मन तुम्हारे गीत गाना चाहता है!

काफी लंबे अंतराल के बाद मैं आज फिर से स्वर्गीय बलबीर सिंह जी ‘रंग’ का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| रंग जी अपनी तरह के एक अनूठे कवि थे और अपनी कविताओं और प्रस्तुति के अंदाज़ के कारण उन्होंने काव्य मंचों पर अपनी अलग पहचान बनाई थी|

लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह जी ‘रंग’ का यह गीत –

चाहता हूँ मैं तुम्हारी दृष्टि का केवल इशारा,
डूबने को बहुत होता एक तिनके का सहारा,
उर-उदधि में प्यार का तूफ़ान आना चाहता है।
आज मेरा मन तुम्हारे गीत गाना चाहता है।

चाहते थककर दिवाकर-चंद्र नभ का शांत कोना,
सह सकेगी अब न वृद्धा भूमि सब का भार ढोना,
जीर्ण जग फिर से नई दुनिया बसाना चाहता है।
आज मेरा मन तुम्हारे गीत गाना चाहता है।

एक योगी चाहता है बाँधना गतिविधि समय की,
एक संयोगी भुलाना चाहता चिंता प्रलय की,
पर वियोगी आग, पानी में लगाना चाहता है।
आज मेरा मन तुम्हारे गीत गाना चाहता है।

व्यंग्य करता है मनुजता पर मनुज का क्षुद्र-जीवन,
हँस रहा मुझ पर जवानी की उमंगों का लड़कपन,
किंतु कोई साथ मेरे मुस्कुराना चाहता है।
आज मेरा मन तुम्हारे गीत गाना चाहता है।

स्वर्ग लज्जित हो रहा है नर्क की लखकर विषमता,
आज सुख भी रो रहा है देखकर दुख की विवशता,
इंद्र का आसन तभी तो डगमगाना चाहता है।
आज मेरा मन तुम्हारे गीत गाना चाहता है।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

जीवन में अरमानों का !

आज एक बार मैं अपने जमाने में काव्य मंचों पर अपनी तरह की अलग कविता से पहचान बनाने वाले स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| रंग जी अक्सर कविता को आत्म कथन के रूप में, कहें कि अपनी गवाही, अपने स्वाभिमान की अभिव्यक्ति के रूप में भी प्रस्तुत करते थे|

आज के इस गीत में भी रंग जी ने जीवन के बारे में कुछ बहुत सुंदर अभिव्यक्तियाँ की हैं| लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-

जीवन में अरमानों का आदान-प्रदान नहीं होता है

मैंने ऐसा मनुज न देखा
अंतर में अरमान न जिसके,
मिला देवता मुझे न कोई
शाप बने वरदान न जिसके ।
पंथी को क्या ज्ञात कि
पथ की जड़ता में चेतनता है ?
पंथी के श्रम स्वेद-कणों से पथ गतिमान नहीं होता है ।
जीवन में अरमानों का आदान-प्रदान नहीं होता है ।


यदि मेरे अरमान किसी के
उर पाहन तक पहुँच न पाए,
अचरज की कुछ बात नहीं
जो जग ने मेरे गीत न गाए ।
यह कह कर संतोष कर लिया-
करता हूँ मैं अपने उर में,
अरुण-शिखा के बिना कहीं क्या स्वर्ण-विहान नहीं होता है
जीवन में अरमानों का आदान-प्रदान नहीं होता है ।

मैं ही नहीं अकेला आकुल
मेरी भाँति दुखी जन अनगिन,
एक बार सब के जीवन में
आते गायन रोदन के क्षण,
फिर भी सब के मन का सुख-दुख एक समान नहीं होता है ।
जीवन में अरमानों का आदान-प्रदान नहीं होता है ।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

                            ********

हँसाते-हँसाते रूलाया गया हूँ !

स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी हिन्दी साहित्य मंच के एक अनूठे कवि थे, उनकी अभिव्यक्ति शैली अलग तरह की थी, अक्सर एक कवि के रूप में वे अपनी बात करते थे, आज भी मैं ‘आत्माभिव्यक्ति शैली में मैं लिखी गई उनकी एक कविता शेयर कर रहा हूँ|

लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी की यह कविता –


न छेड़ो मुझे मैं सताया गया हूँ ।
हँसाते-हँसाते रूलाया गया हूँ ।

सताए हुए को सताना बुरा है,
तृषित की तृषा को बढ़ाना बुरा है,
विफल याचना की अकर्मण्यता पर-
अभय-दान का मुस्कुराना बुरा है ।
करूँ बात क्या दान या भीख की मैं,
संजोया नहीं हूँ, लुटाया गया हूँ ।
न छेड़ो मुझे…।

न स्वीकार मुझको नियंत्रण किसी का,
अस्वीकार कब है निमंत्रण किसी का,
मुखर प्यार के मौन वातावरण में-
अखरता अनोखा समर्पण किसी का ।
प्रकृति के पटल पर नियति तूलिका से,
अधूरा बना कर, मिटाया गया हूँ !


