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बड़ी दूर तक रात ही रात होगी!

डॉ बशीर बद्र जी आज की उर्दू शायरी की पहचान बनाने वाले प्रमुख शायरों में से एक हैं। उनके कुछ शेर तो जैसे मुहावरा बन गए हैं| जैसे आज की ग़ज़ल का एक शेर भी अक्सर दोहराया जाता है- ‘मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी,किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी’|

डॉ बशीर बद्र जी उर्दू शायरी में एक्सपेरीमेंट करने के लिए भी जाने जाते हैं| लीजिए आज इस ग़ज़ल का आनंद लीजिए-

कहाँ आँसुओं की ये सौग़ात होगी ,
नए लोग होंगे नई बात होगी |

मैं हर हाल में मुस्कुराता रहूँगा,
तुम्हारी मोहब्बत अगर साथ होगी |

चराग़ों को आँखों में महफ़ूज़ रखना,
बड़ी दूर तक रात ही रात होगी |

परेशाँ हो तुम भी परेशाँ हूँ मैं भी,
चलो मय-कदे में वहीं बात होगी|

चराग़ों की लौ से सितारों की ज़ौ तक,
तुम्हें मैं मिलूँगा जहाँ रात होगी |

जहाँ वादियों में नए फूल आए,
हमारी तुम्हारी मुलाक़ात होगी |

सदाओं को अल्फ़ाज़ मिलने न पाएँ,
न बादल घिरेंगे न बरसात होगी |

मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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न जाने किस गली में, ज़िंदगी की शाम हो जाए!

आधुनिक उर्दू शायरी के प्रमुख हस्ताक्षर डॉ बशीर बद्र जी की एक ग़ज़ल आज शेयर कर रहा हूँ| डॉ बद्र शायरी में नया मुहावरा गढ़ने और  प्रयोग करने के लिए जाने जाते हैं|

इस ग़ज़ल की विशेष बात ये है कि इसका अंतिम शेर जैसे एक मुहावरा बन गया, लोग अक्सर इसका प्रयोग करते हैं, ये जाने बिना कि यह किस ग़ज़ल से है|

लीजिए प्रस्तुत है ये खूबसूरत ग़ज़ल-

हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए,
चराग़ों की तरह आँखें जलें, जब शाम हो जाए|

मैं ख़ुद भी एहतियातन, उस गली से कम गुजरता हूँ,
कोई मासूम क्यों मेरे लिए, बदनाम हो जाए|

अजब हालात थे, यूँ दिल का सौदा हो गया आख़िर
मुहब्बत की हवेली जिस तरह नीलाम हो जाए|

समन्दर के सफ़र में इस तरह आवाज़ दो हमको,
हवायें तेज़ हों और कश्तियों में शाम हो जाए

मुझे मालूम है उसका ठिकाना फिर कहाँ होगा,
परिंदा आस्माँ छूने में जब नाकाम हो जाए|


उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में, ज़िंदगी की शाम हो जाए|

आज के लिए इतना ही

नमस्कार|   

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बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की!

हिन्दुस्तानी उर्दू शायरी के एक प्रसिद्ध हस्ताक्षर हैं- ज़नाब बशीर बद्र जी| वे शायरी में एक्सपेरीमेंट करने के लिए जाने जाते हैं| मुशायरों को लूटने वाले बशीर जी की गज़लें अक्सर लोग गुनगुनाते हैं|

उनका यह शेर –‘उजाले अपनी यादों के हमारे पास रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए’, यह शेर एक मुहावरा बन गया है| एक और शेर मुझे अभी याद आ रहा है- ‘कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज़ का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो’|


बशीर जी की अनेक गज़लें बहुत लोकप्रिय हैं और अनेक गायकों ने उनको गाया है|
आज की यह ग़ज़ल भी बहुत खूबसूरत है, आइए आज इस ग़ज़ल का आनंद लेते हैं –

न जी भर के देखा न कुछ बात की,
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की|

उजालों की परियाँ नहाने लगीं,
नदी गुनगुनाई ख़यालात की|


मैं चुप था तो चलती हवा रुक गई,
ज़ुबां सब समझते हैं जज़्बात की|


मुक़द्दर मेरी चश्म-ए-पुर-आब का,
बरसती हुई रात बरसात की|


कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं,
कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मकान ख़ाली हुआ है, तो कोई आएगा!

आज उर्दू शायरी में अपनी अलग पहचान बनाने वाले, डॉक्टर बशीर बद्र जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| बशीर बद्र जी शायरी में प्रयोग करने के लिए विख्यात हैं|


आज मैं उनकी जो ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, वह एक रूमानी ग़ज़ल है| हमेशा सीरियस बातें तो ठीक नहीं हैं, इसलिए आज इस रूमानी ग़ज़ल का आनंद लीजिए-



अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा,
मगर तुम्हारी तरह कौन मुझ को चाहेगा|

तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा,
मगर वो आँखें हमारी कहाँ से लाएगा|

न जाने कब तेरे दिल पर नई सी दस्तक हो,
मकान ख़ाली हुआ है तो कोई आएगा |

मैं अपनी राह में दीवार बन के बैठा हूँ ,
अगर वो आया तो किस रास्ते से आएगा |

तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है,
तुम्हारे बाद ये मौसम बहुत सताएगा |

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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