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किसान आंदोलन और कम्युनिस्टों के मंसूबे!

किसान नेताओं के साथ सरकार की वार्ता के एक और दौर में सफलता नहीं मिल पाई, कम्युनिस्ट लोग और हताश कांग्रेसी प्रसन्न होंगे कि उनके मंसूबे अभी तक कामयाब हो रहे हैं| मैं विशेष रूप से इस सच्चाई का उल्लेख करना चाहूँगा कि इस आंदोलन के नेतृत्व में 40 किसान संघों के नेता हैं, जिनमें से कोई अपने को दूसरे किसी दूसरे से कम नहीं समझता| किसी आंदोलन के संबंध में वार्ता का नतीजा तब निकलना संभव होता है, जब उसका एक नेता हो और उसके साथ मुद्दों पर चर्चा करके समझौता किया जा सके| भीड़ को कोई बात समझाई जा सकती है क्या?

विशेष रूप से कम्युनिस्टों को ऐसा वातावरण बने रहने से बहुत सुख मिलता है| साम्यवाद का जो दर्शन है वो एक ऐतिहासिक सच्चाई है| कोई समय था जब रूस में या चीन में इस दर्शन की सार्थकता थी| लेकिन आज लगभग पूरा विश्व इस पार्टी को नकार चुका है (मैं दर्शन की बात नहीं करूंगा, उसकी ऐतिहासिक प्रासंगिकता हो सकती है)|


अपने देश में देखें तो पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक कम्युनिस्ट शासन रहा| बंगाल जो कभी औद्योगिक दृष्टि से अत्यंत संपन्न प्रदेशों में गिना जाता था, वहाँ इन लोगों ने कोई उद्योग नहीं पनपने दिया और आज बंगाल गरीबी का एक बहुत बड़ा शो-रूम बन गया है|


कम्युनिस्ट दर्शन देखा जाए तो अधूरा दर्शन है| जो व्यवस्था चल रही है उसको छिन्न-भिन्न कर दोगे| खास तौर पर भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में तो आंदोलनों, हड़तालों के अधिकार का दुरुपयोग करते हुए आप ये काम कर ही सकते हैं| और अगर आप किसी तरह सफल हो जाते हैं और आपकी व्यवस्था लागू हो जाती है, तब क्या होता है?


मैंने कहीं पढ़ा था कि ख्रुश्चेव के बाद के एक नेता, अपने भाषण में उनकी आलोचना कर रहे थे, भीड़ में से एक व्यक्ति ने पूछा जब वे गलत काम कर रहे थे, तब आप कहाँ थे? उन नेताजी ने पूछा ये प्रश्न किसने पूछा है, हाथ उठाएँ?कोई जवाब नहीं आया| वो नेता बोले मैं उस समय वहीं था, जहां इस समय आप हैं! यह भी कहा जाता है कि किसी बड़े नेता के भाषण के बाद जो पहले ताली बजाना बंद कर देता उसको विद्रोही मान लिया जाता है| और ‘थियानमान चौक’ का नरसंहार तो आपको याद ही होगा, इससे आप समझ सकते हैं कि कम्युनिस्ट विरोध को किस तरह बर्दाश्त करते हैं!


लेकिन जब से मोदी सरकार आई है तब से कम्युनिस्ट विशेष रूप से सक्रिय हैं| लोगों से आपको वोट तो मिलते नहीं हैं, कोई सकारात्मक काम आप नहीं कर सकते, लेकिन लोगों को भड़का तो सकते हैं, भ्रमित तो कर सकते हैं| इतने बड़े देश में आपको विशेष रूप से पंजाब और थोड़े बहुत अन्य एक-दो राज्यों के कुछ किसान मिल गए, बाकी आपके कार्यकर्ता! रास्ते रोकने के लिए तो इतना बहुत है!


मुझे लगता है कि उच्चतम न्यायालय को ऐसे मामलों में रुचि लेकर निर्देश देने चाहिएं, क्योंकि सरकार की आगे बढ़ने की सीमाएं हैं| देशहित में यह ज़रूरी है कि कम्युनिस्टों के ऐसे मंसूबों को नाकाम किया जाए जिसमें वे संसद में पारित किसी कानून के विरोध में जनजीवन को अस्त-व्यस्त करके सरकार को ब्लैक-मेल करना चाहते हैं| अगर किसी कानून का विरोध करना है तो जनसामान्य को बाधा पहुंचाए बिना आप यह काम करें और कानून को न्यायालय में चुनौती दें, लेकिन उसमें भी तो इन कम्युनिस्टों की आस्था नहीं है|


आज ऐसे ही किसान आंदोलन के बहाने कम्युनिस्टों की अव्यावहारिक और विध्वंसक भूमिका के बारे में बात करने का मन हुआ, तो ये बातें कह दीं|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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भाजपा की वेक्सीन!

भारतवर्ष के आबादी की दृष्टि से सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री रहे श्रीमान अखिलेश यादव ने आज एक बयान दे डाला| अपने इस बयान के माध्यम से श्रीमान यादव जी ने यह बता दिया की खानदानी विरासत के दम पर भले ही श्रीमान जी इतने बड़े राज्य के मुख्य मंत्री तक रह चुके हों, परंतु वे भीतर से कितने बौने हैं, यह उनके इस बयान से ज़ाहिर होता है|

वैसे आज का दिन एक ऐतिहासिक दिन है, जबकि देश में बनी दो-दो कोरोना वेक्सीन्स को आपातकालीन उपयोग की अनुमति मिल गई है, और आशा की जाती है की यह कोरोना को देश से समाप्त करने की दिशा में बहुत महत्वपूर्ण उपलब्धि साबित होगी|


परंतु अखिलेश बबुआ ने कहा है कि ये ‘बीजेपी’ की वेक्सीन है और वो इसको नहीं लगवाएंगे| मुझे लगता है कि किसी राजनेता द्वारा इससे घटिया बयान नहीं दिया जा सकता!


बीजेपी पार्टी से आपकी राजनैतिक लड़ाई है, वह आप लड़ते रहिए परंतु यह वेक्सीन देश के वैज्ञानिकों ने अथक परिश्रम से तैयार की हैं| सरकार की इसमें अगर कोई भूमिका है तो वह फंड उपलब्ध कराने और वैज्ञानिकों की टीम को प्रोत्साहित करने तक ही सीमित हो सकती है| इस प्रकार अखिलेश बाबू ने अपने इस द्वेष और मूर्खता से भरे बयान के द्वारा हमारे वैज्ञानिकों का अपमान किया है, जिसके लिए उनकी घोर निंदा की जानी चाहिए|


वैसे भी मोदी जी के सत्तारूढ़ होने के बाद बेचारे विरोधी नेताओं के पास कोई काम नहीं रहा गया है, वे किसानों को भ्रमित कर रहे हैं और जहां भी संभव हो दुष्प्रचार कर रहे हैं| उसी कानून की प्रतियाँ फाड़ रहे हैं, जिसे वो पहले ‘नोटिफ़ाई’ कर चुके हैं| आशा है कभी तो ऊपर वाला उनकी सुनेगा!


परंतु अखिलेश जी, परिस्थिति कैसी भी हो, इतना नीचे उतरना तो ठीक नहीं है| यह लोगों की जान बचाने का मामला है और इस मामले में ओछी राजनीति ठीक नहीं है|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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