एक करो अपराध सुर्खियों में छा जाओगे!

श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी एक सुरीले और सृजनशील गीतकार हैं| संयोग से वे भी किसी समय उसी संस्थान के कोलकता स्थित निगमीय कार्यालय में कार्यरत रहे, जिसकी एक परियोजना में मैं कार्यरत था|

श्री बुद्धिनाथ जी का एक गीत बहुत प्रसिद्ध है- ‘एक बार और जाल फेंक रे मछेरे, जाने किस मछली में बंधन की चाह हो’| आशावाद के इस गीत में कुछ बहुत जानदार अभिव्यक्तियाँ हैं|

आज मैं उनका जो गीत शेयर कर रहा हूँ, वह पत्रकारिता के छिछोरे चरित्र को उजागर करता है| लीजिए प्रस्तुत है यह प्रभावी गीत-

अपराधों के ज़िला बुलेटिन
हुए सभी अख़बार,
सत्यकथाएँ पढ़ते-सुनते
देश हुआ बीमार ।

पत्रकार की क़लमें अब
फ़ौलादी कहाँ रहीं,
अलख जगानेवाली आज
मुनादी कहाँ रही ?

मात कर रहे टी० वी० चैनल
अब मछली बाज़ार ।

फ़िल्मों से, किरकिट से,
नेताओं से हैं आबाद,
ताँगेवाले लिख लेते हैं
अब इनके संवाद|

सच से क्या ये अंधे
कर पाएंगे आँखें चार ?

मिशन नहीं गंदा पेशा यह
करता मालामाल,
झटके से गुज़री लड़की को
फिर-फिर करें हलाल,

सौ-सौ अपराधों पर भारी
इनका अत्याचार ।

त्याग-तपस्या करने पर
गुमनामी पाओगे,
एक करो अपराध
सुर्खियों में छा जाओगे,

सूनापन कट जाएगा
बंगला होगा गुलजार ।

पैसे की, सत्ता की
जो दीवानी पीढ़ी है
उसे पता है, कहां लगी
संसद की सीढ़ी है

और अपाहिज जनता
उसको मान रही अवतार ।

आज के लिए इतना ही,



Mystery Blogger Award

Once again, I am writing a post thanking you all and specially thanking a fellow blogger, for nominating me for one more blogging award, and I am forever obliged to all those who think I am deserving for this award.
This is the Mystery Blogger Award and my nomination comes from a very creative and versatile blogger Sakshi Shreya, You can Follow her wonderful blog Sakshi Shreya @shreyasakshi92 and go through her wonderful posts.
The Rules:
• Display the award logo on your blog.
• Thank the blogger who nominated you and provide a link to their blog.
• Mention Okoto Enigma, the creator of the award.
• Tell your readers 3 things about yourself.
• Answer 5 questions from the blogger who nominated you.
• Nominate 10-20 bloggers.
• Notify your nominees by leaving a comment on their blog.
• Ask your nominees 5 questions of your choice, including 1 weird or funny question.
• Share the link to your best post.
3 Facts about me:

1. I’m a simple human being, I think it is quite difficult to remain simple these days with so many complexities ready to become a part of your personality. No claims of being special, I just try to remain simple.

2. Yes, I read a lot and listened to good poets etc., have come in touch with many great poets and artists, since I organised Kavi Sammelans and musicals programs for my organisation. Learnt a lot from that I feel. Now I just try to put the impressions of that experience in my blog posts.

3. I am a great fan of late Raj Kapur ji, the dream merchant of Hindi films and in love with the songs sung by Mukesh Ji, written by Shailendra Ji and many more poets, Shaayars. May be that might have had an impact on my personality, made me what I am. Yes I also love to travel a lot, this activity is however suspended since the Pandemic spread at present.
Now my answers to the Questions asked by Shreya Ji:

Q1.) What is the craziest thing you have ever done?
Ans. Living in this world of today and remaining happy is the craziest thing, I think. Some poets said ‘the life today is such that as much you think about, you become more and more sad!’

Q2.) What is more important to you: family or success? Why?

Ans. Again I would refer to a shaayar Wasim Barelvi ji- ‘jo zinda hain to fir zinda nazar aana zaruri hai’, We must live our life with full enthusiasm, that is the way to be happy and successful too.

Q3.) List two qualities you have developed during lockdown?

