चला गया मटरू!

बहुत लंबा समय नहीं हुआ है, शायद सात-आठ माह हुए हों, मैंने अपनी ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से अपने घर की बॉलकनी में आकर एक मेहमान के स्थापित होने की सूचना दी थी| उसी समय गोवा में तूफान आया था, शायद उससे भी इस मेहमान के आने का संबंध हो, यह एक श्वेत कपोत था, जिसे हमने ‘मटरू’ नाम दिया| बीच में एक दो बार ऐसा हुआ कि मटरू एक-दो दिन दिखाई नहीं दिया, इस पर भी मैंने एक ब्लॉग-पोस्ट लिखी थी ‘आना और जाना मटरू का’|

हमारी बॉलकनी पर लगे स्पलिट एसी के हवा फेंकने वाले भाग, शायद उसे वेंटीलेटर कहते हैं न!, उसके ऊपर मटरू का निवास बन गया| वह रात भर उस पर ही बैठकर सोता और सुबह नाश्ता करने के बाद वह भ्रमण पर निकल जाता और फिर शाम को सूर्यास्त से काफी पहले वह वापस अपने स्थान पर होता था, जहां अपने पक्षी स्वभाव के अनुसार वह सूर्यास्त से पहले ही शाम का भोजन करता था|

वैसे हमारे यहाँ पक्षियों को दाना डालने की परंपरा तो काफी पुरानी है लेकिन इस तरह का संबंध किसी पक्षी के साथ तो नहीं बना था, वैसे वो था भी बिल्कुल अलग श्वेत कपोत, देखने में सबके बीच बिल्कुल अलग दिखता था, जैसे सामान्य जनता के बीच कोई अभिजात व्यक्तित्व, वैसे तो हम उसको वेंटीलेटर के ऊपर ही खाना दे देते थे, ऐसा कम ही होता था कि वह नीचे सामान्य-जन के साथ भोजन करने के लिए उतर आता था, तब लगता था कि वह बड़ी शान के साथ उनके बीच वीआईपी की तरह भोजन करता था, ऐसे में यह भी हो जाता था कि कभी कोई दूसरा सामान्य कबूतर ऊपर उसके स्थान पर बैठ जाता था, तब हमें तुरंत उसको वहाँ से उड़ाना होता था और वह वापस जाकर अपने स्थान पर बैठ जाता था|

यह भी हुआ कि मटरू के साथ हमें कुछ अन्य पक्षियों से भी परिचित होने का अवसर मिला, जो किसी प्रकार दूसरों से अलग थे| जैसे एक कबूतर बहुत सुंदर है लेकिन उसका पंजा कटा हुआ है| पता नहीं ऐसे पक्षी तो कई हैं जिनका कोई एक पंजा कटा हुआ है, शायद इसमें किसी इंसान का योगदान होगा| एक कौआ है जिसका एक पैर ही नहीं है| मैं उसकी तरफ रोटी या बिस्कुट का टुकड़ा उछाल देता हूँ जिसे वह कैच कर लेता है| कभी ऐसा भी होता है कि दो-तीन बार उछालने पर भी वह उसे कैच नहीं कर पाता, तब वह शायद मान लेता है कि आज यह उसकी किस्मत में नहीं है|

खैर फिर मटरू की बात करता हूँ, आज शाम जब मेरी पत्नी मटरू को शाम की खुराक देने के लिए बाल्कनी में गई तो पाया कि वह फर्श पर लुढ़का हुआ था, कोई चोट का निशान नहीं था, लगता है स्वाभाविक मौत ही मरा था, बहुत बार खयाल आता था कि यह कब तक हमारे साथ रहेगा, उसका जवाब भी मिल गया, अब जब वह दिखाई नहीं देगा तो यह इंतजार नहीं रहेगा कि कब आएगा|

जिस प्रकार मटरू फर्श पर पड़ा था, उसे देखकर श्रीलाल शुक्ल जी के उपन्यास ‘राग दरबारी’ का प्रसंग याद या गया, शायद यह अंतिम दृश्य था, जैसा अभी तक याद है, उपन्यास में एक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी अपना पेंशन संबंधी स्वीकृति आदेश देखने के लिए प्रतिदिन दफ्तर के नोटिस बोर्ड तक जाता है और उसे नहीं पाकर वापस लौट आता है| एक दिन दूसरे लोग देखते हैं कि वह नोटिस बोर्ड के नीचे मृत पड़ा है और उस बोर्ड पर एक कागज फड़फड़ा रहा है, जो उसका पेंशन स्वीकृति आदेश है|

मटरू को क्या प्रतीक्षा थी, ये तो वही जाने, बस वह भी चला गया| कुछ पंक्तियाँ जो दिल्ली में बहुत पहले ट्रेन में साथ चलने वाले कुछ कविता प्रेमी सज्जनों से सुनी थीं, ऐसे ही याद आ रही हैं, किसकी लिखी हुई हैं, मुझे मालूम नहीं है –

उधर वो घर से निकल चुके हैं,
इधर मेरा दम निकल रहा है,
अजब तमाशा है ज़िंदगी का
वो आ रहे हैं, मैं जा रहा हूँ|

वह एक पक्षी था, आता था उड़ जाता था, मोह के कारण फिर लौट आता था, जैसे जहाज का पंछी! इस बार जिन्होंने उड़ान भरी, वह मटरू नहीं, उसके प्राण-पखेरू थे| उनका भी तो पक्षी रूप में ही ज़िक्र करते हैं हम!
ईश्वर उसकी आत्मा को शांति दें|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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आदतें डालने पर!



