मय-ख़ाना तेरे शहर में!

लाई फिर इक लग़्ज़िश-ए-मस्ताना तेरे शहर में,
फिर बनेंगी मस्जिदें मय-ख़ाना तेरे शहर में|

कैफ़ी आज़मी

क्या तिरी आँख की जवानी है!

मय-कदों के भी होश उड़ने लगे,
क्या तिरी आँख की जवानी है|

फ़िराक़ गोरखपुरी

मै-कदों में मगर दूर दूर था!

‘मुल्ला’ का मस्जिदों में तो हमने सुना न नाम,
ज़िक्र उसका मै-कदों में मगर दूर दूर था|

आनंद नारायण ‘मुल्ला’