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अनोखा इतिहास ज्ञान!

एक बार फिर से आज मैं हिन्दी हास्य कविता के दुर्लभ हस्ताक्षर, स्वर्गीय ओम प्रकाश आदित्य जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| यह एक लंबी हास्य कविता है जो उन्होंने एक ऐसे छात्र के बहाने से लिखी है, जो इतिहास की परीक्षा देने जाता है लेकिन उसे कुछ भी नहीं आता है|

लीजिए प्रस्तुत है यह सुंदर हास्य कविता –

इतिहास परीक्षा थी उस दिन, चिंता से हृदय धड़कता था,
थे बुरे शकुन घर से चलते ही, दाँया हाथ फड़कता था|

मैंने सवाल जो याद किए, वे केवल आधे याद हुए,
उनमें से भी कुछ स्कूल तल, आते-आते बर्बाद हुए|

तुम बीस मिनट हो लेट द्वार पर चपरासी ने बतलाया,
मैं मेल-ट्रेन की तरह दौड़ता कमरे के भीतर आया|


पर्चा हाथों में पकड़ लिया, आँखें मूंदीं टुक झूम गया,
पढ़ते ही छाया अंधकार, चक्कर आया सिर घूम गया|

उसमें आए थे वे सवाल जिनमें मैं गोल रहा करता,
पूछे थे वे ही पाठ जिन्हें पढ़ डाँवाडोल रहा करता|

यह सौ नंबर का पर्चा है, मुझको दो की भी आस नहीं,
चाहे सारी दुनिय पलटे पर मैं हो सकता पास नहीं|


ओ! प्रश्न-पत्र लिखने वाले, क्या मुँह लेकर उत्तर दें हम,
तू लिख दे तेरी जो मर्ज़ी, ये पर्चा है या एटम-बम|

तूने पूछे वे ही सवाल, जो-जो थे मैंने रटे नहीं,
जिन हाथों ने ये प्रश्न लिखे, वे हाथ तुम्हारे कटे नहीं|

फिर आँख मूंदकर बैठ गया, बोला भगवान दया कर दे,
मेरे दिमाग़ में इन प्रश्नों के उत्तर ठूँस-ठूँस भर दे|

मेरा भविष्य है ख़तरे में, मैं भूल रहा हूँ आँय-बाँय,
तुम करते हो भगवान सदा, संकट में भक्तों की सहाय|


जब ग्राह ने गज को पकड़ लिया तुमने ही उसे बचाया था,
जब द्रुपद-सुता की लाज लुटी, तुमने ही चीर बढ़ाया था|

द्रौपदी समझ करके मुझको, मेरा भी चीर बढ़ाओ तुम,
मैं विष खाकर मर जाऊंगा, वर्ना जल्दी आ जाओ तुम|

आकाश चीरकर अंबर से, आई गहरी आवाज़ एक,
रे मूढ़ व्यर्थ क्यों रोता है, तू आँख खोलकर इधर देख|

गीता कहती है कर्म करो, चिंता मत फल की किया करो,
मन में आए जो बात उसी को, पर्चे पर लिख दिया करो|


मेरे अंतर के पाट खुले, पर्चे पर क़लम चली चंचल,
ज्यों किसी खेत की छाती पर, चलता हो हलवाहे का हल|

मैंने लिक्खा पानीपत का दूसरा युध्द भर सावन में,
जापान-जर्मनी बीच हुआ, अट्ठारह सौ सत्तावन में|

लिख दिया महात्मा बुध्द महात्मा गांधी जी के चेले थे,
गांधी जी के संग बचपन में आँख-मिचौली खेले थे|

राणा प्रताप ने गौरी को, केवल दस बार हराया था,
अकबर ने हिंद महासागर, अमरीका से मंगवाया था|


महमूद गजनवी उठते ही, दो घंटे रोज नाचता था,
औरंगजेब रंग में आकर औरों की जेब काटता था|

इस तरह अनेकों भावों से, फूटे भीतर के फव्वारे,
जो-जो सवाल थे याद नहीं, वे ही पर्चे पर लिख मारे|

हो गया परीक्षक पागल सा, मेरी कॉपी को देख-देख,
बोला- इन सारे छात्रों में, बस होनहार है यही एक|

औरों के पर्चे फेंक दिए, मेरे सब उत्तर छाँट लिए,
जीरो नंबर देकर बाकी के सारे नंबर काट लिए|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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तू मुझे मेरे ही साये से डराता क्या है!

