हवाएँ करने लगे!

लहूलोहान पड़ा था ज़मीं पे इक सूरज,
परिन्दे अपने परों से हवाएँ करने लगे|

राहत इन्दौरी

बिछुड़े परिंदे आसमाँ मे खो गए!

डाल से बिछुड़े परिंदे आसमाँ मे खो गए,
इक हकी़क़त थे जो कल तक दास्ताँ मे खो गए|

राजेश रेड्डी

लचक जाना ज़रूरी है!

थके-हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें,
सलीक़ा-मंद शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है|

वसीम बरेलवी

जंगल तो पराया होगा!

बिजली के तार पे बैठा हुआ हँसता पंछी,
सोचता है कि वो जंगल तो पराया होगा|

कैफ़ी आज़मी

चहचहाती बुलबुलों पर—

दो दिलों के दरमियाँ दीवार-सा अंतर न फेंक,
चहचहाती बुलबुलों पर विषबुझे खंजर न फेंक|

कुंवर बेचैन

पेड़ पे बैठी इक चिड़िया ने—

कैसा प्यारा मंज़र था जब देख के अपने साथी को,
पेड़ पे बैठी इक चिड़िया ने अपने पर फैलाये थे|

क़तील शिफ़ाई