लंदन डे टूर- ’स्टोनहेंज’ और ‘बाथ’ !

फिर से बता दूँ कि लंदन प्रवास के जो अनुभव मैं आजकल शेयर कर रहा हूँ, वे अगस्त-सितंबर, 2019 में हुए दूसरे लंदन प्रवास के हैं|

मेरे बेटे ने ‘लंदन डे टूर’ में बुकिंग की थी जिसके अंतर्गत हमने दो महत्वपूर्ण स्थान कल देखे। सुबह 7-45 बजे की बस बुकिंग थी, हम घर से 7 बजे सुबह निकले, दो ट्यूब ट्रेन बदलने और काफी दूर तक भागने के बाद हम बस तक पहुंच पाए, क्योंकि वहाँ तक पहुंचने के टाइम की केल्कुलेशन में थोड़ी गड़बड़ हो गई थी।

खैर काफी आरामदायक बस थी, उसमें कमेंट्री करने वाला व्यक्ति भी काफी जानकारी रखने वाला था और उसकी प्रस्तुति भी काफी रोचक थी। वह जहाँ रास्ते में पड़ने वाले सभी स्थानों के बारे में बताता जा रहा था, मैं यहाँ उन दो महत्वपूर्ण स्थानों के बारे में ही बात करूंगा जो इस यात्रा के पड़ाव और प्रमुख आकर्षण थे।
जी हाँ लगभग 2 घंटे यात्रा करने के बाद हम अपने पहले पड़ाव ‘स्टोनहेंज’ पहुंचे जो प्रागैतिहासिक काल का निर्माण है, लगभग 5,000 वर्ष पुराना और विश्व धरोहरों में शामिल है। कुल मिलाकर देखा जाए तो इसमें बड़े-बड़े पत्थर के लंबे आयताकार स्लैब, कुछ खड़े और कुछ पड़े, खड़े हुए स्लैब्स के ऊपर पड़े स्लैब टिकाए गए हैं, जैसे कोई बच्चा स्ट्रक्चर बनाता है। कितने लंबे समय से प्रागैतिहासिक काल का गोलाकार रूप में बना यह ढांचा बना हुआ है। बताया जाता है कि इसका निर्माण सूर्य की गति के अनुसार किया गया है, सुबह जब सूरज उगता है तब कहाँ से दिखता है और सूर्यास्त के समय उसकी रोशनी किधर पड़ती है। यह विश्व धरोहर है और अवश्य देखने का स्थान है। यहाँ पर पुरानी झौंपड़ियों के स्वरूप भी प्रस्तुत किए गए हैं, टिकट के साथ एक वॉकी टॉकी जैसा यंत्र दिया जाता है, इसमें आप जिस स्थान पर पहुंचे हैं, उससे संबंधित बटन दबाने पर आपको उसका विवरण सुनने को मिलता है।

एक बात और कि यहाँ भेड़ें बहुत अधिक संख्या में हैं और उनको नजर न लग जाए, बहुत स्वस्थ भी दिखाई देती हैं। कमेंट्री करने वाला व्यक्ति भी विभिन्न जीवों की संख्या बता रहा था और उसके बाद उसने कहा कि भेड़ों की संख्या का अनुमान लगाना बहुत कठिन है। यहाँ अंदर एक स्थान से दूसरे पर ले जाने के लिए काफी आरामदेह बसों की व्यवस्था भी है। एक बार अवश्य देखने के लायक है।

इसके बाद हम फिर से अपनी दैनिक टूर वाली बस में बैठ गए और उद्घोषक से रोचक विवरण सुनते हुए दिन के दूसरे और अंतिम पड़ाव की तरफ आगे बढ़ने लगे। लगभग डेढ़ घंटे की यात्रा के बाद हम वहाँ पहुंचे, इस स्थान का नाम है- ‘बाथ’, जी हाँ नहाने वाला ‘बाथ’ यह नाम है इस नगर का, प्रकृति की मनोरम छटा के बीच बसा। बस से यहाँ पहुंचते समय ही पहाड़ी चढ़ाई से सामने घाटी में और उसके पार बने रॉयल निवास बहुत सुंदर लग रहे थे, जैसे अपने किसी हिल-स्टेशन में दूर घर दिखाई देते हैं, लेकिन यहाँ क्योंकि रॉयल लोगों के घर थे सो इनकी बनावट भी अतिरिक्त आकर्षक थी।

