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यूं ही ना तोड़ अभी बीन रे सपेरे!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट शेयर कर रहा हूँ|

अपनी शुरू की ब्लॉग पोस्ट्स में, मैंने अपनी जीवन यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ावों का ज़िक्र किया था, आज उनमें से ही एक पोस्ट को दोहरा रहा हूँ, क्योंकि इसमें आदरणीय बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक प्यारा सा गीत शामिल है और प्रसंग भी मुझे आशा है कि आपको पसंद आएगा|
जयपुर में रहते हुए ही मैंने हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की एक वैकेंसी देखी, हिंदी अनुवादक के लिए, यह कार्यपालक श्रेणी का पद था, जबकि आकाशवाणी में, मैं पर्यवेक्षकीय स्तर पर था, हालांकि पदनाम वही था। इसके अलावा वेतन में काफी अंतर था। मैंने आवेदन किया और चयन परीक्षा एवं साक्षात्कार के लिए मुझे बुलावा भी आ गया।

इस बीच मेरे दूसरे पुत्र का जन्म जयपुर में हो चुका था। और आगे की यात्रा पर जाने वाले हम चार लोग थे।


मुझे जाना था बिहार के संथाल परगना क्षेत्र में, जो अब झारखंड में आता है। टाटानगर से लगभग 40 कि.मी. दूर है यह इलाका। जाने से पहले ही मैंने अखबार में यह खबर पढ़ी कि वहाँ गैर आदिवासी लोगों को 10 इंच छोटा करने (गर्दन काटने) की घटनाएं हो रही थीं। परम आदरणीय शिबू सोरेन जी का इलाका है वह।


खैर मैं वहाँ पहली बार जा रहा था और इत्तफाक से मुझे कोई सही मार्गदर्शन करने वाला भी नहीं मिला, बल्कि एक सज्जन ने अधूरे ज्ञान के आधार पर मुझे जो बताया वह मुझे बहुत महंगा पड़ सकता था। मैंने वहाँ जाने के लिए टाटानगर एक्सप्रेस पकड़ी, जो बताया गया था कि सुबह 6 बजे पहुंचेगी, लेकिन वह 9 बजे के बाद पहुंची। वहाँ से मुझे हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के कार्यालय, मऊभंडार जाना था, जहाँ जाने के लिए केवल टेम्पो मिलते हैं, जो सवारियां ठूंसकर भरने पर चलते हैं, और 40 किलोमीटर का वह जंगली रास्ता भी माशाअल्ला था।


खैर रोते-धोते मैं 11 बजे के बाद वहाँ पहुंचा, जबकि उम्मीदवारों की लिखित परीक्षा वहाँ 10 बजे से प्रारंभ होकर पूरी हो चुकी थी और अब साक्षात्कार होना था। मैंने अपनी परिस्थितियां बताईं और मुझे अनुमति दे दी गई, जबकि अन्य लोगों का साक्षात्कार शुरु हो रहा था, मुझे टेस्ट देने के लिए बिठा दिया गया और अंत में मेरा साक्षात्कार हो गया।

जैसा मैंने बताया था कि केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो के प्रशिक्षण के उपरांत मुझे मिला मेडल मेरे काफी काम आया बाकी चयन परीक्षा का निष्पादन तो होगा ही।
बाद में जब मैं गेस्ट हाउस में रुका तो मुझे मालूम हुआ कि प्रत्याशियों में एक ऐसे सज्जन भी शामिल थे, जो केंद्रीय मंत्री रहीं श्रीमती राम दुलारी सिन्हा के पर्सनल स्टॉफ में शामिल रहे थे और वे यह मान रहे थे कि उनका चयन तो कोई रोक नहीं सकता। बाद में मुझे बताया गया कि वहाँ के उप महाप्रबंधक (का. एवं प्रशा.)- श्री राज सिंह निर्वाण ने वहाँ के वरि. प्रबंधक (राजभाषा)- डॉ. राम सेवक गुप्त से कहा था कि वह मिनिस्टर का आदमी है अतः उसका चयन कर लें वरना दिक्कत हो जाएगी। इस पर गुप्ता जी ने कहा था कि आप कर लीजिए, मैं तो उसी को चुनूंगा, जो मुझे ठीक लग रहा है। खैर निर्वाण जी भी गलत काम करना नहीं चाहते थे।


