पार अकेले उतर गया कब का!

वो जो लाया था हम को दरिया तक,
पार अकेले उतर गया कब का|

जावेद अख़्तर

किनारों ने भी दिल तोड़ दिया है!

तूफ़ान का शेवा तो है कश्ती को डुबोना,
ख़ामोश किनारों ने भी दिल तोड़ दिया है|

महेश चंद्र नक़्श

साहिल का इरादा कौन करे!

कश्ती मौजों में डाली है मरना है यहीं जीना है यहीं,
अब तूफ़ानों से घबरा कर साहिल का इरादा कौन करे|

आनंद नारायण मुल्ला

तिनकों पे भरोसा कौन करे!

जब अपना दिल ख़ुद ले डूबे औरों पे सहारा कौन करे,
कश्ती पे भरोसा जब न रहा तिनकों पे भरोसा कौन करे|

आनंद नारायण मुल्ला

कश्ती को उछाला दे दूँ!

डूबते डूबते कश्ती को उछाला दे दूँ,
मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जाएगा|

अहमद फ़राज़

हमको पार होना चाहिए!

आप दरिया हैं तो फिर इस वक़्त हम ख़तरे में हैं,
आप कश्ती हैं तो हमको पार होना चाहिए|

मुनव्वर राना

लहरों से टकराती तो है!

इस नदी की धार से ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है|

दुष्यंत कुमार

कश्ती बादबानी दे गया!

सब हवायें ले गया मेरे समंदर की कोई,
और मुझको एक कश्ती बादबानी दे गया|

जावेद अख़्तर

कोई कोहराम नहीं होता!

दिन डूबे हैं या डूबे बारात लिये कश्ती,
साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता|

मीना कुमारी

दरिया उतर गया यारो!

भटक रही थी जो कश्ती वो ग़र्क-ए-आब हुई,
चढ़ा हुआ था जो दरिया उतर गया यारो|

शहरयार