ज़िंदगी की दुआ न दी जाए!

कह दो इस अहद के बुज़ुर्गों से,
ज़िंदगी की दुआ न दी जाए|

राहत इन्दौ
री

उनसे मैं शिकायात न लिखने पाऊँ!

शुक्र ही शुक्र लिखे जाऊँ मैं उनके हक़ में,
कभी उनसे मैं शिकायात न लिखने पाऊँ|

राजेश रेड्डी

मेरा दस्त-ए-दुआ’ अकेला था!

बख़्शिश-ए-बे-हिसाब के आगे,
मेरा दस्त-ए-दुआ’ अकेला था|

वसीम बरेलवी

जो ज़ख्म मेरे दिल को!

मिलते रहे दुनिया से जो ज़ख्म मेरे दिल को,
उनको भी समझकर मैं सौग़ात, बरतता हूँ ।

राजेश रेड्डी