काफी समय बाद जब मैं वहाँ से आ रहा था, तब मुझे वहाँ के सतर्कता प्रभारी ने मुझे वे पत्र दिखाए, जो दो केंद्रीय मंत्रियों- श्री वसंत साठे और श्री एन.के.पी. साल्वे ने मेरी नियुक्ति के विरुद्ध लिखे थे। इन दोनो मंत्रियों ने श्रीमती सिन्हा के स्टाफ में रहे उस व्यक्ति की शिकायत को अग्रेषित किया था। उन सज्जन को भी एक पाइंट यह मिल गया था कि मैं देर से पहुंचा था। खैर इसका मेरे मैडल और निष्पादन का हवाला देते हुए, समुचित उत्तर दे दिया गया था।


हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की इस इकाई का नाम इंडियन कॉपर कॉम्प्लेक्स था, जो पहले अंग्रेजो द्वारा चलाई जाती थी और उस समय उसका नाम था- इंडियन कॉपर कार्पोरेशन था। वहाँ की माइंस थीं मुसाबनी माइंस, जो देश की सबसे गहरी ऑपरेशनल खदानें थीं। किसी जमाने में, अंग्रेजों ने यहाँ से तांबे के अलावा बड़ी मात्रा में सोना, चांदी भी निकाले थे। खदानों के मामले में यह लागू होता है कि खदान जितनी गहरी होती जाएगी, खनन की लागत उतनी ही बढ़ती जाएगी। जबकि खदान में तांबे की मात्रा बहुत कम हो गई थी और खनन लागत बढ़ती जा रही थी। कई बार ऐसा लगता था कि स्टाफ को यदि घर बिठाकर पैसा दिया जाए तो घाटा कम होगा, खनन करने पर ज्यादा। खैर कई उपाय अपनाए जा रहे थे वहाँ पर खनन लागत को कम करने के लिए। वैसे अब स्थिति यह है कि, ये खदानें कई वर्ष पहले बंद की जा चुकी हैं।


अंग्रेजों के समय से ही वहाँ की टाउनशिप बनी थी, और उसे लोगों को बांटने की अंग्रेजों की नीति के अनुसार ही बसाया गया था। ऑफिस के कर्मचारियों को अलग बसाया गया था, उसका नाम था स्टाफ कालोनी, अंग्रेज काफी बड़ी संख्या में नेपालियों को भी मज़दूर के रूप में काम करने के लिए ले आए थे और उनके लिए नेपाली कालोनी बना दी थी, उनके बच्चों का अब कोई भविष्य नहीं था, वे पूरा दिन जुआ खेलते थे। अंग्रेजों ने कर्मचारियों को बांटकर रखा, उनको अच्छी सुविधाएं दीं लेकिन शिक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं की थी।


हिंदुस्तान कॉपर में आने के बाद यहाँ शिक्षा की सुविधाएं विकसित करने का प्रयास किया गया। हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के कलकत्ता स्थित मुख्यालय में श्रेष्ठ कवि डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र कार्यरत थे, उनके एक आशावादी गीत के साथ यह ब्लॉग समाप्त करते हैं, वहाँ के बारे में बाकी बातें बाद में करेंगे-


एक बार और जाल फेंक रे मछेरे
जाने किस मछली में बंधन की चाह हो।
सपनों की ओस गूंथती कुस की नोंक है,
हर दर्पण में उभरा एक दिवालोक है,
रेत के घरौंदों में सीप के बसेरे,
इस अंधेर में कैसे प्रीत का निबाह हो।
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे….


उनका मन आज हो गया पुरइन पात है,
भिगो नहीं पाती यह पूरी बरसात है,
चंदा के इर्द-गिर्द मेघों के घेरे,
ऐसे में क्यों न कोई मौसमी गुनाह हो।
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे….


गूंजती गुफाओं में कल की सौगंध है,
हर चारे में कोई चुंबकीय गंध है,
कैसे दे हंस झील के अनंत फेरे,
पग-पग पर लहरें जब बांध रही छांव हो।
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे…
.


कुमकुम सी निखरी कुछ भोरहरी लाज है,
बंसी की डोर बहुत कांप रही आज है,
यूं ही ना तोड़ अभी बीन रे सपेरे,
जाने किस नागिन में प्रीति का उछाह हो।
एक बार और जाल फेंक रे मछेरे
जाने किस मछली में, बंधन की चाह हो॥

( पुरइन पात- कमल का पत्ता)


डा. बुद्धिनाथ मिश्र
फिलहाल इतना ही,
नमस्कार।

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गति,अगति, सद्गति!