आज प्रस्तुत कर रहा हूँ ज़नाब शहजाद अहमद जी की एक खूबसूरत ग़ज़ल, इस गजल के कुछ शेर गुलाम अली साहब ने भी गाए हैं|


लीजिए प्रस्तुत है यह सुंदर ग़ज़ल –

अपनी तस्वीर को आँखों से लगाता क्या है,
एक नज़र मेरी तरफ भी, तेरा जाता क्या है|

मेरी रुसवाई में तू भी है बराबर का शरीक़,
मेरे किस्से मेरे यारों को सुनाता क्या है|

पास रहकर भी न पहचान सका तू मुझको,
दूर से देखकर अब हाथ हिलाता क्या है|

सफ़र-ए-शौक में क्यूँ कांपते हैं पाँव तेरे,
आँख रखता है तो फिर आँख चुराता क्या है|


उम्र भर अपने गरीबां से उलझने वाले,
तू मुझे मेरे ही साये से डराता क्या है|

मर गए प्यास के मारे तो उठा अब्र-ए-करम,
बुझ गयी बज़्म तो अब शम्मा ज़लाता क्या है|

मैं तेरा कुछ भी नहीं हूँ मगर इतना तो बता,
देखकर मुझको तेरे ज़ेहन में आता क्या है|

तुझमें जो बल है तो दुनिया को बहाकर लेजा,
चाय की प्याली में तूफ़ान उठाता क्या है|


तेरी आवाज़ का जादू न चलेगा उन पर,
जागने वालो को ‘शहजाद’ जगाता क्या है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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किसी कबीर की मुट्ठी में वो रतन देखा !

हिन्दी काव्य मंचों की शान रहे स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी की एक हिन्दी ग़ज़ल आज प्रस्तुत कर रहा हूँ|


कविता अपनी बात स्वयं कहती है और नीरज जी भी किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं| लीजिए प्रस्तुत है यह ग़ज़ल और नीरज जी के शब्दों में कहें तो ‘गीतिका’-


बदन पे जिस के शराफ़त का पैरहन देखा,
वो आदमी भी यहाँ हम ने बद-चलन देखा|

ख़रीदने को जिसे कम थी दौलत-ए-दुनिया,
किसी कबीर की मुट्ठी में वो रतन देखा|


मुझे मिला है वहाँ अपना ही बदन ज़ख़्मी,
कहीं जो तीर से घायल कोई हिरन देखा|

बड़ा न छोटा कोई फ़र्क़ बस नज़र का है,
सभी पे चलते समय एक सा कफ़न देखा|

ज़बाँ है और बयाँ और उस का मतलब और,
अजीब आज की दुनिया का व्याकरण देखा|


लुटेरे डाकू भी अपने पे नाज़ करने लगे,
उन्होंने आज जो संतों का आचरण देखा|

जो सादगी है कुहन में हमारे ऐ ‘नीरज’,
किसी पे और भी क्या ऐसा बाँकपन देखा|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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न मैं होता तो क्या होता!

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है ये पोस्ट-

एक पुराने संदर्भ से प्रेरणा लेते हुए आज का आलेख लिख रहा हूँ। लेकिन मैं उन प्रसंगों का ही उल्लेख कर रहा हूँ जिनसे मेरे जीवन, मेरे करियर को सकारात्मक दिशा मिली है। ऐसे प्रसंग नहीं हैं जिनके बारे में मैं नकारात्मक रूप में लिख सकूं।

मैंने अपने शुरू के ब्लॉग्स में अपने जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं, प्रसंगों, प्रभावित करने वाले और कुछ बाधक बनने वाले व्यक्तियों का क्रमबद्ध तरीके से उल्लेख किया, आज संक्षेप में कुछ घटनाओं का उल्लेख करूंगा, जो जीवन को दिशा देने वाली सिद्ध हुईं।


मेरा जन्म हुआ था दिल्ली के दरिया गंज में, लेकिन जब तक मैंने पढ़ाई शुरू की तब तक हम शाहदरा जा चुके थे, जहाँ रहते हुए मैंने पढ़ाई की और जब मैं बीएससी फाइनल में आया था तब मेरे पिता, जो एक विक्रय प्रतिनिधि के रूप में दौरों पर जाते रहते थे, वे एक बार गए तो फिर वापस नहीं आए। मैं यह कह सकता हूँ कि काश यह न हुआ होता, तब शायद ज़िंदगी ज्यादा आसान हो सकती थी, लेकिन पिताजी का काम ठीक से चल नहीं रहा था और वे सन्यास लेने की सोच रहे थे काफी समय से, शायद उनकी ज़िंदगी ज्यादा आराम से बीती हो उसके बाद! वैसे शायद यदि वे न गए होते तो मैं कुछ और हुआ होता!


