प्यास बुझाते हुए मर जाते हैं!

दश्त में प्यास बुझाते हुए मर जाते हैं,
हम परिंदे कहीं जाते हुए मर जाते हैं|

अब्बास ताबिश

डाली पे लौट भी जाते!

परिंदे होते तो डाली पे लौट भी जाते,
हमें न याद दिलाओ कि शाम हो गई है|

राजेश रेड्डी

ये कलाम किसका कलाम है!

कोई नग़्मा धूप के गाँव सा कोई नग़्मा शाम की छाँव सा,
ज़रा इन परिंदों से पूछना ये कलाम किसका कलाम है|

बशीर बद्र

किसी शाख़-ए-शजर का हो जाए!

खुली हवाओं में उड़ना तो उसकी फ़ितरत है,
परिंदा क्यूँ किसी शाख़-ए-शजर का हो जाए|

वसीम बरेलवी

चिड़ियों को आज़ाद किया!

खोल के खिड़की चाँद हँसा फिर चाँद ने दोनों हाथों से,
रंग उड़ाए फूल खिलाए चिड़ियों को आज़ाद किया|

निदा फ़ाज़ली

ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी न सकूँ!

अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ,
ऐसे ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी न सकूँ|

राहत इन्दौरी

आसमानों के ख़ज़ाने चाहिएँ!

कुछ परिंदों को तो बस दो चार दाने चाहिएँ,
कुछ को लेकिन आसमानों के ख़ज़ाने चाहिएँ|

राजेश रेड्डी

हवाएँ करने लगे!

लहूलोहान पड़ा था ज़मीं पे इक सूरज,
परिन्दे अपने परों से हवाएँ करने लगे|

राहत इन्दौरी

बिछुड़े परिंदे आसमाँ मे खो गए!

डाल से बिछुड़े परिंदे आसमाँ मे खो गए,
इक हकी़क़त थे जो कल तक दास्ताँ मे खो गए|

राजेश रेड्डी