80. एक सपने का अंत

डॉ. कुंवर बेचैन की लिखी  पंक्तियां हैं-

विरहिन की मांग सितारे नहीं संजो  सकते

प्रेम के सूत्र नज़ारे नहीं पिरो सकते,

मेरी कुटिया से ये माना कि महल ऊंचे हैं

मेरे सपनों से मगर ऊंचे नहीं हो सकते।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जी ने भी ऊंचे सपने देखने का महत्व बताया है, लेकिन सच्चाई है कि दुनिया छोटी सोच वालों से भरी पड़ी है,  वे अगर आपको बड़ी सोच वाला कोई काम करते हुए भी देखेंगे तो अचंभा करेंगे, सावधान करेंगे और चेतावनी भी दे सकते हैं।

यह सब अचानक याद आया जब सुना कि ‘आरके स्टूडिओ’ पूरी तरह जलकर खाक हो गया है और उसके साथ ही राजकपूर के सपनों की ताबीर पूरी तरह समाप्त हो गई है, किस तरह राज कपूर ने, जो एक बड़े कलाकार बाप के बेटे थे, अच्छे अभिनेता थे, अपनी होम प्रोडक्शन यूनिट प्रारंभ की और उसमें एक-एक कड़ी जोड़ते गए।

हर फिल्म कामयाब तो नहीं होती, बीच-बीच में कंगाली की नौबत भी आई, खास तौर पर जब एक बहुत बड़ा सपना देखा था राजकपूर ने, जिसका नाम था-‘मेरा नाम जोकर’, इस फिल्म की असफलता भी उतनी ही बड़ी थी, और फिर राजकपूर ने बताया कि वो जनता की नब्ज़ जानते हैं और उंन्होंने ‘बॉबी’ बनाई और कहा कि इसको ‘फेल’ करके दिखाओ, जैसा कि हम जानते हैं इस फिल्म ने रिकॉर्ड तोड़ सफलता प्राप्त की थी। बड़े सपनों कडी‌ में संगम भी सेल्युलॉइड पर एक बहुत सुंदर कविता थी। इस फिल्म के एक गीत की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

सुनते हैं प्यार की दुनिया में, दो दिल मुश्किल से समाते हैं

क्या गैर यहाँ अपनों तक के, साये भी न आने पाते हैं,

हमने आखिर क्या देख लिया, क्या बात है क्यों हैरान हैं हम,

इक दिल के दो अरमान हैं हम।

ऐ मेरे सनम, ऐ मेरे सनम।

बड़े सपनों के नाम से मुझे भारतीय फिल्म जगत का सबसे बड़ा शो-मैन राजकपूर ही याद आता है, जिसके सपनों की एक महान धरोहर- आरके स्टूडियो अब जलकर नष्ट हो गया है।

एक घटना और याद आ रही है, जो पढ़ी थी। ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ की शूटिंग जिस सेट पर हो रही थी, नदी का स्थल था, वहाँ अचानक बाढ़ आ गई, पूरा सेट तहस-नहस हो रहा था, राजकपूर ने एक क्षण के लिए तो माथा पकड़ लिया, फिर कहा- ‘शूट’ और फिर वह सीन उसी रूप में फिल्म में आया, इसी को कहते हैं – ‘बाधाओं के ऊपर पैर रखकर आगे बढ़ जाना’ (मेक हर्डल्स योर स्टेपिंग स्टोंस).

आरके स्टूडिओ के नष्ट होने पर, बड़े सपनों के उस चितेरे और उसके शहीद हो चुके इस सपने को विनम्र श्रद्धांजलि।

नमस्कार।

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79. मत्स्य कन्या

अपने मित्र के दादाजी का सुनाया हुआ एक और किस्सा आपसे शेयर कर रहा हूँ, जैसा मैंने वादा किया था। इस किस्से में भी एक ऐसे जीव का उल्लेख है, जिसके बारे में हम सुनते तो हैं लेकिन हमने उसको देखा नहीं होता। यह घटना भी लगभग 100 वर्ष पुरानी है- मैं इसको घटना ही कहूँगा, आप चाहें तो कहानी मान सकते हैं। घटना का स्थान वही मुल्तान, जहाँ मेरे मित्र के दादाजी उस समय रहते थे।

