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हाय रे अकेले छोड़ के जाना, और न आना बचपन का!

आज मुझे अपने परम प्रिय गायक जी का गाया, फिल्म देवर का एक गीत याद आ रहा है, जो अभिनेता धर्मेंद्र जी पर फिल्माया गया था। इस गीत को लिखा था आनंद बख्शी जी ने और रोशन जी के संगीत निर्देशन में मुकेश जी ने अपने मधुर स्वर में इस गीत को गाकर अमर कर दिया है।

गीत का विषय भी ऐसा ही है, वास्तव कुछ चीजें जो जीवन में अनमोल होती हैं, उनमें से एक है बचपन, और बचपन के अनमोल होने को इस गीत में बहुत सुंदरता में अभिव्यक्त किया गया है।

लीजिए प्रस्तुत है यह अमर गीत-

 

 

आया है मुझे फिर याद वो जालिम,
गुज़रा ज़माना बचपन का,
हाय रे अकेले छोड़ के जाना
और न आना बचपन का,
आया है मुझे फिर याद वो जालिम।

 

वो खेल वो साथी वो झूले,
वो दौड़ के कहना आ छू ले,
हम आज तलक भी न भूले-
हम आज तलक भी न भूले,
वो ख्वाब सुहाना बचपन का,
आया है मुझे फिर याद वो जालिम।

 

इसकी सबको पहचान नहीं,
ये दो दिन का मेहमान नहीं-
ये दो दिन का मेहमान नहीं,
मुश्किल है बहुत आसान नहीं,
ये प्यार भुलाना बचपन का,
आया है मुझे फिर याद वो जालिम।

 

मिल कर रोयें फरियाद करें,
उन बीते दिनों की याद करें,
ऐ काश कहीं मिल जाये कोई-
ऐ काश कही मिल जाये कोई,
जो मीत पुराना बचपन का।
आया है मुझे फिर याद वो जालिम।
गुज़रा ज़माना बचपन का।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-14 : बचपन!

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज चौदहवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

उस समय जो कविताएं किसी हद तक ‘परफेक्ट’ लगती थीं उनको मित्रों के बीच, गोष्ठियों में पढ़ देता था। बहुत सी पांडुलिपियां ऐसी होती थीं जिनको लेकर तसल्ली नहीं होती थी।

ऐसी ही कुछ कागज़ पर सुरक्षित कविताएं, जिनको मैंने उस समय फाइनल नहीं माना और बाद में उनको फाइनल रूप देने का समय नहीं मिला, आज की तारीख में सोचता हूँ कि उनको ‘जैसी हैं, जहाँ हैं, वैसी शेयर कर लेता हूँ।

एक कविता आज प्रस्तुत है-

 

बचपन

बचपन के बारे में,
आपके मन में भी कुछ सपनीले खयालात होंगे,
है भी ठीक, अपने आदर्श रूप में- बचपन
एक सुनहरा सपना है,
जो बीत जाने के बाद, बार-बार याद आता है।
कोशिश रहती है हमारी, कि हमारे बच्चे-
हक़ीकत को जानें अवश्य,
पर उसके कड़ुए दंश से घायल न हों।
वे ये तो जानें कि जमीन पथरीली है,
पर उससे उनके नाज़ुक पैर न छिलें,
कोशिश तो यहाँ तक होती है कि उनके पांव
जहाँ तक संभव हो-
पथरीली जमीन को छुएं भी नहीं।
खिलौनों, बादलों, खुले आसमान
और परीलोक को ही वे, अपनी दुनिया मानते रहें।
सचमुच कितने भाग्यशाली हैं ये बच्चे-
यह खयाल तब आता है, जब-
कोई दुधमुहा बच्चा, चाय की दुकान में
कप-प्लेट साफ करता है।
दुकान में चाय-नाश्ता बांटते समय
जब कुछ टूट जाता है उससे, तब
ग्राहक या दुकानदार, पूरी ताकत से
उसके गाल पर, अपनी घृणा के हस्ताक्षर करता है।
सपनों की दुनिया से अनजान ये बच्चे,
जब कहीं काम या भीख मांगते दिखते हैं,
तब आता है खयाल मन में-
कि ये बच्चे, देश का भविष्य हैं!
अपनी पूरी ताकत से कोई छोटा बच्चा
जब रिक्शा के पैडल मारता है,
तब कितनी करुणा से देखते हैं उसको आप!
हम बंटे रहें-
जातियों, संप्रदायों, देशों और प्रदेशों में,
पर क्या कोई ऐसी सूरत नहीं कि
बच्चों को हम, बच्चों की तरह देखें।
कोशिश करें कि ये नौनिहाल-
स्वप्न देखने की अवधि, तालीम की उम्र
ठीक से गुज़ारें
और उसके बाद, ज़िंदगी की लड़ाई में
अपने बलबूते पर, प्रतिभा के दम पर
शामिल हों।
क्या हम सब रच सकते हैं
इस निहायत ज़रूरी सपने को-
अपने परिवेश में!

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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