कौन रखता है मज़ारों का हिसाब!

जिस्म से रूह तलक रेत ही रेत
न कहीं धूप न साया न सराब,
कितने अरमान हैं किस सहरा में
कौन रखता है मज़ारों का हिसाब|

कैफ़ी आज़मी

तेरे बदन की महक छा गई!

अपनी साँसों की ख़ुशबू लगे अजनबी,
मुझ पर तेरे बदन की महक छा गई।

नक़्श लायलपुरी

उसे जिस्म बनाकर देखो!

वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में,
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो |

निदा फ़ाज़ली

हमेशा तेरी डगर में रहा!

वो जिस्म ही था जो भटका किया ज़माने में,
हृदय तो मेरा हमेशा तेरी डगर में रहा ।

गोपालदास “नीरज”

मैं देवता की तरह क़ैद!

मैं देवता की तरह क़ैद अपने मंदिर में,
वो मेरे जिस्म के बाहर मेरी तलाश में है|

कृष्ण बिहारी ‘नूर’

कभी चांद नगर के हम हैं!

जिस्म से रूह तलक अपने कई आलम हैं,
कभी धरती के, कभी चांद नगर के हम हैं |

निदा फ़ाज़ली

और जां तन्हा!

ज़िन्दगी क्या इसी को कहते हैं,
जिस्म तन्हा है और जां तन्हा|

मीना कुमारी (महज़बीं बानो)

मिट्टी है, हवा है मुझमें!

आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है मुझमें,
मुझको ये वहम नहीं है कि खु़दा है मुझमें|

राजेश रेड्डी