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तुम्हारी ये जवानी सलामत रहे!

एक गीत आज फिर से शेयर कर रहा हूँ मुकेश जी का | इस गीत को शेयर करने से पहले ऐसे ही एक शेर याद आ रहा है, वैसे इसका गीत से कोई संबंध नहीं है, ऐसे ही याद आया तो पेश कर रहा हूँ-

गुज़रो जो बाग से तो दुआ मांगते चलो,
जिसमें लगे हैं फूल वो डाली हरी रहे|


एक और शेर था जो अभी याद नहीं आ रहा है, लेकिन उसमें कहा गया था कि छायादार वृक्ष बने रहें|

ऐसे ही खयाल आया कि अब यहाँ पेड़ वाली छाया तो नहीं है, जिसमें राहगीर को ठंडक मिले, ज़ुल्फ़ों के रंगीन साये को लेकर ही कवि/शायर दुआ करता है कि किसी की जवानी सलामत रहे, खैर दुआ ही की है न, तो अच्छी बात है|

लीजिए आज प्रस्तुत है मुकेश जी का गाया 1968 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘अंजाम’ का गीत, जिसे लिखा है हसरत जयपुरी जी ने और इसके संगीतकार शायद ‘गणेश’ थे| लीजिए प्रस्तुत है ये मधुर गीत –


ज़ुल्फ़ों का रंगी साया,
रे तौबा खुदाया,
तुम्हारी ये जवानी सलामत रहे|
ज़ुल्फ़ों का रंगी साया|

भीगी फिजाएं देखो, चंचल हवाएं देखो,
दिल की सदा है यही, चुप ना रहो|
जागे हैं अरमां मेरे, मुखड़े पे गेसू तेरे,
दिन है कि रात बोलो, कुछ तो कहो|
बोलो ना बोलो हमसे, हम तो कहेंगे तुमसे
तुम्हारी ये जवानी सलामत रहे|
ज़ुल्फ़ों का रंगी साया|


दुनिया में होंगे कई, दिल को चुराने वाले
तुम सा ना देखा कोई, माह-ए-नक़ाब
दुनिया बनाने वाला, तुझको बना के गोरी,
रूप बनाना हाय भूल गया,
तुम्हारा है ज़माना, बना दो तुम दीवाना
तुम्हारी ये जवानी सलामत रहे|
ज़ुल्फ़ों का रंगी साया
|

हाए ये अदाएं तेरी, तुझ से ही बहारें मेरी,
गुल भी पुकारें तुझे बाद-ए-सबा
बिगड़ी बनाना सीखो, दिल का लगाना सीखो,
ज़ुल्फ़ें बनाना छोड़ो, जान-ए-वफ़ा,
लबों पे सदा ही आएं हमारे ये दुआएं
तुम्हारी ये जवानी सलामत रहे|
ज़ुल्फ़ों का रंगी साया||




आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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चांद आहें भरेगा!

आज एक बार फिर मैं अपने प्रिय गायक- मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर करूंगा| नायिका के सौंदर्य का वर्णन करने वाले अनेक गीत आपने सुने होंगे, लेकिन इस ऊंचाई वाला गीत बहुत मुश्किल से सुनने को मिलता है, और फिर मुकेश जी की आवाज़ तो इसमें अलग से जान डाल ही रही है|

लीजिए  फिल्म- ‘फूल बने अंगारे’ के लिए आनंद बख्शी जी के लिखे इस गीत का आनंद लीजिए, जिसे कल्याण जी आनंद जी के संगीत निर्देशन में मुकेश जी ने गाया है-

चांद आहें भरेगा,
फूल दिल थाम लेंगे,
हुस्न की बात चली तो,
सब तेरा नाम लेंगे|


आँखें नाज़ुक सी कलियां,
बात मिश्री की डलियां,
होंठ गंगा के साहिल,
ज़ुल्फ़ें जन्नत की गलियां|
तेरी खातिर फ़रिश्ते,
सर पे इल्ज़ाम लेंगे|

हुस्न की बात चली तो,
सब तेरा नाम लेंगे|


चुप न होगी हवा भी,
कुछ कहेगी घटा भी,
और मुमकिन है तेरा,
ज़िक्र कर दे खुदा भी|
फिर तो पत्थर ही शायद,
ज़ब्त से काम लेंगे|

हुस्न की बात चली तो,
सब तेरा नाम लेंगे|


चाँद आहें भरेगा,
फूल दिल थाम लेंगे,
हुस्न की बात चली तो,
सब तेरा नाम लेंगे|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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Film Song

नींद सूरज-सितारों को आने लगे!