हाँ तो मेरे मित्र के दादाजी को ये घटना उनके एक सरदार मित्र ने सुनाई थी। उस समय मेरे मित्र के दादाजी जवान थे और उनके ये सरदार मित्र भी जवान थे। इसके अलावा जैसा मैंने अपने मित्र से जाना, ये सरदार जी बहुत आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थे। कुल मिलाकर घटना छोटी सी है, मैं बिना बात इसमें मसाला डाल रहा हूँ।

ये सरदार जी एक ‘शिप’ या कहें कि बड़ी नाव पर यात्रा कर रहे थे, डेक पर खड़े हुए समुद्र का, नज़ारा देख रहे थे। इतने में इनकी निगाह एक मत्स्य कन्या पर पड़ी,  वह लगातार इनके शिप के पीछे तैरकर आ रही थी और सरदार जी की तरफ देखे जा रही थी। वह बीच-बीच में कुछ आवाज़ भी निकालती जा रही थी। जैसा मैंने कहा सरदार जी बहुत सुंदर थे और मत्स्य कन्या तो जैसा उसके बारे में सुना जाता है, वैसी ही थी। वह मत्स्य कन्या, सरदार जी की तरफ देखते हुए लगातार शिप के पीछे तेजी से तैरती आ रही थी, सरदार जी भी उसकी तरफ बहुत आकर्षित हो रहे थे, उन्होंने देखा कि शिप की गति के साथ मिलान करने में मत्स्य कन्या बहुत थक रही थी, वह तेज आवाज़ें भी निकाल रही थी, आखिर में जब सरदार जी ने देखा कि समुद्र का किनारा इतनी दूर है कि तैरकर पहुंचा जा सकता है, तब उन्होंने शायद अपने साथियों को अपने सामान का खयाल रखने को कहा और समुद्र में छलांग लगा दी।

सरदार जी और मत्स्य कन्या तैरकर पास के किनारे पर पहुंच गए, जो एक निर्जन स्थान था, बहुत समय तक वे आपस में प्यार करते रहे, शायद अगला दिन हो गया, सरदार जी को भूख लगी और उन्होंने एक मछली पकड़ी और वे उसको भूनकर खाने लगे, यह देखकर मत्स्य कन्या ने नफरत भरी मुद्रा में आवाज निकाली और वहाँ से दूर चली गई। इसके बाद सरदार जी किसी तरह अपने स्थान पर पहुंचे।

ये है किस्सा नंबर-2, विश्वास करना न करना आपकी श्रद्धा पर निर्भर है, मैं तो अपने मित्र की बात, जो उन्होंने अपने दादाजी के हवाले से बताई, उस पर पूरी तरह विश्वास करता हूँ।

नमस्कार।

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78. इच्छाधारी सर्प

आज एक वृतांत सुना रहा हूँ जो मैंने दिल्ली में अपने एक मित्र और सहकर्मी से सुना था, मेरे ये मित्र मूलतः मुल्तान के रहने वाले थे, मुझसे कुछ पहले ही रिटायर हो चुके हैं और अभी दिल्ली में रह रहे हैं। दो किस्से हैं, सच्ची घटनाएं जो उनको, उनके दादाजी ने सुनाई थीं। उस समय की घटनाएं हैं जब वे (दादाजी) मुल्तान में रहते थे, देश की आज़ादी से काफी पहले की घटनाएं हैं।  

मेरा अपने मित्र पर पूरा विश्वास है, जैसा उनका अपने दादाजी पर था, इसलिए मैं इनको सच्ची घटना के रूप में सुना रहा हूँ, आप चाहें तो इनको किस्से के रूप में सुन लीजिए।

