जिससे अपनी पीर कहूँ मैं!

आज मैं एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ, जो मेरे अत्यंत प्रिय कवि से संबंधित है|
लीजिए फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय गीत कवि स्व. भारत भूषण जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। कविता, गीत आदि स्वयं अपनी बात कहते हैं और जितना ज्यादा प्रभावी रूप से कहते हैं, वही उसकी सफलता की पहचान है।

लीजिए आज के लिए स्व. भारत भूषण जी का यह गीत आपको समर्पित है-

जिस पल तेरी याद सताए, आधी रात नींद जग जाये,
ओ पाहन! इतना बतला दे, उस पल किसकी बाहँ गहूँ मैं।
अपने अपने चाँद भुजाओं,
में भर भर कर दुनिया सोये।
सारी सारी रात अकेला,
मैं रोऊँ या शबनम रोये।
करवट में दहकें अंगारे, नभ से चंदा ताना मारे,
प्यासे अरमानों को मन में दाबे कैसे मौन रहूँ मैं।

गाऊँ कैसा गीत कि जिससे,
तेरा पत्थर मन पिघलाऊँ,
जाऊँ किसके द्वार जहाँ ये,
अपना दुखिया मन बहलाऊँ।
गली गली डोलूँ बौराया, बैरिन हुई स्वयं की छाया,
मिला नहीं कोई भी ऐसा, जिससे अपनी पीर कहूं मैं।


टूट गया जिससे मन दर्पण,
किस रूपा की नजर लगी है।
घर घर में खिल रही चाँदनी,
मेरे आँगन धूप जगी है।
सुधियाँ नागन सी लिपटी हैं, आँसू आँसू में सिमटी हैं।
छोटे से जीवन में कितना, दर्द-दाह अब और सहूँ मैं।

फटा पड़ रहा है मन मेरा,
पिघली आग बही काया में।
अब न जिया जाता निर्मोही,
गम की जलन भरी छाया में।
बिजली ने ज्यों फूल छुआ है, ऐसा मेरा हृदय हुआ है।
पता नहीं क्या क्या कहता हूँ, अपने बस में आज न हूँ मैं।



(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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तस्वीर अधूरी रहनी थी!

आज एक पुरानी पोस्ट फिर से शेयर कर रहा हूँ|

हिंदी के एक अत्यंत श्रेष्ठ गीतकार थे श्री भारत भूषण जी, मेरठ के रहने वाले थे और काव्य मंचों पर मधुरता बिखेरते थे। मैं यह नहीं कह सकता कि वे सबसे लोकप्रिय थे, परंतु जो लोग कवि-सम्मेलनों में कविता, गीतों के आस्वादन के लिए जाते थे, उनको भारत भूषण जी के गीतों से बहुत सुकून मिलता था।

वैसे भारत भूषण जी ने बहुत से अमर गीत लिखे हैं- ‘चक्की पर गेहूं लिए खड़ा, मैं सोच रहा उखड़ा- उखड़ा, क्यों दो पाटों वाली चाकी, बाबा कबीर को रुला गई’; ‘मैं बनफूल भला मेरा, कैसा खिलना, क्या मुर्झाना’, ‘आधी उमर करके धुआं, ये तो कहो किसके हुए’ आदि-आदि।

आज जो गीत मुझे बरबस याद आ रहा है वह एक ऐसा गीत है, जिसमें वे लोग जो जीवन में मनचाही उपलब्धियां नहीं कर पाते, असफल रहते हैं, वे अपने आप को किस तरह समझाते हैं, बहुत सुंदर उपमाएं दी हैं इस गीत में भारत भूषण जी ने, प्रस्तुत यह गीत-