यह अत्यंत सुंदर नगर है, यहाँ आपको अनेक सुंदर रेस्टोरेंट, पब अपनी तरफ खींचते हैं, एक आइस-क्रीम की दुकान हैं जहाँ लाइन लगी रहती है क्योंकि कुछ लोग कहते हैं कि यहाँ जैसी आइस क्रीम कहीं नहीं मिलती। इमारतें अर्द्ध-गोलाकार रूप में बनी हैं और इस कारण मुहल्ले का नाम ‘सर्कस’ पड़ जाता है, (जो वास्तव में सर्किल ही है)।

सुंदर पार्क, ब्रिज, झील आदि इस नगर को और भी आकर्षित बनाते हैं। हाँ बाथ के लिए जो नेचुरल वाटर का स्रोत है, उसने तो इस नगर को यह नाम ही दिया है।

यहाँ जो रईस लोग रहते थे, उनके घरों के बारे में बताते हैं कि ये तीन मंज़िला होते हैं, अभी भी हैं। भूतल पर प्रवेश और रसोई, प्रथम तल पर ‘ड्राइंग रूम’ मेहमानों के स्वागत के लिए और द्वितीय तल में शयन- कक्ष होता था। उसके ऊपर नौकर रहते थे। मालिकों को सामान्यतः नौकर लोग कुर्सी पर बैठी स्थिति में उठाकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाते थे।

इस सुंदर नगर में भ्रमण का, यहाँ खाने-पीने का हमने 3 घंटे तक आनंद लिया और इसके बाद वापसी यात्रा का प्रारंभ, उद्घोषक द्वारा दी जा रही जानकारी, हंसी-मज़ाक के साथ प्रारंभ किया।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

**********

ये लंदन-वो दिल्ली!

यह आलेख मैंने पिछले वर्ष लंदन छोड़ने से पहले लिखा था, अब इस वर्ष फिर से वही घटना हो रही है तो थोड़ा बहुत एडिट करके फिर से प्रस्तुत कर रहा हूँ। पिछले वर्ष एक महीना रुका था, 6 जून से 6 जुलाई तक, इस बार प्रवास डेढ़ महीने का है, 6 अगस्त से 20 सितंबर तक, अब बस चलाचली की बेला है।

 

 

काफी दिन पहले अपने एक भारतीय अखबार में छपा एक कार्टून याद आ रहा है। उस समय लंदन को दुनिया का सबसे खूबसूरत नगर घोषित किया गया था। कार्टून में एक घर का कमरा दिखाया गया था, जिसमें एक भारतीय सरदार जी का परिवार था, सामान इधर-उधर फैला था, कमरे के आर-पार डोरी टांगकर उस पर कपड़े सूख रहे थे, और वो अपनी पत्नी से कह रहे थे- देखो जी, हम दुनिया के सबसे खूबसूरत नगर में रह रहे हैं।

 

 

 

कैसे तुलना करें। दिल्ली की बात- मतलब भारत की बात और लंदन मतलब ब्रिटेन की बात! दोनों नगर प्रतिनिधि तो हैं ही,दो देशों के,दो संस्कृतियों के।

 

 

वैसे हमें दूसरों के सामने खुद को नीचा करके दिखाने की आदत है,लेकिन मैं प्रयास करुंगा इस मामले में संतुलित रहने की।

 

 

अंग्रेजों को देखकर लंबे समय से एक छवि बनी रही है हमारे मन में- ‘टुम हिंदुस्तानी कैसे हमारे सामने खड़े होने की हिम्मत करटा है’। एक टॉम आल्टर थे, अभिनेता जो मूल रूप से अंग्रेज थे और अक्सर बुरे,अत्याचारी अंग्रेजों की भूमिका निभाते रहते थे।
आज की तारीख में दुनिया में जो महानतम लोकतंत्र हैं, उनमें शायद अमरीका, ब्रिटेन और भारत ही सबसे प्रमुख हैं। लेकिन लोकतंत्र की समान कड़ी को छोड़कर बाकी बातों में,संस्कृति में बहुत बड़ा अंतर है।

 

हिंदुस्तानी लोग पारंपरिक रूप से बहुत शांत,संतोषी और सबको प्यार करने वाले रहे हैं। मुझे इस संदर्भ में ‘जिस देश में गंगा बहती है’ का नायक ‘राजू’ याद आता है। वैसे वो भी तो फिल्म में अपनी तरह का अकेला ही था। लेकिन इस संस्कृति में बहुत प्रदूषण व्याप गया है। इस माहौल को खराब करने में आज की राजनीति का भी बहुत बड़ा योगदान है।