आज का समय मानव जाति के लिए बड़ा कठिन है, खास तौर पर कोरोना की यह दूसरी लहर भारतवर्ष के लिए बड़े कष्ट लेकर आई है| पहली लहर के समय हम कहते थे कि बाहर से लोगों को क्यों आने दे रहे हैं! आज दूसरे अनेक देश भारत से लोगों का वहाँ जाना प्रतिबंधित कर रहे हैं| इस महामारी का हम सबको मिलकर मुक़ाबला करना है, मैं तो कम से कम उन लोगों में से नहीं हूँ जो इस स्थिति के लिए भी किसी एक व्यक्ति को दोष देकर मुक्त हो जाएँ|

जिस गति से आज कोरोना फैल रहा है, उस पर शीघ्र नियंत्रण किया जाना आवश्यक और मुझे उम्मीद है कि एक संकल्प-बद्ध राष्ट्र के रूप में हम ऐसा करने में सफल होंगे|


असल में, मैं स्वयं को इतना कुशल नहीं मानता कि कोरोना के बारे में कोई उपयोगी सलाह दे सकूँ, वैसे हमारे यहाँ हर घर में ऐसे लोग मिल जाएंगे जो कोरोना को दूर भगाने के कारगर घरेलू नुस्खे बता सकते हैं, परंतु जब उनके किसी अपने को यह रोग लग जाता है, तब वे शांत हो जाते हैं|


खैर आज मैं गति को लेकर कुछ बात करना चाह रहा था| गोवा में हम जिस सोसायटी में रहते हैं, उसमें सभी 6 मंजिला इमारतें हैं, गोवा में शायद सामान्यतः इतनी मंज़िलें बनाने की अनुमति है| और हम छठी मंज़िल पर रहते हैं| अपनी लिफ्ट का इस्तेमाल करते समय अक्सर मुझे ऐसा लगता है कि अपनी यह लिफ्ट दिल्ली मैट्रो की तरह चलती है| जी हाँ, जितने समय में दिल्ली मैट्रो एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक पहुँचती है, उतने समय में अपनी यह लिफ्ट, एक फ्लोर से दूसरे फ्लोर पर पहुँचती है| मैं यही सोचता हूँ कि अगर अपनी बिल्डिंग 20-25 या इससे अधिक फ्लोर वाली होती तो हमें दिल्ली कि एक मैट्रो लाइन- ग्रीन, ब्लू या किसी पर भी पूरी यात्रा का आनंद मिल जाता| अब थोड़ी-बहुत अतिशयोक्ति की तो आप मुझे अनुमति देंगे ही न!

आज कोरोना के इस माहौल में बंबई (मुंबई) की हालत सबसे ज्यादा खराब है, और पूरे देश से वहाँ श्रमिक अपनी ज़िंदगी बनाने के लिए जाते हैं| ऐसे में एक पुराना गाना, नए संदर्भ में याद आता है-

ऐ दिल, मुश्किल-जीना यहाँ,

जरा हटके, जरा बचके, ये है बंबई मेरी जान|


वैसे भी कोरोना ने हमारी ज़िंदगी की गति की ऐसी की तैसी कर रखी है, ऐसे ही मन हुआ कि अपनी इस लिफ्ट के बहाने किसी ओर तरफ ध्यान दिया जाए, वैसे जो चुनौती आज हम सबके सामने है, उससे तो हमको मिलकर निपटना ही है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मैं जहां भी जाऊंगा, उसको पता हो जाएगा !!

आज डॉक्टर बशीर बद्र साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, जिसे जगजीत सिंह और अन्य गायक कलाकारों ने भी गाया है| बद्र साहब अपनी नायाब एक्स्प्रेशन और भाषिक प्रयोगों के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है डॉक्टर बशीर बद्र साहब की ये बेहतरीन ग़ज़ल-

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा,
इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा,

हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है,
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा,

कितनी सच्चाई से मुझसे, ज़िन्दगी ने कह दिया,
तू नहीं मेरा तो कोई दूसरा हो जाएगा,


मैं खुदा का नाम लेकर, पी रहा हूं दोस्तों,
ज़हर भी इसमें अगर होगा, दवा हो जाएगा,

सब उसी के हैं, हवा, ख़ुशबू, ज़मीन-ओ-आसमां
मैं जहां भी जाऊंगा, उसको पता हो जाएगा !!

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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इंसान की ख़ुश्बू आती है!

