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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-21 / भाषा की डुगडुगी बजाते हैं!

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज इक्कीसवां और फिलहाल अंतिम दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध थीं, एक साथ शेयर करने की कोशिश की है, जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

उस समय जो कविताएं किसी हद तक ‘परफेक्ट’ लगती थीं उनको मित्रों के बीच, गोष्ठियों में पढ़ देता था। बहुत सी पांडुलिपियां ऐसी होती थीं जिनको लेकर तसल्ली नहीं होती थी।

आज की रचना हल्की-फुल्की है, गज़ल के छंद में है। इस छंद का बहुत सारे लोगों ने सदुपयोग-दुरुपयोग किया है, थोड़ा बहुत मैंने भी किया है। लीजिए प्रस्तुत है आज की रचना-

 

 

 

गज़ल

 

भाषा की डुगडुगी बजाते हैं,
लो तुमको गज़ल हम सुनाते हैं।

 

बहुत दिन रहे मौन के गहरे जंगल में,
अब अपनी साधना भुनाते हैं।

 

यूं तो कविता को हम, सुबह-शाम लिख सकते,
पर उससे अर्थ रूठ जाते हैं।

 

वाणी में अपनी, दुख-दर्द सभी का गूंजे,
ईश्वर से यही बस मनाते हैं।

 

मैंने कुछ कह दिया, तुम्हें भी कुछ कहना है,
अच्छा तो, लो अब हम जाते हैं।

 

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

 

 

इसके साथ ही पुरानी, अनछुई रचनाओं का यह सिलसिला अब यहीं थमता है, अब कल से देखेंगे कि क्या नया काम करना है।

आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-20 / दूर बहुत दूर!

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज बीसवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

उस समय जो कविताएं किसी हद तक ‘परफेक्ट’ लगती थीं उनको मित्रों के बीच, गोष्ठियों में पढ़ देता था। बहुत सी पांडुलिपियां ऐसी होती थीं जिनको लेकर तसल्ली नहीं होती थी।

ऐसी ही कुछ कागज़ पर सुरक्षित कविताएं, जिनको मैंने उस समय फाइनल नहीं माना और बाद में उनको फाइनल रूप देने का समय नहीं मिला, आज की तारीख में सोचता हूँ कि उनको ‘जैसी हैं, जहाँ हैं, वैसी शेयर कर लेता हूँ।

इसी क्रम में लीजिए प्रस्तुत है आज का गीत-

 

गीतों के सुमन जहाँ महके थे,
वह ज़मीन-
दूर, बहुत दूर।

 

अजनबी हवाएं,मौसम आदमखोर,
हर तरफ फिजाओं में जहरीला शोर,
सरसों की महक और
सरकंडी दूरबीन,
दूर, बहुत दूर।

 

कुछ हुए हवाओं में गुम, कुछ को धरती निगल गई,
जो भी अपने हुए यहाँ, उन पर तलवार चल गई,
दिवराती सांझ और
फगुआती भोर,
दूर, बहुत दूर।

 

मौसम के साथ-साथ बदले साथी,
दुनिया में सब-सुविधा के बाराती,
दुर्दिन में बंधी रहे-
वह कच्ची डोर,
दूर, बहुत दूर।

 

गीत पंक्ति जैसी आती मीठी याद,
कडुवे अनुभव भी देते मीठा स्वाद,
चांद हुआ बचपन
आहत मन चकोर
तकता कितनी दूर।

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

 

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-19 / लगता है लोकतंत्र इसी तरह आता है!

