77. शैतान की फसल

एक समस्या जिससे हमारा देश बहुत लंबे समय से जूझ रहा है और आज वह विश्वव्यापी समस्या बन गई है, वह है आतंकवाद की समस्या।

आज पूरी दुनिया के देश तरक्की करने के रास्ते खोज रहे हैं, एक स्वस्थ प्रतियोगिता हो रही है दुनिया के देशों के बीच में, वहाँ की शासन व्यवस्था चाहे किसी भी प्रकार की हो। संयुक्त राष्ट्र संघ और अनेक अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर राष्ट्राध्यक्ष मिलकर इस बारे में विचार करते हैं कि किस प्रकार आपसी सहयोग के साथ प्रगति की नई ऊंचाइयों को छुआ जाए। लेकिन यह शैतान, सभी योजनाओं में पलीता लगा देता है। 

कुछ देशों के बीच सीमा-विवाद रहता है, हमारे देश को भी दुर्भाग्य से ऐसे पड़ौसी मिले हैं कि हमेशा कोई न कोई विवाद बना रहता है और जो राशि हमें देश की प्रगति पर खर्च करनी चाहिए, उसका एक बड़ा हिस्सा रक्षा तैयारियों पर करना हमारी मजबूरी बन गई है।

इतना ही नहीं, लंबे समय से हम आतंकवाद के, एक ऐसे शत्रु से लड़ाई लड़ रहे हैं, जिसका पता नहीं होता कि वह कहाँ छिपा बैठा है और कब, कहाँ हमला करेगा। यह शत्रु नैतिकता के किसी प्रकार के नियमों का भी पालन नहीं करता, निहत्थे नागरिकों की हत्या करने में, ट्रेन में या बाजार में ब्लास्ट करने में भी इसको कोई संकोच नहीं होता।

इस प्रकार की परिस्थितियों का हम लंबे समय से सामना करते रहे हैं, आज अमरीका, ब्रिटेन आदि बड़े देशों को भी इसका सामना करना पड़ रहा है। अभी कल ही ब्रिटेन में अंडरग्राउंड ट्रेन में बड़ा हादसा हुआ है।

जो लोग ऐसा काम करते हैं, वे इंसान कहलाने के लायक तो नहीं हैं, मैं नहीं समझ पाता कि ऐसा कौन से दर्शन है जो इन नीच लोगों को ऐसे काम करने के लिए प्रेरित करता है।

समय की मांग है कि दुनिया की सभी ताकतें मिलकर आतंकवाद के इस राक्षस का जड़ से सफाया करने के लिए सम्मिलित प्रयास करें और हमारी यह दुनिया- हर देश, प्रदेश, धर्म और जाति के लोगों के खुशहाली के साथ आगे बढ़ने के लिए जानी जाए।

आतंकवाद का यह दुश्मन छिपा हुआ है, इसलिए और अधिक जागरूकता के साथ दुनिया के सभी प्रगतिशील देशों को, इस बुराई को जड़ से समाप्त करने के लिए भरसक प्रयास करना होगा।

हमारी शुभकामना है आतंकवाद की समाप्ति में हम सफल हों और जल्द ही ऐसा दिन आए कि हम इस बुराई से पूरी तरह मुक्त हो जाएं।  

आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।

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Journey called life

When we talk about life, may be we can put forward our experiences with several adjectives, kinds of impressions, we are happy at times when we achieve desired results, we also get depressed, demotivated at times when our sincere efforts do not yield desired results.

Whatever may be the case, one thing we can all agree about is that the path, the journey of life is not a rose walk, it is rather quite difficult, quite thorny,

We need to polish our efforts, re-design our plans at times, to be successful at various tedious points in the journey of life. Sometimes it is not our life conditions but the behavior of our fellow beings which makes our path more difficult. They are also part of our environment, we need to always be ready to face the challenges in life, even if we are not ready, we would have to face them, then why be caught unprepared. Sometimes our life may be smooth sailing but at some other times we have to face difficult phases, pass through uneven, hilly terrains, that is what life is.

That is why it is said ‘ hope for the best and be prepared for the worst’. Life demands that one should always be ready and well prepared to pass through thorny conditions, environment and terrains.