वक़्त भी क्या-क्या चालें चलता है, आज तो देश और दुनिया के लिए मानो परीक्षा की घड़ी है| वक़्त की इस चाल की चिंता तो हम सभी को करनी है और करनी भी पड़ेगी, लेकिन यहाँ मैं इससे अलग जाते हुए नायिका की चाल, चालबाजी नहीं जी, सिर्फ ‘चाल’, उसके चलने के अंदाज़ के बारे में बात करूंगा, क्योंकि कवि-शायर तो उसकी हर अदा पर कुर्बान जाते हैं, जिसमें ‘चाल’ भी शामिल है|

हालांकि पाक़ीज़ा फिल्म में तो राजकुमार नायिका की चाल पर पाबंदी लगा देना चाहते हैं, जब वो ट्रेन में सोती हुई नायिका देखकर कहते हैं- ‘आपके पाँव बहुत सुंदर हैं, इन्हें ज़मीन पर मत उतारना’!


खैर चाल के बारे में बात भी मैं अपने प्रिय गायक मुकेश जी की गाई गीत पंक्तियों के साथ करूंगा-


तौबा ये मतवाली चाल,
झुक जाए फूलों की डाल, चांद और सूरज आकर मांगें
तुझसे रंग-ओ-जमाल,
हसीना तेरी मिसाल कहाँ|


मुकेश जी की आवाज में ही एक और गीत की पंक्तियाँ याद आ रही हैं, जिसे नीरज जी ने लिखा है-


चाल ऐसी है मदहोश मस्ती भरी,
नींद सूरज-सितारों को आने लगे,
इतने नाज़ुक क़दम चूम पाएँ अगर,
सोते-सोते बियाबान गाने लगें,
मत महावर रचाओ बहुत पाँव में,
फर्श का मर्मरी दिल दहल जाएगा|


अब क्या करूं फिर से मुकेश जी का ही गाया एक और गीत याद आ रहा है-


गोरी तेरे चलने पे, मेरा दिल कुर्बां,
तेरा चलना, तेरा रुकना, तेरा मुड़ना तौबा,
मेरा दिल कुर्बां|


लीजिए एक और गीत याद आ रहा है ‘चाल’ पर-


ठुमक-ठुमक मत चलो, हाँ जी मत चलो,
किसी का दिल धड़केगा,
मंद-मंद मत हंसो, हाँ जी मत हंसो,
कोई प्यासा भटकेगा|

वैसे जब नायिका की गलियों की तरफ नायक जाता है, तब उसकी चाल भी कुछ अलग ही होती है न-

चल मेरे दिल, लहरा के चल,

मौसम भी है, वादा भी है|

उसकी गली का फासला,

थोड़ा भी है, ज्यादा भी है|


अब इसके बाद क्या कहूँ, एक गीत की पंक्तियाँ फिलहाल याद आ रही हैं-


हम चल रहे थे, तुम चल रहे थे,
मगर दुनिया वालों के दिल जल रहे थे|


तो भाई मेरे जलने की कोई बात नहीं है, सब चलते रहें, ये दुनिया भी चलती रहे और सब खुश रहें|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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वह चलती है, सुंदरता बिखेरते हुए!

आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

पिछले कुछ दिनों में मैंने लॉर्ड बॉयरन की कुछ कविताओं का भावानुवाद प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। कविता में एक खूबसूरती यह भी होती है कि हर कोई उसे अपनी तरह से समझ सकता है। आज फिर से एक बार, अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि लॉर्ड बॉयरन की एक प्रसिद्ध कविता –‘शी वॉक्स इन ब्यूटी’ का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-

वह चलती है, सुंदरता बिखेरते हुए!

वह चलती है सुंदरता बिखेरते, जैसे रात-
बिना बादलों के परिवेश में, और फिर तारों से भरा आकाश,
और उसकी निगाहों के पहलू में अंधकार और प्रकाश-
दोनों के सर्वश्रेष्ठ स्वरूप घुलते-मिलते:
निर्मल प्रकाश के नाज़ुक स्वरूप के साथ,
जो ऊपर वाला, किसी गर्वीले दिन को भी नहीं देता है।


रंग की एक कूची अधिक, एक किरण कम,
जिन्होंने उस अनाम मोहकता को मात दे दी,
जो प्रत्येक कलमुहे पेड़ में लहराती है,
अथवा कोमलता से उसके चेहरे पर पड़कर फीकी हो जाती है;
जहाँ विचार शांतिपूर्वक मधुर अभिव्यक्ति देते हैं,
कि उनका वह ठिकाना- कितना पवित्र, कितना प्यारा है।


और वह कपोल, आंख की भौंह,
कितने कोमल, कितने शांत, फिर भी कितना बतियाते,
वे मुस्कान जो जीत लेती हैं, वह आभा जो चमचमाती है,
परंतु वे बताते हैं उन दिनों के बारे में, जो अच्छाई से बिताए गए,
एक मस्तिष्क जिसका शरीर के साथ सामंजस्य है,
एक हृदय जो एकदम भोला है!