तू मन अनमना न कर अपना, इसमें कुछ दोष नहीं तेरा,

धरती के कागज़ पर मेरी, तस्वीर अधूरी रहनी थी।

रेती पर लिखे नाम जैसा, मुझको दो घड़ी उभरना था,

मलयानिल के बहकाने पर, बस एक प्रभात निखरना था,

गूंगे के मनोभाव जैसे, वाणी स्वीकार न कर पाए,

ऐसे ही मेरा हृदय कुसुम, असमर्पित सूख बिखरना था,

जैसे कोई प्यासा मरता, जल के अभाव में विष पी ले,

मेरे जीवन में भी ऐसी, कोई मजबूरी रहनी थी।

धरती के कागज़ पर मेरी तस्वीर अधूरी रहनी थी॥




इच्छाओं के उगते बिरुवे, सब के सब सफल नहीं होते,

हर एक लहर के जूड़े में, अरुणारे कमल नहीं होते,

माटी का अंतर नहीं मगर, अंतर रेखाओं का तो है,

हर एक दीप के हंसने को, शीशे के महल नहीं होते,

दर्पण में परछाई जैसे, दीखे तो पर अनछुई रहे,

सारे सुख वैभव से यूं ही, मेरी भी दूरी रहनी थी।

धरती के कागज़ पर मेरी, तस्वीर अधूरी रहनी थी॥




मैंने शायद गत जन्मों में, अधबने नीड़ तोड़े होंगे,

चातक का स्वर सुनने वाले, बादल वापस मोड़े होंगे,

ऐसा अपराध किया होगा, जिसकी कुछ क्षमा नहीं होती,

तितली के पर नोचे होंगे, हिरणों के दृग फोड़े होंगे।

मुझको आजन्म भटकना था, मन में कस्तूरी रहनी थी।

धरती के कागज़ पर मेरी, तस्वीर अधूरी रहनी थी।।



इस गीत के साथ मैं उस महान गीतकार का विनम्र स्मरण करता हूँ।


नमस्कार

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मन, कितना अभिनय शेष रहा!

कुछ नया लिखने का मन नहीं है आज, इसलिए एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ, और एक श्रेष्ठ गीत फिर से आपके सम्मुख रख रहा हूँ|

आज हिंदी कविता, विशेष रूप से गीतों के एक अनूठे हस्ताक्षर- स्व. भारत भूषण जी का एक और गीत शेयर कर रहा हूँ। भारत भूषण जी मेरे प्रिय गीत कवि रहे हैं और अनेक बार उनको मंचों से कविता-पाठ करते सुनने का अवसर मिला है। कुछ बार उनके गीतों को सुनकर या पढ़कर आंखों में आंसू भी आ गए हैं। उनके एक-दो गीतों का उल्लेख करूं तो-

चक्की पर गेंहू लिए खड़ा, मैं सोच रहा उखड़ा-उखड़ा, क्यों दो पाटों वाली चाकी, बाबा कबीर को रुला गई’,

‘आधी उमर करके धुआं, ये तो कहो किसके हुए, परिवार के या प्यार के, या गीत के, या देश के!’,

‘मैं बनफूल भला मेरा कैसा खिलना, क्या मुर्झाना’,

‘तू मन अनमना न कर अपना, इसमें कुछ दोष नहीं तेरा, धरती के कागज़ पर मेरी तस्वीर अधूरी रहनी थी’।

इस प्रकार के असंख्य अमर गीत स्व. भारत भूषण जी ने लिखे थे और उनमें से अनेक मैंने पहले शेयर किए हैं और आगे भी मौका मिलेगा तो करूंगा।
इसी क्रम में मैं आज भी उनका एक प्यारा सा गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिसमें कवि ने यह संकल्प व्यक्त किया है कि वह तो गीत लिखने के लिए ही बने थे और गीत का संदेश ही वे अपने पाठकों को दे रहे हैं-

मनवंशी
मन!
कितना अभिनय शेष रहा,
सारा जीवन जी लिया, ठीक
जैसा तेरा आदेश रहा!

बेटा, पति, पिता, पितामह सब,
इस मिट्टी के उपनाम रहे,
जितने सूरज उगते देखे
उससे ज्यादा संग्राम रहे,
मित्रों मित्रों रसखान जिया,
कितनी भी चिंता, क्लेश रहा!

हर परिचय शुभकामना हुआ,
दो गीत हुए सांत्वना बना,
बिजली कौंधी, सो आँख लगीं,
अँधियारा फिर से और लगा,
पूरा जीवन आधा–आधा,
तन घर में मन परदेश रहा!

आँसू–आँसू संपत्ति बने,

भावुकता ही भगवान हुई,
भीतर या बाहर से टूटे,
केवल उनकी पहचान हुई,
गीत ही लिखो गीत ही जियो-
मेरा अंतिम संदेश रहा!


आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

हर ओर कलियुग के चरण!

