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दृष्टि-अंधता का विस्तार!

आज ऐसे ही अचानक बात करने का बहाना मिल गया| क्रिकेट में बॉलर के लिए एक विशेष कुशलता मानी जाती है कि वह ऐसे कोण पर बॉल डाले, या ऐसा घुमाव दे कि खिलाड़ी उसको न देख पाए| मुझे याद है कि किसी समय भागवत चन्द्रशेखर भारतीय टीम के ऐसे बॉलर थे जिनकी बॉल बहुत पिटती थीं, लेकिन जब वह ठीक से पड़ती थी तब दुनिया को कोई भी खिलाड़ी उसको नहीं खेल पाता था|

इसे कहते हैं ‘ब्लाइंड स्पॉट’| वैसे देखा जाए तो राजनीतिज्ञों या कुछ राजनीतिक दलों के घोर समर्थकों का यह ‘ब्लाइंड स्पॉट’ बहुत बड़ा होता है| वे देश को और लोकतन्त्र को अपने हिसाब से चलाना चाहते हैं, लेकिन जनता है कि उनकी सुनती ही नहीं है| और इतनी शालीनता उनमें होती नहीं कि वे यह मान लें कि जनता का फैसला सर्वोपरि है| आखिर लोकतन्त्र में देश क्या कुछ ऐसे लोगों के विचार से चलेगा, जो कुछ खास ही अच्छाइयों को देख पाते हैं, कहीं उनको सिर्फ बुराई दिखती है और कहीं सिर्फ अच्छाई|


उदाहरण के लिए मैं कहना चाहूँगा कि केरल में जो लगातार लोगों को मौत के घाट उतार दिया जाता है, पश्चिम बंगाल में लोगों को मारकर पेड़ पर लटका दिया जाता है, उसको जनता की कृपा से आजकल बेरोजगार चल रहे अथवा हाशिये पर चले गए पत्रकार- विनोद दुआ, रवीश कुमार, राजदीप सरदेसाई, पुण्य प्रसून वाजपेयी आदि-आदि नहीं देख पाएंगे| जिनका खाते हैं उनके खिलाफ कैसे बोल पाएंगे!

उत्तर प्रदेश में दो गुटों के बीच झगड़े के कारण हुई घटना, भले ही उस पर तुरंत कार्रवाई भी हो जाए, उसे ये ऐसे दिखाएंगे कि ये सरकार ने ही किया है| जबकि केरल और पश्चिम बंगाल में सत्ता पक्ष द्वारा किए गए कारनामों पर ये बिल्ली की तरह आँखें मूँद लेते हैं|


ये बेचारे पत्रकार रोज यह दुआ करते हैं कि फिर से पहले वाली सरकार आ जाए, वो प्रधानमंत्री के साथ विदेश-यात्रा पर जाएँ, हवाई जहाज में बैठकर इंटरव्यू लें, वहाँ जाकर सरकारी खर्चे पर मौज करें और तमाम सुख-सुविधाओं के लिए लाइन में लगे रहें|


देश की जनता ने इन बेचारों को बहुत दुख दिया है| जब अर्णब गोस्वामी जैसे साहसी पत्रकार पर महाराष्ट्र सरकार ज़ुल्म करती है, तब ये कायर लोग अपने खोल में बंद हो जाते हैं| आप असहमत हो सकते हैं, लेकिन वह भी आपका साथी पत्रकार है, ये तो मानेंगे| कल आपके साथ भी तो ऐसा हो सकता है| अर्णब के समर्थन में जो जनता उमड़कर आती है, उसके बारे में, ये प्लास्टिक के पत्रकार क्या कहेंगे|


कहने को बहुत कुछ है, लेकिन ज्यादा लिखने से क्या ये बदल जाएंगे| ये तो उनका ही गुणगान करेंगे जिनसे ये सम्मान और सुख-सुविधाएं प्राप्त करते आए हैं|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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अत्याचारी महाराष्ट्र सरकार!

महाराष्ट्र में आजकल जो कुछ हो रहा है, वो निश्चित रूप से आपात्काल की याद दिलाता है| सुशांत हत्याकांड के बारे में जब प्रश्न उठाए गए, तब महाराष्ट्र सरकार जिसने पहले तुरंत ही इसे आत्महत्या घोषित कर दिया था, वो सीबीआई जांच का भरपूर विरोध करती रही| उनको सीबीआई जांच से डर क्यों लग रहा था जी!

