पी जा हर अपमान!

आज एक बार फिर गीतों की दुनिया के एक पुराने हस्ताक्षर स्वर्गीय बाल स्वरूप ‘राही’ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ | राही जी ने कुछ बहुत अच्छे गीतों और ग़ज़लों का उपहार हमें दिया है| उनको कवि सम्मेलनों में सुनने का भी अवसर मुझे मिला था, उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे मुस्कुराते हुए पूरा काव्य पाठ करते थे|

लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय बाल स्वरूप ‘राही’ जी का यह गीत –



पी जा हर अपमान और कुछ चारा भी तो नहीं !

तूने स्वाभिमान से जीना चाहा यही ग़लत था
कहाँ पक्ष में तेरे किसी समझ वाले का मत था
केवल तेरे ही अधरों पर कड़वा स्वाद नहीं है
सबके अहंकार टूटे हैं तू अपवाद नहीं है

तेरा असफल हो जाना तो पहले से ही तय था
तूने कोई समझौता स्वीकारा भी तो नहीं !

ग़लत परिस्थिति ग़लत समय में ग़लत देश में होकर
क्या कर लेगा तू अपने हाथों में कील चुभोकर
तू क्यों टँगे क्रॉस पर तू क्या कोई पैग़म्बर है
क्या तेरे ही पास अबूझे प्रश्नों का उत्तर है?

कैसे तू रहनुमा बनेगा इन पाग़ल भीड़ों का
तेरे पास लुभाने वाला नारा भी तो नहीं ।


यह तो प्रथा पुरातन दुनिया प्रतिभा से डरती है
सत्ता केवल सरल व्यक्ति का ही चुनाव करती है
चाहे लाख बार सिर पटको दर्द नहीं कम होगा
नहीं आज ही, कल भी जीने का यह ही क्रम होगा

माथे से हर शिकन पोंछ दे, आँखों से हर आँसू
पूरी बाज़ी देख अभी तू हारा भी तो नहीं।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
******

सपने ताजमहल के हैं!

आज मैं हिन्दी बहुत प्यारे कवि/ गीतकार स्वर्गीय बाल स्वरूप राही जी की एक गजल प्रस्तुत कर रहा हूँ| राही जी ने बहुत अच्छे गीत और गज़लें हमें दी हैं| आज की ये गजल भी आशा है आपको पसंद आएगी-

 

 

उनके वादे कल के हैं,
हम मेहमाँ दो पल के हैं ।

 

कहने को दो पलकें हैं,
कितने सागर छलके हैं ।

 

मदिरालय की मेज़ों पर,
सौदे गंगा जल के हैं ।

 

नई सुबह के क्या कहने,
ठेकेदार धुँधलके हैं ।

 

जो आधे में छूटी हम,
मिसरे उसी ग़ज़ल के हैं ।

 

बिछे पाँव में क़िस्मत है,
टुकड़े तो मखमल के हैं ।

 

रेत भरी है आँखों में,
सपने ताजमहल के हैं ।

 

क्या दिमाग़ का हाल कहें,
सब आसार खलल के हैं ।

 

सुने आपकी राही कौन,
आप भला किस दल के हैं ।

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

******