खैर पिता के जाने के बाद मैंने, पढ़ाई छोड़कर, पहले चार वर्षों में प्रायवेट नौकरियां कीं, जिनमें वेतन रु. 100/- से लेकर शायद 250 तक पहुंचा। उसके बाद केंद्रीय सचिवालय में क्लर्क के रूप में सेवा की लगभग 6 वर्ष तक। विस्तृत विवरण मैं अपने शुरू के ब्लॉग्स में दे चुका हूँ।


जब क्लर्क था, तब की एक घटना, जिसका उल्लेख मैं पहले भी कर चुका हूँ। मैं एलडीसी था और उससे ऊपर का स्तर होता है यूडीसी, जिसमें एक बुज़ुर्ग साथी कार्यरत थे। खूब ओवरटाइम करते थे, अधिक कमाई करने के लिए, जिससे घर का खर्च चल सके! एक बार ओवरटाइम करके लौटते हुए वे साइकिल से गिर गए, बेहोश हो गए, अस्पताल में जब उनको होश आया, तब उनका यही सवाल था-‘ मेरा ओवरटाइम चल रहा है न!’


यह प्रसंग मैंने इसलिए सुनाया कि उस नौकरी में रहते हुए मैं शायद इस गति को प्राप्त होने के ही सपने देख सकता था, शायद उससे ऊपर के स्तर ‘सहायक’ तक पहुंच पाता, रिटायर होने तक!


इस दौरान मैंने बीच में छूटी पढ़ाई को आगे बढ़ाते हुए प्रायवेटली बी.ए. कर लिया था और स्टॉफ सेलेक्शन कमीशन की परीक्षा पास करके मैं ‘हिंदी अनुवादक’ के पद हेतु चुन लिया गया था, जो उस समय के हिसाब से अच्छी उड़ान थी और मेरी पोस्टिंग आकाशवाणी, जयपुर में हो गई। आकाशवाणी में रहते हुए मैंने हिंदी में एम.ए. भी कर लिया।


एक ही और घटना का उल्लेख करना चाहूंगा, आकाशवाणी की नौकरी करते हुए मैंने केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो का प्रशिक्षण प्राप्त किया, जिसमें मैं प्रथम आया और मुझे मैडल मिला। उसके बाद हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड, घाटशिला, झारखंड में मैंने सहायक हिंदी अधिकारी के पद हेतु आवेदन किया। केद्रीय मंत्री रहीं सुश्री राम दुलारी सिन्हा जी के स्टॉफ के एक सज्जन भी वहाँ इंटरव्यू देने आए थे और वे मान रहे थे कि चयन तो उनका ही होना है। उनका चयन नहीं हुआ और मेरा हो गया। बाद में उनकी शिकायत आई जिसे दो केंद्रीय मंत्रियों ने अग्रेषित किया था।


ये सारे प्रसंग अपनी जगह, लेकिन मैं जिसके सपने शुरू में एल.डी.सी से सहायक तक बनने के थे, वह अंततः एनटीपीसी से मिडिल मैंनेजमेंट स्तर तक पहुंचकर रिटायर हुआ, कैसे कहूं कि काश ये न हुआ होता या वो न हुआ होता!

डुबोया मुझको होने ने,
न मैं होता तो क्या होता!

चचा गालिब का ये शेर तो ऐसे ही याद आ गया जी, कोई अर्थ तलाश मत कीजिए।
नमस्कार!
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दृष्टि-अंधता का विस्तार!

आज ऐसे ही अचानक बात करने का बहाना मिल गया| क्रिकेट में बॉलर के लिए एक विशेष कुशलता मानी जाती है कि वह ऐसे कोण पर बॉल डाले, या ऐसा घुमाव दे कि खिलाड़ी उसको न देख पाए| मुझे याद है कि किसी समय भागवत चन्द्रशेखर भारतीय टीम के ऐसे बॉलर थे जिनकी बॉल बहुत पिटती थीं, लेकिन जब वह ठीक से पड़ती थी तब दुनिया को कोई भी खिलाड़ी उसको नहीं खेल पाता था|