Wish you all the best for the journey called life.

via Daily Prompt: Thorny

76. प्रद्युम्न के बहाने

कुछ मामलों पर चर्चा करने की एकाएक हिम्मत नहीं होती। सात वर्ष का बच्चा प्रद्युम्न, एक प्रतिष्ठित स्कूल का नन्हा छात्र, सुबह उसके पिता उसको स्कूल छोड़कर आए और कुछ देर में ही खबर मिली कि उसकी हत्या हो गई।

हत्या हुई एक प्रतिष्ठित स्कूल के बाथरूम में, सुबह स्कूल पहुंचते ही, हत्या का इल्ज़ाम एक बस कंडक्टर पर, जो बाथरूम से उस रक्त रंजित बच्चे को बाहर लेकर आया, जिसकी गर्दन को चाकू से, बेरहमी के साथ काटा गया था। बस कंडक्टर यह स्वीकार कर रहा है कि उसने ही हत्या की है लेकिन विश्वास नहीं होता। विश्वास नहीं होता कि कोई भी उस मासूम की हत्या करेगा, क्या दुश्मनी हो सकती है किसी की उस मासूम के साथ!

लेकिन हत्या तो हुई है, वह भी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में, एक प्रतिष्ठित स्कूल में, जहाँ की फीस बहुत ऊंची होती है, जहाँ प्रबंधन पैसे वसूलने के नए-नए तरीके तलाशता रहता है। अब जबकि ऐसी अशोभनीय घटना घट गई है, उस स्कूल में तो लोगों को हर तरह की शिकायतें करने का एक मौका भी मिल गया है।

यह भी सही है कि इस प्रकार की घटनाएं हिंदुस्तान में कहीं न कहीं हर रोज़ होती हैं, लेकिन क्योंकि यह घटना राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में और एक प्रतिष्ठित स्कूल में हुई है, जहाँ मीडिया को आने-जाने में सुविधा रहती है, तो इस पर चर्चा भी खूब हो रही है। पत्रकार लोग स्कूल की बाउंड्री कितनी जगह से टूटी है यह देख रहे हैं और शराब का ठेका कितने कदम दूर है, यह माप रहे हैं। वैसे भारत में तो बहुत सारे स्कूल ऐसे हैं जिनकी बाउंड्री ही नहीं है।

मासूम प्रद्युम्न की मौत वास्तव में दिल पर चोट करती है और इस बहाने अगर हम अधिक जागरूक हो जाएं, ऐसे कदम उठाए जाएं जिनसे ऐसी घटनाएं न हो सकें तो बहुत अच्छा होगा। लेकिन हम सिस्टम में ऐसी कमियां जान-बूझकर छोड़ देते हैं शायद। जैसे कि यह अक्सर होता है कि सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं, लेकिन जब ऐसी कोई घटना हो जाती है, तब मालूम होता है कि कैमरे काम नहीं कर रहे हैं। सामान्य परिस्थितियों में इन व्यवस्थाओं का ऑडिट क्यों नहीं होता!

एक खबर इस बीच आई थी कि दिल्ली के एक स्कूल ने अपने डांस टीचर को नौकरी से हटा दिया और उसके विरुद्ध पुलिस में शिकायत भी की कि वह डांस छात्राओं के साथ गलत व्यवहार करता है! क्या आपको लगता है कि इस मामले में अचानक स्कूल प्रबंधक की आत्मा जाग गई। ऐसा केवल इसलिए हुआ कि प्रद्युम्न की हत्या के बाद जो एक जन-आंदोलन जैसा हुआ, उसमें उस स्कूल के लोगों को लगा कि यह जो गतिविधि वहाँ चल रही है, जिसकी जानकारी निश्चित रूप से उस स्कूल के कुछ लोगों को पहले से थी, वह अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

आज जो वातावरण इस घटना के बाद बना है, इसमें अच्छा होगा कि ऐसी गतिविधियां जो स्कूलों में अथवा किसी भी संस्थान में, कुछ लोगों की जानकारी में चलती रहती हैं, उनको बर्दाश्त न किया जाए और उसको समय रहते समाप्त किया जाए। सीसीटीवी जैसी, जो भी निगरानी  सुविधाएं जहाँ मौज़ूद हैं उनका पूरी क्षमता के साथ इस्तेमाल किया जाए और सबसे बड़ी बात तो यह है कि जो अपराधी है उनको समय पर और अधिकतम संभव दंड मिले जिससे और लोगों की ऐसा करने की हिम्मत न हो।  

आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।

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75.जो हुआ ही नहीं अखबार में आ जाएगा!

