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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-16: गीतों में कहनी थीं, तुमसे कुछ बातें!

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज सोलहवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

उस समय जो कविताएं किसी हद तक ‘परफेक्ट’ लगती थीं उनको मित्रों के बीच, गोष्ठियों में पढ़ देता था। बहुत सी पांडुलिपियां ऐसी होती थीं जिनको लेकर तसल्ली नहीं होती थी।

ऐसी ही कुछ कागज़ पर सुरक्षित कविताएं, जिनको मैंने उस समय फाइनल नहीं माना और बाद में उनको फाइनल रूप देने का समय नहीं मिला, आज की तारीख में सोचता हूँ कि उनको ‘जैसी हैं, जहाँ हैं, वैसी शेयर कर लेता हूँ।

एक गीत-कविता आज प्रस्तुत है-

 

गीतों में कहनी थीं, तुमसे कुछ बातें
आओ कुछ समय यहीं साथ-साथ काटें।
अपनी तुतली ज़ुबान गीतमयी
मुद्दत से बंद चल रही,
करवट लेते विचार हर पल लेकिन,
वाणी खामोश ही रही।

 

आंदोलित करें आज, भीतर की हलचल को,
चुन लें अभिव्यक्ति के, फूल और कांटे।
आओ कुछ समय यहीं साथ-साथ काटें।।

 

जीवन सागर से, याचक बने समेटें
गीतों की शंख-सीपियां,
दूर करें मिलकर, तट को गंदा करतीं,
उथली, निर्मम कुरीतियां।
जन-गण के सपनों पर
अपनी टांगें पसार,
सोते संप्रभुओं की नींद कुछ उचाटें।

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-12

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज बारहवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

उस समय जो कविताएं किसी हद तक ‘परफेक्ट’ लगती थीं उनको मित्रों के बीच, गोष्ठियों में पढ़ देता था। बहुत सी पांडुलिपियां ऐसी होती थीं जिनको लेकर तसल्ली नहीं होती थी।

ऐसी ही कुछ कागज़ पर सुरक्षित कविताएं, जिनको मैंने उस समय फाइनल नहीं माना और बाद में उनको फाइनल रूप देने का समय नहीं मिला, आज की तारीख में सोचता हूँ कि उनको ‘जैसी हैं, जहाँ हैं, वैसी शेयर कर लेता हूँ।

एक कविता आज प्रस्तुत है-

 

 

 

पेड़

पेड़ हमारी आस्थाओं का प्रतिफलन है,
पेड़ बनने के लिए ज़रूरी है
कि पहले हम ऐसा बीज हों-
जिसे धरती स्वीकार करे,
फिर धरती में रचे-बसे
रसों-स्वादों, मूल रसायनों से भी
हमारा तालमेल हो,
तभी हम धरती का सीना चीरकर
अपना नाज़ुक सिर, शान से उठा सकेंगे।
फिर यहाँ की आब-ओ-हवा, गर्द-ओ-गुबार
धूप और बरसात, जब सहन करेंगे
और दूसरों की इनसे रक्षा करेंगे,
तभी कहला सकेंगे- पेड़,
यह सब यदि संभव नहीं-
तो फिर शान से इंसान बने रहो,
जी भरकर नफरत करो दूसरों से,
और करो ऐसे काम, कि वे भी
आपसे नफरत करें।
कुदरत, सभ्यता, शिष्टता, नागरिकता के
जितने भी मापदंड हैं, नियम हैं
उन्हें शान से तोड़ो,
क्योंकि इंसान होने के लिए
सिर्फ इंसान जैसा दिखना ज़रूरी है।
उसके बाद तो इंसान सबसे ऊपर है,
अपनी पहचान रोज़ तोड़ता है-
फिर भी इंसान ही कहलाता है।
क्या ही अच्छा होता अगर
इंसान का भी, धरती से
ऐसा ही रिश्ता होता-
जैसा पेड़ का होता है।
तब यह दुनिया, बाहर से भी हरी-भरी होती
और भीतर से भी!

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-9 : कोई तो आसपास हो होश-ओ-हवास में!

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज नौवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

लीजिए आज इस क्रम की इस नौवीं पोस्ट में तीन और रचनाओं को शेयर कर रहा हूँ-

 

 

 

पहली कविता- जीवन की नीरसता, निस्संगता में लोग किस प्रकार कहीं जुड़ाव महसूस नहीं करते, रोज़गार और अन्य अनेक कारणों से नए स्थानों और नए लोगों के पास जाते हैं और एकांतिक जीवन बिताते जाते हैं, केवल व्यावहारिक संबंध बनते हैं बस-

बनवासी राम की तरह

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

 

पांवों से धूल झाड़कर,
पिछले अनुबंध फाड़कर
रोज जिए हम-
बनवासी राम की तरह।

 

छूने का सुख न दे सके-
रिश्तों के धुंधले एहसास,
पंछी को मिले नहीं पर-
उड़ने को सारा आकाश।

 

सच की किरचें उखाड़कर,
सपनों की चीरफाड़ कर,
टांक लिए भ्रम,
गीतों के दाम की तरह।

कहते हैं कि मौसम पर बात करना सबसे आसान होता है लेकिन जब मौसम अपनी पर आ जाए तब उसको झेलना सबसे मुश्किल होता है।

मैंने भी अपने कुछ गीतों में और एक गज़ल में मौसम का ज़िक्र किया था, एक गज़ल के कुछ शेर यहाँ दे रहा हूँ-

