विदागीत!

आज मैं आधुनिक हिन्दी कविता के श्रेष्ठ कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| वाजपेयी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता–

भागते हैं,
छूटते ही जा रहे हैं पेड़
पीपल-बेर-बरगद-आम के,
बिछुड़ती पग-लोटती घासें,
खिसकती ही जा रही हैं
रेत परिचय की अनुक्षण,
दूरियों की खुल रही हैं मुट्ठियाँ!
फिर किसी आवर्त्त में बंध
कभी आऊँगा यहाँ
रेत जाने किन तहों तक धँसेगी
परिचय न चमकेगा कभी भी
चुप रहेंगे पेड़-धरती घास सब…
तब मुझे पहचान
छोड़ता हूँ आज जिसको
टेरेगा सहसा क्या
विदा का बूढ़ा-सा पाखी?


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जीवन!

आज एक बार फिर मैं आधुनिक हिन्दी कविता में अपना अलग स्थान बनाने वाले श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| अशोक वाजपेयी जी का कविता लिखने का, अभिव्यक्ति का अलग ही अंदाज़ है, जो इस कविता में भी प्रदर्शित होता है|

लीजिए, आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता –

तुम्हें जीने के लिए
कम से कम क्या चाहिए ?
थोड़ी सी रोटी, कुछ नमक, पानी,
एक बसेरा, एक दरी, एक चादर,
एक जोड़ी कपड़े, एक थैला,
दो चप्पलें,
कुछ शब्द, एकाध पुस्तक, कुछ गुनगुनाहट,
दो-चार फूल, मातृस्मृति,
दूर चला गया बचपन,
पास आती मृत्यु।

तुम्हें कविता करने के लिए क्या चाहिए ?
बहुत सारा जीवन, पूर्वज,
प्रेम, आँसू, अपमान,
लोगों का शोरगुल, अरण्य का एकान्त,
भाषा का घर, लय का अन्तरिक्ष,
रोटी का टुकड़ा, नमक की दली,
पानी का घड़ा
और निर्दय आकाश।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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हम न होंगे!

आज एक बार फिर मैं प्रसिद्ध आधुनिक हिन्दी कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक और सुंदर कविता शेयर कर रहा हूँ| अशोक वाजपेयी जी की कुछ कविताएं मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ और उनके बारे में अपनी जानकारी भी शेयर कर चुका हूँ|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की एक और सुंदर कविता जिसमें उन्होंने बताया कि किसी व्यक्ति के नहीं रहने पर भी ये दुनिया वैसे ही चलती रहती है –
हम न होंगे-
जीवन और उसका अनन्त स्पन्दन,
कड़ी धूप में घास की हरीतिमा,
प्रेम और मंदिरों का पुरातन स्थापत्य,
अक्षर, भाषा और सुन्दर कविताएँ,
इत्यादि, लेकिन, फिर भी सब होंगे-
किलकारी, उदासी और गान सब-
बस हम न होंगे।

शायद कभी किसी सपने की दरार में,
किसी भी क्षण भर की याद में,
किसी शब्द की अनसुनी अन्तर्ध्वनि में-
हमारे होने की हलकी सी छाप बची होगी
बस हम न होंगे।

देवता होंगे, दुष्ट होंगे,
जंगलों को छोड़कर बस्तियों में<
मठ बनाते सन्त होंगे,
दुबकी हुई पवित्रता होगी,
रौब जमाते पाप होंगे,
फटे-चिथड़े भरे-पूरे लोग होंगे,
बस हम न होंगे।

संसार के कोई सुख-दुख कम न होंगे
बस हम न होंगे।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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वर्षान्त!

आज फिर से मैं आधुनिक हिन्दी के एक प्रमुख कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ जो एक उच्च अधिकारी भी रहे हैं और जैसा मैंने पहले भी लिखा है भोपाल में निर्मित भारत भवन साहित्य एवं संस्कृति कर्मियों के लिए उनकी अमूल्य भेंट है|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता –

वर्षान्त किसी की प्रतीक्षा नहीं करता
मेरी या तुम्हारी।

हरे-हलके बाँसों से
एक दिन अचानक आ
मुट्ठी से अन्तिम बादल बह जाने देगा।

फिर किसी दिन चौंक कर
देखेंगे हम :
अरे, यह खिड़की पर
इन्द्रधनुष कौन रच गया है,
किसने ये ढेर हरसिंगार ला धरे हैं?

वर्षान्त प्रतीक्षा नहीं करता
मेरी या तुम्हारी या किसी की।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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एक बार जो ढल जाएंगे!

आज एक बार फिर मैं आधुनिक हिन्दी के प्रसिद्ध रचनाकार, अनेक साहित्यिक पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित माननीय श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| जैसा मैंने पहले भी बताया है भोपाल में साहित्य और संस्कृति को समर्पित ‘भारत भवन’ की संकल्पना उनकी ही थी|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता –

एक बार जो ढल जाएँगे
शायद ही फिर खिल पाएँगे।

फूल शब्द या प्रेम
पंख स्वप्न या याद
जीवन से जब छूट गए तो
फिर न वापस आएँगे।
अभी बचाने या सहेजने का अवसर है
अभी बैठकर साथ
गीत गाने का क्षण है।
अभी मृत्यु से दाँव लगाकर
समय जीत जाने का क्षण है।

कुम्हलाने के बाद
झुलसकर ढह जाने के बाद
फिर बैठ पछताएँगे।

एक बार जो ढल जाएँगे
शायद ही फिर खिल पाएँगे।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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वहाँ भी!

