अब ‘मुल्ला’ को कहना आ गया!

लब पे नग़्मा और रुख़ पर इक तबस्सुम की नक़ाब,
अपने दिल का दर्द अब ‘मुल्ला’ को कहना आ गया|

आनंद नारायण मुल्ला

आ गया काँटों में रहना आ गया!

एक ना-शुकरे चमन को रंग-ओ-बू देता रहा,
आ गया हाँ आ गया काँटों में रहना आ गया|

आनंद नारायण मुल्ला

मुझको रंज सहना आ गया!

पी के आँसू सी के लब बैठा हूँ यूँ इस बज़्म में,
दर-हक़ीक़त जैसे मुझको रंज सहना आ गया|

आनंद नारायण मुल्ला

मोती का गहना आ गया!

तुझको अपना ही लिया आख़िर निगार-ए-इश्क़ ने,
ऐ उरूस-ए-चश्म ले मोती का गहना आ गया|

आनंद नारायण मुल्ला

रुख़ पर हम को बहना आ गया!

ज़िंदगी से क्या लड़ें जब कोई भी अपना नहीं,
हो के शल धारे के रुख़ पर हम को बहना आ गया|

आनंद नारायण मुल्ला

अब जिसे दाँतों में रहना आ गया!

सबकी सुनता जा रहा हूँ और कुछ कहता नहीं,
वो ज़बाँ हूँ अब जिसे दाँतों में रहना आ गया|

आनंद नारायण मुल्ला

अब मुझको कहना आ गया!

पूछता कोई नहीं अब मुझ से मेरा हाल-ए-दिल,
शायद अपना हाल-ए-दिल अब मुझको कहना आ गया|

आनंद नारायण मुल्ला

मुझको रंज सहना आ गया!

आरज़ू को दिल ही दिल में घुट के रहना आ गया,
और वो ये समझे कि मुझको रंज सहना आ गया|

आनंद नारायण मुल्ला

मिल के बिछड़ना ज़रूर था!

दुनिया है ये किसी का न इसमें क़ुसूर था,
दो दोस्तों का मिल के बिछड़ना ज़रूर था|

आनंद नारायण मुल्ला

दिखाने का तड़पना नहीं आता!

दुख जाता है जब दिल तो उबल पड़ते हैं आँसू,
‘मुल्ला’ को दिखाने का तड़पना नहीं आता|

आनंद नारायण मुल्ला