भारतीय उपमहाद्वीप के एक अत्यंत लोकप्रिय शायर रहे क़तील शिफ़ाई साहब की एक ग़ज़ल आज शेयर कर रहा हूँ| क़तील शिफ़ाई साहब पाकिस्तान के निवासी थे और उन्होंने अत्यंत खूबसूरत ग़ज़लें लिखी हैं जो बहुत लोकप्रिय हुई हैं और ग़ुलाम अली, जगजीत सिंह आदि प्रमुख गायकों ने उनको गाया है|

लीजिए प्रस्तुत है क़तील शिफ़ाई साहब की यह ग़ज़ल-

बेचैन बहारों में क्या-क्या है जान की ख़ुश्बू आती है
जो फूल महकता है उससे तूफ़ान की ख़ुश्बू आती है

कल रात दिखा के ख़्वाब-ए-तरब जो सेज को सूना छोड़ गया
हर सिलवट से फिर आज उसी मेहमान की ख़ुश्बू आती है

तल्कीन-ए-इबादत की है मुझे यूँ तेरी मुक़द्दस आँखों ने
मंदिर के दरीचों से जैसे लोबान की ख़ुश्बू आती है

कुछ और भी साँसें लेने पर मजबूर-सा मैं हो जाता हूँ
जब इतने बड़े जंगल में किसी इंसान की ख़ुश्बू आती है

कुछ तू ही मुझे अब समझा दे ऐ कुफ़्र दुहाई है तेरी
क्यूँ शेख़ के दामन से मुझको इमान की ख़ुश्बू आती है

डरता हूँ कहीं इस आलम में जीने से न मुनकिर हो जाऊँ
अहबाब की बातों से मुझको एहसान की ख़ुश्बू आती है

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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उसे तुम भी भूल जाओ!

भारतीय उपमहाद्वीप के एक अत्यंत लोकप्रिय शायर रहे स्वर्गीय अहमद फ़राज़ साहब की एक ग़ज़ल आज शेयर कर रहा हूँ| अहमद फ़राज़ साहब पाकिस्तान के निवासी थे और उन्होंने अत्यंत खूबसूरत ग़ज़लें लिखी हैं जो बहुत लोकप्रिय हुईं और ग़ुलाम अली, जगजीत सिंह आदि प्रमुख गायकों ने उनको गाया है|

लीजिए प्रस्तुत है अहमद फ़राज़ साहब की यह ग़ज़ल-

इन्हीं ख़ुशगुमानियों में कहीं जाँ से भी न जाओ,
वो जो चारागर नहीं है उसे ज़ख़्म क्यूँ दिखाओ|

ये उदासियों के मौसम कहीं रायेगाँ न जाएं,
किसी ज़ख़्म को कुरेदो, किसी दर्द को जगाओ|

वो कहानियाँ अधूरी, जो न हो सकेंगी पूरी,
उन्हें मैं भी क्यूँ सुनाऊँ, उन्हें तुम भी क्यूँ सुनाओ|

मेरे हमसफ़र पुराने मेरे अब भी मुंतज़िर हैं,
तुम्हें साथ छोड़ना है तो अभी से छोड़ जाओ|

ये जुदाइयों के रस्ते बड़ी दूर तक गए हैं,
जो गया वो फिर न लौटा, मेरी बात मान जाओ|

किसी बेवफ़ा की ख़ातिर ये जुनूँ “फ़राज़” कब तक,
जो तुम्हें भुला चुका है, उसे तुम भी भूल जाओ|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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I am worried for God Almighty!

Today I am going for the easier option, provided through #IndiSpire prompt for the week. The challenge is that we write a short story only in three lines. Now since the story has to be only in 3 lines, the introduction could be bigger!

I am not sure whether the short story would be as per the expectations, but through it, I am expressing a thought that often comes to my mind. So no more explanation, directly to the story and this story relates to God!


God almighty was getting bored so he thought of creation this world, many things he created – Jungles, mountains, rivers etc. and so many creatures.


Then the thought came to his mind that a creature with mind, thoughts and emotions like himself should be created, who could be his own representative in this world and he created human beings, Man and Woman.

Since that day God has simply been watching what this super creation of his mind is doing and thinks so many times whether this decision to create ‘Man’ was right or wrong.


I just took the liberty to present this thing, as a ‘Short Story’ based on the #IndiSpire prompt-

Narrate a short story in not more than 3 three lines… Many short stories in a post will be amazing… #shortstory
Thanks for reading.


