ख़त तो नहीं है कि जला भी न सकूँ!

फूँक डालूँगा किसी रोज़ मैं दिल की दुनिया,
ये तिरा ख़त तो नहीं है कि जला भी न सकूँ|

राहत इन्दौरी

ख़्वाब की ताबीर बताने वाला!

मैंने देखा है बहारों में चमन को जलते,
है कोई ख़्वाब की ताबीर बताने वाला|

अहमद फ़राज़

जलती है सहर होते तक!

ग़म-ए-हस्ती का ‘असद’ किस से हो जुज़मर्ग इलाज,
शम्अ हर रंग में जलती है सहर होते तक |

मिर्ज़ा ग़ालिब

जलने का क़रीना मुश्किल है!

वह शोला नहीं जो बुझ जाए आँधी के एक ही झोंके से,
बुझने का सलीका आसाँ है, जलने का क़रीना मुश्किल है|

अर्श मलसियानी