तो पहली घटना, जो दादाजी के मित्र के सामने हुई और उसने उनको बताई, वह मित्र जंगल के बीच से जा रहा था जहाँ मार्ग के दोनों तरफ मिट्टी के ऊंचे-ऊंचे दीवारनुमा टीले थे और उन टीलों में काफी ऊंचाई तक सूराख बने हुए थे, सर्प के बिल जैसे। उस व्यक्ति ने देखा कि एक तरफ के टीले के सूराख में से एक पतला सा सर्प, हरे रंग का निकला और दूसरी तरफ के टीले के सूराख मे घुस गया। इतना में उधर दो साधु वेशधारी व्यक्ति आए, उन्होंने उससे पूछा कि क्या उन्होंने देखा है कि सर्प कौन से सूराख में घुसा है, उस व्यक्ति ने उनको बता दिया।

उन लोगों ने बताया कि वह इच्छाधारी सर्प है, उनके पास एक तसले में गोबर भरा हुआ था वे गोबर को उस सूराख पर डालने लगे जिसमें वह सर्प घुसा था। जैसे ही वे गोबर डालते वह जल जाता, वे पुनः गोबर डालते, इस प्रकार काफी देर तक चलता रहा, अंत में गोबर जलना बंद हो गया, इसके बाद उनमें से एक साधु ने उस बिल (सूराख) के अंदर हाथ डाला और उस पतले से हरे रंग के सर्प को बाहर निकाल लिया।

उनके पास एक दूसरा साफ तसला भी था और उनमें से एक ने उस सर्प को सीधा उस तसले के ऊपर लटका लिया और सीधा उसको दबाकर  ऊपर से नीचे तक अपना हाथ ले आए, जिससे उसका सारा रक्त उस तसले में आ गया। उनमें से एक ने वह रक्त पिया और वह अदृश्य हो गया, उसके बाद दूसरे ने उस तसले में बाकी बचे रक्त को चाट लिया और वह भी अदृश्य हो गया। इसके बाद उन सज्जन ने केवल उनके जाते समय, उनके धन्यवाद का स्वर सुना।

मुझे यह किस्सा सुने 40 वर्ष से ऊपर हो गए, उस समय की बात है जब मैं दिल्ली में नौकरी करता था और दिल्ली मैंने 1980 में छोड़ दी थी। मेरे मित्र के दादाजी ने कब ये किस्सा सुनाया होगा पता नहीं और घटना तो लगता है लगभग 100 वर्ष पुरानी होगी!

आज अचानक याद आया तो शेयर कर लिया, आप चाहें इसे जिस भी रूप में लें। दूसरा किस्सा भी काफी रोचक है यद्यपि उसमें किसी के गायब होने की बात नहीं है, अब अगला झटका थोड़ा रुककर देते हैं न!  

नमस्कार।

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Recreate: Going deep through music

Ever listened to a musician

a Sitar maestro may be

in complete silence,

the imaginations he has in his mind

he recreates through the strings

which he touches with his creative alertness

he goes deep in the waves he creates

and the audience awakens after going deep there

everybody finding something

he or she had kept deep in the mind

or soul.

The music recreates a world within us

and we are not there, where we were

for quite some time.

Our mind and souls get

what they had been thirsty for.

via Daily Prompt: Recreate

77. शैतान की फसल

एक समस्या जिससे हमारा देश बहुत लंबे समय से जूझ रहा है और आज वह विश्वव्यापी समस्या बन गई है, वह है आतंकवाद की समस्या।

आज पूरी दुनिया के देश तरक्की करने के रास्ते खोज रहे हैं, एक स्वस्थ प्रतियोगिता हो रही है दुनिया के देशों के बीच में, वहाँ की शासन व्यवस्था चाहे किसी भी प्रकार की हो। संयुक्त राष्ट्र संघ और अनेक अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर राष्ट्राध्यक्ष मिलकर इस बारे में विचार करते हैं कि किस प्रकार आपसी सहयोग के साथ प्रगति की नई ऊंचाइयों को छुआ जाए। लेकिन यह शैतान, सभी योजनाओं में पलीता लगा देता है। 

कुछ देशों के बीच सीमा-विवाद रहता है, हमारे देश को भी दुर्भाग्य से ऐसे पड़ौसी मिले हैं कि हमेशा कोई न कोई विवाद बना रहता है और जो राशि हमें देश की प्रगति पर खर्च करनी चाहिए, उसका एक बड़ा हिस्सा रक्षा तैयारियों पर करना हमारी मजबूरी बन गई है।