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उनकी याद, उनकी तमन्ना, उनका ग़म!

शकील बदायुनी साहब भारत के एक जाने–माने शायर थे और हिन्दी फिल्मों के लिए भी उन्होंने कुछ बहुत नायाब गीत लिखे हैं| उनका एक शेर तो मुझे अक्सर याद आता है- ‘जब चला ज़िक्र ज़माने में मोहब्बत का शकील, मुझको अपने दिल-ए-नाकाम पे रोना आया!’

लीजिए आज प्रस्तुत है शकील साहब की यह ग़ज़ल-

सुब्ह का अफ़साना कहकर शाम से,
खेलता हूं गर्दिशे-आय्याम से|

उनकी याद उनकी तमन्ना, उनका ग़म,
कट रही है ज़िन्दगी आराम से|

इश्क़ में आएंगी वो भी साअ़तें,
काम निकलेगा दिले-नाकाम से|


लाख मैं दीवाना-ओ-रूसवा सही,
फिर भी इक निस्बत है तेरे नाम से|

सुबहे-गुलशन देखिए क्या गुल खिलाए,
कुछ हवा बदली हुई है शाम से|

हाय मेरा मातमे-तश्नालबी,
शीशा मिलकर रो रहा है जाम से|


हर नफ़स महसूस होता है ‘शकील’,
आ रहे हैं नामा-ओ-पैग़ाम से|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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एक पूरा दिन!

गुलज़ार साहब हमारे देश के बहुत सृजनशील और प्रयोगधर्मी रचनाकार हैं| जहां फिल्मी दुनिया को उन्होंने बहुत से नायाब गीत दिए हैं वहीं जगजीत सिंह जी जैसे ग़ज़ल गायकों ने भी उनकी अनेक रचनाओं को अपना स्वर दिया है|

लीजिए आज प्रस्तुत है गुलज़ार साहब की यह नज़्म-

मुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज़ मिलता है
मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है,
झपट लेता है, अंटी से
कभी खीसे से गिर पड़ता है तो गिरने की
आहट भी नहीं होती,
खरे दिन को भी खोटा समझ के भूल जाता हूँ मैं
गिरेबान से पकड़ कर मांगने वाले भी मिलते हैं
“तेरी गुजरी हुई पुश्तों का कर्जा है, तुझे किश्तें चुकानी है “
ज़बरदस्ती कोई गिरवी रख लेता है, ये कह कर
अभी 2-4 लम्हे खर्च करने के लिए रख ले,
बकाया उम्र के खाते में लिख देते हैं,
जब होगा, हिसाब होगा
बड़ी हसरत है पूरा एक दिन इक बार मैं
अपने लिए रख लूं,
तुम्हारे साथ पूरा एक दिन
बस खर्च
करने की तमन्ना है !!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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आज रात मैं लिख सकता हूँ!


आज भी मैं विख्यात कवि नोबेल पुरस्कार विजेता- श्री पाब्लो नेरुदा की जो मूलतः चिले से थे, की मूल रूप से ‘स्पेनिश’ भाषा में लिखी गई कविता, के अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर उसका भावानुवाद और उसके बाद अंग्रेजी में अनूदित मूल कविता, जिसका मैंने अनुवाद किया है, उसको प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। आज के लिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-

आज रात मैं लिख सकता हूँ

आज रात मैं लिख सकता हूँ, सर्वाधिक उदास पंक्तियां।
जैसे मैं लिख सकता हूँ, कि तारों से सजी है रात,
तारे नीले हैं और दूर-दूर कांप रहे हैं।’

आसमान में रात की हवा घूमती है और गाती है।

आज रात मैं लिख सकता हूँ, सर्वाधिक उदास पंक्तियां।
मैंने उसे प्रेम किया, और कभी-कभी उसने भी मुझे प्रेम किया।

आज जैसी रातों में, मैंने उसे अपनी बांहों में लिए रखा।
अनंत आकाश के तले मैं उसे बारबार चूमता रहा।

उसने मुझे प्यार किया, कभी-कभी मैंने भी उसे प्यार किया।
कोई कैसे उसकी अति सुंदर स्थिर आंखों को प्यार न करता।

आज रात मैं लिख सकता हूँ, सर्वाधिक उदास पंक्तियां।
मुझे लगता है कि मैं उसे प्यार नहीं करता, यह महसूस करने के लिए मैंने उसे खो दिया।