स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक गीत और आज शेयर कर रहा हूँ| भारत भूषण जी एक ऐसे गीतकार थे जिनके बारे में कहा जा सकता है कि वे अपने समय से काफी आगे की बात कहते थे| कवि सम्मेलनों में उनका काव्य पाठ सुनना एक विलक्षण अनुभव होता था|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत भूषण जी का यह गीत –

हर ओर कलियुग के चरण
मन स्मरण कर अशरण शरण।


धरती रंभाती गाय सी
अन्तोन्मुखी की हाय सी
संवेदना असहाय सी
आतंकमय वातावरण।

प्रत्येक क्षण विष दंश है
हर दिवस अधिक नृशंस है
व्याकुल परम् मनु वंश है
जीवन हुआ जाता मरण।

सब धर्म गंधक हो गये
सब लक्ष्य तन तक हो गये
सद्भाव बन्धक हो गये
असमाप्त तम का अवतरण।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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बदल दिये कैलेण्डर!

आज एक बार फिर से मैं अपने अत्यंत प्रिय गीतकार स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मैंने पहले भी उनके बहुत से गीत अपने ब्लॉग में शेयर की हैं| हमारी पीढ़ी इस बात पर गर्व कर सकती है कि हमें भारत भूषण जी जैसे महान गीतकार को साक्षात देखने और सुनने का अवसर मिल पाया|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत भूषण जी का यह गीत-

फिर फिर
बदल दिये कैलेण्डर
तिथियों के संग संग प्राणों में
लगा रेंगने
अजगर सा डर
सिमट रही साँसों की गिनती
सुइयों का क्रम जीत रहा है!

पढ़कर
कामायनी बहुत दिन
मन वैराग्य शतक तक आया
उतने पंख थके जितनी भी
दूर दूर नभ
में उड़ आया
अब ये जाने राम कि कैसा
अच्छा बुरा अतीत रहा है!

संस्मरण
हो गई जिन्दगी
कथा कहानी सी घटनाएँ
कुछ मनबीती कहनी हो तो
अब किसको
आवाज लगाएँ
कहने सुनने सहने दहने
को केवल बस गीत रहा है!

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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श्रीराम जी की जलसमाधि !

अभी हमने श्रीरामनवमी के अवसर पर प्रभु श्रीराम जी को याद किया| इस अवसर पर मैं अपनी एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट दोहरा रहा हूँ |

आज फिर से मैं अपने प्रिय कवि/गीतकारों में से एक स्व. भारत भूषण जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। इस रचना में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की जलसमाधि का प्रसंग प्रस्तुत किया गया है। श्रीराम जो शिखर पर हैं, लोगों के प्रभु हैं, अयोध्या के नरेश हैं, जब प्रसंग के अनुसार वे जल-समाधि लेते हैं, वे किसी से कोई शिकायत नहीं कर सकते, शिखर पर व्यक्ति कितना अकेला होता है, वह ईश्वर का अवतार ही क्यों न हो!

श्रीराम की जल समाधि के प्रसंग में, वे जब जल में क्रमशः डूबते जाते हैं, तब उनके मन में क्या-क्या आता है, इसका बहुत सुंदर वर्णन स्व. भारत भूषण जी ने अपनी रचना में किया है। लीजिए प्रस्तुत है यह अति सुंदर रचना-

पश्चिम में ढलका सूर्य उठा वंशज सरयू की रेती से,
हारा-हारा, रीता-रीता, निःशब्द धरा, निःशब्द व्योम,
निःशब्द अधर पर रोम-रोम था टेर रहा सीता-सीता।

किसलिए रहे अब ये शरीर, ये अनाथ मन किसलिए रहे,
धरती को मैं किसलिए सहूँ, धरती मुझको किसलिए सहे।
तू कहाँ खो गई वैदेही, वैदेही तू खो गई कहाँ,
मुरझे राजीव नयन बोले, काँपी सरयू, सरयू काँपी,
देवत्व हुआ लो पूर्णकाम, नीली माटी निष्काम हुई,
इस स्नेहहीन देह के लिए, अब सांस-सांस संग्राम हुई।