आज मौसम पे तब्सिरा कर लें,
और कुछ ज़ख्म को हरा कर लें।

 

जिनके नुस्खों पे रोग पलते हैं,
उन हक़ीमों से मशविरा कर लें।

 

आह के शेर, दर्द की नज़्में,
इक मुसलसल मुशायरा कर लें।

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

 

और अंत में, राजनीतिज्ञ अपनी ही अलग दुनिया में रहते हैं, चमचों की जयकार के बीच उनको यह एहसास ही नहीं रहता कि उनके पैरों के नीचे ज़मीन है भी या नहीं।

इस विषय में मुझे अपनी लिखी हुई पंक्तियां याद आ रही हैं-

वे खुद बने हैं रोशनी, लिपटे कपास में,
कैसे अजीब भ्रम पले दिन के उजास में।

 

कुछ अपनी बदहवासियां उनको पता चलें,
कोई तो आसपास हो होश-ओ-हवास में।

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-3, ‘हम शंटिंग ट्रेन हो गए’!

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज तीसरा दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

लीजिए आज इस क्रम की इस तीसरी पोस्ट में दो और रचनाओं को शेयर कर रहा हूँ-

दिल्ली में अपनी प्रारंभिक सेवाओं में से दूसरी प्रायवेट नौकरी अर्थात दिल्ली प्रेस, झंडेवालान में सेवा के दौरान ट्रेन में दैनिक यात्रा के अनुभव भी बहुत रोचक थे, शाहदरा से झंडेवालान तक जाने के लिए, और इस दौरान रचनाएं भी बहुत सी लिखी गईं।

साम्यवाद में ऐसी अवधारणा है कि मेहनतकश मिलकर शोषण के विरुद्ध सामूहिक लड़ाई लड़ते हैं, लेकिन मैं देखता हूँ कि ‘दिल्ली प्रेस’ जैसी संस्थाएं तो शोषण के ही महाकेंद्र हैं, महानगरों में ऐसे संस्थानों की भीड़ है, और कर्मचारीगण सुबह से ही बस,ट्रेन और अब मैट्रो भी, की लाइनों में लग जाते हैं, जीवन-यापन की व्यक्तिगत लड़ाई लड़ने के लिए।

उन दिनों लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो काफी लोकप्रिय हुआ था-

 

महानगर का गीत

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष

 

नींदों में जाग-जागकर, कर्ज़ सी चुका रहे उमर,
सड़कों पर भाग-भागकर, लड़ते हैं व्यक्तिगत समर।
छूटी जब हाथ से किताब, सारे संदर्भ खो गए,
सीमाएं बांध दी गईं, हम शंटिंग ट्रेन हो गए,
सूरज तो उगा ही नहीं, लाइन में लग गया शहर,
लड़ने को व्यक्तिगत समर।

 

व्यापारिक-साहित्यिक बोल, मिले-जुले कहवाघर में,
एक फुसफुसाहट धीमी, एक बहस ऊंचे स्वर में,
हाथों में थामकर गिलास, कानों से पी रहे ज़हर।
कर्ज़ सी चुका रहे उमर।

 

मीलों फैले उजाड़ में, हम पीली दूब से पले,
उतने ही दले गए हम, जितने भी काफिले चले,
बरसों के अंतराल से गूंजे कुछ अपने से स्वर,
क्रांति चेतना गई बिखर।

 

 

और यह दूसरी कविता भी दिल्ली प्रेस में सेवा के दौरान की ही है, जब एशिया 72 प्रदर्शनी लगी थी, मैं उसे देखने गया लेकिन लेट हो गया और तब मैंने बगल में स्थित पुराना किला देखा, जिसके बाहर डीडीए ने फुलवारी बनाकर सजावट की हुई थी। उसको देखने के बाद ही ये गीत लिखा था|कम से कम इस गीत के लेखन का वर्ष मुझे याद रहता है, क्योंकि उस समय एशिया-72 प्रदर्शनी लगी थी, इसलिए कह सकता हूँ कि यह 1972 में लिखा गया था। लीजिए प्रस्तुत है आज का यह दूसरा गीत-

 

 

खंडहर गीत

 

तुम उजाडों से न ऊब जाओ कहीं
मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।
ये तिमिर से घिरी राजसी सीढ़ियां,
इनसे चढ़ती उतरती रही पीढ़ियां,
युग बदलते रहे,तंत्र गलते गए,
टूटती ही रहीं वंशगत रूढ़ियां।
था कभी जो महल, बन वही अब गया,
बेघरों के लिए है, बसेरा प्रिये।
मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।

 

कल कहानी बना आज मेरे लिए
उस कहानी के संकेत मिलते यहाँ,
भूल जाते हैं जब अपना इतिहास हम
ठोकरें फिर पुरानी हैं पाते वहाँ,
अपने जीवन की उपलब्धियों की ध्वजा
मैं फिराता रहा हर डगर इसलिए।
मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।

 

आज की सप्तरंगी छटाएं सभी
एक दिन खंडहर ही कही जाएंगी,
देखकर नवसृजन की विपुल चंद्रिका
अपनी बदसूरती पर ये शरमाएंगी,
स्नेह की नित्य संजीवनी यदि न हो,
ज़िंदगी भी तो एक खंडहर है प्रिये,
मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।

-श्रीकृष्णशर्मा ‘अशेष’ 

 

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
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