नहीं आता है तो अपना नहीं आता!

मै-ख़ाने में कुछ पी चुके कुछ जाम ब-कफ़ हैं,
साग़र नहीं आता है तो अपना नहीं आता|

आनंद नारायण मुल्ला

रूठ गए दिन बहार के!

वीराँ है मयकदा ख़ुमो-सागर उदास हैं,
तुम क्या गये कि रूठ गए दिन बहार के|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

जहाँ गए जाकर पछताए!

झूठे जग में सच्चे सुख की,
क्या तो कोई आस लगाए ।

देवालय हो या मदिरालय,
जहाँ गए जाकर पछताए ।

बालस्वरूप राही

नैन तुम्हारे सचमुच के मयख़ाने हों!

फ़र्ज़ करो तुम्हें ख़ुश करने के ढूंढे हमने बहाने हों,
फ़र्ज़ करो ये नैन तुम्हारे सचमुच के मयख़ाने हों|

इब्ने इंशा

शक्ल क्या हो गई मय-ख़ाने की!

क़ौस इक रंग की होती है तुलू
एक ही चाल भी पैमाने की,
गोशे-गोशे में खड़ी है मस्जिद
शक्ल क्या हो गई मय-ख़ाने की|

कैफ़ी आज़मी

चेहरे पे नूर था!

पीते तो हमने शैख़ को देखा नहीं मगर,
निकला जो मै-कदे से तो चेहरे पे नूर था|

आनंद नारायण ‘मुल्ला’

हैं वरना मयखाने बहुत!

साक़िया हम को मुरव्वत चाहिए,
शहर में हैं वरना मयखाने बहुत|

महेन्द्र सिंह बेदी ‘सहर’

-लेकर ख़ुदा का नाम, चलो–

यारो जो होगा देखेंगे, ग़म से तो हो निजात,
लेकर ख़ुदा का नाम, चलो मयकदे चलें|

कृष्ण बिहारी ‘नूर

जीना न हो हराम!

अच्छा, नहीं पियेंगे जो पीना हराम है,
जीना न हो हराम, चलो मयकदे चलें|

कृष्ण बिहारी ‘नूर’