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राहें भी तमाशाई, राही भी तमाशाई!

कल मैंने कैफी आज़मी साहब की एक ग़ज़ल शेयर की थी जो एक महान शायर होने के अलावा शबाना आज़मी के पिता भी थे| आज मैं ज़नाब अली सरदार जाफ़री साहब की एक रचना शेयर कर रहा हूँ, वे भी एक महान शायर थे और उनकी ही पीढ़ी के थे, फिल्मों में भी उनके बहुत से गीत लोकप्रिय हुए हैं

आज जो गीत शेयर कर रहा हूँ उसको जगजीत सिंह और चित्रा सिंह ने बड़े सुंदर ढंग से गाया है| लीजिए आज प्रस्तुत है ये प्यारा सा गीत, अकेलेपन अर्थात तन्हाई के बारे में-  


आवारा हैं गलियों के, मैं और मेरी तन्हाई,
जाएँ तो कहाँ जाएँ हर मोड़ पे रुसवाई|

ये फूल से चहरे हैं, हँसते हुए गुलदस्ते
कोई भी नहीं अपना बेगाने हैं सब रस्ते,
राहें भी तमाशाई, राही भी तमाशाई|

मैं और मेरी तन्हाई|


अरमान सुलगते हैं सीने में चिता जैसे
कातिल नज़र आती है दुनिया की हवा जैसे,
रोती है मेरे दिल पर बजती हुई शहनाई|

मैं और मेरी तन्हाई|


आकाश के माथे पर तारों का चरागाँ है
पहलू में मगर मेरे, जख्मों का गुलिस्तां है,
आंखों से लहू टपका, दामन में बहार आई|

मैं और मेरी तन्हाई|


हर रंग में ये दुनिया, सौ रंग दिखाती है
रोकर कभी हंसती है, हंस कर कभी गाती है,
ये प्यार की बाहें हैं या मौत की अंगडाई|

मैं और मेरी तन्हाई|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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माँ है रेशम के कारख़ाने में!

अली सरदार जाफरी साहब की एक नज़्म आज शेयर कर रहा हूँ| इस रचना में पिछड़े वर्ग के लोगों की ज़िंदगी का ऐसा चित्रण किया गया है, जिनकी हालत पीढ़ी दर पीढ़ी एक जैसी बनी रहती है, कोई सपने नहीं, कोई बदलाव की उम्मीद नहीं है|

जाफरी साहब एक प्रगतिशील शायर थे, मुद्दतों पहले उन्होंने यह रचना लिखी थी, लेकिन आज भी स्थितियाँ वैसी ही है|

लीजिए प्रस्तुत है अली सरदार जाफरी साहब की यह सुंदर रचना-

 

 

माँ है रेशम के कारख़ाने में
बाप मसरूफ़ सूती मिल में है,
कोख से माँ की जब से निकला है
बच्चा खोली के काले दिल में है|

 

जब यहाँ से निकल के जाएगा
कारख़ानों के काम आएगा,
अपने मजबूर पेट की ख़ातिर
भूख सरमाये की बढ़ाएगा|

 

हाथ सोने के फूल उगलेंगे
जिस्म चांदी का धन लुटाएगा,
खिड़कियाँ होंगी बैंक की रौशन
खून इसका दिये जलाएगा|

 

यह जो नन्हा है भोला-भाला है
खूनी सरमाये का निवाला है,
पूछती है ये, इसकी ख़ामोशी
कोई मुझको बचाने वाला है !

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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