तोरा मन दर्पण कहलाये!

आज स्वर्गीय साहिर लुधियानवी जी का लिखा एक सुंदर गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| फिल्म- ‘काजल’ के लिए इस गीत का संगीत रवि जी ने दिया था और इसको आशा भौंसले जी ने अपनी मधुर वाणी में गाया है जो आज तक हमारे मन में गूँजता है|

लीजिए आज प्रस्तुत हैं इस मधुर गीत के बोल –


प्राणी अपने प्रभु से पूछे किस विधि पाऊँ तोहे,
प्रभु कहे तू मन को पा ले, पा जायेगा मोहे|

तोरा मन दर्पण कहलाये,
भले बुरे सारे कर्मों को, देखे और दिखाये|
तोरा मन दर्पण कहलाये|

मन ही देवता, मन ही ईश्वर, मन से बड़ा न कोय,
मन उजियारा जब जब फैले, जग उजियारा होय,
इस उजले दर्पण पे प्राणी, धूल न जमने पाये|
तोरा मन दर्पण कहलाये

सुख की कलियाँ, दुख के कांटे, मन सबका आधार,
मन से कोई बात छुपे ना, मन के नैन हज़ार,
जग से चाहे भाग लो कोई, मन से भाग न पाये|
तोरा मन दर्पण कहलाये|


तन की दौलत ढलती छाया, मन का धन अनमोल,
तन के कारण मन के धन को मत माटी में रौंद,
मन की क़दर भुलानेवाला वीराँ जनम गवाये|
तोरा मन दर्पण कहलाये|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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बस यही एक पल है!


आज मैं 1965 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘वक़्त’ का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| फिल्मी गीतों में सभी प्रकार के दर्शन, हर प्रकार के विचारों, फलसफ़ों को अभिव्यक्ति दी जाती है, जैसे जो पार्टी एनिमल कहे जाते हैं, विलन और वेंप होते हैं, उनका अलग फलसफ़ा होता है| ऐसा ही फलसफ़ा इस गीत में व्यक्त किया गया है|

आज का यह गीत साहिर लुधियानवी जी का लिखा हुआ है और इसे रवि जी के संगीत निर्देशन में आशा भोंसले जी और समूह ने गाया था| लीजिए प्रस्तुत हैं इस गीत के बोल –

आगे भी जाने ना तू, पीछे भी जाने ना तू
जो भी है बस यही एक पल है|

अनजाने सायों का राहों में डेरा है
अनदेखी बाहों ने हम सब को घेरा है,
ये पल उजाला है, बाकी अँधेरा है
ये पल गँवाना ना, ये पल ही तेरा है,
जीने वाले सोच ले
यही वक़्त है कर ले पूरी आरज़ू|

इस पल के जलवों ने महफ़िल सँवारी है
इस पल की गर्मी ने धड़कन उभारी है,
इस पल के होने से दुनिया हमारी है
ये पल जो देखो तो सदियों पे भारी है,
जीने वाले सोच ले
यही वक़्त है कर ले पूरी आरज़ू|

इस पल के साये में अपना ठिकाना है
इस पल के आगे की हर शय फ़साना है,
कल किसने देखा है, कल किसने जाना है
इस पल से पाएगा, जो तुझको पाना है,
जीने वाले सोच ले
यही वक़्त है कर ले पूरी आरज़ू|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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दिल सोगवार आज भी है!

आज एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसकी विशेषता है गायक भूपिंदर सिंह की गूँजती आवाज| वैसे उन्होंने यह गीत 1985 में रिलीज़ हुई फिल्म- ऐतबार के लिए, भप्पी लाहिड़ी जी के संगीत निर्देशन में, आशा भोंसले जी के साथ मिलकर गाया है| इसके गीतकार हैं- हसन कमाल जी|


लीजिए आज प्रस्तुत है ये गीत-

किसी नज़र को तेरा
इंतज़ार आज भी है,

कहाँ हो तुम के
ये दिल बेकरार आज भी है|
किसी नज़र को तेरा
इंतज़ार आज भी है|
वो वादियाँ वो फिजायें के
हम मिले थे जहां,
मेरी वफ़ा का वहीं
पर मजार आज भी है|
किसी नज़र को तेरा
इंतज़ार आज भी है|

न जाने देख के उनको ये
ये क्यों हुआ एहसास,
के मेरे दिल पे उन्हें
इख़्तियार आज भी है|
किसी नज़र को तेरा
इंतज़ार आज भी है|

वो प्यार जिसके लिए
हमने छोड़ दी दुनिया,
वफ़ा की राह में घायल
वो प्यार आज भी है|
किसी नज़र को तेरा
इंतज़ार आज भी है|

यकीं नहीं हैं मगर
आज भी ये लगता है,
मेरी तलाश में शायद
बहार आज भी है|
किसी नज़र को तेरा
इंतज़ार आज भी है|

न पूछ कितने मोहब्बत में
ज़ख्म खाए हैं,
के जिनको सोच के दिल
सोगवार आज भी है|

वो प्यार जिस के लिए
हमने छोड़ दी दुनिया,
वफ़ा की राह में घायल
वो प्यार आज भी है|

किसी नज़र को तेरा
इंतज़ार आज भी है|
कहा हो तुम के ये
दिल बेकरार आज भी है|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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