Ans. I am not a person who keeps developing qualities. Yes, we follow some rules during lock down, would keep doing so during this scare. Further I am a retired person, I had been staying mostly at home earlier also, so not great change, except travelling not possible at present.

Q4.) What is your inspiration behind starting your blog?

Ans. Everybody in the world wants to communicate. Some who consider themselves artists or thinkers also find ways to reach people. Initially I wrote poems etc. to reach people now I think blogging is the easy and best way to reach people and interact with them.

Q5.) Name the driving force which motivates you during your low phases and why?

Ans. I believe in Indian philosophy and the principle of ‘Karmas’ also. Whatever we have to face in life is going to happen, we can only remain ready to face all situations. Some Saint told somebody ‘This situation would also end’, which means whether happiness or sadness, all situations are going to change, so we must accept whatever happens, with courage and readiness.

After this there are two activities to happen. One is that I have to nominate some fellow bloggers for this award.

My Nominations:

As per my past practice, being a lazy person too and one who can’t choose a few, I nominate everybody who reads my blog posts, to accept it as a nomination from my side and take the baton forward. Yes, I nominate you, for this award.

Further I need to ask some questions, so again I think the questions asked by Sakshi Shreya Ji were quite good and a lot can be said in response to these questions, so you may take these questions from my side and give your wonderful answers based on them.

I am also supposed to provide a link to my best post. I feel that best post is yet to come. I wish that my friends read my posts and tell me which one is a bit better and what kind of posts they would like to read more.

Once again thank you so much for this awesome award.

Thanks for reading and I hope some friends would accept this nomination from my side and come out with their blog posts in response to it.



भिक्षुक हृदय – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Beggarly Heart’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

भिक्षुक हृदय

जब मेरा हृदय कठोर और शुष्क हो गया हो,
तब मेरे ऊपर दया की वृष्टि करते हुए आना|

जब जीवन से कृपा लुप्त हो गई हो,
तब एक गीत की गूंज के साथ आना|

जब काम की आपाधापी मुझे पूरी तरह, बाहरी जगत से काट दे,
तब मेरे पास आना, मौन के देवता, अपनी शांति और चैन के साथ|

जब मेरा भिक्षुक हृदय सिर झुकाकर बैठा हो, बंद कमरे के एक कोने में,
तब मेरे सम्राट, द्वार तोड़कर अंदर, एक सम्राट की आनबान के साथ आना|

जब कामनाएँ मुझे अंधा कर दें, मायाजाल और धूल फैलाकर, ओ मेरे पवित्र प्रभु,
सबको जागृत करने वाले, अपने प्रकाश और गर्जना के साथ आना|

-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Beggarly Heart

When the heart is hard and parched up,
come upon me with a shower of mercy.

When grace is lost from life,
come with a burst of song.

When tumultuous work raises its din on all sides shutting me out from
beyond, come to me, my lord of silence, with thy peace and rest.

When my beggarly heart sits crouched, shut up in a corner,
break open the door, my king, and come with the ceremony of a king.

When desire blinds the mind with delusion and dust, O thou holy one,
thou wakeful, come with thy light and thy thunder

-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,



ख़ून गिरा पी गई कचहरी!

आज एक श्रेष्ठ गीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक और गीत शेयर कर रहा हूँ| दिल्ली में रहते हुए उनसे मिलने के, उनका ओजस्वी काव्य-पाठ सुनने और उनके समक्ष अपनी कुछ रचनाएँ प्रस्तुत करने के भी अवसर प्राप्त हुए थे|
जैसे कोई योद्धा युद्ध में वीर-गति को प्राप्त होता है, रंजक जी के साथ ऐसा हुआ था कि दूरदर्शन के लिए कवि गोष्ठी की रिकॉर्डिंग के दौरान ही उनको दिल का दौरा पड़ा था, जो उनके प्राण लेकर ही गया|

आजकल अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत जी की दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु के संदर्भ में ही नेताओं और अपराधियों के तंत्रजाल के संबंध में काफी चर्चा हो रही है|
ऐसे ही सदियों से चले आ रहे दुष्चक्र को उद्घाटित करता है रंजक जी का यह गीत–

परदे के पीछे मत जाना मेरे भाई !
टुकड़े-टुकड़े कर डालेंगे, बैठे हुए कसाई ।

बड़े-बड़े अफ़सर बैठे हैं,
माल धरे तस्कर बैठे हैं,
बैठे हैं कुबेर के बेटे,
ऐश लूटते लेटे-लेटे,
नंगी कॉकटेल में नंगी, नाच रही गोराई ।