– लॉर्ड बॉयरन


और अब मूल अंग्रेजी कविता-

She Walks In Beauty

She walks in beauty, like the night
Of cloudless climes and starry skies;
And all that’s best of dark and bright
Meet in her aspect and her eyes:
Thus mellowed to that tender light
Which heaven to gaudy day denies.


One shade the more, one ray the less,
Had half impaired the nameless grace
Which waves in every raven tress,
Or softly lightens o’er her face;
Where thoughts serenely sweet express
How pure, how dear their dwelling place.


And on that cheek, and o’er that brow,
So soft, so calm, yet eloquent,
The smiles that win, the tints that glow,
But tell of days in goodness spent,
A mind at peace with all below,
A heart whose love is innocent!

– Lord Byron


नमस्कार।


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ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया!

आज फिर से प्रस्तुत है एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट|

वसीम बरेलवी साहब की एक गज़ल याद आ रही है, बस उसके शेर एक-एक करके शेयर कर लेता हूँ। बड़ी सादगी के साथ बड़ी सुंदर बातें की हैं, वसीम साहब ने इस गज़ल में। पहला शेर तो वैसा ही है, जैसा हम कहते हैं, कोई बहुत सुंदर हो तो उसको देखकर-

आपको देख कर देखता रह गया
क्या कहूँ और कहने को क्या रह गया।


ये बात तो उनकी हुई, कि उन्होंने अपनी झलक से जैसे मंत्रमुग्ध कर दिया हो, अब आपके पास क्या है मियां? आपकी बातें, आपके जज़्बात, आपका अंदाज-ए-बयां। उसके दम पर ही आपको तो अपनी छाप छोड़नी होगी न! आपने अपनी सारी प्रतिभा, सारी ईमानदारी, सब कुछ लगा दिया उसको प्रभावित करने में, लेकिन आखिर में हुआ तो बस इतना-

आते-आते मेरा नाम-सा रह गया
उस के होंठों पे कुछ काँपता रह गया।


अब ये सब कैसे समझाया जाए कि जहाँ पर तबीयत जम जाए, ऐसा लगता है कि वो तो बस सामने ही रहे और हम उसको देखते रहें, लेकिन ऐसे में अचानक ऐसा होता है, और हम फिर से देखते ही रह जाते हैं-


वो मेरे सामने ही गया और मैं
रास्ते की तरह देखता रह गया।


होता यह भी है आज के समय में कि जब आप अपनी खूबियों से, जो आपके अंदर हैं, उनसे लोगों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं, वहीं आज का समय ऐसा है, ऐसे लोग आज उभरकर सामने आते हैं कि उनके भीतर भले ही कुछ न हो, वे स्वयं को शाहरुख खान की तरह, मतलब कि जहाँ जैसी जरूरत है, जैसी डिमांड है, उस रूप में प्रस्तुत कर देंगे। गज़लों में अक्सर आशिक़-माशूक़ के रूप में बातें रखी जाती हैं, लेकिन वास्तविक ज़िंदगी में वह कोई भी हो सकता है, आपका बॉस भी हो सकता है! जिसे आप अपनी भीतरी खूबसूरती से, अपनी प्रतिभा से, अपनी सच्चाई से प्रभावित करना चाहते हैं, और दूसरे लोग उसको अपने प्रेज़ेंटेशन से प्रभावित कर लेते हैं, और ऐसा बार-बार होता है, क्योंकि आपको तो अपनी सच्चाई पर ही भरोसा है-

झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गये
और मैं था कि सच बोलता रह गया।


अब आखिर में अचानक, मुझे डॉ. धर्मवीर भारती की लिखी एक कहानी याद आ रही है- ‘गुलकी बन्नो’, वैसे मुझको इसका ताना-बाना कुछ याद नहीं है, बस इतना है कि एक कन्या, जो बहू बनकर आई थी मुहल्ले के एक गरीब परिवार में, उस पर इतनी मुसीबतें आती हैं, इतनी बार वह टूटती है, मुसीबतें झेलती है, कुछ बार बहुत दिन तक नहीं दिखती, लेखक सोचता है कि मर-खप गई है, फिर अचानक दिखाई दे जाती है, शरीर कंकाल हो चुका है, लेकिन वही मुस्कान, दांत निपोरती हुई पहले की तरह्।

