबई कार्यालय, पश्चिम क्षेत्र मुख्यालय में, विशेष रूप से जनसंपर्क का काम देखने के लिए एक अधिकारी की आवश्यकता थी, वैसे भी मुंबई नगरी बहुतों को आकर्षित करती है, मुझे तो हमेशा से करती रही है। पदोन्नति के समय मैंने मुंबई का विकल्प दिया था।

हमारे बॉस रहे श्री अविनाश चंद्र चतुर्वेदी जी मुंबई में मानव संसाधन विभाग के प्रमुख बन गए थे, उनसे अनुरोध किया और उनके प्रयास से मेरा स्थानांतरण भी हो गया मुंबई में, और इस प्रकार नए सपने लेकर मैं उस मायानगरी में पहुंचा।

एक अंग्रेजी फिल्म देखी थी- ‘कांक्वरर्स ऑफ द गोल्डन सिटी’ बड़े शहर में अक्सर लोग ऐसे ही इरादे लेकर जाते हैं, जैसे शायद धीरू भाई अंबानी लेकर गए होंगे। लेकिन अधिकांश के साथ महानगर, इसका कुछ उल्टा ही करता है।

वैसे किस्मत भी अजीब चीज़ होती है। मुझे नीता जी का किस्सा याद आ गया, जो उन्होंने खुद कहीं शेयर किया था। जान-बूझकर मैं अभी पूरा नाम नहीं लिख रहा हूँ। तो नीता जी उन दिनों नृत्य के कार्यक्रम प्रस्तुत करती थीं। एक रोज़ उनके घर फोन आया- ‘मैं धीरूभाई अंबानी बोल रहा हूँ’। उन्होंने कहा मैं क्लिओपेट्रा बोल रही हूँ (शायद कोई और प्रसिद्ध नाम बोला था, मुझे यह याद आ रहा है) और कहकर फोन रख दिया। उनको लग रहा था कि कोई मज़ाक कर रहा है। ऐसा दो-तीन बार हुआ, उसके बाद उन्होंने फोन उठाना बंद कर दिया। बाद में जब फोन बज रहा था तो उनके पिता ने फोन उठाया तब अंबानी जी ने उनको बताया कि उनके बेटे (मुकेश अंबानी) ने नीता जी का प्रोग्राम देखा था, वे उनको बहुत पसंद आईं और वे शादी की बात करने आना चाहते हैं। ऐसे होता है, जब किस्मत जबर्दस्ती पीछे पड़ जाती है। इस प्रकार नीता जी, नीता अंबानी हो गईं।

खैर, मैं भी मुंबई गया क्योंकि कंपनी मुंबई में रहने के लिए क्वार्टर दे रही थी, नौकरी तो करनी ही थी, उसके अलावा मुंबई क्या कुछ नहीं दे सकती, किसी भी फील्ड में, मेरे सपने क्रिएटिव फील्ड से जुड़े थे।

जिस तरह देश पुकारता है, मुझे लगता था कि मुंबई में बने फिल्मी स्टूडिओ, टीवी चैनल, मेरा ही इंतज़ार कर रहे हैं।

अब आगे की कहानी बाद में कहेंगे,

फिलहाल नीरज जी का एक मुक्तक-

खुशी जिसने खोजी वो धन लेके लौटा

हंसी जिसने खोजी चमन लेके लौटा

मगर प्यार को खोजने जो चला वो,

न तन लेके लौटा, न मन लेके लौटा।

 

 

 नमस्कार।

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33. कैसे मनाऊं पियवा, गुन मेरे एकहू नाहीं।

इस प्रस्ताव को सहमति मिल गई थी कि एनटीपीसी के स्थापना दिवस के अवसर पर, विंध्याचल परियोजना में नितिन मुकेश जी, अथवा दो-तीन फिल्मी गायक और थे, उनमें से किसी एक को चुनकर आमंत्रित किया जाए, इसके लिए तीन सदस्यों की एक समिति को मुंबई भेजा गया, इसमें मेरे अलावा एक कर्मचारी कल्याण परिषद के महासचिव थे और एक वित्त विभाग के प्रतिनिधि थे।

मेरे बाकी दो साथियों के लिए नितिन मुकेश जी भी वैसे ही थे, जैसे बाकी विकल्प थे, इसलिए मुझे इस विकल्प पर ज्यादा जोर लगाना था, खैर परिस्थितियों ने भी साथ दिया और हम नितिन जी के विकल्प पर मुहर लगाने वाले थे।

हम नितिन जी के घर पहुंचे और मुझे श्रीमती मुकेश जी के चरण स्पर्श करने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ,जो व्हील चेयर पर थीं। घर में जहाँ पुरस्कारों की विशाल प्रदर्शनी लगी थी वहीं नील नितिन मुकेश के स्कूल की किसी सांस्कृतिक गतिविधि में पुरस्कृत होने का प्रमाण पत्र भी दीवार पर टंगा था। उस समय नील स्कूल में पढ़ रहे थे।