इतना ही नहीं, लंबे समय से हम आतंकवाद के, एक ऐसे शत्रु से लड़ाई लड़ रहे हैं, जिसका पता नहीं होता कि वह कहाँ छिपा बैठा है और कब, कहाँ हमला करेगा। यह शत्रु नैतिकता के किसी प्रकार के नियमों का भी पालन नहीं करता, निहत्थे नागरिकों की हत्या करने में, ट्रेन में या बाजार में ब्लास्ट करने में भी इसको कोई संकोच नहीं होता।

इस प्रकार की परिस्थितियों का हम लंबे समय से सामना करते रहे हैं, आज अमरीका, ब्रिटेन आदि बड़े देशों को भी इसका सामना करना पड़ रहा है। अभी कल ही ब्रिटेन में अंडरग्राउंड ट्रेन में बड़ा हादसा हुआ है।

जो लोग ऐसा काम करते हैं, वे इंसान कहलाने के लायक तो नहीं हैं, मैं नहीं समझ पाता कि ऐसा कौन से दर्शन है जो इन नीच लोगों को ऐसे काम करने के लिए प्रेरित करता है।

समय की मांग है कि दुनिया की सभी ताकतें मिलकर आतंकवाद के इस राक्षस का जड़ से सफाया करने के लिए सम्मिलित प्रयास करें और हमारी यह दुनिया- हर देश, प्रदेश, धर्म और जाति के लोगों के खुशहाली के साथ आगे बढ़ने के लिए जानी जाए।

आतंकवाद का यह दुश्मन छिपा हुआ है, इसलिए और अधिक जागरूकता के साथ दुनिया के सभी प्रगतिशील देशों को, इस बुराई को जड़ से समाप्त करने के लिए भरसक प्रयास करना होगा।

हमारी शुभकामना है आतंकवाद की समाप्ति में हम सफल हों और जल्द ही ऐसा दिन आए कि हम इस बुराई से पूरी तरह मुक्त हो जाएं।  

आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।

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Journey called life

When we talk about life, may be we can put forward our experiences with several adjectives, kinds of impressions, we are happy at times when we achieve desired results, we also get depressed, demotivated at times when our sincere efforts do not yield desired results.

Whatever may be the case, one thing we can all agree about is that the path, the journey of life is not a rose walk, it is rather quite difficult, quite thorny,

We need to polish our efforts, re-design our plans at times, to be successful at various tedious points in the journey of life. Sometimes it is not our life conditions but the behavior of our fellow beings which makes our path more difficult. They are also part of our environment, we need to always be ready to face the challenges in life, even if we are not ready, we would have to face them, then why be caught unprepared. Sometimes our life may be smooth sailing but at some other times we have to face difficult phases, pass through uneven, hilly terrains, that is what life is.

That is why it is said ‘ hope for the best and be prepared for the worst’. Life demands that one should always be ready and well prepared to pass through thorny conditions, environment and terrains.

Wish you all the best for the journey called life.

via Daily Prompt: Thorny

76. प्रद्युम्न के बहाने

कुछ मामलों पर चर्चा करने की एकाएक हिम्मत नहीं होती। सात वर्ष का बच्चा प्रद्युम्न, एक प्रतिष्ठित स्कूल का नन्हा छात्र, सुबह उसके पिता उसको स्कूल छोड़कर आए और कुछ देर में ही खबर मिली कि उसकी हत्या हो गई।

हत्या हुई एक प्रतिष्ठित स्कूल के बाथरूम में, सुबह स्कूल पहुंचते ही, हत्या का इल्ज़ाम एक बस कंडक्टर पर, जो बाथरूम से उस रक्त रंजित बच्चे को बाहर लेकर आया, जिसकी गर्दन को चाकू से, बेरहमी के साथ काटा गया था। बस कंडक्टर यह स्वीकार कर रहा है कि उसने ही हत्या की है लेकिन विश्वास नहीं होता। विश्वास नहीं होता कि कोई भी उस मासूम की हत्या करेगा, क्या दुश्मनी हो सकती है किसी की उस मासूम के साथ!