ज़नाब राहत इंदौरी का एक शेर याद आ रहा है जो उन्होंने कुछ समय पहले ‘द कपिल शर्मा शो’ में  पढ़ा था-

बनके इक हादसा, किरदार में आ जाएगा

जो हुआ ही नहीं, अखबार में आ जाएगा।

अब खबरों की दुनिया की क्या बात करें। आज बड़े-बड़े चैनलों पर जो पत्रकार, एंकर काम कर रहे हैं उनकी शक्ल देखने से पहले उनका चश्मा दिखाई देता है, कौन सी घटना इनके लिए महत्वपूर्ण होगी कौन सी नहीं, ये इनका प्रोग्राम देखने वाला कोई भी व्यक्ति बता सकता है, यहाँ तक कौन सी लाश पर ये देर तक बीन बजाएंगे और कौन सी हत्या या हत्याएं इनके लिए महत्वपूर्ण नहीं है! इतना ही नहीं, मोदी जी और राहुल बाबा की तरह इनके भी फैन हैं, जो इनके द्वारा किसी खबर को महत्व दिए जाने और किसी को नकारे जाने के मामले में पूरी तरह साथ रहते हैं। इस मामले में यह भी शामिल है कि कहाँ घटना हो तो वहाँ का मुख्यमंत्री ज़िम्मेदार है और कहाँ उस गरीब की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है।

खैर, ये तो मैंने बात शुरू करने के लिए कह दिया, मैं यात्रा करना चाहता हूँ पुराने दिनों में, जब हमने नगर संवाददाताओं, पत्रकारों, छोटे-छोटे अखबार छापने वालों को शुरू-शुरू में जाना था।

शाहदरा की बात है, शायद सत्तर के दशक की, वहाँ मैं कवि-गोष्ठियां आदि सुनने के लिए जाता था, वहाँ मालूम होता था कि किसी राष्ट्रीय समाचार पत्र के नगर संवाददाता थे, उनका काम खबरें एकत्रित करना नहीं था, बल्कि ये था कि किस खबर को अखबार में जाने दिया जाए और किसको रोक दिया जाए। अक्सर आयोजक लोग कवि गोष्ठी की खबर छपवाने के लिए उनसे गुहार लगाते थे। बाद में तो इस प्रकार के आयोजनों और उनकी रिपोर्ट छपवाने की गतिविधियां मैंने स्वयं काफी कीं, जन संपर्क का काम देखा तो पत्रकारों को मित्र बनाया और कंपनी से जुड़ी बहुत सी खबरें, रिपोर्टें उनके माध्यम से छपवाईं।

आगे बढ़ने से पहले एक पत्रकार मित्र की बात बताऊं जो आगरा में एक छोटा सा अखबार छापते थे। उनके हाथ कुछ यशकामी लोग लग जाते थे या वे उनको ऐसा बना देते थे। जैसे एक कल्लू टाल वाले थे, जो लकड़ियों की एक बड़ी सी टाल चलाते थे। कमाई ठीक-ठाक थी उनकी, वे उनसे मिलते और बोलते कि देखो कल तुम मर जाओगे, लोग तुमको किस नाम से जानेंगे, ‘कल्लू टाल वाला’, तुम्हारे नाम से कुछ छाप देता हूँ अखबार में, नाम हो जाएगा। और अगर वो नहीं मानता तो ये भी बताते कि तुम्हारे खिलाफ कुछ लिख दूंगा, फिर सफाई देते फिरना। इस प्रकार वो कल्लू टालवाला चक्कर में आ जाता था और उनको कुछ दाना-पानी दे देता था।

वैसे कल्लू टालवाले के बहाने मुझे कुछ फिल्मी पात्र भी याद आ गए, एक तो ‘चमेली की शादी’ में थे ‘हैं जी’, जो ख्याति पाने के लिए राजनीति में उतरना चाहते थे और एक बेचारे थे मुकरी, जिनके छोटे से शरीर पर ‘अइयो बल्ली प्यार का दुश्मन, हाय-हाय’ जैसी लानत लगी थी!