इधर बोरियों की कतार,
पतलूनों में रोज़गार है,
बड़े-बड़े गोदाम पड़े हैं,
जिन पर नमक हराम खड़े हैं,
परदे के बाहर पहरे पर, आदमक़द महँगाई ।

जिसने उधर झाँककर देखा,
उसकी खिंची पीठ पर रेखा,
काया लगने लगी गिलहरी,
ख़ून गिरा पी गई कचहरी,
ऐसा क़त्ल हुआ चौरे में, लाश न पड़ी दिखाई ।

तेरी क्या औक़ात बावले,
जो परदे की ओर झाँक ले,
ये परदा इस-उसका चंदा,
समझौतों का गोल पुलंदा,
ऐसा गोरखधंधा, जिसकी नस-नस में चतुराई ।

जो इक्के-दुक्के जाएँगे,
वापस नहीं लौट पाएँगे,
जाना है तो गोल बना ले,
हथियारों पर हाथ जमा ले,
ऐसा हल्ला बोल कि जागे, जन-जन की तरुणाई ।

आज के लिए इतना ही,



धूप-भरे सूने दालान!

एक सुरीले गीतकार और भारतीय काव्य मंचों की शान श्री सोम ठाकुर जी का एक प्यारा सा गीत आज शेयर कर रहा हूँ| गीत का सौंदर्य और अभिव्यक्ति की दिव्यता स्वयं ही पाठक/श्रोता को सम्मोहित कर लेती है|

लीजिए प्रस्तुत है प्रतीक्षा का यह प्यारा सा गीत–

खिड़की पर आंख लगी,
देहरी पर कान।

धूप-भरे सूने दालान,
हल्दी के रूप भरे सूने दालान।

परदों के साथ-साथ उड़ता है-
चिड़ियों का खण्डित-सा छाया क्रम
झरे हुए पत्तों की खड़-खड़ में
उगता है कोई मनचाहा भ्रम
मंदिर के कलशों पर-
ठहर गई सूरज की कांपती थकान
धूप-भरे सूने दालान।

रोशनी चढ़ी सीढ़ी-सीढ़ी
डूबा मन
जीने के
मोड़ों को
घेरता अकेलापन|

ओ मेरे नंदन!
आंगन तक बढ़ आया
एक बियाबान।
धूप भरे सूने दालान।

आज के लिए इतना ही,



तुम जो न सुनते, क्यों गाता मैं!

आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

आज ऐसे ही, गीतकार शैलेंद्र जी की याद आ गई। मुझे ये बहुत मुश्किल लगता है कि किसी की जन्मतिथि अथवा पुण्यतिथि का इंतज़ार करूं और तब उसको याद करूं।

मैंने कहीं पढ़ा था कि शैलेंद्र जी इप्टा से जुड़े थे और वहीं किसी नाटक के मंचन के समय पृथ्वीराज कपूर जी उनसे मिले, बताया कि उनके बेटे राज कपूर अपनी पहली फिल्म बनाने वाले हैं और उनसे फिल्म में गीत लिखने का अनुरोध किया।

शैलेंद्र उस समय अपनी विचारधारा के प्रति पूरी तरह समर्पित थे और उन्होंने कहा कि वे फिल्म के लिए गीत नहीं लिखेंगे। पृथ्वीराज जी ने उनसे कहा कि जब उनका मन हो तब वे आकर मिल लें, अगर वे आएंगे तो उनको बहुत अच्छा लगेगा। इत्तफाक़ से वह घड़ी बहुत जल्द आ गई और हमारी फिल्मों को शैलेंद्र जैसा महान गीतकार मिल गया।

सिर्फ इतना ही नहीं, शैलेंद्र, हसरत जयपुरी, मुकेश, शंकर जयकिशन का राजकपूर के साथ मिलकर एक ऐसा समूह बना, जिसने हमारी फिल्मों अनेक अविस्मरणीय गीत दिए, जिनमें सिर्फ महान विचार और भावनाएं नहीं अपितु आत्मा धड़कती है। संगीतकार के तौर पर इस समूह में कल्याण जी-आनंद जी और शायद लक्ष्मीकांत प्यारे लाल भी जुड़े। कुछ ऐसा संयोग बन गया कि शैलेंद्र अथवा हसरत गीत लिखेंगे, शंकर जयकिशन उसका संगीत देंगे, मुकेश उसके पुरुष कंठ होंगे और पर्दे पर पर राज कपूर की प्रस्तुति इस सभी का संयोग बनकर वह गीत अमर बन जाएगा-