घनघोर रात की ध्वनियां सुनने को, जो और भी घनघोर है, उसके बिना,
और ये काव्य पंक्तियां पड़ती हैं आत्मा पर, जैसे ओस गिरती है घास पर।

इससे क्या फर्क पड़ता है कि मेरा प्रेम उसे अपने पास नहीं रख पाया।
रात तारों से भरी है और वह मेरे पास नहीं है।

यही सब है, दूर कहीं कोई गीत गा रहा है दूर कहीं।
मेरी आत्मा संतुष्ट नहीं है कि इसने उसे खो दिया।

मेरी दृष्टि प्रयास करती है उसे खोजने का, जैसे उसे पास लाने का।
मेरी आत्मा उसे खोजती है, और वह मेरे पास नहीं है।

वही रात, वही उन्हीं पेड़ों का सफेद हो जाना,
लेकिन उस समय के हम, हम अब वही नहीं हैं।

मैं अब उसे प्यार नहीं करता, यह तो निश्चित है, लेकिन मैं कैसे उसे प्यार करता था।
मेरी आवाज़ ने प्रयास किया कि हवा को खोज ले, जो उसके सुनते हुए, उसे स्पर्श करे।

किसी और की, वह होगी किसी और की, जैसे कि वह मेरे चुंबनों से पहले थी।
उसकी आवाज़, उसका दमकता बदन। उसकी असीम आंखें।

मैं अब उसे प्रेम नहीं करता, यह निश्चित है, लेकिन शायद मैं उसे प्यार करता हूँ।
प्रेम की उम्र इतनी कम है और भूलना होता है इतनी देर तक!

क्योंकि आज जैसी रातों में मैं उसे, अपनी बांहों में भरे रहता था,
मेरी आत्मा संतुष्ट नहीं है कि मैंने उसे खो दिया है।

यद्यपि यह शायद अंतिम दर्द हो, जो उसने मुझे दिया है,
और यह अंतिम कविता जो मैं उसके लिए लिख रहा हूँ।

पाब्लो नेरूदा

अंग्रेजी अनुवाद- डब्लू. एस. मेर्विन

और अब वह अंग्रेजी अनुवाद, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-


Tonight I Can Write

Tonight I can write the saddest lines.

Write, for example, ‘The night is starry
and the stars are blue and shiver in the distance.’

The night wind revolves in the sky and sings.

Tonight I can write the saddest lines.
I loved her, and sometimes she loved me too.

Through nights like this one I held her in my arms.
I kissed her again and again under the endless sky.

She loved me, sometimes I loved her too.
How could one not have loved her great still eyes.

Tonight I can write the saddest lines.
To think that I do not have her. To feel that I have lost her.

To hear the immense night, still more immense without her.
And the verse falls to the soul like dew to the pasture.

What does it matter that my love could not keep her.
The night is starry and she is not with me.

This is all. In the distance someone is singing. In the distance.
My soul is not satisfied that it has lost her.

My sight tries to find her as though to bring her closer.
My heart looks for her, and she is not with me.

The same night whitening the same trees.
We, of that time, are no longer the same.

I no longer love her, that’s certain, but how I loved her.
My voice tried to find the wind to touch her hearing.

Another’s. She will be another’s. As she was before my kisses.
Her voice, her bright body. Her infinite eyes.

I no longer love her, that’s certain, but maybe I love her.
Love is so short, forgetting is so long.

Because through nights like this one I held her in my arms
my soul is not satisfied that it has lost her.

Though this be the last pain that she makes me suffer
and these the last verses that I write for her.
Pablo Neruda
Translated in English by W.S. Merwin

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|
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आग अब भी कहीं दबी-सी है!

आज बिना किसी भूमिका के जावेद अख्तर साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| जावेद अख्तर किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं और फिर कविता अपनी बात स्वयं कहती है|

लीजिए प्रस्तुत है जावेद अख्तर साहब की यह ग़ज़ल-

हर ख़ुशी में कोई कमी-सी है,
हँसती आँखों में भी नमी-सी है|

दिन भी चुपचाप सर झुकाये था,
रात की नब्ज़ भी थमी-सी है|

किसको समझायें किसकी बात नहीं,
ज़हन और दिल में फिर ठनी-सी है|


ख़्वाब था या ग़ुबार था कोई,
गर्द इन पलकों पे जमी-सी है|

कह गए हम ये किससे दिल की बात,
शहर में एक सनसनी-सी है|

हसरतें राख हो गईं लेकिन,
आग अब भी कहीं दबी-सी है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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