इक रेल जा रही थी कि!

‘अंजुम’ तुम्हारा शहर जिधर है उसी तरफ़,
इक रेल जा रही थी कि तुम याद आ गए|

अंजुम रहबर

मैं गुनगुना रही थी कि!

कल शाम छत पे मीर-तक़ी-‘मीर’ की ग़ज़ल,
मैं गुनगुना रही थी कि तुम याद आ गए|

अंजुम रहबर

मैं सर झुका रही थी कि!

ईमान जानिए कि इसे कुफ़्र जानिए,
मैं सर झुका रही थी कि तुम याद आ गए|

अंजुम रहबर

इक ख़त छुपा रही थी!

कल मेरी एक प्यारी सहेली किताब में,
इक ख़त छुपा रही थी कि तुम याद आ गए|

अंजुम रहबर

वो लड़का ग़रीब था!

दफ़ना दिया गया मुझे चाँदी की क़ब्र में,
मैं जिस को चाहती थी वो लड़का ग़रीब था|

अंजुम रहबर

गले में निशान-ए-सलीब था!

मरियम कहाँ तलाश करे अपने ख़ून को,
हर शख़्स के गले में निशान-ए-सलीब था|

अंजुम रहबर

और समुंदर क़रीब था!

बस्ती के सारे लोग ही आतिश-परस्त थे,
घर जल रहा था और समुंदर क़रीब था|

अंजुम रहबर

हथेली पे मेरा नसीब था!

मैं उसको देखने को तरसती ही रह गई,
जिस शख़्स की हथेली पे मेरा नसीब था|

अंजुम रहबर

वो उतनी दूर हो गया!

मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था,
वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था|

अंजुम रहबर