जिनसे हमें उल्फत भी थी!

क्या क़यामत है ‘मुनीर’ अब याद भी आते नहीं,
वो पुराने आशना जिनसे हमें उल्फत भी थी|

मुनीर नियाज़ी

कुछ चांदनी सी बातें हों!

तुम आ गए हो तो कुछ चांदनी सी बातें हों,
ज़मीं पे चांद कहाँ रोज़ रोज़ उतरता है।

वसीम बरेलवी

जिसका मोहसिन कहलायेगा!

मैंने पूछा पहला पत्थर मुझ पर कौन उठायेगा,
आई इक आवाज़ कि तू जिसका मोहसिन कहलायेगा

क़तील शिफ़ाई

उतनी दूर पिया तुम मेरे गाँव से!

हर पुरवा का झोंका तेरा घुँघरू,
हर बादल की रिमझिम तेरी भावना,,
हर सावन की बूंद तुम्हारी ही व्यथा
हर कोयल की कूक तुम्हारी कल्पना|

जितनी दूर ख़ुशी हर ग़म से,
जितनी दूर साज सरगम से,
जितनी दूर पात पतझर का छाँव से,
उतनी दूर पिया तुम मेरे गाँव से|

कुंवर बेचैन