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज उन्नीसवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

उस समय जो कविताएं किसी हद तक ‘परफेक्ट’ लगती थीं उनको मित्रों के बीच, गोष्ठियों में पढ़ देता था। बहुत सी पांडुलिपियां ऐसी होती थीं जिनको लेकर तसल्ली नहीं होती थी।

ऐसी ही कुछ कागज़ पर सुरक्षित कविताएं, जिनको मैंने उस समय फाइनल नहीं माना और बाद में उनको फाइनल रूप देने का समय नहीं मिला, आज की तारीख में सोचता हूँ कि उनको ‘जैसी हैं, जहाँ हैं, वैसी शेयर कर लेता हूँ।

एक बात और, आज की रचना में कुछ चुनावी माहौल का चित्र है, जब इसको लिखा था, तब वातावरण अलग था, चुनाव के समय बहुत से बेरोज़गारों को काम मिलता था, वोट छापने का, कट्टे बनाने का, जैसे कि बिहार में माननीय लालू यादव जी का शासन था और लगता ही नहीं था कि वे कभी सत्ता से अलग होंगे। वोटिंग मशीन ने बड़ा ज़ुल्म किया है, अपने पराक्रम के बल पर जीतने का रास्ता ही बंद कर दिया।

खैर, मैं राजनीति की बात नहीं करूंगा। आज की रचना, जो गज़ल के छंद में है, आपके सामने प्रस्तुत है-

 

 

गहरे सन्नाटे में जन-गण थर्राता है,
लगता है लोकतंत्र इसी तरह आता है।

 

चुनने की सुविधा और मरने का इंतजाम,
ऐसे में भी भीखू, वोट डाल आता है।

 

एक बार चुन लें, फिर पांच बरस मौन रहें,
पाठ धैर्य का ऐसे सिखलाया जाता है।

 

मंचों पर भाषण, घर में कोटा वितरण,
अपना नेता कितनी मेहनत की खाता है।

 

हालचाल पत्रों में प्रतिदिन लिख भेजना,
मन में इससे ही आश्वस्ति भाव आता है।

 

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-18/ गीत उगने दो!

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज अठारहवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

बीच में कुछ काम आ गया था, अभी भी निपटा नहीं है, इस बीच समय निकालकर आज की शेयरिंग।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

उस समय जो कविताएं किसी हद तक ‘परफेक्ट’ लगती थीं उनको मित्रों के बीच, गोष्ठियों में पढ़ देता था। बहुत सी पांडुलिपियां ऐसी होती थीं जिनको लेकर तसल्ली नहीं होती थी।

ऐसी ही कुछ कागज़ पर सुरक्षित कविताएं, जिनको मैंने उस समय फाइनल नहीं माना और बाद में उनको फाइनल रूप देने का समय नहीं मिला, आज की तारीख में सोचता हूँ कि उनको ‘जैसी हैं, जहाँ हैं, वैसी शेयर कर लेता हूँ।

आज का गीत छोटा सा है। जैसा है आपके सामने प्रस्तुत है-

 

 

मौन यूं कवि मत रहो,
अब गीत उगने दो।

 

अनुभव की दुनिया के
अनगिनत पड़ाव,
आसपास से गुज़र गए,
झोली में भरे कभी
पर फिर अनजाने में,
सभी पत्र-पुष्प झर गए,
करके निर्बंध, पिपासे मानव-मन को-
अनुभव-संवेदन दाना चुगने दो।

 

खुद से खुद की बातें
करने से क्या होगा,
सबसे, सबकी ही
संवेदना कहो,
अपने ही तंतुजाल में
उलझे रहकर तुम,
दुनिया का नया
तंत्रजाल मत सहो,
आगे बढ़कर सारे
भटके कोलाहल में,
मंजिल के लिए
लालसा जगने दो।

 

मौन यूं कवि मत रहो,
अब गीत उगने दो।

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-17 / शारदे मां शारदे

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज सत्रहवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

उस समय जो कविताएं किसी हद तक ‘परफेक्ट’ लगती थीं उनको मित्रों के बीच, गोष्ठियों में पढ़ देता था। बहुत सी पांडुलिपियां ऐसी होती थीं जिनको लेकर तसल्ली नहीं होती थी।

ऐसी ही कुछ कागज़ पर सुरक्षित कविताएं, जिनको मैंने उस समय फाइनल नहीं माना और बाद में उनको फाइनल रूप देने का समय नहीं मिला, आज की तारीख में सोचता हूँ कि उनको ‘जैसी हैं, जहाँ हैं, वैसी शेयर कर लेता हूँ।

आज सरस्वती वंदना के रूप में एक गीत-कविता आज प्रस्तुत है-

 

