लो करने आ गए जिरह!

आज फिर से मैं अपने अत्यंत प्रिय कवि और नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| बाकी क्षेत्रों की तरह कविता और गीत, नवगीत की दुनिया में भी कुछ सृजनधर्मी रचनाकार होते हैं और बहुत से ऐसे लोग होते हैं जिनके पास रचना-कौशल या प्रतिभा तो नहीं होती परंतु तर्क खूब होते हैं|

लीजिए आज मैं स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक ऐसा ही नवगीत शेयर कर रहा हूँ, जिसमें रचनाधार्मिता के संबंध ऐसी ही जिरह की प्रवृत्ति का जिक्र किया गया है–

कोल्हू के बैल की तरह
घूमते रहे हैं जो एक ही जगह
लो करने आ गए जिरह।

खुर वही पुजे हैं
तोड़ा है जिसने भी
धरती का बाँझपन
और सुम वही हैं
नाप गए बिना नापी
धरती का आयतन

भीतर तक भरे नहीं
ऊपर से हरे नहीं
लालसा ही अर्थ की
जीवन में खरे नहीं

छूते ही रहे सदा ऊपरी सतह
लो करने आ गए जिरह
घूमते रहे हैं जो एक ही जगह
कोल्हू के बैल की तरह ।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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