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इन दिलों में कौन सा दिल है !

आज अकबर इलाहाबादी साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| लफ्जों की कारीगरी जो कविता/ग़ज़ल में होती है वह इसमें बाकायदा मौजूद है|
प्रस्तुत है यह ग़ज़ल-


कहाँ ले जाऊँ दिल, दोनों जहाँ में इसकी मुश्क़िल है ।
यहाँ परियों का मज़मा है, वहाँ हूरों की महफ़िल है ।

इलाही कैसी-कैसी सूरतें तूने बनाई हैं,
हर सूरत कलेजे से लगा लेने के क़ाबिल है।

ये दिल लेते ही शीशे की तरह पत्थर पे दे मारा,
मैं कहता रह गया ज़ालिम, मेरा दिल है, मेरा दिल है ।

जो देखा अक्स आईने में अपना बोले झुँझलाकर,
अरे तू कौन है, हट सामने से क्यों मुक़ाबिल है ।

हज़ारों दिल मसल कर पाँवों से झुँझला के फ़रमाया,
लो पहचानो तुम्हारा इन दिलों में कौन सा दिल है ।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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ये क्या हो रहा है ये क्यों हो रहा है- अकबर इलाहाबादी

आज अकबर इलाहाबादी साहब की एक छोटी सी रचना शेयर कर रहा हूँ| अकबर इलाहाबाद साहब ने हल्की-फुलकी और गंभीर, दोनों प्रकार की रचनाएँ लिखी हैं, नेताओं के बारे में भी और मशहूर गजल, ‘हंगामा है क्यों बरपा’ भी अकबर इलाहाबादी साहब ने ही लिखी थी| लीजिए आज इस कविता का आनंद लीजिए-

 

 

कोई हँस रहा है कोई रो रहा है,
कोई पा रहा है कोई खो रहा है|

 

कोई ताक में है किसी को है गफ़लत,
कोई जागता है कोई सो रहा है|

 

कहीँ नाउम्मीदी ने बिजली गिराई,
कोई बीज उम्मीद के बो रहा है|

 

इसी सोच में मैं तो रहता हूँ ‘अकबर’,
ये क्या हो रहा है ये क्यों हो रहा है|

 

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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