इसे कहते हैं ‘ब्लाइंड स्पॉट’| वैसे देखा जाए तो राजनीतिज्ञों या कुछ राजनीतिक दलों के घोर समर्थकों का यह ‘ब्लाइंड स्पॉट’ बहुत बड़ा होता है| वे देश को और लोकतन्त्र को अपने हिसाब से चलाना चाहते हैं, लेकिन जनता है कि उनकी सुनती ही नहीं है| और इतनी शालीनता उनमें होती नहीं कि वे यह मान लें कि जनता का फैसला सर्वोपरि है| आखिर लोकतन्त्र में देश क्या कुछ ऐसे लोगों के विचार से चलेगा, जो कुछ खास ही अच्छाइयों को देख पाते हैं, कहीं उनको सिर्फ बुराई दिखती है और कहीं सिर्फ अच्छाई|


उदाहरण के लिए मैं कहना चाहूँगा कि केरल में जो लगातार लोगों को मौत के घाट उतार दिया जाता है, पश्चिम बंगाल में लोगों को मारकर पेड़ पर लटका दिया जाता है, उसको जनता की कृपा से आजकल बेरोजगार चल रहे अथवा हाशिये पर चले गए पत्रकार- विनोद दुआ, रवीश कुमार, राजदीप सरदेसाई, पुण्य प्रसून वाजपेयी आदि-आदि नहीं देख पाएंगे| जिनका खाते हैं उनके खिलाफ कैसे बोल पाएंगे!

उत्तर प्रदेश में दो गुटों के बीच झगड़े के कारण हुई घटना, भले ही उस पर तुरंत कार्रवाई भी हो जाए, उसे ये ऐसे दिखाएंगे कि ये सरकार ने ही किया है| जबकि केरल और पश्चिम बंगाल में सत्ता पक्ष द्वारा किए गए कारनामों पर ये बिल्ली की तरह आँखें मूँद लेते हैं|


ये बेचारे पत्रकार रोज यह दुआ करते हैं कि फिर से पहले वाली सरकार आ जाए, वो प्रधानमंत्री के साथ विदेश-यात्रा पर जाएँ, हवाई जहाज में बैठकर इंटरव्यू लें, वहाँ जाकर सरकारी खर्चे पर मौज करें और तमाम सुख-सुविधाओं के लिए लाइन में लगे रहें|


देश की जनता ने इन बेचारों को बहुत दुख दिया है| जब अर्णब गोस्वामी जैसे साहसी पत्रकार पर महाराष्ट्र सरकार ज़ुल्म करती है, तब ये कायर लोग अपने खोल में बंद हो जाते हैं| आप असहमत हो सकते हैं, लेकिन वह भी आपका साथी पत्रकार है, ये तो मानेंगे| कल आपके साथ भी तो ऐसा हो सकता है| अर्णब के समर्थन में जो जनता उमड़कर आती है, उसके बारे में, ये प्लास्टिक के पत्रकार क्या कहेंगे|


कहने को बहुत कुछ है, लेकिन ज्यादा लिखने से क्या ये बदल जाएंगे| ये तो उनका ही गुणगान करेंगे जिनसे ये सम्मान और सुख-सुविधाएं प्राप्त करते आए हैं|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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नरकासुर वध!

हमारा देश त्यौहारों का देश है| हर समय, कहीं न कहीं कोई त्यौहार मनाया जा रहा होता है| दशहरा और दीपावली हमारे प्रमुखतम त्यौहारों में शामिल हैं|


दशहरे के अवसर पर जहां उत्तर भारत में रामलीला होती है, वहीं पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा की धूम होती है| बहुत से लोग नौ दिन तक उपवास भी रखते हैं|
इसी प्रकार दीपावली का त्यौहार भी पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है|

दीपावली से पहले आती है छोटी दीवाली, जिसे नरक-चतुर्दशी भी कहते हैं|
मैं पिछले कई वर्षों से गोवा में रहता हूं, और मैं ये बता सकता हूँ कि यहाँ बड़ी दीवाली से ज्यादा छोटी दीवाली अर्थात ‘नरक चतुर्दशी’ को मनाया जाता है|
इस अवसर पर लगभग हर मुहल्ले में ‘नरकासुर’ के पुतले बनाकर उनको जलाया जाता है|


आज बस नरकासुर के ही कुछ पुतलों के चित्र शेयर कर रहा हूँ-


नमस्कार|
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The Anti social, social media!

Once again talking about social media. I have talked on this subject a number of times and I am making a very good use of these platforms as a blogger.

I normally try to talk on literary subjects- poetry, film songs etc. which are non-controversial, and I normally avoid falling into arguments with people, who are always ready to pick an issue for fighting. There are people here who hate almost everybody in the world.