अपनी परंपरा के अनुसार हमने अनुबंध का एक ड्राफ्ट, नितिन जी को हस्ताक्षर करने के लिए दिया, जिसमें एक पंक्ति कुछ इस प्रकार थी- ‘दोनों पक्ष हर स्थिति में अनुबंध के अनुसार यह कार्यक्रम संपन्न करेंगे।‘

इस पर नितिन जी ने कहा- ‘शर्माजी, सब कुछ तो इंसान के हाथ में नहीं होता, कुछ चीज़ें तो ऊपर वाला अपने हाथ में रखता है।‘ इसके बाद उस पंक्ति को इस तरह लिखा गया- ‘दोनो पक्ष अनुपालन का पूर्ण प्रयास करेंगे।’

इसके बाद मुझे एक घटना रीवा की मालूम हुई, जहाँ नितिन जी कार्यक्रम के लिए गए थे, लेकिन जोरदार बारिश के कारण उस दिन कार्यक्रम नहीं हो पाया, नितिन जी अगले दिन रुके, कार्यक्रम के शुरू में बूंदाबांदी हो रही थी, लेकिन नितिन जी ने, अपनी परंपरा के अनुसार- ‘मंगल भवन, अमंगल हारी’ से कार्यक्रम का प्रारंभ किया और जो छाते खुले थे, वे धीरे-धीरे बंद हो गए, और फिर कार्यक्रम पूरा होने के बाद ही जोरदार बारिश हुई।

खैर, जैसा कार्यक्रम तय किया गया था, उसके हिसाब से नितिन जी फ्लाइट लेकर और उनकी टीम के सदस्य ट्रेन द्वारा, वाराणसी पहुंचे। वाराणसी के सिगरा क्षेत्र में उस समय एनटीपीसी का गेस्ट हाउस था जहाँ नितिन जी की टीम के सदस्यों के ठहरने की व्यवस्था की गई थी और नितिन जी के लिए पास के एक होटल में प्रबंध किया गया था, परंतु नितिन जी ने कहा कि वे टीम के साथ ही रुकेंगे। उनकी टीम में कुछ सदस्य, उनके पिता के समय से हैं, एक हैं जिनको वे मामा कहते थे।

नितिन जी के एक साथी ने बताया कि मुकेश जी जहाँ अपना हारमोनियम बजाते हुए, डूबकर गाना गाते रहते थे, वहीं नितिन जी पूरा धमाल मचाते हैं।

अपनी परंपरा के अनुसार नितिन जी वाराणसी के मंदिरों में गए, उन्होंने बताया कि इधर आने में उनको एक लाभ यह भी लगा कि वे मंदिरों के दर्शन कर लेंगे। दर्शन के समय मैं उनके साथ था। उन्होंने गौदोलिया चौक पर पुलिस वाले को अपना कार्ड दिखाया, उसके बाद एक पुलिस वाला हमारे साथ रहा और सभी जगह हमने वीआईपी दर्शन किए।

काशी विश्वनाथ मंदिर के बाहर हर दुकानदार उनसे कहता रहा कि आपके पिता जी हमारे यहाँ से ही सामग्री खरीदते थे, आप भी हमसे ही सामान लीजिए।

गंगा घाट पर तीन तरह के लोग मिले, एक जो नितिन जी को पहचानते थे, दूसरे जो उनको शम्मी कपूर समझ रहे थे और तीसरे वे जो उनको अंग्रेज समझ रहे थे।

वाराणसी से हम विंध्यनगर आए, शाम को मुक्ताकाश प्रेक्षागृह में उनका कार्यक्रम था। उन्होंने अपनी परंपरा के अनुसार ‘मंगल भवन अमंगल हारी’ के साथ अपना कार्यक्रम प्रारंभ किया और उसके बाद, मुकेश जी के 15-20 अमर गीत एक के बाद एक,  सुना दिए, फर्माइशें पूरा करने से पहले, क्योंकि उनका कहना था कि एक बार फास्ट गानों का सिलसिला शुरू हो जाएगा, तब शायद इन गीतों के लिए माहौल नहीं रह पाएगा।

अब अगर गीतों का ज़िक्र करूं तो किनका करूं? सैंकड़ों फर्माइशी पर्चियां तो ऐसी हैं, जिनका नंबर आ ही नहीं पाया। संगीत के प्रोग्राम तो पहले भी बहुत हुए थे, लेकिन श्रोताओं में इतना उत्साह कभी नहीं देखा गया। महफिलें जमाने वाले तो हज़ारों गीत हैं, किस-किसका ज़िक्र करूं?

