भीड़ में भी जाए तो तन्हा दिखाई दे!

क्या हुस्न है जमाल है क्या रंग-रूप है,
वो भीड़ में भी जाए तो तन्हा दिखाई दे|

कृष्ण बिहारी नूर

ठोकर में ज़माना है!

क्या हुस्न ने समझा है क्या इश्क़ ने जाना है,
हम ख़ाक-नशीनों की ठोकर में ज़माना है|

जिगर मुरादाबादी

तिरे लब का बदल कहते हैं!

वो तिरे हुस्न की क़ीमत से नहीं हैं वाक़िफ़,
पंखुड़ी को जो तिरे लब का बदल कहते हैं|

क़तील शिफ़ाई

उसे ताज-महल कहते हैं!

उफ़ वो मरमर से तराशा हुआ शफ़्फ़ाफ़ बदन,
देखने वाले उसे ताज-महल कहते हैं|

क़तील शिफ़ाई

सूरत नज़र आए तो ग़ज़ल कहते हैं!

हुस्न को चाँद जवानी को कँवल कहते हैं,
उनकी सूरत नज़र आए तो ग़ज़ल कहते हैं|

क़तील शिफ़ाई

जिस दिन धोका खाएँगे!

अच्छी सूरत वाले सारे पत्थर-दिल हों मुमकिन है,
हम तो उस दिन राय देंगे जिस दिन धोका खाएँगे|

निदा फ़ाज़ली

तुझे आइने में उतार लूँ!

अभी इस तरफ़ न निगाह कर मैं ग़ज़ल की पलकें सँवार लूँ,
मिरा लफ़्ज़ लफ़्ज़ हो आईना तुझे आइने में उतार लूँ|

बशीर बद्र

जवाब क्या देते खो गए सवालों में!

पहली बार नज़रों ने चाँद बोलते देखा,
हम जवाब क्या देते खो गए सवालों में|

बशीर बद्र

कुछ दिन ठहर के देखते हैं!

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं,
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं|

अहमद फ़राज़