खैर फिर से वास्तविक दुनिया के पत्रकारों पर आते हैं, देश के कुछ सुदूर स्थानों पर छोटे-छोटे अखबार छापकर ब्लैकमेल करने का धंधा भी काफी चलता रहा है, शायद आज भी कुछ स्थानों पर चलता हो। जब मैं एनटीपीसी, विंध्यनगर में था, जो मध्य प्रदेश के सीधी जिले में स्थित है, जहाँ कुंवर अर्जुन सिंह जी ने ‘चुरहट लॉटरी कांड’ को अंजाम देकर, उस क्षेत्र को ख्याति दिलाई थी।

हाँ तो इस परियोजना जब मैं था, तब वहाँ सीधी के एक सज्जन थे, जो पत्रकार कहलाते थे, वे चार पन्नों का एक अनियतकालीन अखबार निकालते थे-‘विंध्य टाइगर’। कंपनी के गेस्ट हाउस में उनको आते ही कमरा मिल जाता था, साथ में खाना और दारू भी, क्योंकि गेस्ट हाउस चलाने वाले ठेकेदार को अपनी खैरियत की चिंता थी। एनटीपीसी तो वैसे भी इलाके के बदमाश लोगों के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी थी। तो ये पत्रकार महोदय आकर ठेकेदारों से वसूली करते, धमकी देते और जिसके साथ इनकी पिछली बार पैसे को लेकर बात नहीं बनी थी, उसके खिलाफ छापकर लाया हुआ चार पृष्ठ का (छोटे आकार का) अखबार कॉलोनी और दफ्तर में अनेक स्थानों पर चिपका देते।

ऐसे लोगों को  ब्लैकमेल करने के लिए तो लोग मिल ही जाते हैं। जैसे मुझे याद आ रहा है कि वहाँ नगर प्रशासन विभाग के प्रधान एक बार बने श्री रघुरमन, उनके समय में यह हुआ कि सड़कों आदि की जीवन अवधि अचानक काफी कम हो गई। इसको हमने इस रूप में जाना कि जिस प्रकार पौधों में जीवन प्रमाणित करने वाला परीक्षण ‘रमन इफेक्ट’ कहलाता है, वैसे ही सड़कों की आयु कम करने वाला परीक्षण ‘रघुरमन इफेक्ट’ है।

क्षमा करें, यह नाम अचानक याद आ गया, बहुत पुरानी बात है और ये सज्जन इंचार्ज थे, मैं कोई दोष उनको नहीं दे रहा हूँ, बस अपनी बात कहने का माध्यम उनको बना लिया, ये कोई और ‘इफेक्ट’ भी हो सकता है।

इस प्रकार एक-दो पत्रकारों के माध्यम से, जो याद आया कि छोटे स्थानों पर जो एक विशेष प्रकार की पत्रकारिता होती  थी, शायद आज भी होती हो, उसकी एक बानगी प्रस्तुत की है।

आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।

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74. बोल मेरी मछली कितना पानी!

बरसात का मौसम अपने हिस्से की तबाही मचाकर जाने वाला है, अब गरीबों को सर्दी का सामना करना होगा। क्योंकि हर मौसम की मार, गरीबों को ही तो वास्तव में सहनी पड़ती है। अमीर अथवा मध्यम वर्ग तो अपने परिधानों अथवा अनुकूलन की सुविधाओं से अपने को बचा लेते हैं, वो रूम हीटर हों अथवा कूलर, एयर कंडीशनर।

मैं तो क्योंकि अब गोआ में हूँ, इसलिए दिल्ली की सर्दी और दिल्ली की गर्मी तो अब याद करने वाली बात हो गई, हाँ यहाँ बारिश दिल्ली से ज्यादा होती है।

जबकि बारिश बीतने चली है, एक खेल याद आ रहा है, जिसे खेलते हुए, हम बचपन में गाया करते ‘हरा समुंदर, गोपी चंदर, बोल मेरी मछली कितना पानी’! ये गीत अब के बच्चे तो शायद कम ही गाते होंगे, हम लोग दिल्ली, यू.पी. के इलाके में इसे गाते थे, जहाँ समुंदर आसपास नहीं था।

एक बार पहले भी मैंने इस विषय में चर्चा की है कि जहाँ, हमारे देश में वर्षा इतनी तबाही मचाती है, वहीं ‘वाटर टेबल’ लगातार नीचे जा रहा है, कुएं सूख रहे हैं, क्योंकि बस्तियां बसाने के लिए तालाबों को समाप्त कर दिया जाता है और जल संरक्षण के कोई प्रभावी उपाय नहीं किए जाते हैं। इस दिशा में सरकारों, नागरिक संगठनों और गंभीरता से काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) द्वारा कदम उठाए जाने की आवश्यकता है, क्योंकि इसकी उम्मीद आप बिल्डरों से नहीं कर सकते।