तुम जो हमारे मीत न होते
गीत ये मेरे- गीत न होते।

तुम जो न सुनते,
क्यों गाता मैं,
दर्द से घुट कर रह जाता मैं।
सूनी डगर का एक सितारा-
झिलमिल झिलमिल रूप तुम्हारा।

एक बहुत बड़ी शृंखला है ऐसे गीतों की, जिनमें बहुत गहरी बात को बड़ी सादगी से कह दिया गया है। नशे का गीत है तो उसमें भी बड़ी सरलता से फिलॉसफी कह दी गई है-

मुझको यारो माफ करना, मैं नशे में हूँ-
कल की यादें मिट चुकी हैं, दर्द भी है कम
अब जरा आराम से आ-जा रहा है दम,
कम है अब दिल का तड़पना, मैं नशे में हूँ।

है जरा सी बात और छलके हैं कुछ प्याले,
पर न जाने क्या कहेंगे, ये जहाँ वाले,
तुम बस इतना याद रखना, मैं नशे में हूँ।

शराबियों से ही जुड़ी एक और बात, वो रोज तौबा करते हैं और रोज भूल जाते हैं, इन बातों को इस गीत में कितनी खूबसूरती से कहा गया है-

याद आई आधी रात को, कल रात की तौबा,
दिल पूछता है झूम के, किस बात की तौबा!

जीने भी न देंगे मुझे, दुश्मन मेरी जां के,
हर बात पे कहते हैं कि- इस बात की तौबा!

बातों में वफा और वो मर मिटने की कस्में,
क्या दौर था, उस दौर के जज़्बात की तौबा।

और फिर सादगी और मानवीयता के दर्शन से भरे ये गीत-

किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार,
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार,
किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार-
जीना इसी का नाम है।

रिश्ता दिल से दिल के ऐतबार का,
जिंदा है हमीं से नाम प्यार का|

किसी के आंसुओं में मुस्कुराएंगे,
मर के भी किसी को याद आएंगे,
कहेगा फूल हर कली से बार-बार
जीना इसी का नाम है।

या फिर-

इन काली सदियों के सिर से, जब रात का आंचल ढ़लकेगा,
जब दुख के बादल छिटकेंगे, जब सुख का सागर छलकेगा,
जब अंबर झूमके नाचेगा, जब धरती नगमे गाएगी-
वो सुबह कभी तो आएगी।

एक और-

जेबें हैं अपनी खाली, क्यों देता वर्ना गाली,
ये संतरी हमारा, ये पासबां हमारा।

चीन-ओ-अरब हमारा, हिंदोस्तां हमारा,
रहने को घर नहीं है, सारा जहाँ हमारा।

और अंत में-

तुम्हारे महल- चौबारे, यहीं रह जाएंगे सारे,
अकड़ किस बात की प्यारे, ये सर फिर भी झुकाना है।

सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है,
न हाथी है न घोड़ा है, वहाँ पैदल ही जाना है।

ये सब मैंने कहा, कवि शैलेंद्र जी को याद करके, हालांकि मुझे इस बात की जानकारी नहीं है कि जिन गीतों की पंक्तियां मैंने यहाँ लिखी हैं, उनमें कौन सा गीत शैलेंद्र जी का है, कौन सा नहीं, लेकिन इतना ज़रूर है कि ये सभी गीत उसी परंपरा के हैं, जिसके शैलेंद्र जी प्रतिनिधि थे। हाँ इन सभी गीतों को मुकेश जी ने अपनी सीधे दिल में उतर जाने वाली आवाज़ दी है।

मुझे नहीं मालूम कि आपको यह आलेख कैसा लगेगा, लेकिन मुझे इस सफर से गुज़रकर बहुत अच्छा लगा और आगे भी जब मौका मिलेगा, मैं इस प्रकार की बातें करता रहूंगा। हर गीत की कुछ पंक्तियां लिखने के बाद मुझे लगा है कि जो पंक्तियां मैंने यहाँ नहीं दी हैं, उनको लिखता तो और अच्छा रहता। इन अमर गीतों की कुछ पंक्तियों के बहाने मैं शैलेंद्र जी को और इन गीतों से जुड़े सभी महान सर्जकों, कलाकारों को याद करता हूँ।




किस क़दर जल्द बदल जाते हैं इन्सां जाना !

