ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं!

आज मैं मुशायरों और कवि सम्मेलनों की मशहूर शायरा सुश्री अंजुम रहबर जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| अंजुम जी का अंदाज़ ए बयां अलग तरह का रहा है| उनकी एक रचना काफी प्रसिद्ध है- ‘छुक-छुक, छुक-छुक रेल चली है जीवन की’|

लीजिए आज प्रस्तुत है सुश्री अंजुम रहबर जी यह ग़ज़ल –

कुछ दिन से ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं
यूँ देखती है जैसे मुझे जानती नहीं

वो बे-वफ़ा जो राह में टकरा गया कहीं
कह दूँगी मैं भी साफ़ कि पहचानती नहीं

समझाया बार-हा कि बचो प्यार-व्यार से
लेकिन कोई सहेली कहा मानती नहीं

मैं ने तुझे मुआ’फ़ किया जा कहीं भी जा
मैं बुज़दिलों पे अपनी कमाँ तानती नहीं

‘अंजुम’ पे हँस रहा है तो हँसता रहे जहाँ
मैं बे-वक़ूफ़ियों का बुरा मानती नहीं।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

इक रेल जा रही थी कि!

‘अंजुम’ तुम्हारा शहर जिधर है उसी तरफ़,
इक रेल जा रही थी कि तुम याद आ गए|

अंजुम रहबर

मैं गुनगुना रही थी कि!

कल शाम छत पे मीर-तक़ी-‘मीर’ की ग़ज़ल,
मैं गुनगुना रही थी कि तुम याद आ गए|

अंजुम रहबर

मैं सर झुका रही थी कि!

ईमान जानिए कि इसे कुफ़्र जानिए,
मैं सर झुका रही थी कि तुम याद आ गए|

अंजुम रहबर

इक ख़त छुपा रही थी!

कल मेरी एक प्यारी सहेली किताब में,
इक ख़त छुपा रही थी कि तुम याद आ गए|

अंजुम रहबर

वो लड़का ग़रीब था!

दफ़ना दिया गया मुझे चाँदी की क़ब्र में,
मैं जिस को चाहती थी वो लड़का ग़रीब था|

अंजुम रहबर

गले में निशान-ए-सलीब था!

मरियम कहाँ तलाश करे अपने ख़ून को,
हर शख़्स के गले में निशान-ए-सलीब था|

अंजुम रहबर

और समुंदर क़रीब था!

बस्ती के सारे लोग ही आतिश-परस्त थे,
घर जल रहा था और समुंदर क़रीब था|

अंजुम रहबर

हथेली पे मेरा नसीब था!

मैं उसको देखने को तरसती ही रह गई,
जिस शख़्स की हथेली पे मेरा नसीब था|

अंजुम रहबर