कल मैंने हास्य-व्यंग्य कवि श्री अशोक चक्रधर की एक कविता शेयर की थी तो सोचता हूँ कि आज आधुनिक हिन्दी कविता के एक प्रमुख हस्ताक्षर श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर लूँ| वाजपेयी जी एक प्रमुख कवि होने के अलावा एक उच्च अधिकारी भी रहे हैं और भोपाल का ‘भारत भवन’ उनकी ही अमूल्य देन है|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता–

हम वहाँ भी जायेंगे
जहाँ हम कभी नहीं जायेंगे|

अपनी आखिरी उड़ान भरने से पहले,
नीम की डाली पर बैठी चिड़िया के पास,
आकाशगंगा में आवारागर्दी करते किसी नक्षत्र के साथ,
अज्ञात बोली में उचारे गये मंत्र की छाया में
हम जायेंगे
स्वयं नहीं
तो इन्हीं शब्दों से-

हमें दुखी करेगा किसी प्राचीन विलाप का भटक रहा अंश,
हम आराधना करेंगे
मंदिर से निकाले गये
किसी अज्ञातकुलशील देवता की-

हम थककर बैठ जायेंगे
दूसरों के लिए की गयी
शुभकामनाओं और मनौतियों की छाँह में-


हम बिखर जायेंगे
पंखों की तरह
पंखुरियों की तरह
पंत्तियों और शब्दों की तरह-

हम वहाँ भी जायेंगे
जहाँ हम कभी नहीं जायेंगे।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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तुम जहाँ कहो!

आज श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| अशोक वाजपेयी जी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री स्वर्गीय अर्जुन सिंह जी के काफी नजदीक थे, वे साहित्य और संस्कृति से जुड़े अनेक पदों पर भी आसीन रहे| भोपाल के भारत भवन की परिकल्पना भी वाजपेयी जी की ही थी जो आज साहित्य और संस्कृति से जुड़ी गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र है|

लीजिए आज प्रस्तुत है अशोक वाजपेयी जी की यह कविता–

तुम जहाँ कहो
वहाँ चले जायेंगे
दूसरे मकान में
अँधेरे भविष्य में
न कहीं पहुँचने वाली ट्रेन में|

अपना बस्ता-बोरिया उठाकर
रद्दी के बोझ सा
जीवन को पीठ पर लादकर
जहाँ कहो वहाँ चले जायेंगे,
वापस इस शहर
इस चौगान, इस आँगन में नहीं आयेंगे|

वहीं पक्षी बनेंगे, वृक्ष बनेंगे
फूल या शब्द बन जायेंगे
जहाँ तुम कभी खुद नहीं आना चाहोगे
वहाँ तुम कहो तो
चले जायेंगे|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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वही थोड़ा सा आदमी!

अशोक वाजपेयी जी आधुनिक कवियों की जमात में अग्रिम पंक्ति में नज़र आते हैं| उन्होंने मध्य प्रदेश में और केंद्र में भी सांस्कृतिक उत्थान से जुड़े अनेक पदों को सुशोभित किया| मध्य प्रदेश का ‘भारत भवन’ उनका सांस्कृतिक गतिविधियों के संचालन हेतु बहुत बड़ा कदम था|


लीजिए आज प्रस्तुत है, अशोक वाजपेयी जी की यह कविता –

अगर बच सका
तो वही बचेगा
हम सबमें थोड़ा-सा आदमी–

जो रौब के सामने नहीं गिड़गिड़ाता,
अपने बच्चे के नंबर बढ़वाने नहीं जाता मास्टर के घर,

जो रास्ते पर पड़े घायल को सब काम छोड़कर
सबसे पहले अस्पताल पहुंचाने का जतन करता है,
जो अपने सामने हुई वारदात की गवाही देने से नहीं हिचकिचाता–


वही थोड़ा-सा आदमी–
जो धोखा खाता है पर प्रेम करने से नहीं चूकता,

जो अपनी बेटी के अच्छे फ्राक के लिए
दूसरे बच्चों को थिगड़े पहनने पर मजबूर नहीं करता,

जो दूध में पानी मिलाने से हिचकता है,
जो अपनी चुपड़ी खाते हुए दूसरे की सूखी के बारे में सोचता है,

वही थोड़ा-सा आदमी–
जो बूढ़ों के पास बैठने से नहीं ऊबता
जो अपने घर को चीजों का गोदाम होने से बचाता है,

जो दुख को अर्जी में बदलने की मजबूरी पर दुखी होता है
और दुनिया को नरक बना देने के लिए दूसरों को ही नहीं कोसता

वही थोड़ा-सा आदमी–
जिसे ख़बर है कि
वृक्ष अपनी पत्तियों से गाता है अहरह एक हरा गान,
आकाश लिखता है नक्षत्रों की झिलमिल में एक दीप्त वाक्य,
पक्षी आंगन में बिखेर जाते हैं एक अज्ञात व्याकरण


वही थोड़ा-सा आदमी–
अगर बच सका तो
वही बचेगा।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार

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