लेकिन हत्या तो हुई है, वह भी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में, एक प्रतिष्ठित स्कूल में, जहाँ की फीस बहुत ऊंची होती है, जहाँ प्रबंधन पैसे वसूलने के नए-नए तरीके तलाशता रहता है। अब जबकि ऐसी अशोभनीय घटना घट गई है, उस स्कूल में तो लोगों को हर तरह की शिकायतें करने का एक मौका भी मिल गया है।

यह भी सही है कि इस प्रकार की घटनाएं हिंदुस्तान में कहीं न कहीं हर रोज़ होती हैं, लेकिन क्योंकि यह घटना राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में और एक प्रतिष्ठित स्कूल में हुई है, जहाँ मीडिया को आने-जाने में सुविधा रहती है, तो इस पर चर्चा भी खूब हो रही है। पत्रकार लोग स्कूल की बाउंड्री कितनी जगह से टूटी है यह देख रहे हैं और शराब का ठेका कितने कदम दूर है, यह माप रहे हैं। वैसे भारत में तो बहुत सारे स्कूल ऐसे हैं जिनकी बाउंड्री ही नहीं है।

मासूम प्रद्युम्न की मौत वास्तव में दिल पर चोट करती है और इस बहाने अगर हम अधिक जागरूक हो जाएं, ऐसे कदम उठाए जाएं जिनसे ऐसी घटनाएं न हो सकें तो बहुत अच्छा होगा। लेकिन हम सिस्टम में ऐसी कमियां जान-बूझकर छोड़ देते हैं शायद। जैसे कि यह अक्सर होता है कि सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं, लेकिन जब ऐसी कोई घटना हो जाती है, तब मालूम होता है कि कैमरे काम नहीं कर रहे हैं। सामान्य परिस्थितियों में इन व्यवस्थाओं का ऑडिट क्यों नहीं होता!

एक खबर इस बीच आई थी कि दिल्ली के एक स्कूल ने अपने डांस टीचर को नौकरी से हटा दिया और उसके विरुद्ध पुलिस में शिकायत भी की कि वह डांस छात्राओं के साथ गलत व्यवहार करता है! क्या आपको लगता है कि इस मामले में अचानक स्कूल प्रबंधक की आत्मा जाग गई। ऐसा केवल इसलिए हुआ कि प्रद्युम्न की हत्या के बाद जो एक जन-आंदोलन जैसा हुआ, उसमें उस स्कूल के लोगों को लगा कि यह जो गतिविधि वहाँ चल रही है, जिसकी जानकारी निश्चित रूप से उस स्कूल के कुछ लोगों को पहले से थी, वह अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

आज जो वातावरण इस घटना के बाद बना है, इसमें अच्छा होगा कि ऐसी गतिविधियां जो स्कूलों में अथवा किसी भी संस्थान में, कुछ लोगों की जानकारी में चलती रहती हैं, उनको बर्दाश्त न किया जाए और उसको समय रहते समाप्त किया जाए। सीसीटीवी जैसी, जो भी निगरानी  सुविधाएं जहाँ मौज़ूद हैं उनका पूरी क्षमता के साथ इस्तेमाल किया जाए और सबसे बड़ी बात तो यह है कि जो अपराधी है उनको समय पर और अधिकतम संभव दंड मिले जिससे और लोगों की ऐसा करने की हिम्मत न हो।  

आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।

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75.जो हुआ ही नहीं अखबार में आ जाएगा!