पानी पर्याप्त मात्रा में जमीन के नीचे इकट्ठा होता रहे, यह आज की बहुत गंभीर आवश्यकता है, इसके लिए जो भी कदम उठाने हों, ऐसे पेड़ लगाना जो जल संरक्षण, वर्षा में सहायक हों, जो भी आवश्यक है किया जाए जिससे आने वाली पीढ़ियां हमारी लापरवाही को दोष न दें। प्रकृति में पानी की कमी नहीं है, उसके संरक्षण, बेहतर प्रबंधन की आवश्यकता है, जिससे हमारी खुशियों पर पानी चढ़े, पानी फिर न जाए।

कहीं आने वाले समय में यही गूंज न सुनाई दे- ‘बोल मेरी मछली, कितना पानी’।

अंत में ये पंक्तियां याद आ रही हैं-

इस दुनिया में जीने वाले, ऐसे भी हैं जीते

रूखी-सूखी खाते हैं और ठंडा पानी पीते,

भूखे की भूख और प्यास जैसा।

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा।

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वैसे तो हर रंग में तेरा जलवा रंग जमाए

जब तू फिरे उम्मीदों पर तेरा रंग समझ न आए।

कली खिले तो झट आ जाए पतझड़ का पैगाम,

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा।

नमस्कार।

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73. चंचल, शीतल, निर्मल, कोमल संगीत की देवी स्वर-सजनी!

ज़िंदगी सिर्फ मोहब्बत नहीं कुछ और भी है,

ज़ुल्फ-ओ-रुखसार की जन्नत नहीं कुछ और भी है,

भूख और प्यास की मारी हुई इस दुनिया में

इश्क़ ही एक हक़ीकत नहीं, कुछ और भी है।

तुम अगर नाज़ उठाओ तो, ये हक़ है तुमको

मैंने तुमसे ही नहीं, सबसे मोहब्बत की है।

आज हक़ीकत और कल्पना पर आधारित कुछ फिल्मी गीतों के बारे में बात करते हैं। ऊपर जिस गीत के बोल लिखे गए हैं, वह हक़ीकत के बोझ से दबे, ज़िम्मेदार शायर के बोल हैं, जो देखता है कि दुनिया में इतने दुख हैं, ऐसे में कैसे किसी एक के प्यार में पागल हुआ जाए।

अब कल्पना की धुर उड़ान के बारे में बात कर ली जाए, जहाँ प्रेमी अपने तसव्वुर में इतना पागल है कि सामने जो हक़ीकत है उसको स्वीकार नहीं कर पाता और देखें उसकी कल्पना की उड़ान कितनी दूर तक जाती है-

चंचल, शीतल, निर्मल, कोमल, संगीत की देवी स्वर-सजनी,

सुंदरता की हर मूरत से, बढ़कर के है तू सुंदर सजनी।

दीवानगी का एक और आलम ये भी है-

ये तो कहो कौन हो तुम, कौन हो तुम,

हमसे पूछे बिना दिल में आने लगे,

नीची नज़रों से बिजली गिराने लगे।

एक और मिसाल-

मेहताब तेरा चेहरा, एक ख्वाब में देखा था,

ऐ जान-ए-जहाँ बतला,

बतला कि तू कौन है।

और जवाब-

ख्वाबों में मिले अक्सर,

एक राह चले मिलकर,

फिर भी है यही बेहतर-  

मत पूछ मैं कौन हूँ।

और इसके बाद फिर हक़ीकत की पथरीली ज़मीन पर आते हैं-

देख उनको जो यहाँ सोते हैं फुटपाथों पर,

लाश भी जिनकी कफन तक न यहाँ पाती है,

पहले उन सबके लिए, एक इमारत गढ़ लूं,

फिर तेरी मांग सितारों से भरी जाएगी।

आज के लिए इतना ही!

नमस्कार।

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72. सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला!

