शहर अचानक तनहा लगता है!

और तो सब कुछ ठीक है लेकिन कभी-कभी यूँ ही,
चलता-फिरता शहर अचानक तनहा लगता है|

निदा फ़ाज़ली

वो वहाँ पर नहीं रहा!

वापस न जा वहाँ कि तेरे शहर में ‘मुनीर’,
जो जिस जगह पे था वो वहाँ पर नहीं रहा|

मुनीर नियाज़ी

किसी के बराबर नहीं रहा!

मुझ में ही कुछ कमी थी कि बेहतर मैं उनसे था,
मैं शहर में किसी के बराबर नहीं रहा|

मुनीर नियाज़ी

कोई चेहरा दिखाई पड़ता है!

हमारे शहर में बे-चेहरा लोग बसते हैं,
कभी-कभी कोई चेहरा दिखाई पड़ता है|

जाँ निसार अख़्तर

घर जलने का मंज़र लेके आया है!

बसा था शहर में बसने का इक सपना जिन आँखों में,
वो उन आँखों मे घर जलने का मंज़र लेके आया है|

राजेश रेड्डी

फैल जाए न बाज़ार देखना!

अच्छी नहीं है शहर के रस्तों की दोस्ती
आँगन में फैल जाए न बाज़ार देखना…..!

निदा फ़ाज़ली

जोगी का शहर में ठिकाना क्या!

इंशाजी उठो अब कूच करो इस शहर में दिल को लगाना क्या।
वहशी को सुकूं से क्या मतलब जोगी का शहर में ठिकाना क्या॥

इब्ने इंशा

कल कोई त्योहार होगा!

ये सारे शहर में दहशत-सी क्यों हैं,
यक़ीनन कल कोई त्योहार होगा|

राजेश रेड्डी