ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी न सकूँ!

अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ,
ऐसे ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी न सकूँ|

राहत इन्दौरी

आसमानों के ख़ज़ाने चाहिएँ!

कुछ परिंदों को तो बस दो चार दाने चाहिएँ,
कुछ को लेकिन आसमानों के ख़ज़ाने चाहिएँ|

राजेश रेड्डी

हवाएँ करने लगे!

लहूलोहान पड़ा था ज़मीं पे इक सूरज,
परिन्दे अपने परों से हवाएँ करने लगे|

राहत इन्दौरी

बिछुड़े परिंदे आसमाँ मे खो गए!

डाल से बिछुड़े परिंदे आसमाँ मे खो गए,
इक हकी़क़त थे जो कल तक दास्ताँ मे खो गए|

राजेश रेड्डी

लचक जाना ज़रूरी है!

थके-हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें,
सलीक़ा-मंद शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है|

वसीम बरेलवी

जंगल तो पराया होगा!

बिजली के तार पे बैठा हुआ हँसता पंछी,
सोचता है कि वो जंगल तो पराया होगा|

कैफ़ी आज़मी