The use of social media is good for keeping in touch with your nears and dears and share your updates with them and know about them on a regular basis.


But people wish to expand their circle of friendship and influence. For that you must provide something worthy to your readers and choose whom you want to make your readers.


I have a feeling that if you keep on adding people in your circle without proper scrutiny, specially if you write on political subjects, then you may often keep fighting, since social media today is an abode for ‘politically anti-social people’. They never accept the view points of anybody who thinks differently.


I just want to mention that there are people on social media for whom- Arundhuti Roy who doesn’t spare any chance to speak against our country and Prashant Bhushan who didn’t feel shame in insulting our judicial system, they are the heroes for some people here.


So, I feel that the thing I normally do, i.e. writing on literary and film related subjects, mind it ‘film related’ and not ‘film industry related’ subjects is better and also one should also keep pruning own circle on social media friends, so that one may not have to indulge in unnecessary fights.


A lot can be said on this subject but today I would prefer to limit myself to this much only.


This is my humble submission on #IndiSpire prompt- How are you managing Social Media? Are you up-to-date in sharing images, posts, comments, replies etc.? Any SM management tips? #SocialMediaTips

Thanks for reading.

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लीडर याने जांबवंत!

दीपावली आ रही है, श्रीराम जी के लंका पर विजय के बाद, और वनवास की अवधि पूरी होने पर अयोध्या लौटने पर खुशी का पर्व, जिसमें अमावस्या की काली रात को दीयों और रोशनी से जगमग कर दिया जाता है|


मुझे अचानक याद आया कि लंका विजय से पहले किसी दूत को वहाँ जाना था, माता सीता की सुधि लेने के लिए और लंका की व्यूह रचना जानने के लिए| ऐसे में समुद्र लांघकर लंका में जाने की आवश्यकता थी, जिसके लिए आकाश मार्ग से, आज कि लिहाज से देखें तो 30-40 किलोमीटर जाना था|


ऐसे में रामजी के सब सैनिक, जो सुग्रीव की वानर सेना से थे, और उनका नायक था- जांबवंत जो रिक्ष (भालू) प्रजाति से था| वहाँ ऐसा कोई विवाद नहीं हुआ कि बहुमत तो वानरों का है, फिर उनका नायक भालू कैसे हो सकता है|


सब लोग समुद्र के किनारे जाकर बैठ गए, कोई यह नहीं सोच पा रहा था कि अब आगे कैसे बढ़ा जाए, समुद्र पर इस विशाल दूरी को कैसे पार किया जाए| ऐसे में जांबवंत जो वास्तविक अर्थों में एक नायक हैं, वह हनुमान जी को उनकी छिपी हुई शक्तियों का स्मरण कराते हैं उनको बताते हैं कि इसी काम के लिए उनका अवतार हुआ है|


वास्तव में जो सच्चा नायक होता है, वह अपने साथियों को उनकी शक्तियों का एहसास कराता है और उनका सही उपयोग करने के लिए प्रेरित करता है|
इसके बाद हनुमान जी लंका में जो कुछ चमत्कार करते हैं, हम सब उनको जानते हैं| एक बात का उल्लेख करना चाहूँगा कि राक्षसों का वध करने के लिए वे विशाल रूप धारण करते हैं और माता सीता के सामने विनम्रता वश ‘लघु रूप’ में आ जाते हैं|


इसके बाद में जांबवंत जी की सच्चे नायक वाली भूमिका का उल्लेख करना चाहूँगा| वे श्रीरामजी को हनुमान जी के चमत्कारों के बारे में बताते हैं| यहाँ कुछ पंक्ति उद्धृत करना चाहूँगा, श्रीरामचरित मानस से-


पवन तनय के चरित सुहाए, जांबवंत रघुपतिहि सुनाए,
सुनत कृपानिधि मन अति भाए, कर गहि परम निकट बैठाए|
सुनु कपि तोही समान उपकारी, नहिं कोई सुर, नर, मुनि तनधारी,
प्रति उपकार करहूँ का तोरा, सन्मुख होई न सकत जिय मोरा|


मन होता है कि यहाँ कुछ और पंक्तियाँ उद्धृत करूं, लेकिन फिलहाल इतना ही ठीक है| यहाँ जो उल्लेखनीय है, वो यह कि जांबवंत जी हनुमान जी के कार्यों की प्रशंसा करते हैं, जबकि आज का कोई लीडर होता तो वह अपने अधीनस्थ को पीछे करके कहता कि मैंने ही सब कुछ किया है|