ज़नाब राहत इंदौरी का एक शेर याद आ रहा है जो उन्होंने कुछ समय पहले ‘द कपिल शर्मा शो’ में  पढ़ा था-

बनके इक हादसा, किरदार में आ जाएगा

जो हुआ ही नहीं, अखबार में आ जाएगा।

अब खबरों की दुनिया की क्या बात करें। आज बड़े-बड़े चैनलों पर जो पत्रकार, एंकर काम कर रहे हैं उनकी शक्ल देखने से पहले उनका चश्मा दिखाई देता है, कौन सी घटना इनके लिए महत्वपूर्ण होगी कौन सी नहीं, ये इनका प्रोग्राम देखने वाला कोई भी व्यक्ति बता सकता है, यहाँ तक कौन सी लाश पर ये देर तक बीन बजाएंगे और कौन सी हत्या या हत्याएं इनके लिए महत्वपूर्ण नहीं है! इतना ही नहीं, मोदी जी और राहुल बाबा की तरह इनके भी फैन हैं, जो इनके द्वारा किसी खबर को महत्व दिए जाने और किसी को नकारे जाने के मामले में पूरी तरह साथ रहते हैं। इस मामले में यह भी शामिल है कि कहाँ घटना हो तो वहाँ का मुख्यमंत्री ज़िम्मेदार है और कहाँ उस गरीब की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है।

खैर, ये तो मैंने बात शुरू करने के लिए कह दिया, मैं यात्रा करना चाहता हूँ पुराने दिनों में, जब हमने नगर संवाददाताओं, पत्रकारों, छोटे-छोटे अखबार छापने वालों को शुरू-शुरू में जाना था।

शाहदरा की बात है, शायद सत्तर के दशक की, वहाँ मैं कवि-गोष्ठियां आदि सुनने के लिए जाता था, वहाँ मालूम होता था कि किसी राष्ट्रीय समाचार पत्र के नगर संवाददाता थे, उनका काम खबरें एकत्रित करना नहीं था, बल्कि ये था कि किस खबर को अखबार में जाने दिया जाए और किसको रोक दिया जाए। अक्सर आयोजक लोग कवि गोष्ठी की खबर छपवाने के लिए उनसे गुहार लगाते थे। बाद में तो इस प्रकार के आयोजनों और उनकी रिपोर्ट छपवाने की गतिविधियां मैंने स्वयं काफी कीं, जन संपर्क का काम देखा तो पत्रकारों को मित्र बनाया और कंपनी से जुड़ी बहुत सी खबरें, रिपोर्टें उनके माध्यम से छपवाईं।

आगे बढ़ने से पहले एक पत्रकार मित्र की बात बताऊं जो आगरा में एक छोटा सा अखबार छापते थे। उनके हाथ कुछ यशकामी लोग लग जाते थे या वे उनको ऐसा बना देते थे। जैसे एक कल्लू टाल वाले थे, जो लकड़ियों की एक बड़ी सी टाल चलाते थे। कमाई ठीक-ठाक थी उनकी, वे उनसे मिलते और बोलते कि देखो कल तुम मर जाओगे, लोग तुमको किस नाम से जानेंगे, ‘कल्लू टाल वाला’, तुम्हारे नाम से कुछ छाप देता हूँ अखबार में, नाम हो जाएगा। और अगर वो नहीं मानता तो ये भी बताते कि तुम्हारे खिलाफ कुछ लिख दूंगा, फिर सफाई देते फिरना। इस प्रकार वो कल्लू टालवाला चक्कर में आ जाता था और उनको कुछ दाना-पानी दे देता था।

वैसे कल्लू टालवाले के बहाने मुझे कुछ फिल्मी पात्र भी याद आ गए, एक तो ‘चमेली की शादी’ में थे ‘हैं जी’, जो ख्याति पाने के लिए राजनीति में उतरना चाहते थे और एक बेचारे थे मुकरी, जिनके छोटे से शरीर पर ‘अइयो बल्ली प्यार का दुश्मन, हाय-हाय’ जैसी लानत लगी थी!

