लौट के फिर घर नहीं जाता!

खुले थे शहर में सौ दर मगर इक हद के अंदर ही,
कहाँ जाता अगर मैं लौट के फिर घर नहीं जाता|

वसीम बरेलवी

इस शहर में क्या हो नहीं सकता!

बस तू मिरी आवाज़ से आवाज़ मिला दे,
फिर देख कि इस शहर में क्या हो नहीं सकता|

मुनव्वर राना

उकताए हुए रहना!

आदत ही बना ली है तुमने तो ‘मुनीर’ अपनी,
जिस शहर में भी रहना उकताए हुए रहना|

मुनीर नियाज़ी

कोई फिसलकर नहीं गिरता!

इतना तो हुआ फ़ाएदा बारिश की कमी का,
इस शहर में अब कोई फिसलकर नहीं गिरता|

क़तील शिफ़ाई

लोगों से याराना चाहिए!

चौराहे बाग़ बिल्डिंगें सब शहर तो नहीं,
कुछ ऐसे वैसे लोगों से याराना चाहिए|

निदा फ़ाज़ली

आने वाले हैं ज़ंजीरें पहनाने लोग!

फिर सहरा से डर लगता है फिर शहरों की याद आई,
फिर शायद आने वाले हैं ज़ंजीरें पहनाने लोग|

राही मासूम रज़ा

शहर अचानक तनहा लगता है!

और तो सब कुछ ठीक है लेकिन कभी-कभी यूँ ही,
चलता-फिरता शहर अचानक तनहा लगता है|

निदा फ़ाज़ली

वो वहाँ पर नहीं रहा!

वापस न जा वहाँ कि तेरे शहर में ‘मुनीर’,
जो जिस जगह पे था वो वहाँ पर नहीं रहा|

मुनीर नियाज़ी

किसी के बराबर नहीं रहा!

मुझ में ही कुछ कमी थी कि बेहतर मैं उनसे था,
मैं शहर में किसी के बराबर नहीं रहा|

मुनीर नियाज़ी

कोई चेहरा दिखाई पड़ता है!

हमारे शहर में बे-चेहरा लोग बसते हैं,
कभी-कभी कोई चेहरा दिखाई पड़ता है|

जाँ निसार अख़्तर