भारतीय उपमहाद्वीप में उर्दू के जो सर्वश्रेष्ठ शायर हुए हैं, उनमें से एक रहे हैं जनाब अहमद फराज़, वैसे तो श्रेष्ठ कवियों/शायरों के लिए सीमाओं का कोई महत्व नहीं होता, लेकिन यह बता दूँ कि फराज़ साहब पाकिस्तान में थे और उनमें इतना साहस था की उन्होंने वहाँ मिलिटरी शासन का विरोध किया था|
फराज़ साहब की अनेक गज़लें भारत में भी लोगों की ज़ुबान पर रहती हैं| इस ग़ज़ल के कुछ शेर भी गुलाम ली साहब ने गाये हैं| वैसे मैं भी ग़ज़ल के कुछ चुने हुए शेर ही दे रहा हूँ, जिनमें थोड़ी अधिक कठिन उर्दू है, उनको मैंने छोड़ दिया है|

लीजिए प्रस्तुत है यह प्यारी सी ग़ज़ल–

अब के तज्दीद-ए-वफ़ा का नहीं इम्काँ जाना,
याद क्या तुझ को दिलाएँ तेरा पैमाँ जाना|

यूँ ही मौसम की अदा देख के याद आया है,
किस क़दर जल्द बदल जाते हैं इन्सां जाना|

ज़िन्दगी तेरी अता थी सो तेरे नाम की है,
हमने जैसे भी बसर की तेरा एहसां जाना|

दिल ये कहता है कि शायद हो फ़सुर्दा तू भी,
दिल की क्या बात करें दिल तो है नादां जाना|

अव्वल-अव्वल की मुहब्बत के नशे याद तो कर,
बे-पिये भी तेरा चेहरा था गुलिस्ताँ जाना|

मुद्दतों से यही आलम न तवक़्क़ो न उम्मीद,
दिल पुकारे ही चला जाता है जाना जाना|

हम भी क्या सादा थे हमने भी समझ रखा था,
ग़म-ए-दौराँ से जुदा है, ग़म-ए-जाना जाना|

हर कोई अपनी ही आवाज़ से काँप उठता है,
हर कोई अपने ही साये से हिरासाँ जानाँ|

जिसको देखो वही ज़न्जीर-ब-पा लगता है,
शहर का शहर हुआ दाख़िल-ए-ज़िन्दाँ जाना|

अब तेरा ज़िक्र भी शायद ही ग़ज़ल में आये,
और से और हुआ दर्द का उन्वाँ जाना|

हम कि रूठी हुई रुत को भी मना लेते थे,
हम ने देखा ही न था मौसम-ए-हिज्राँ जाना|

आज के लिए इतना ही,



Moral of the story!

Yes, it has been the endeavor of many writers, film makers, directors to leave a moral behind in their stories or film scripts. We have been listening to many religious stories and scriptures etc. which tell us that in the end truth prevails and nice people win in the end.

With that in mind, our film makers give full chance to the villains and vamps, say for more than 2 hours in a film lasting for around 3 hours and in the end, they find a way to declare the hero and the heroine victorious.

This has been the aim of most of the story writers to give such a clear and loud teaching that in the end the good natured and God-fearing people win, though during most part of the movie, these are the villains and vamps who enjoy a lot. In our education system also we have a regular question- ‘What is the moral of the story?’

For last more than a month I have been watching a Serial ‘Chakravorty Samrat Ashok’. In this serial also, which is based on historical inputs, we find that all the characters from the Royal family, except Ashoka and his mother Dharma are always busy in conspiracies, and they are most powerful. Not only that they always weave stories to prove before King Bindusara that Ashoka was wrong and they were right. Though I felt that had there been recording facilities, close circuit cameras etc. during that period, most of these conspiracies could have been exposed.

Anyway, I just want to mention that till recent time it was considered necessary to write stories with some teaching, to spread moral values and to assure the readers that in the end truth prevails.

Great Hindi novelist and story writer- Munshi Prem Chand ji also wrote most of his initial stories and novels in that style. But later he felt that we should portray things the way these are happening in real. With that in mind he wrote his famous Novels- Gaban, Godaan etc. In Godaan the priests keep making the hero spend on various things to get peace in life but in the end he could not provide a cow, as Godan for ‘climbing the stairs to heaven’.