सच्चे लोगों की परीक्षा ज़िंदगी कुछ ज्यादा ही लेती है, और आखिरी शेर इस गज़ल का प्रस्तुत है-

आँधियों के इरादे तो अच्छे न थे
ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया।


आज वसीम बरेलवी साहब की इस गज़ल के बहाने आपसे कुछ बातें हो गईं।

नमस्कार।

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ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

 

 

आज वसीम बरेलवी साहब की एक गज़ल याद आ रही है, बस उसके शेर एक-एक करके शेयर कर लेता हूँ। बड़ी सादगी के साथ बड़ी सुंदर बातें की हैं, वसीम साहब ने इस गज़ल में। पहला शेर तो वैसा ही है, जैसा हम कहते हैं, कोई बहुत सुंदर हो तो उसको देखकर-

आपको देख कर देखता रह गया
क्या कहूँ और कहने को क्या रह गया।

ये बात तो उनकी हुई, कि उन्होंने अपनी झलक से जैसे मंत्रमुग्ध कर दिया हो, अब आपके पास क्या है मियां? आपकी बातें, आपके जज़्बात, आपका अंदाज-ए-बयां। उसके दम पर ही आपको तो अपनी छाप छोड़नी होगी न! आपने अपनी सारी प्रतिभा, सारी ईमानदारी, सब कुछ लगा दिया उसको प्रभावित करने में, लेकिन आखिर में हुआ तो बस इतना-

आते-आते मेरा नाम-सा रह गया
उस के होंठों पे कुछ काँपता रह गया।

अब ये सब कैसे समझाया जाए कि जहाँ पर तबीयत जम जाए, ऐसा लगता है कि वो तो बस सामने ही रहे और हम उसको देखते रहें, लेकिन ऐसे में अचानक ऐसा होता है, और हम फिर से देखते ही रह जाते हैं-

वो मेरे सामने ही गया और मैं
रास्ते की तरह देखता रह गया।

होता यह भी है आज के समय में कि जब आप अपनी खूबियों से, जो आपके अंदर हैं, उनसे लोगों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं, वहीं आज का समय ऐसा है, ऐसे लोग आज उभरकर सामने आते हैं कि उनके भीतर भले ही कुछ न हो, वे स्वयं को शाहरुख खान की तरह, मतलब कि जहाँ जैसी जरूरत है, जैसी डिमांड है, उस रूप में प्रस्तुत कर देंगे। गज़लों में अक्सर आशिक़-माशूक़ के रूप में बातें रखी जाती हैं, लेकिन वास्तविक ज़िंदगी में वह कोई भी हो सकता है, आपका बॉस भी हो सकता है! जिसे आप अपनी भीतरी खूबसूरती से, अपनी प्रतिभा से, अपनी सच्चाई से प्रभावित करना चाहते हैं, और दूसरे लोग उसको अपने प्रेज़ेंटेशन से प्रभावित कर लेते हैं, और ऐसा बार-बार होता है, क्योंकि आपको तो अपनी सच्चाई पर ही भरोसा है-

झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गये
और मैं था कि सच बोलता रह गया।

अब आखिर में अचानक, मुझे डॉ. धर्मवीर भारती की लिखी एक कहानी याद आ रही है- ‘गुलकी बन्नो’, वैसे मुझको इसका ताना-बाना कुछ याद नहीं है, बस इतना है कि एक कन्या, जो बहू बनकर आई थी मुहल्ले के एक गरीब परिवार में, उस पर इतनी मुसीबतें आती हैं, इतनी बार वह टूटती है, मुसीबतें झेलती है, कुछ बार बहुत दिन तक नहीं दिखती, लेखक सोचता है कि मर-खप गई है, फिर अचानक दिखाई दे जाती है, शरीर कंकाल हो चुका है, लेकिन वही मुस्कान, दांत निपोरती हुई पहले की तरह्।
सच्चे लोगों की परीक्षा ज़िंदगी कुछ ज्यादा ही लेती है, और आखिरी शेर इस गज़ल का प्रस्तुत है-

आँधियों के इरादे तो अच्छे न थे
ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया।

आज वसीम बरेलवी साहब की इस गज़ल के बहाने आपसे कुछ बातें हो गईं।

नमस्कार।

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