सुशांत की मृत्यु और पालघर में साधुओं की हत्या के मामले को पुरजोर तरीके से उठाने के लिए ,तीन टांग वाली ये सरकार, अर्णब गोस्वामी और उनके रिपब्लिक चैनल के पीछे पड़ गई| इसमें तो कोई संदेह नहीं है ना कि पालघर में साधुओं की हत्या की गई थी, या वो भी आत्महत्या थी!

अर्णब एक ऐसे पत्रकार हैं जिन्होंने हमेशा गलत कामों का विरोध किया है, घोटालों को उजागर किया है| सुशांत हत्याकांड की आंच महाराष्ट्र की सत्ता में बैठे बड़े लोगों पर भी आ रही थी तो ये मामला उठाने के लिए महाराष्ट्र के सत्ताधीशों ने एक-एक करके अर्णब पर अनेक केस लगाए, अनेक बार पूछताछ के लिए पूरे-पूरे दिन बिठाए रखा, उसके हजार पत्रकारों पर केस कर दिए और अंत में पूरी गुंडागर्दी के साथ एक वरिष्ठ पत्रकार को ऐसे पकड़कर ले गई, जैसे किसी आतंकवादी को पकड़ा जाता है|

महाराष्ट्र पुलिस का कमिश्नर ऐसा है जिससे गुंडे और गैंगस्टर प्रेरणा ले सकते हैं उसके कारनामे पहले भी ऐसे रहे हैं और वो सरेआम झूठ बोलता है और उसको सही साबित करने के लिए लोगों पर झूठी गवाही देने के लिए दवाब डालता है|

एक बात मुंबई उच्च न्यायालय के बारे में भी, कुछ दिन तक मामला खींचने, फैसला सुरक्षित रखने के बाद उन्होंने कहा कि आप सेशंस कोर्ट में जाइए| यही कहना था तो फैसला सुरक्षित क्यों रखा था! न्यायालय ने यह दिखाने की कोशिश की कि किसी नागरिक को अन्याय होने के मामले में पहले निचले कोर्ट में जाना चाहिए| लेकिन निश्चित रूप से यह न्याय नहीं है|

यह किसी नागरिक के साथ गलती से अन्याय हो जाने का मामला नहीं है| यह शासन द्वारा योजनाबद्ध रूप से एक पत्रकार से बदला लेने का मामला है| जिसमें उनका एक मंत्री यहाँ तक कहता है- ‘अर्णब आत्महत्या भी तो कर सकता है!’

चलिए ये अन्यायी भी कब तक गुंडागर्दी कर पाएंगे| अर्णब के समर्थन में जहां हर जगह जनसमूह उमड़ रहा है, वहीं अनेक कारणों से उसके शत्रु भी बहुत से हैं| उनको उसका बात करने का अंदाज़ अच्छा नहीं लगता| उनको कमीशन खाने वाले, सरकार से सुविधाएं प्राप्त करने वाले पत्रकार ‘शिष्ट’ लगते हैं| आप असहमत हो सकते हैं, लेकिन किसी भी हालत में आप अन्याय का समर्थन कैसे कर सकते हैं! वैसे कुछ लोग तो ऐसे होते ही हैं कि यदि उनको न्याय करने की ज़िम्मेदारी दे दी जाए तो वे दुनिया के आधे लोगों को मृत्युदंड दे दें!

सबसे बड़ी अफसोस की बात यह है कि पत्रकार बिरादरी के सुविधाभोगी जयचंदों को शायद यह खबर ही नहीं है कि वरिष्ठ पत्रकार अर्णब गोस्वामी 6 दिन से गैर कानूनी हिरासत/जेल में हैं|

खैर ज्यादा क्या कहें, सभी सरकारों में कुछ कमी हो सकती है, परंतु मैं महाराष्ट्र की निरंकुश और गूंगी-बाहरी सरकार की घोर निंदा करता हूँ और अगर केंद्र, इस सरकार को बर्खास्त भी कर दे तो मुझे कोई अफसोस नहीं होगा|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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