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हम सिगार से जला किए!

आज स्वर्गीय कुमार शिव जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ, जिसमें उन्होंने बड़े खूबसूरत तरीके से कहा है कि किस प्रकार ज़िंदगी ने हमारी हालत, राखदान में पड़े सिगार जैसी कर दी है| राखदान में सुलगता सिगार, जो मदिरा पान, संगीत और राजनैतिक गतिविधियों तथा बहस आदि का भी साक्षी बनता है|

लीजिए आज कुमार शिव जी की इस रचना का आनंद लेते हैं-

राखदान में पड़े हुए
हम सिगार से जला किए ।

उँगलियों में दाबकर हमें
ज़िन्दगी ने होंठ से छुआ
कशमश में एक कश लिया
ढेर सा उगल दिया धुआँ


लोग मेज़ पर झुके हुए
आँख बाँह से मला किए ।

बुझ गए अगर पड़े-पड़े
तीलियों ने मुख झुलस दिया
फूँक गई त्रासदी कभी
और कभी दर्द ने पिया


झण्डियाँ उछालते हुए
दिन जुलूस में चला किए ।

बोतलों-गिलास की खनक
आसपास से गुज़र गई
बज उठे सितार वायलिन
इक उदास धुन बिखर गई
|

राख को उछालते रहे
हम बुलन्द हौसला किए ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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