इसके लिए मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी, हनुमान जी की इतनी प्रशंसा करते हैं कि उसको सुनकर हनुमान जी की आँखों में आँसू आ जाते हैं| यह भी सत्य है कि श्रीराम जी का हनुमान जी से बड़ा कोई भक्त नहीं है|


अंत में प्रभु श्रीराम जी के एक गुण का ज़िक्र करके बात समाप्त करूंगा| गोस्वामी जी ने, श्रीराम जी के बारे में लिखा है-


कोमल चित अति दीन-दयाला,
कारण बिनु रघुनाथ कृपाला|


स्वार्थ वश, कुछ पाने के बदले कृपा जो करते हैं, वो कृपा नहीं होती, श्रीराम जी का तो स्वभाव ही कृपा करने वाला है|


अंत में तुलसी के राम की एक और परिकल्पना का उल्लेख करना चाहूँगा-


विस्वरूप रघुवंशमणि, करहु वचन विश्वास!

तुलसीदास जी कहते हैं कि यह जो दुनिया है, यही प्रभु श्रीराम का स्वरूप है| यदि हम किसी जीव का भला करते हैं, तो वह प्रभु की सेवा है और यदि किसी को कष्ट देते हैं, तो उससे हम प्रभु श्रीराम को नाराज़ करते हैं|


आज ऐसे ही जांबवंत जी के बहाने से कुछ कहने का मन हुआ सो कह दिया|
नमस्कार


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बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की!

हिन्दुस्तानी उर्दू शायरी के एक प्रसिद्ध हस्ताक्षर हैं- ज़नाब बशीर बद्र जी| वे शायरी में एक्सपेरीमेंट करने के लिए जाने जाते हैं| मुशायरों को लूटने वाले बशीर जी की गज़लें अक्सर लोग गुनगुनाते हैं|

उनका यह शेर –‘उजाले अपनी यादों के हमारे पास रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए’, यह शेर एक मुहावरा बन गया है| एक और शेर मुझे अभी याद आ रहा है- ‘कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज़ का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो’|


बशीर जी की अनेक गज़लें बहुत लोकप्रिय हैं और अनेक गायकों ने उनको गाया है|
आज की यह ग़ज़ल भी बहुत खूबसूरत है, आइए आज इस ग़ज़ल का आनंद लेते हैं –

न जी भर के देखा न कुछ बात की,
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की|

उजालों की परियाँ नहाने लगीं,
नदी गुनगुनाई ख़यालात की|


मैं चुप था तो चलती हवा रुक गई,
ज़ुबां सब समझते हैं जज़्बात की|


मुक़द्दर मेरी चश्म-ए-पुर-आब का,
बरसती हुई रात बरसात की|


कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं,
कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मैं प्यार का परवाना!

आज एक बार फिर मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक और गीत शेयर कर रहा हूँ| मजे की बात ये है कि यह गीत भी 1968 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘दीवाना’ से ही है- यह गीत लिखा है हसरत जयपुरी जी ने और इसका मधुर संगीत तैयार किया है- शंकर जयकिशन की संगीतमय जोड़ी ने|


इस एक ही फिल्म का यह पाँचवाँ गीत है, जो मैं शेयर कर रहा हूँ| असल में यह इस फिल्म का ‘थीम सांग’ है| ये एक तरह से सादगी का सेलीब्रेशन है| जैसे कहा जाए की हम सरल, सिंपल हैं और हमें इस पर गर्व है!

अब बिना और भूमिका बनाए, लीजिए प्रस्तुत है यह मधुर गीत-

दिवाना मुझको लोग कहें,
मैं समझूँ जग है दिवाना, ओ
मैं समझूँ जग है दिवाना,
दिवाना मुझको लोग कहें|

हँसता है कोई सूरत पे मेरी,
हँसता है कोई हालत पे मेरी,
छोटा ही सही, पर दिल है बड़ा,
मैं झूमता पैमाना|


मैं इंसां सीधा-साधा हूँ,
ईमान का मैं शहजादा हूँ,
है कौन बुरा मालिक जाने,
मैं प्यार का परवाना|

मैं यार की खातिर लुट जाऊँ,
और प्यार की खातिर मिट जाऊँ,
चलता ही रहूँ, हर मंज़िल तक,
अंजाम से बेगाना|


दीवाना मुझको लोग कहें,
मैं समझूँ जग है दीवाना, ओ
मैं समझूँ जग है दीवाना,
दिवाना मुझको लोग कहें|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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