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जनकवि शैलेन्द्र

फिल्मी दुनिया के जनकवि स्वर्गीय शैलेन्द्र जी की मृत्यु होने पर जनकवि बाबा नागार्जुन जी द्वारा उनके प्रति श्रद्धांजलि स्वरूप लिखी गई एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| इस कविता से मालूम होता कि बाबा नागार्जुन के मन में, फिल्मी दुनिया में सक्रिय अपने इस सृजनशील साथी के प्रति कितना स्नेह, लगाव और आदर था|


लीजिए आज बाबा नागार्जुन जी द्वारा शैलेन्द्र जी के प्रति उनकी श्रद्धांजलि के रूप में लिखी गई इस कविता का आस्वादन करते हैं-


गीतों के जादूगर का मैं छंदों से तर्पण करता हूँ ।’

सच बतलाऊँ तुम प्रतिभा के ज्योतिपुत्र थे,छाया क्या थी,
भली-भाँति देखा था मैंने, दिल ही दिल थे, काया क्या थी ।

जहाँ कहीं भी अंतर्मन से, ॠतुओं की सरगम सुनते थे,
ताज़े कोमल शब्दों से तुम रेशम की जाली बुनते थे ।

जन मन जब हुलसित होता था, वह थिरकन भी पढ़ते थे तुम,
साथी थे, मज़दूर-पुत्र थे, झंडा लेकर बढ़ते थे तुम ।


युग की अनुगुंजित पीड़ा ही घोर घन-घटा-सी छाई
प्रिय भाई शैलेन्द्र, तुम्हारी पंक्ति-पंक्ति नभ में लहराई ।

तिकड़म अलग रही मुस्काती, ओह, तुम्हारे पास न आई,
फ़िल्म-जगत की जटिल विषमता, आख़िर तुमको रास न आई ।

ओ जन मन के सजग चितेरे, जब-जब याद तुम्हारी आती,
आँखें हो उठती हैं गीली, फटने-सी लगती है छाती ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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आज सड़क के जीव उदास हैं!

आज बाबा नागार्जुन जी की एक प्रसिद्ध कविता याद आ रही है- ‘अकाल और उसके बाद’। इस कविता में अकाल के प्रभाव को बड़े सुंदर तरीके से दर्शाया गया है। जब घर में चूल्हा जलता है तब केवल घर के मानव सदस्य ही तृप्त नहीं होते अपितु ऐसे अनेक जीव भी भोजन पाते हैं, जिनमें से कुछ पर तो हमारा ध्यान जाता है और कुछ पर नहीं।

आजकल दुनिया में जो कोरोना की महामारी फैली है, हजारों लोग इस भयावह रोग की भेंट चढ़ चुके हैं, ऐसे में यह भी हुआ है कि हमने खुद को अपने घरों में बंद कर लिया है। मानव समाज की रक्षा के लिए यह एक प्रभावी कदम लगता है, लेकिन हम देखते हैं कि जब हम बाहर निकलते हैं, तब वहाँ भी अनेक ऐसे जीव हैं जिनका पेट हमारे कारण ही भरता है। कुछ के सामने तो हम स्वयं खाने के लिए कुछ डाल देते हैं और कुछ को हमारे खाने-पीने की गतिविधियों के परिणामस्वरूप कुछ मिल जाता है। आजकल सड़कों पर वे प्राणी, मैं यहाँ श्वान अथवा सड़क के कुत्तों और गायों का तो ज़िक्र कर ही सकता हूँ, वैसे तो अनेक जीव हैं, हम जहाँ चाट ठेले पर, चाय की दुकान या रेस्टोरेंट में कुछ खाते-पीते हैं, तब हम इनके आगे कुछ डालें य न डालें, इनको कुछ मिल ही जाता है। आजकल वे कितनी आस से देखते होंगे, यही खयाल आता है।

 

 

खैर मानव-जाति को इस महामारी से शीघ्र छुटकारा मिले, इस कामना के साथ, लीजिए प्रस्तुत है इससे बिल्कुल अलग परिस्थिति की यह कविता, जिसमें घर के भीतर के प्राणी अभाव झेलते हैं, जबकि आजकल इसका सामना बाहर के प्राणी इस अभाव का सामना कर रहे हैं, कोरोना की महामारी जल्द दूर हो यह इन मूक प्राणियों के लिए भी अच्छा रहेगा।

लीजिए प्रस्तुत है बाबा नागार्जुन जी की यह कविता-

 

अकाल और उसके बाद

 

कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिन तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त।

 

दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद।

 

मानव मात्र की भलाई के लिए और विशेष रूप से भारत में सड‌क के जीवों के लिए भी यह कामना है कि इस दुष्ट रोग का शीघ्र नाश हो।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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