ये राजमुकुट, ये सिंहासन, ये दिग्विजयी वैभव अपार,
ये प्रियाहीन जीवन मेरा, सामने नदी की अगम धार,
माँग रे भिखारी, लोक माँग, कुछ और माँग अंतिम बेला,
इन अंचलहीन आँसुओं में नहला बूढ़ी मर्यादाएँ,
आदर्शों के जलमहल बना, फिर राम मिलें न मिलें तुझको,
फिर ऐसी शाम ढले न ढले।

ओ खंडित प्रणयबंध मेरे, किस ठौर कहां तुझको जोडूँ,
कब तक पहनूँ ये मौन धैर्य, बोलूँ भी तो किससे बोलूँ,
सिमटे अब ये लीला सिमटे, भीतर-भीतर गूँजा भर था,
छप से पानी में पाँव पड़ा, कमलों से लिपट गई सरयू,
फिर लहरों पर वाटिका खिली, रतिमुख सखियाँ, नतमुख सीता,
सम्मोहित मेघबरन तड़पे, पानी घुटनों-घुटनों आया,
आया घुटनों-घुटनों पानी। फिर धुआँ-धुआँ फिर अँधियारा,
लहरों-लहरों, धारा-धारा, व्याकुलता फिर पारा-पारा।

फिर एक हिरन-सी किरन देह, दौड़ती चली आगे-आगे,
आँखों में जैसे बान सधा, दो पाँव उड़े जल में आगे,
पानी लो नाभि-नाभि आया, आया लो नाभि-नाभि पानी,
जल में तम, तम में जल बहता, ठहरो बस और नहीं कहता,
जल में कोई जीवित दहता, फिर एक तपस्विनी शांत सौम्य,
धक धक लपटों में निर्विकार, सशरीर सत्य-सी सम्मुख थी,
उन्माद नीर चीरने लगा, पानी छाती-छाती आया,
आया छाती-छाती पानी।


आगे लहरें बाहर लहरें, आगे जल था, पीछे जल था,
केवल जल था, वक्षस्थल था, वक्षस्थल तक केवल जल था।
जल पर तिरता था नीलकमल, बिखरा-बिखरा सा नीलकमल,
कुछ और-और सा नीलकमल, फिर फूटा जैसे ज्योति प्रहर,
धरती से नभ तक जगर-मगर, दो टुकड़े धनुष पड़ा नीचे,
जैसे सूरज के हस्ताक्षर, बांहों के चंदन घेरे से,
दीपित जयमाल उठी ऊपर,

सर्वस्व सौंपता शीश झुका, लो शून्य राम लो राम लहर,
फिर लहर-लहर, सरयू-सरयू, लहरें-लहरें, लहरें- लहरें,
केवल तम ही तम, तम ही तम, जल, जल ही जल केवल,
हे राम-राम, हे राम-राम
हे राम-राम, हे राम-राम ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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जा तुझको भी नींद न आए!

आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के एक महान गीतकार स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| भारत भूषण जी के गीत पढ़ना और उससे भी अधिक जो सौभाग्य मुझे अनेक बार मिला, उनको गीत पाठ करते हुए सुनना एक दिव्य अनुभव होता था| उनके बहुत से गीत अमर हैं, जैसे- ‘चक्की पर गेंहू लिए खड़ा’, ‘आधी उमर करके धुआँ ये तो कहो किसके हुए’, ‘ मैं बनफूल भला मेरा कैसा खिलना, क्या मुरझाना’ आदि|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत भूषण जी का यह गीत, जिसमें उन्होंने प्रेम में एक अलग ही अंदाज़ में उलाहना दिया है –

मेरी नींद चुराने वाले, जा तुझको भी नींद न आए,
पूनम वाला चांद तुझे भी सारी-सारी रात जगाए|

तुझे अकेले तन से अपने, बड़ी लगे अपनी ही शैय्या
चित्र रचे वह जिसमें, चीरहरण करता हो कृष्ण-कन्हैया,
बार-बार आँचल सम्भालते, तू रह-रह मन में झुंझलाए
कभी घटा-सी घिरे नयन में, कभी-कभी फागुन बौराए|
मेरी नींद चुराने वाले, जा तुझको भी नींद न आए|

बरबस तेरी दृष्टि चुरा लें, कंगनी से कपोत के जोड़े
पहले तो तोड़े गुलाब तू, फिर उसकी पंखुडियाँ तोड़े,
होठ थकें ‘हाँ’ कहने में भी, जब कोई आवाज़ लगाए
चुभ-चुभ जाए सुई हाथ में, धागा उलझ-उलझ रह जाए|
मेरी नींद चुराने वाले, जा तुझको भी नींद न आए|