इंटरनेट पर ज्ञान देने वाले तो भरे पड़े हैं,  मैं तो अज्ञान का ही पक्षधर हूँ। जो व्यक्ति आज भी दिमाग के स्थान पर दिल पर अधिकतम भरोसा करते हैं, उनमें कवि-शायर काफी बड़ी संख्या में आते हैं। वहाँ भी सभी ऐसे हों, ऐसा नहीं है।

आज मन हो रहा है निदा फाज़ली साहब की शायरी के बारे में कुछ बात करूं। इस इंसान ने कितना अच्छा लिखा है, देख-सुनकर आश्चर्य होता है, पूरी तरह ज़मीन से जुड़े हुए व्यक्ति थे निदा फाज़ली साहब। अपने दोहों में ही उन्होंने आत्मानुभूति का वो अमृत उंडेला है कि सुनकर मन तृप्त हो जाता है।शुरू में तो उसी गज़ल के अमर शेर प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिससे शीर्षक लिया है-

गरज-बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला,

चिड़ियों को दाने, बच्चों को, गुड़धानी दे मौला।

फिर मूरत से बाहर आकर, चारों ओर बिखर जा,

फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला।

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है,

सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला।

और कितनी सादगी से कितनी बड़ी बात कहते हैं, कुछ गज़लों से कुछ शेर यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ-

उसको रुखसत तो किया था, मुझे मालूम न था,

सारा घर ले गया, घर छोड़ के जाने वाला।

एक मुसाफिर के सफर जैसी है सबकी दुनिया,

कोई जल्दी तो कोई देर में जाने वाला।

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अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफर के हम हैं,

रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं।

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घर से मस्ज़िद है बहुत दूर चलो यूं कर लें,

किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए।

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बच्चों के छोटे हाथों को, चांद सितारे छूने दो,

चार किताबें पढ़कर ये भी, हम जैसे हो जाएंगे।

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दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है,

मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है।

बरसात का बादल तो, दीवाना है क्या जाने,

किस राह से बचना है, किस छत को भिगोना है।

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वृंदाबन के कृष्ण कन्हैया अल्ला हू,

बंसी, राधा, गीता, गैया अल्ला हू।

एक ही दरिया नीला, पीला, लाल, हरा,

अपनी अपनी सबकी नैया अल्ला हू।

मौलवियों का सज़दा, पंडित की पूजा,

मज़दूरों की हैया हैया, अल्ला हू।

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दुनिया न जीत पाओ तो हारो न खुद को तुम,

थोड़ी बहुत तो ज़ेहन में नाराज़गी रहे।

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हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी,

जिसको भी देखना हो, कई बार देखना।

मुझको निदा जी के जो शेर बहुत अच्छे लगते हैं, उन सभी को लिखना चाहूं तो दस-बीस ब्लॉग तो उसमें निकल जाएंगे, मैंने कुछ गज़लों से एक- या दो शेर लिखे हैं, लेकिन उनमें से कोई शेर भी छोडने योग्य नहीं है।

अंत में उनके कुछ दोहे, जिनमें बड़ी सादगी से गहरा दर्शन प्रस्तुत किया गया है-

मैं रोया परदेस में, भीगा मां का प्यार,

दुख ने दुख से बात की, बिन चिट्ठी, बिन तार।

छोटा करके देखिए जीवन का विस्तार,

आंखों भर आकाश है, बांहों भर संसार।

सबकी पूजा एक सी, अलग अलग हर रीत,

मस्ज़िद जाए मौलवी, कोयल गाए गीत।

सपना झरना नींद का, जागी आंखें प्यास,

पाना, खोना, खोजना, सांसों का इतिहास।

मैंने कुछ शेर यहाँ दिए, क्योंकि यहाँ लिखने की कुछ सीमाएं हैं। इन कुछ उद्धरणों के माध्यम से मैं उस महान शायर को याद करता हूँ, जिसने हिंदुस्तानी शायरी में अपना अनमोल योगदान किया है।

नमस्कार।

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Daily Prompt: Educate- Keep learning

we all need education and our being educated must reflect in our behavior .

When we talk about education, we mostly mean formal education, which starts with the play schools now a days for children and can continue as long as a person wants to learn more skills or virtues, as a part of formal education. Otherwise non-formal education continues throughout our life, we keep educating others and also getting educated our self at the same time, through all our activities.

We need to adopt the learning culture, get the right inspiration and in a way education from every achievement or failure we come across in life.

We have learnt about personalities who failed almost at every step in their life, until one day the world found them sitting at the top, because they never accepted defeat and learnt from every failure.

There are Teachers or Gurus who  teach others but the real teachers are those, who constantly keep teaching themselves. As one said after failing ten times that he had eliminated ten wrong ways of doing that, so now he was ten steps nearer to his point of success.