काफी लंबा समय हो गया ये ब्लॉग लिखते हुए| मैंने कभी यह नहीं सोचा कि विद्वान लोग ही इसको पढ़ें और अपनी सम्मति दें| जो भी मेरा पाठक है, वह मेरी दृष्टि में सबसे विद्वान है|
शुरुआत मैंने की थी अपने जीवन के प्रसंगों, प्रारंभिक जीवन जो दिल्ली-शाहदरा में रहते हुए बिताया, उसके बाद विभिन्न स्थानों पर सेवाकाल में हुए अनुभवों को दोहराते हुए, अपने कवि मित्रों का संदर्भ भी इसमें दिया और उनकी कुछ रचनाएं भी शेयर कीं | मैंने अपने नियोजकों के लिए बहुत से कवि सम्मेलन भी आयोजित किए, उनके अनुभव और इस प्रकार जिन कवियों के संपर्क में आया, उनके बारे में भी लिखा|

आज मैं इतना ही कहना चाहूँगा कि प्रारंभ में जबकि मैं अपने ब्लॉग में अपने अनुभव ज्यादा शेयर करता था, वह बाद में रचनाएं अथवा फिल्मी गीत आदि शेयर करने पर आकर सिमट गया| यद्यपि ये रचनाएं और फिल्मी गीत भी मुझे अत्यंत प्रिय हैं और मेरा विश्वास है कि मेरे अधिकांश पाठक भी इनको पसंद करते हैं|

असल में हमारी सुविधा और परिस्थितियों के अनुसार भी हमारी आदतें बदलती रहती हैं| आज मैं आदतों के बारे में ही बात करूंगा| मुझे याद है कि हायर सैकेंडरी के मेरे पाठ्यक्रम में अंग्रेजी की ‘प्रोज़ बुक’ थी| उसमें एक निबंध था ‘ऑन अरली राइज़िंग’ जिसमें एक उक्ति थी ‘राइज़ अरली, एंड यू आर द मास्टर ऑफ टाइम’, यह पाठ सुबह जल्दी उठने की आदत डालने के बारे में था|

एक पाठ और याद आ रहा है इसी पुस्तक से ‘ऑन मेकिंग हैबिट्स’, इस पाठ में बताया गया था कि कैसे हम लोगों की आदत होती है कि कहाँ क्या रखना है, किस जेब में कौन सा सामान रखना है| इसमें लेखक ने एक प्रसंग लिखा था कि एक बार वो पूरी रात नशे में, बदनाम लोगों के साथ जुआ खेलता रहा लेकिन उसकी जेब साफ नहीं हुई, क्योंकि उसे खुद ध्यान नहीं था कि उसकी कौन सी जेब में पैसे रखे हैं| लेखक यह बताना चाहते थे कि जब हमको यह चिंता होती है कि उधर रखे हुए मेरे पैसे सलामत रहें, तब हम अनजाने में दूसरे लोगों को इसका संकेत दे देते हैं कि पैसे किधर हैं!

आदतों के बारे में एक उदाहरण कि किस तरह लोग हमारी आदतों का फायदा उठाते हैं| बहुत पहले प्रबंधन विषय की किसी कक्षा में एक वक्ता ने यह बात बताई थी| यह शायद 15-20 साल पुरानी तो बात होगी ही, एक टुथ-पेस्ट कंपनी के प्रबंधन ने महसूस किया कि उनके टुथ-पेस्ट की बिक्री नहीं बढ़ रही है, तब उन्होंने यह निर्णय लिया कि ट्यूब के जिस गोल मुह से पेस्ट निकलता है, उसका आकार थोड़ा बढ़ा दिया जाए| लोगों को अक्सर आदत होती है कि वे ब्रश के ऊपर एक निश्चित लंबाई तक पेस्ट निकालकर उसका उपयोग करते हैं| क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि ट्यूब का मुह थोड़ा सा ही बड़ा करने से टुथ-पेस्ट की बिक्री दोगुनी हो गई|

अभी कोरोना काल है, हम मास्क पहनकर बाहर निकलने की आदत डालते हैं, कभी-कभी भूल जाते हैं| ईश्वर करे कि यह स्थिति जल्दी खत्म हो जाए और हमको इसके बिना निकलने की आदत डालनी पड़े|

आदतें तो बहुत सी हो सकती हैं, मैं उपदेशक भी नहीं बनना चाहता बस हर प्राणी से प्रेम करने की आदत डाल सकें तो अच्छा है, इसके लिए दूसरों के दोषों पर नहीं उनकी अच्छाइयों पर फोकस करना होगा|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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