बेसुध बैठ कहीं धरती पर, तू हस्ताक्षर करे किसी के
नए-नए संबोधन सोचे, डरी-डरी पहली पाती के,
जिय बिनु देह नदी बिनु वारी, तेरा रोम-रोम दुहराए
ईश्वर करे हृदय में तेरे, कभी कोई सपना अँकुराए|
मेरी नींद चुराने वाले, जा तुझको भी नींद न आए|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जिस दिन भी बिछड़ गया मीता!

आज एक बार फिर से मैं अपने अत्यंत प्रिय गीतकार स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक प्रेम गीत शेयर कर रहा हूँ| इस गीत में भारत भूषण जी ने प्रेम की अनूठी अभिव्यक्ति की है| भावुकता का अपना सौन्दर्य है और जो लोग भावुक हैं शायद वे ही इसे समझ सकते हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत भूषण जी की यह सरस गीत –

जिस दिन भी बिछड गया मीता
ढूँढ़ती फिरोगी लाखों में।

फिर कौन सामने बैठेगा
बंगाली भावुकता पहने,
दूरों-दूरों से लाएगा
केशों को गंधों के गहने।

यह देह अजन्ता शैली-सी
किसके गीतों में सँवरेगी।
किसकी रातें महकाएँगीं
जीने के मोड़ों की छुअनें।

फिर चाँद उछालेगा पानी
किसकी समुन्दरी आँखों में।

दो दिन में ही बोझिल होगा
मन का लोहा, तन का सोना।
फैली बाँहों-सा दीखेगा
सूनेपन में कोना-कोना।

अपनी रुचि-रंगों के चुनाव
किसके कपडों में टाँकोगे,
अखरेगा किसकी बातों में
पूरी दिनचर्या ठप होना।

दरकेगी सरोवरी छाती
धूलिया जेठ-बैसाखों में।

ये गुँथे-गुँथे बतियाते पल
कल तक गूँगे हो जाएँगे,
होंठों से उड़ते भ्रमर-गीत
सूरज ढलते सो जाएँगे।

जितना उड़ती है आयु-परी
इकलापन बढ़ता जाता है।
सारा जीवन निर्धन करके
ये पारस पल खो जाएँगे।

गोरा मुख लिए खड़े रहना
खिड़की की स्याह सलाखों में।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मेरे मन-मिरगा नहीं मचल

आज एक बार फिर मैं अपने अत्यंत प्रिय गीतकार स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| कुल मिलाकर गीत अक्सर भावुकता का ही व्यापार होते हैं, जैसे नीरज जी ने लिखा – ‘हूँ बहुत नादान करता हूँ ये नादानी, बेचकर खुशियां खरीदूँ आँख का पानी’ या भारत भूषण जी ने ही लिखा- ‘तू मन अनमना न कर अपना, इसमें कुछ दोष नहीं तेरा, धरती के कागज़ पर मेरी तस्वीर अधूरी राहनी थी’| भारत भूषण जी का काव्य पाठ सुनना वास्तव में एक दिव्य अनुभव होता था|

लीजिए आज प्रस्तुत है भारत भूषण जी का यह गीत, जिसमें मन को बहलाने का प्रयास किया गया है-

मेरे मन-मिरगा नहीं मचल
हर दिशि केवल मृगजल-मृगजल!

प्रतिमाओं का इतिहास यही
उनको कोई भी प्यास नहीं
तू जीवन भर मंदिर-मंदिर
बिखराता फिर अपना दृगजल!

खौलते हुए उन्मादों को
अनुप्रास बने अपराधों को
निश्चित है बाँध न पाएगा
झीने-से रेशम का आँचल!

भीगी पलकें भीगा तकिया
भावुकता ने उपहार दिया
सिर माथे चढा इसे भी तू
ये तेरी पूजा का प्रतिफल!

आज के लिए इतना ही, नमस्कार|

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मैं हूँ बनफूल भला मेरा कैसा खिलना, क्या मुरझाना!