खैर फिर से वास्तविक दुनिया के पत्रकारों पर आते हैं, देश के कुछ सुदूर स्थानों पर छोटे-छोटे अखबार छापकर ब्लैकमेल करने का धंधा भी काफी चलता रहा है, शायद आज भी कुछ स्थानों पर चलता हो। जब मैं एनटीपीसी, विंध्यनगर में था, जो मध्य प्रदेश के सीधी जिले में स्थित है, जहाँ कुंवर अर्जुन सिंह जी ने ‘चुरहट लॉटरी कांड’ को अंजाम देकर, उस क्षेत्र को ख्याति दिलाई थी।

हाँ तो इस परियोजना जब मैं था, तब वहाँ सीधी के एक सज्जन थे, जो पत्रकार कहलाते थे, वे चार पन्नों का एक अनियतकालीन अखबार निकालते थे-‘विंध्य टाइगर’। कंपनी के गेस्ट हाउस में उनको आते ही कमरा मिल जाता था, साथ में खाना और दारू भी, क्योंकि गेस्ट हाउस चलाने वाले ठेकेदार को अपनी खैरियत की चिंता थी। एनटीपीसी तो वैसे भी इलाके के बदमाश लोगों के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी थी। तो ये पत्रकार महोदय आकर ठेकेदारों से वसूली करते, धमकी देते और जिसके साथ इनकी पिछली बार पैसे को लेकर बात नहीं बनी थी, उसके खिलाफ छापकर लाया हुआ चार पृष्ठ का (छोटे आकार का) अखबार कॉलोनी और दफ्तर में अनेक स्थानों पर चिपका देते।

ऐसे लोगों को  ब्लैकमेल करने के लिए तो लोग मिल ही जाते हैं। जैसे मुझे याद आ रहा है कि वहाँ नगर प्रशासन विभाग के प्रधान एक बार बने श्री रघुरमन, उनके समय में यह हुआ कि सड़कों आदि की जीवन अवधि अचानक काफी कम हो गई। इसको हमने इस रूप में जाना कि जिस प्रकार पौधों में जीवन प्रमाणित करने वाला परीक्षण ‘रमन इफेक्ट’ कहलाता है, वैसे ही सड़कों की आयु कम करने वाला परीक्षण ‘रघुरमन इफेक्ट’ है।

क्षमा करें, यह नाम अचानक याद आ गया, बहुत पुरानी बात है और ये सज्जन इंचार्ज थे, मैं कोई दोष उनको नहीं दे रहा हूँ, बस अपनी बात कहने का माध्यम उनको बना लिया, ये कोई और ‘इफेक्ट’ भी हो सकता है।

इस प्रकार एक-दो पत्रकारों के माध्यम से, जो याद आया कि छोटे स्थानों पर जो एक विशेष प्रकार की पत्रकारिता होती  थी, शायद आज भी होती हो, उसकी एक बानगी प्रस्तुत की है।

आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।

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74. बोल मेरी मछली कितना पानी!

बरसात का मौसम अपने हिस्से की तबाही मचाकर जाने वाला है, अब गरीबों को सर्दी का सामना करना होगा। क्योंकि हर मौसम की मार, गरीबों को ही तो वास्तव में सहनी पड़ती है। अमीर अथवा मध्यम वर्ग तो अपने परिधानों अथवा अनुकूलन की सुविधाओं से अपने को बचा लेते हैं, वो रूम हीटर हों अथवा कूलर, एयर कंडीशनर।

मैं तो क्योंकि अब गोआ में हूँ, इसलिए दिल्ली की सर्दी और दिल्ली की गर्मी तो अब याद करने वाली बात हो गई, हाँ यहाँ बारिश दिल्ली से ज्यादा होती है।

जबकि बारिश बीतने चली है, एक खेल याद आ रहा है, जिसे खेलते हुए, हम बचपन में गाया करते ‘हरा समुंदर, गोपी चंदर, बोल मेरी मछली कितना पानी’! ये गीत अब के बच्चे तो शायद कम ही गाते होंगे, हम लोग दिल्ली, यू.पी. के इलाके में इसे गाते थे, जहाँ समुंदर आसपास नहीं था।

एक बार पहले भी मैंने इस विषय में चर्चा की है कि जहाँ, हमारे देश में वर्षा इतनी तबाही मचाती है, वहीं ‘वाटर टेबल’ लगातार नीचे जा रहा है, कुएं सूख रहे हैं, क्योंकि बस्तियां बसाने के लिए तालाबों को समाप्त कर दिया जाता है और जल संरक्षण के कोई प्रभावी उपाय नहीं किए जाते हैं। इस दिशा में सरकारों, नागरिक संगठनों और गंभीरता से काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) द्वारा कदम उठाए जाने की आवश्यकता है, क्योंकि इसकी उम्मीद आप बिल्डरों से नहीं कर सकते।