Education or learning needs two basic things- one is a strong desire to  acquire knowledge and the second is faith. Faith in oneself that he can achieve the goals.

Let’s all be educated to the extent possible and make our utmost contribution to the progress and well being of humanity.

 

via Daily Prompt: Educate

71. इतना तो मेरे यार करो मैं नशे में हूँ!

जगजीत सिंह जी की गाई, शायर शहीद कबीर की इस गज़ल के बहाने आज बात शुरू करेंगे-

ठुकराओ अब कि प्यार करो, मैं नशे में हूँ

जो चाहो मेरे यार करो, मैं नशे में हूँ।

गिरने दो तुम मुझे, मेरा सागर संभाल लो,

इतना तो मेरे यार करो, मैं नशे में हूँ।

अब भी दिला रहा हूँ, यक़ीन-ए-वफा मगर,

मेरा न ऐतबार करो, मैं नशे में हूँ।

वैसे देखा जाए तो प्रेम करने के लिए होश में होना ज़रूरी नहीं है, इसलिए जो वफा का यक़ीन नशे में दिलाया जा रहा है, वह शायद ज्यादा कारगर हो, हाँ व्यापार करने के लिए होश में होना बहुत ज़रूरी है।

इसीलिए तो इस गज़ल में धर्म गुरुओं, उपदेशकों से यह भी कहा गया है-

मुझको कदम-कदम पे भटकने दो वाइज़ो

तुम अपना कारोबार करो, मैं नशे में हूँ।

एक और गज़ल में, यह भी कहा गया है-

होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज़ है,

इश्क़ कीजे, फिर समझिए, ज़िंदगी क्या चीज़ है।

और फिर इस दुनिया के नियमों के बारे में उस्ताद गुलाम अली जी ने क्या कहा है (मतलब गाया है)-

मयनोशी के आदाब से आगाह से, आगाह नहीं तू,

जिस तरह कहे साक़ी-ए-मैखाना पिए जा।

और फिर अकबर इलाहाबादी जी की, हंगामा बरपा वाली गज़ल में-

हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से,

हर सांस ये कहती है, हम हैं तो खुदा भी है।

नातज़ुर्बाकारी से, वाइज़ की ये बातें हैं,

इस रंग को क्या जाने, पूछो जो कभी पी है।

आखिर में मुकेश जी की टिप्पणी-

है ज़रा सी बात और छलके हैं कुछ प्याले,

पर न जाने क्या कहेंगे ये जहाँ वाले,

तुम बस इतना याद रखना

मैं नशे में हूँ।

वैसे नशे के बारे में ऐसी दलीलें देने के लिए तो शायद होश में रहना ज़रूरी है, और ये दलीलें कितनी लंबी चल सकती हैं, इसकी कोई सीमा नहीं है।

मैंने ऐसी कोई कसम भी तो नहीं खाई थी कि हमेशा होश की ही बात करुंगा।

नमस्कार।

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70. अस्पताल की टूटी टांग!

आज स्वास्थ्य और इस बहाने स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में बात करेंगे।

वैसे तो मुझे लगता है कि आज की तारीख में हिंदुस्तान में, और शायद दुनिया में, कोई बीमारी होनी ही नहीं चाहिए। अब लोग ‘फॉलो’ न करें तो अलग बात है वरना सोशल मीडिया पर, दुनिया में जितनी भी तक़लीफें या बीमारियां हैं, उनमें से प्रत्येक के लिए कम से कम दस इलाज तो सेवाभावी लोगों द्वारा दे दिए जाते हैं।

अब मैं अपनी सारी बीमारियों के बारे में तो चर्चा नहीं करूंगा, लेकिन एक बात है कि मेरा वज़न लगातार बढ़ता जा रहा है और शुगर की तकलीफ भी है, लेकिन मैं कितना अविश्वासी प्राणी हूँ कि हर दिन परोपकारी जीव, सोशल मीडिया पर ऐसे शर्तिया उपाय बताते हैं, जिनसे मोटापा तेज़ी से घटता है और आपका फैट, आइसक्रीम की तरह पिघल जाता है, शुगर जड़ से मिट जाती है, लेकिन मैंने शुरू में तो एक- दो उपाय आज़माए पर उसके बाद ऐसा करना बंद कर दिया। अब ऐसा थोड़े ही होता है, बाबा रामदेव भी कहते हैं कि करने से होगा! लेकिन दिक्कत ये है कि कंपीटीशन चल रहा है, इधर बीमारियां बढ़ रही हैं और उधर चौगुनी रफ्तार से, सोशल मीडिया पर उनके इलाज बढ़ रहे हैं।