Close-Up Photography of Pink Flowers



स्वर्गीय भारत भूषण जी एक असाधारण प्रतिभा वाले कवि और गीतकार थे| भारत भूषण जी के गीतों को सुनना ही एक दिव्य अनुभव होता था| भारत भूषण जी के अनेक गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं, आज जो गीत शेयर कर रहा हूँ ‘बनफूल’ यह भी भारत भूषण जी का एक प्रसिद्ध गीत है|

कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें जीवन में कुछ भी मनचाहा नहीं मिलता, इसका उदाहरण भारत भूषण जी ने ‘बनफूल’ के माध्यम से दिया है| इस गीत में बनफूल अपनी व्यथा सुनाते हुए यह भी कहता है कि मालिन, जो किसी भी दृष्टि से सुंदर नहीं है, लेकिन वह भी चुनने के लिए बनफूल की तरफ निगाह नहीं डालती, और वह जीवन भर उपेक्षित ही रहता है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत भूषण जी का यह लाजवाब गीत ‘बनफूल’-


मैं हूँ बनफूल भला मेरा कैसा खिलना, क्या मुरझाना,
मैं भी उनमें जिनका जग में, जैसा आना वैसा जाना|

सिर पर अंबर की छत नीली, जिसकी सीमा का अंत नहीं
मैं जहाँ उगा हूँ वहाँ कभी भूले से खिला वसंत नहीं,
ऐसा लगता है जैसे मैं ही बस एक अकेला आया हूँ
मेरी कोई कामिनी नहीं, मेरा कोई भी कंत नहीं,
बस आसपास की गर्म धूल उड़ मुझे गोद में लेती है
है घेर रहा मुझको केवल सुनसान भयावह वीराना|

सूरज आया कुछ जला गया, चंदा आया कुछ रुला गया
आंधी का झोंका मरने की सीमा तक झूला झुला गया,
छह ऋतुओं में कोई भी तो मेरी न कभी होकर आई
जब रात हुई सो गया यहीं, जब भोर हुई कुलमुला गया,
मोती लेने वाले सब हैं, ऑंसू का गाहक नहीं मिला
जिनका कोई भी नहीं उन्हें सीखा न किसी ने अपनाना|


सुनता हूँ दूर कहीं मन्दिर, हैं पत्थर के भगवान जहाँ
सब फूल गर्व अनुभव करते, बन एक रात मेहमान वहाँ,
मेरा भी मन अकुलाता है, उस मन्दिर का आंगन देखूँ
बिन मांगे जिसकी धूल परस मिल जाते हैं वरदान जहाँ,
लेकिन जाऊँ भी तो कैसे, कितनी मेरी मजबूरी है
उड़ने को पंख नहीं मेरे, सारा पथ दुर्गम अनजाना|

काली रूखी गदबदा बदन, कांसे की पायल झमकाती
सिर पर फूलों की डलिया ले, हर रोज़ सुबह मालिन आती,
ले गई हज़ारों हार निठुर, पर मुझको अब तक नहीं छुआ
मेरी दो पंखुरियों से ही, क्या डलिया भारी हो जाती,
मैं मन को समझाता कहकर, कल को ज़रूर ले जाएगी
कोई पूरबला पाप उगा, शायद यूँ ही हो कुम्हलाना|


उस रोज़ इधर दुल्हा-दुल्हन को लिए पालकी आई थी
अनगिनती कलियों-फूलों से, ज्यों अच्छी तरह सजाई थी,
मैं रहा सोचता गुमसुम ही, ये भी हैं फूल और मैं भी
सच कहता हूँ उस रात, सिसकियों में ही भोर जगाई थी,
तन कहता मैं दुनिया में हूँ, मन को होता विश्वास नहीं
इसमें मेरा अपराध नहीं, यदि मैं भी चाहूँ मुसकाना|

पूजा में चढ़ना होता तो, उगता माली की क्यारी में
सुख सेज भाग्य में होती तो, खिलता तेरी फुलवारी में,
ऐसे कुछ पुण्य नहीं मेरे, जो हाथ बढ़ा दे ख़ुद कोई
ऐसे भी हैं जिनको जीना ही पड़ता है लाचारी में,
कुछ घड़ियाँ और बितानी हैं, इस कठिन उपेक्षा में मुझको
मैं खिला पता किसको होगा, झर जाऊंगा बे-पहचाना|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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