 

 

हमारे यहाँ ऐसी पहचान बन गई है कि कुछ खास पार्टियों का सक्रिय सदस्य होने का मतलब है- गुंडा होना।

 

 

लंदन में बहुत बड़ा अंतर जो भारत के मुकाबले, यहाँ आते ही दिखाई देता है, वह है कि यहाँ सार्वजनिक स्थानों पर,एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड पर कहीं भी आपको प्रेमी युगल चुंबन लेते, लिपटते, प्यार करते दिख जाएंगे। भारत में तो इसे अपराध माना जाता है, हाँ यह थोड़ा-बहुत एयरपोर्ट तक पहुंच रहा है।

 

 

भारत में सरेआम लोग लड़की को छेड़ सकते हैं, लड़ाई-झगड़ा कर सकते हैं, यहाँ तक कि अपहरण और ‘रेप’ भी कर सकते हैं, लेकिन प्रेम नहीं कर सकते! उसको रोकने के लिए ‘एंटी रोमियो स्क्वैड’ और बजरंग दल के महान स्वयंसेवक अपने प्राणों की आहुति देने को तैयार रहते हैं। इनको यह नहीं लगता कि लूटपाट,दंगा और बलात्कार आदि रोकने में उनकी कोई भूमिका हो सकती है!

 

 

यह बहुत बड़ी बात है कि अंग्रेज, जिनकी छवि हमारे मन में बर्बर, अत्याचारी और नफरत करने वालों की थी,वे आज प्रेम के प्रतिनिधि नजर आते हैं और मानव-मात्र से प्रेम वाली हमारी संस्कृति के प्रतिनिधि- हिंसा और नफरत में लिप्त दिखाई देते हैं।
एक बात मैं अवश्य कहना चाहूंगा कि सच्चे भारतीय आज भी सबसे प्रेम करने वाले और ईश्वर से भय खाने वाले हैं,हाँ महानगरों में कुछ लोग ऐसे सामने आ रहे हैं, और ये लोग अपनी गतिविधियों में इतने सक्रिय हैं कि इनके कारण हमारे देश का नाम खराब हो रहा है।

 

 

आज यह सुनकर बहुत खराब लगता है कि भारत विदेशी महिला सैलानियों के लिए सुरक्षित नहीं है। वास्तव में इस मामले में कानून का भय कायम किए जाने की आवश्यकता है,जिससे विदेशी सैलानी हमेशा हमारे बारे में अच्छी राय रखें, भारत भ्रमण के अच्छे अनुभव लेकर जाएं।

 

 

मैं इंग्लैंड प्रवास में यह बात कह रहा हूँ,क्योंकि मुझे लगता है कि जो लोग भारत आते हैं, वे हमारी मेज़बानी से प्रसन्न होकर जाएं।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

********

लंदन डे टूर- ’स्टोनहेंज’ और ‘बाथ’ !

कई दिन से पिछले साल के अनुभव शेयर कर रहा था, लेकिन आज जो अनुभव शेयर कर रहा हूँ वह कल का ही है।

मेरे बेटे ने ‘लंदन डे टूर’ में बुकिंग की थी जिसके अंतर्गत हमने दो महत्वपूर्ण स्थान कल देखे। सुबह 7-45 बजे की बस बुकिंग थी, हम घर से 7 बजे सुबह निकले, दो ट्यूब ट्रेन बदलने और काफी दूर तक भागने के बाद हम बस तक पहुंच पाए, क्योंकि वहाँ तक पहुंचने के टाइम की केल्कुलेशन में थोड़ी गड़बड़ हो गई थी।

खैर काफी आरामदायक बस थी, उसमें कमेंट्री करने वाला व्यक्ति भी काफी जानकारी रखने वाला था और उसकी प्रस्तुति भी काफी रोचक थी। वह जहाँ रास्ते में पड़ने वाले सभी स्थानों के बारे में बताता जा रहा था, मैं यहाँ उन दो महत्वपूर्ण स्थानों के बारे में ही बात करूंगा जो इस यात्रा के पड़ाव और प्रमुख आकर्षण थे।