पानी पर्याप्त मात्रा में जमीन के नीचे इकट्ठा होता रहे, यह आज की बहुत गंभीर आवश्यकता है, इसके लिए जो भी कदम उठाने हों, ऐसे पेड़ लगाना जो जल संरक्षण, वर्षा में सहायक हों, जो भी आवश्यक है किया जाए जिससे आने वाली पीढ़ियां हमारी लापरवाही को दोष न दें। प्रकृति में पानी की कमी नहीं है, उसके संरक्षण, बेहतर प्रबंधन की आवश्यकता है, जिससे हमारी खुशियों पर पानी चढ़े, पानी फिर न जाए।

कहीं आने वाले समय में यही गूंज न सुनाई दे- ‘बोल मेरी मछली, कितना पानी’।

अंत में ये पंक्तियां याद आ रही हैं-

इस दुनिया में जीने वाले, ऐसे भी हैं जीते

रूखी-सूखी खाते हैं और ठंडा पानी पीते,

भूखे की भूख और प्यास जैसा।

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा।

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वैसे तो हर रंग में तेरा जलवा रंग जमाए

जब तू फिरे उम्मीदों पर तेरा रंग समझ न आए।

कली खिले तो झट आ जाए पतझड़ का पैगाम,

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा।

नमस्कार।

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73. चंचल, शीतल, निर्मल, कोमल संगीत की देवी स्वर-सजनी!

ज़िंदगी सिर्फ मोहब्बत नहीं कुछ और भी है,

ज़ुल्फ-ओ-रुखसार की जन्नत नहीं कुछ और भी है,

भूख और प्यास की मारी हुई इस दुनिया में

इश्क़ ही एक हक़ीकत नहीं, कुछ और भी है।

तुम अगर नाज़ उठाओ तो, ये हक़ है तुमको

मैंने तुमसे ही नहीं, सबसे मोहब्बत की है।

आज हक़ीकत और कल्पना पर आधारित कुछ फिल्मी गीतों के बारे में बात करते हैं। ऊपर जिस गीत के बोल लिखे गए हैं, वह हक़ीकत के बोझ से दबे, ज़िम्मेदार शायर के बोल हैं, जो देखता है कि दुनिया में इतने दुख हैं, ऐसे में कैसे किसी एक के प्यार में पागल हुआ जाए।

अब कल्पना की धुर उड़ान के बारे में बात कर ली जाए, जहाँ प्रेमी अपने तसव्वुर में इतना पागल है कि सामने जो हक़ीकत है उसको स्वीकार नहीं कर पाता और देखें उसकी कल्पना की उड़ान कितनी दूर तक जाती है-

चंचल, शीतल, निर्मल, कोमल, संगीत की देवी स्वर-सजनी,

सुंदरता की हर मूरत से, बढ़कर के है तू सुंदर सजनी।

दीवानगी का एक और आलम ये भी है-

ये तो कहो कौन हो तुम, कौन हो तुम,

हमसे पूछे बिना दिल में आने लगे,

नीची नज़रों से बिजली गिराने लगे।

एक और मिसाल-

मेहताब तेरा चेहरा, एक ख्वाब में देखा था,

ऐ जान-ए-जहाँ बतला,

बतला कि तू कौन है।

और जवाब-

ख्वाबों में मिले अक्सर,

एक राह चले मिलकर,

फिर भी है यही बेहतर-  

मत पूछ मैं कौन हूँ।

और इसके बाद फिर हक़ीकत की पथरीली ज़मीन पर आते हैं-

देख उनको जो यहाँ सोते हैं फुटपाथों पर,

लाश भी जिनकी कफन तक न यहाँ पाती है,

पहले उन सबके लिए, एक इमारत गढ़ लूं,

फिर तेरी मांग सितारों से भरी जाएगी।

आज के लिए इतना ही!

नमस्कार।

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