चिराग़ाँ हर एक घर के लिए!

कहां तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए,
कहां चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए|

दुष्यंत कुमार

हम जब उसके शहर से निकले—

हिज्र की पहली शाम के साये दूर उफ़क़ तक छाये थे,
हम जब उसके शहर से निकले सब रास्ते सँवलाये थे|

क़तील शिफ़ाई

तेरे शहर से गुज़रते हुए!

ये वाकया है तेरे शहर से गुज़रते हुए,
हरे हुए हैं कई ज़ख्म दिल के भरते हुए।

मिलाप चंद राही