क्षितिज पर धरा व्योम से नित्य मिलती,
सदा चांदनी में चकोरी निकलती,
तिमिर यदि न आह्वान करता प्रभा का-
कभी रात भर दीप की लौ न जलती ।
करो व्यंग्य मत व्यर्थ मेरे मिलन पर,
मैं आया नहीं हूँ, बुलाया गया हूँ ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

क्यों विष जान पिया करता है!

आज मैं स्वर्गीय बलबीर सिंह जी ‘रंग’ का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| ‘रंग’ जी अपनी अलग प्रकार की अभिव्यक्ति शैली के लिए जाने जाते थे| इस गीत में ‘रंग’ जी ने अपने अंदाज़ में यह कहा है कि कवि गीत क्यों लिखता है|

बलबीर सिंह ‘रंग’ जी की बहुत लोकप्रिय पंक्तियाँ जो मैं अक्सर दोहराता हूँ, वे हैं

आब-ओ-दाना रहे, रहे ना रहे
ये ज़माना रहे, रहे ना रहे,
तेरी महफिल रहे सलामत यार,
आना-जाना रहे, रहे ना रहे।

हमने गुलशन की खैर मांगी है,
आशियाना रहे, रहे ना रहे।


लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी का यह गीत –

कवि क्यों गीत लिखा करता है?
कवि ने गीतों में क्या देखा,
दुःख की छाया, सुख की रेखा;
वरदानों की झोली ले,
वह क्यों अभिशाप लिया करता है?

याद उसे क्यों गा कर रोना,
ज्ञात उसे क्यों पा कर खोना;
मस्ती में अमृत ठुकरा कर,
क्यों विष जान पिया करता है?

जग कवि के गीतों में डूबा,
कवि जग आघातों से ऊबा;
ढाल लगा कर गीतों की वह,
जग आघात सहा करता है।


जब जग कवि में संशय पाता,
तब वह अंतस चीर दिखाता;
फिर वह गीत सूत्र से अपने,
उर के घाव सिया करता है।

गीतों में कुछ दुख चुक जाता,
वेग वेदना का रुक जाता;
वरना वह पीड़ा के तम से,
दिन की रात किया करता है।

माना मन के गीत न कवि के;
किन्तु निरर्थक गीत न कवि के;
गीतों को वह मीत बनाकर,
युग-युग तलक जिया करता है।
कवि क्यों गीत लिखा करता है?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
******

दुःख की छाया, सुख की रेखा!

हिन्दी काव्य मंचों के एक प्रमुख हस्ताक्षर थे स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’, जो अपनी बेबाकी और फक्कड़पन के लिए जाने जाते थे| उनकी कुछ प्रसिद्ध पंक्तियाँ, जिनका मैं अक्सर स्मरण करता हूँ, वे हैं-


आब-ओ-दाना रहे, रहे न रहे,
ये ज़माना रहे, रहे ना रहे,
तेरी महफिल रहे सलामत यार,
आना-जाना रहे, रहे ना रहे|


आज मैं उनका एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसमें वे लिखते हैं की कवि गीत क्यों लिखता है| भावुक लोगों की पीड़ाएँ अलग तरह की होती हैं और कवियों की संपत्ति उनकी भावुकता ही तो है|


लीजिए प्रस्तुत है यह ‘रंग’ जी का यह गीत-


कवि क्यों गीत लिखा करता है?
कवि ने गीतों में क्या देखा,
दुःख की छाया, सुख की रेखा;
वरदानों की झोली ले,
वह क्यों अभिशाप लिया करता है?

याद उसे क्यों गाकर रोना,
ज्ञात उसे क्यों पाकर खोना;
मस्ती में अमृत ठुकरा कर,
क्यों विष जान पिया करता है?


जग कवि के गीतों में डूबा,
कवि जग आघातों से ऊबा;
ढाल लगाकर गीतों की वह,
जग आघात सहा करता है।

जब जग कवि में संशय पाता,
तब वह अंतस चीर दिखाता;
फिर वह गीत सूत्र से अपने,
उर के घाव सिया करता है।

गीतों में कुछ दुख चुक जाता,
वेग वेदना का रुक जाता;
वरना वह पीड़ा के तम से,
दिन की रात किया करता है।


माना मन के मीत न कवि के;
किन्तु निरर्थक गीत न कवि के;
गीतों को वह मीत बनाकर,
युग-युग तलक जिया करता है।
कवि क्यों गीत लिखा करता है?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


*********