बदी के सामने नेकी अभी तक!

बदी के सामने नेकी अभी तक,
सिपर-अंदाज़ होती जा रही है|

आनंद नारायण ‘मुल्ला’

आवाज़ होती जा रही है!

नहीं आता समझ में शोर-ए-हस्ती,
बस इक आवाज़ होती जा रही है|

आनंद नारायण ‘मुल्ला’

आवाज़ होती जा रही है!

ख़मोशी साज़ होती जा रही है,
नज़र आवाज़ होती जा रही है|

आनंद नारायण ‘मुल्ला’

मै-कदों में मगर दूर दूर था!

‘मुल्ला’ का मस्जिदों में तो हमने सुना न नाम,
ज़िक्र उसका मै-कदों में मगर दूर दूर था|

आनंद नारायण ‘मुल्ला’

चेहरे पे नूर था!

पीते तो हमने शैख़ को देखा नहीं मगर,
निकला जो मै-कदे से तो चेहरे पे नूर था|

आनंद नारायण ‘मुल्ला’

जिसे जितना शुऊर था!

इस इक नज़र के बज़्म में क़िस्से बने हज़ार,
उतना समझ सका जिसे जितना शुऊर था|

आनंद नारायण ‘मुल्ला’

क़ुसूर न करना क़ुसूर था!

उसके करम पे शक तुझे ज़ाहिद ज़रूर था,
वरना तेरा क़ुसूर न करना क़ुसूर था|

आनंद नारायण ‘मुल्ला’

बिछड़ना ज़रूर था!

दुनिया है ये किसी का न इसमें क़ुसूर था,
दो दोस्तों का मिल के बिछड़ना ज़रूर था|

आनंद नारायण ‘मुल्ला’