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सामने बैठा था मेरे, और वो मेरा न था!

आज एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, जिसके कुछ शेर ग़ुलाम अली जी ने और जगजीत सिंह तथा चित्रा सिंह की जोड़ी ने भी गाए हैं| काफी लंबी ग़ज़ल है ये और सिर्फ एक घटना हो जाने पर ज़िंदगी कितनी बदल जाती है, ये इसमें बहुत खूबसूरती से दर्शाया गया है|


लीजिए आज प्रस्तुत है, अदीम हाशमी जी की लिखी ये खूबसूरत ग़ज़ल-

फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा भी न था,
सामने बैठा था मेरे, और वो मेरा न था|

वो के ख़ुशबू की तरह फैला था मेरे चार सू,
मैं उसे महसूस कर सकता था छू सकता न था|

रात भर पिछली ही आहट कान में आती रही,
झाँककर देखा गली में कोई भी आया न था|

अक्स तो मौजूद था पर अक्स तनहाई का था,
आईना तो था मगर उसमें तेरा चेहरा न था|

आज उसने दर्द भी अपने अलहदा कर दिए,
आज मैं रोया तो मेरे साथ वो रोया न था|

मैं तेरी सूरत लिए सारे ज़माने में फिरा,

सारी दुनिया में मगर, कोई तेरे जैसा न था|

आज मिलने की ख़ुशी में सिर्फ़ मैं जागा नहीं,
तेरी आँखों से भी लगता है कि तू सोया न था|

ये भी सब वीरानियाँ उस के जुदा होने से थीं,
आँख धुँधलाई हुई थी, शहर धुँधलाया न था|

सैंकड़ों तूफ़ान लफ़्ज़ों में दबे थे ज़ेर-ए-लब,
एक पत्थर था ख़ामोशी का, के जो हटता न था|



याद करके और भी तकलीफ़ होती थी ‘अदीम’,
भूल जाने के सिवा अब कोई भी चारा न था|

मस्लहत ने अजनबी हम को बनाया था ‘अदीम’,
वरना कब इक दूसरे को हमने पहचाना न था|


-अदीम हाशमी


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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