सोशल मीडिया पर जो इलाज बताए जाते हैं, उनको अक्सर लोग बड़ी श्रद्धा से पढ़ते हैं, फिर बीमारियां और मोटापे जैसी सामान्य विकृतियां क्यों बढ़ती जा रही हैं।

बीमारी अपनी जगह है लेकिन मेरी डॉक्टरों और अस्पतालों में ज्यादा श्रद्धा नहीं रही है, जब मज़बूरी हो जाती है,  सामान्यतः तभी मैं अस्पताल जाता हूँ। इससे पहले मैं गुड़गांव में था, जहाँ मेदांता, आर्टिमिस,पारस, फोर्टिस आदि अंतर्राष्ट्रीय स्तर के माने जाने वाले अस्पताल हैं, वहाँ डॉक्टरों की संख्या भी अच्छी खासी है, लेकिन उनके पास फुर्सत नहीं होती, लंबे इंतज़ार के बाद जब मरीज़ का नंबर आता है, तब वरिष्ठ चिकित्सक उससे कहते हैं कि वह जल्दी से अपनी तकलीफ बताए, जिससे वे यह तय कर सकें कि इसके कौन-कौन से टेस्ट किए जा सकते हैं, वरिष्ठ चिकित्सक महोदय के आस-पास कुछ शिष्य-शिष्याएं भी अक्सर बैठे रहते हैं, जिनको वे समझाते हैं कि रोगी को किस प्रकार टहलाना है।

अक्सर यह भी होता है कि पहले दौर के परीक्षणों के बाद उनको याद आता है कि कुछ और टेस्ट कराए जा सकते हैं, विशेष रूप से यदि उनको पता हो कि मरीज़ के इलाज का खर्च कोई माली कंपनी अथवा हेल्थ इंश्योरेंस वाले देखते हैं। मुझे याद है कि मैंने दो-तीन वर्ष पहले अपनी  आंखों का केटेरेक्ट का ऑपरेशन, गुड़गांव के एक नेत्र-चिकित्सक से अपोलो में कराया, क्योंकि उन चिकित्सक के यहाँ ऑपरेशन कराने पर मेरी कंपनी पैसा नहीं देती। नतीज़ा यह हुआ कि प्रत्येक आंख के लिए जो ऑपरेशन 35-40 हजार में होना था, उसका खर्च एक लाख से ऊपर आया।

मैं यह बात जिस कारण से कर रहा हूँ, वह ये है कि गोआ आने के बाद मैंने यहाँ के एक अस्पताल में डॉक्टर को दिखाया, मुझे लगा कि यहाँ के चिकित्सक के पास मरीज़ की बातें ध्यान से सुनने के लिए समय था, यहाँ जो टेस्ट उन्होंने कराए वे महंगे भी नहीं थे और प्रासंगिक भी लगे और मुझे लगा कि उनके माध्यम से चिकित्सक महोदय सही निष्कर्ष पर पहुंच पाए।

अब यह भी है कि नई जगह पर शुरू में सब कुछ अच्छा लगता है, लेकिन यहाँ पर वह मैट्रो नहीं है, बाहर जाने के लिए उस तरह के साधन नहीं हैं, हालांकि जाने के लिए ‘बीच’ बहुत सारी हैं, जहाँ दुनिया भर से लोग आते हैं, लेकिन अगर आप स्वयं वाहन नहीं चलाते हैं तो ऑटो-टैक्सी आदि मिलना वैसे तो रिहायशी इलाकों में मुश्किल है और फिर मिलने पर वह कितना पैसा मांग ले, इसकी कोई सीमा नहीं है।

खैर आज स्वास्थ्य, उसके लिए सोशल मीडिया पर मिलने वाले नुस्खों और स्वास्थ्य सेवाओं के संबंध में हल्की-फुल्की चर्चा करनी थी, सो मुझे लगता है, फिलहाल के लिए काफी हो गई।

अब शीर्षक के बारे में ज्यादा मत सोचिए, ओम प्रकाश आदित्य जी की एक कविता का शीर्षक था यह, सो मैंने भी ‘टीप’ लिया।

नमस्कार।

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