जी हाँ लगभग 2 घंटे यात्रा करने के बाद हम अपने पहले पड़ाव ‘स्टोनहेंज’ पहुंचे जो प्रागैतिहासिक काल का निर्माण है, लगभग 5,000 वर्ष पुराना और विश्व धरोहरों में शामिल है। कुल मिलाकर देखा जाए तो इसमें बड़े-बड़े पत्थर के लंबे आयताकार स्लैब, कुछ खड़े और कुछ पड़े, खड़े हुए स्लैब्स के ऊपर पड़े स्लैब टिकाए गए हैं, जैसे कोई बच्चा स्ट्रक्चर बनाता है। कितने लंबे समय से प्रागैतिहासिक काल का गोलाकार रूप में बना यह ढांचा बना हुआ है। बताया जाता है कि इसका निर्माण सूर्य की गति के अनुसार किया गया है, सुबह जब सूरज उगता है तब कहाँ से दिखता है और सूर्यास्त के समय उसकी रोशनी किधर पड़ती है। यह विश्व धरोहर है और अवश्य देखने का स्थान है। यहाँ पर पुरानी झौंपड़ियों के स्वरूप भी प्रस्तुत किए गए हैं, टिकट के साथ एक वॉकी टॉकी जैसा यंत्र दिया जाता है, इसमें आप जिस स्थान पर पहुंचे हैं, उससे संबंधित बटन दबाने पर आपको उसका विवरण सुनने को मिलता है।

एक बात और कि यहाँ भेड़ें बहुत अधिक संख्या में हैं और उनको नजर न लग जाए, बहुत स्वस्थ भी दिखाई देती हैं। कमेंट्री करने वाला व्यक्ति भी विभिन्न जीवों की संख्या बता रहा था और उसके बाद उसने कहा कि भेड़ों की संख्या का अनुमान लगाना बहुत कठिन है। यहाँ अंदर एक स्थान से दूसरे पर ले जाने के लिए काफी आरामदेह बसों की व्यवस्था भी है। एक बार अवश्य देखने के लायक है।

इसके बाद हम फिर से अपनी दैनिक टूर वाली बस में बैठ गए और उद्घोषक से रोचक विवरण सुनते हुए दिन के दूसरे और अंतिम पड़ाव की तरफ आगे बढ़ने लगे। लगभग डेढ़ घंटे की यात्रा के बाद हम वहाँ पहुंचे, इस स्थान का नाम है- ‘बाथ’, जी हाँ नहाने वाला ‘बाथ’ यह नाम है इस नगर का, प्रकृति की मनोरम छटा के बीच बसा। बस से यहाँ पहुंचते समय ही पहाड़ी चढ़ाई से सामने घाटी में और उसके पार बने रॉयल निवास बहुत सुंदर लग रहे थे, जैसे अपने किसी हिल-स्टेशन में दूर घर दिखाई देते हैं, लेकिन यहाँ क्योंकि रॉयल लोगों के घर थे सो इनकी बनावट भी अतिरिक्त आकर्षक थी।
यह अत्यंत सुंदर नगर है, यहाँ आपको अनेक सुंदर रेस्टोरेंट, पब अपनी तरफ खींचते हैं, एक आइस-क्रीम की दुकान हैं जहाँ लाइन लगी रहती है क्योंकि कुछ लोग कहते हैं कि यहाँ जैसी आइस क्रीम कहीं नहीं मिलती। इमारतें अर्द्ध-गोलाकार रूप में बनी हैं और इस कारण मुहल्ले का नाम ‘सर्कस’ पड़ जाता है, (जो वास्तव में सर्किल ही है)।
सुंदर पार्क, ब्रिज, झील आदि इस नगर को और भी आकर्षित बनाते हैं। हाँ बाथ के लिए जो नेचुरल वाटर का स्रोत है, उसने तो इस नगर को यह नाम ही दिया है।

यहाँ जो रईस लोग रहते थे, उनके घरों के बारे में बताते हैं कि ये तीन मंज़िला होते हैं, अभी भी हैं। भूतल पर प्रवेश और रसोई, प्रथम तल पर ‘ड्राइंग रूम’ मेहमानों के स्वागत के लिए और द्वितीय तल में शयन- कक्ष होता था। उसके ऊपर नौकर रहते थे। मालिकों को सामान्यतः नौकर लोग कुर्सी पर बैठी स्थिति में उठाकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाते थे।

इस सुंदर नगर में भ्रमण का, यहाँ खाने-पीने का हमने 3 घंटे तक आनंद लिया और इसके बाद वापसी यात्रा का प्रारंभ, उद्घोषक द्वारा दी जा रही जानकारी, हंसी-मज़ाक के साथ प्रारंभ किया।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।