लेकिन कुछ गीतों का ज़िक्र इसलिए कर दे रहा हूँ, क्योंकि संभव है, नई पीढ़ी के कुछ लोगों को उनके नाम से ये गीत न याद हों- ‘होठों पे सच्चाई रहती है, कहीं दूर जब दिन ढ़ल जाए, तौबा ये मतवाली चाल, रुक जा ओ जाने वाली रुक जा, सारंगा तेरी याद में, सुहाना सफर और ये मौसम हसीं, झूमती चली हवा, मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने, मैं पल दो पल का शायर हूँ, देखती ही रहो आज दर्पण न तुम, ओ महबूबा, तेरे दिल के पास ही है मेरी, मंज़िल ए मक़सूद  आदि  …  सैंकड़ों गीत मैं लिख सकता हूँ, जो आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं।

  मुकेश जी का स्मरण करते हुए, मैं उनके गाए कुछ ऐसे गीतों की पंक्तियां यहाँ दे रहा हूँ, जो शब्दों और प्रस्तुति, दोनों के लिहाज़ से, अलग तरह के हैं-

कैसे मनाऊं पियवा, गुन मेरे एकहू नाहीं।

आई मिलन की बेला, घबराऊं मन माही।

 

साजन मेरे आए, धड़कन बढ़ती जाए,

नैना झुकते जाएं, घूंघट ढलका जाए,

तुझसे क्यों शर्माये, आज तेरी परछाई।

 

मैं अनजान पराई, द्वार तिहारे आई,

तुमने मुझे अपनाया, प्रीत की रीत सिखाई,

हाय रे मन की कलियां, फिर भी खिल ना पाईं।

एक और गीत की कुछ पंक्तियां –

पुकारो, मुझे नाम लेकर पुकारो,

मुझे इससे अपनी खबर मिल रही है।

कई बार यूं भी हुआ है सफर में,

अचानक से दो अजनबी मिल गए हों,

जिन्हें रूह पहचानती हो अज़ल से,

भटकते-भटकते वही मिल गए हों।

कुंवारे लबों की कसम तोड़ दो तुम,

ज़रा मुस्कुराकर बहारें संवारो।

 

खयालों में तुमने भी देखी तो होंगी

कभी मेरे ख्वाबों की धुंधली लकीरें,

तुम्हारी हथेली से मिलती हैं जाकर,

मेरे हाथ की ये अधूरी लकीरें।

बड़ी सर चढ़ी हैं ये ज़ुल्फें तुम्हारी,

ये ज़ुल्फें मेरी बाज़ुओं में उतारो।  

 

पुकारो, मुझे नाम लेकर पुकारो,

मुझे इस से अपनी खबर मिल रही है।।

और इसके बाद आखिर में-

ज़िंदगी सिर्फ मोहब्बत नहीं, कुछ और भी है।

ज़ुल्फ-ओ-रुखसार की जन्नत नहीं, कुछ और भी है।

भूख और प्यास की मारी हुई इस दुनिया में,

इश्क़ ही एक हक़ीकत नहीं कुछ और भी है।

तुम अगर नाज़ उठाओ, तो ये हक़ है तुमको,

मैंने तुमसे ही नहीं, सबसे मोहब्बत की है।

इन शब्दों के साथ, नितिन जी के कार्यक्रम के बहाने मैं अपने प्रिय गायक, मुकेश जी की स्मृतियों को विनम्र श्रद्धांजलि देता हूँ और कामना करता हूँ कि नितिन जी लंबे समय तक, मुकेश जी के गीतों का अमृत पान श्रोताओं को कराते रहें।

अंत में मन हो रहा है कि मैं अपना एक गीत शेयर करूं। यह गीत मैंने दिल्ली में, सर्दी की एक रात में, ट्रेन से शाहदरा लौटते हुए लिखा था, जब मैं मुकेश जी का गीत ( मैं ढ़ूंढ़ता हूँ उनको) गुनगुना रहा था। ये पैरोडी नहीं है, सिर्फ मुखड़े की पंक्तियों को ध्यान में रख सकते हैं-

रात शीत की  

रजनी गुज़र रही है, सुनसान रास्तों से

गोलाइयों में नभ की, जुगनू टंके हुए हैं।

 

हर चीज़ पर धुएं की,एक पर्त चढ़ गई है,

कम हो गए पथिक पर, पदचाप बढ़ गई है,

यह मोड़ कौन सा है, किस ओर जा रहा मैं,

यूं प्रश्न-चिह्न धुंधले, पथ पर लगे हुए हैं।

 

अब प्रश्न-चिह्न कल के, संदर्भ हो गए हैं,

कुछ तन ठिठुर- ठिठुरकर, निष्कंप सो गए हैं,

कितने बंटे हैं कंबल, अंकित है फाइलों में,

फुटपाथ के कफन पर, किसके गिने हुए हैं।

 

अब सो चुकी है जल में, परछाइयों की बस्ती,

चंदा ही खे रहा है, बस चांदनी की कश्ती,

चिथड़ों में गूंजती हैं, अब कर्ज़दार सांसें,

पर ब्याज के रजिस्टर, अब भी खुले हुए हैं।

                                                                      (श्रीकृष्ण शर्मा)

आज कुछ ज्यादा समय ले लिया आपका, नमस्कार।

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