A story by Prem Chand Ji- “Poos ki Raat’ also comes to my mind in which the poor farmer keeps a watch on his fields during very cold nights of ‘Poos’ month, until he maintains the hope that he can save his crops. Prem Chand Ji also mentions in this story ‘Hope is the mother of zest’, meaning that as long we have hope to achieve something, we keep making our efforts with sincerity. In this story the farmer finally finds that whatever he may do, he would not be able to get his crops, then he leaves everything to God and his fate and goes to sleep, away from his field and the chilling cold.

So, this is the time that literature is becoming more realistic and there is not excessive morality and teaching tendency. So, after reading every story, we need not look for a moral in it, but try to be more aware, so that we are able to face all kinds of situations.

This is my humble submission on the #IndiSpire prompt- Do you look for a moral in every story? Share any story. #StoryTime

Thanks for reading.



मेरे अपने, मेरे होने की निशानी माँगें!

आज मैं 1991 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘डैडी’ का एक बहुत भावपूर्ण गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| यह गीत लिखा है सूरज सनीम जी ने और इसके लिए संगीत दिया है राजेश रोशन जी ने| इस गीत को ज़नाब तलत अज़ीज़ जी ने बहुत भावपूर्ण तरीके से निभाया है|

इस फिल्म में अनुपम खेर जी ने एक गायक की भूमिका का निर्वाह बड़े प्रभावी ढंग से किया है, जो अपनी शराब की लत के कारण बर्बाद हो जाता है| इस गायक की लाड़ली बेटी की भूमिका पूजा भट्ट ने निभाई थी|

लीजिए प्रस्तुत है यह मार्मिक गीत –

आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत माँगे,
मेरे अपने मेरे होने की निशानी माँगें,
आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत माँगे|

मैं भटकता ही रहा दर्द के वीराने में,
वक्त लिखता रहा चेहरे पे हर-एक पल का हिसाब|
मेरी शोहरत मेरी दीवानगी की नज़्र हुई,
पी गई मय की ये बोतल मेरे गीतों के किताब|

आज लौटा हूँ तो हँसने की अदा भूल गया,
ये शहर भूला मुझे, मैं भी इसे भूल गया|

मेरे अपने मेरे होने की निशानी माँगें,
आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत माँगे|

मेरा फ़न फिर मुझे बाज़ार में ले आया है,
ये वो शै है कि जहाँ मेहर-ओ-वफ़ा बिकते हैं,
बाप बिकते हैं यहाँ लख्त-ए-जिगर बिकते हैं,
कोख बिकती है, दिल बिकते हैं, सर बिकते हैं|
इस बदलती हुई दुनिया का खुदा कोई नहीं
सस्ते दामो में हर रोज खुदा बिकते हैं |
बिकते हैं, बिकते हैं |

मेरे अपने मेरे होने के निशानी माँगें|
आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत माँगे|

हर खरीदार को बाज़ार में बिकता पाया,
हम क्या पाएँगे किसी ने है यहाँ क्या पाया|
मेरे एहसास मेरे फूल कहीं और चलें,
बोल पूजा मेरी बच्ची कहीं और चलें,
और चलें, और चलें|

आज के लिए इतना ही,



कौन है यह – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Who Is This’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

कौन है यह

मैं अकेला ही निकला था, इस गुप्त भेंट के अपने मार्ग पर,
परंतु कौन है यह, जो इस शांत अंधेरे में मेरे पीछे-पीछे चला है?

मैं एक तरफ खिसक जाता हूं उसकी उपस्थिति से बचने के लिए, परंतु उससे बचने में सफल नहीं होता|

वह अपनी अकड़ भरी चाल के कारण धूल उड़ाता चलता है;
मैं जो भी शब्द बोलता हूँ, उसमें वह अपना भारी स्वर जोड़ देता है|

वह मेरा ही अपना लघु अहं है, मेरे प्रभु, उसे बिलकुल शर्म नहीं आती;
परंतु मैं शर्मिंदा हूँ, कि मैं आपके द्वार पर, उसको साथ लेकर आया|

-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार पर मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Who Is This

I came out alone on my way to my tryst.
But who is this that follows me in the silent dark?

I move aside to avoid his presence but I escape him not.

He makes the dust rise from the earth with his swagger;
he adds his loud voice to every word that I utter.

He is my own little self, my lord, he knows no shame;
but I am ashamed to come to thy door in his company.

-Rabindranath Tagore

आज के लिए इतना ही,