मेरी आवाज़ ही, पहचान है!

लीजिए लता जी को विदा करने का समय भी आ गया| एक ज़माना रहा फिल्म संगीत का, जिसमें रफी साहब रहे, मुकेश जी, किशोर दा, हेमंत कुमार जी, मन्ना डे साहब आदि अनेक पुरुष गायक थे, महिला गायिकाएं भी अनेक रहीं जिनमें लता जी की छोटी बहन आशा भौंसले जी, सुमन कल्याणपुर जी, गीता दत्त जी आदि-आदि अनेक गायिकाएं थीं, लेकिन गायिकाओं में किसी का क़द लता जी के आस पास नहीं था|

याद करने लगें तो लता जी के अनेक गाने गिनाए जा सकते हैं, भले ही वे रोमांटिक हों, भजन हों, राष्ट्रभक्ति के गीत हों, हर क्षेत्र में लता जी ने नई ऊंचाइयां हासिल की थीं और सर्वाधिक गीत गाने का भी रिकॉर्ड बनाया था|

चीन से हुए युद्ध के बाद एक आयोजन में लता जी के गाये इस गीत को सुनकर पंडित नेहरू की आँखों में आंसू आ गए थे- ‘ए मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो कुर्बानी’| मैं यहाँ उनके अमर गीतों की गिनती नहीं कराऊंगा क्योंकि वह संभव ही नहीं है|

स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर जी को श्रद्धांजलि स्वरूप लीजिए आज प्रस्तुत हैं फिल्म- किनारा के लिए गुलज़ार जी के लिखे इस गीत के बोल, जिसका संगीत तैयार किया था राहुल देव बर्मन जी ने, यह गीत स्वयं ही लता जी के बारे में बात कर रहा है:

नाम गुम जायेगा, चेहरा ये बदल जायेगा
मेरी आवाज़ ही, पहचान है,
गर याद रहे|

वक़्त के सितम, कम हसीं नहीं
आज हैं यहाँ, कल कहीं नहीं,
वक़्त से परे अगर, मिल गये कहीं|
मेरी आवाज़ ही …

जो गुज़र गई, कल की बात थी
उम्र तो नहीं, एक रात थी,
रात का सिरा अगर, फिर मिले कहीं|
मेरी आवाज़ ही …


दिन ढले जहाँ, रात पास हो
ज़िंदगी की लौ, ऊँची कर चलो,
याद आये गर कभी, जी उदास हो|
मेरी आवाज़ ही …


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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