 

 

शारदे मां शारदे,
अभिव्यक्ति का उपहार दे।
बालक तेरा निरीह, भटके वन-वन,
कर दे इस निर्जन को नंदन कानन,
सुधियों के छंद सभी
मां मुझे उधार दे।
जितना भी अहंकार आज तक संजोया था,
मौन हुई वाणी सब, पत्तों सा झर गया,
जिसने तेरे पुनीत चरणों का ध्यान कर
किंचित भी लिखा, सभी ओर नाम कर गया।
अपने इस पुत्र को, हे वीणापाणि मां,
प्यार दे, दुलार दे।।
गीतों में रच सकूं, अनूठा संसार,
कर सकूं तेरे बच्चों को सच्चा प्यार,
मुझको वह शक्ति दे, अनूठी रचना करूं,
सिरजन की प्यास
मेरे मन में उतार दे।।
मेरी पहचान हो, सच्चे वाणी पुत्र सी,
एक यही कामना मेरी पूरी कर दे।
मुद्दत से झोली, खाली मेरी चल रही,
अपने आशीषों से मां, इसको भर दे।
मन निर्मल-शांत हो, वाणी गूंजे निर्भय,
मन में अनुराग और स्वर में झंकार दे।
शारदे मां शारदे,
अभिव्यक्ति का उपहार दे।

 

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-15

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज पंद्रहवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

उस समय जो कविताएं किसी हद तक ‘परफेक्ट’ लगती थीं उनको मित्रों के बीच, गोष्ठियों में पढ़ देता था। बहुत सी पांडुलिपियां ऐसी होती थीं जिनको लेकर तसल्ली नहीं होती थी।

ऐसी ही कुछ कागज़ पर सुरक्षित कविताएं, जिनको मैंने उस समय फाइनल नहीं माना और बाद में उनको फाइनल रूप देने का समय नहीं मिला, आज की तारीख में सोचता हूँ कि उनको ‘जैसी हैं, जहाँ हैं, वैसी शेयर कर लेता हूँ।

एक कविता आज प्रस्तुत है-

 

 

सपनों के झूले में
झूलने का नाम है- बचपन,
तब तक-जब तक कि
इन सपनों की पैमाइश
जमीन के टुकड़ों,
इमारत की लागत
और बैंक खाते की सेहत से न आंकी जाए।

 

जवान होने का मतलब है
दोस्तों के बीच होना
ठहाकों की तपिश से
माहौल को गरमाना,
और भविष्य के प्रति
अक्सर लापरवाह होना।

 

बूढ़ा होने का मतलब है-
अकेले होना,
जब तक कोई, दोस्तों की
चहकती-चिलकती धूप में है,
तब तक वह बूढ़ा कैसे हो सकता है।

 

काश यह हर किसी के हाथ में होता
कि वह-
जब चाहे बच्चा, जब चाहे जवान बना रहता,
और बूढ़ा होना, मन से-
यह तो विकल्पों में
शामिल ही नहीं है।

 

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।

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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-14 : बचपन!

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज चौदहवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

उस समय जो कविताएं किसी हद तक ‘परफेक्ट’ लगती थीं उनको मित्रों के बीच, गोष्ठियों में पढ़ देता था। बहुत सी पांडुलिपियां ऐसी होती थीं जिनको लेकर तसल्ली नहीं होती थी।

ऐसी ही कुछ कागज़ पर सुरक्षित कविताएं, जिनको मैंने उस समय फाइनल नहीं माना और बाद में उनको फाइनल रूप देने का समय नहीं मिला, आज की तारीख में सोचता हूँ कि उनको ‘जैसी हैं, जहाँ हैं, वैसी शेयर कर लेता हूँ।

एक कविता आज प्रस्तुत है-

 

बचपन

बचपन के बारे में,
आपके मन में भी कुछ सपनीले खयालात होंगे,
है भी ठीक, अपने आदर्श रूप में- बचपन
एक सुनहरा सपना है,
जो बीत जाने के बाद, बार-बार याद आता है।
कोशिश रहती है हमारी, कि हमारे बच्चे-
हक़ीकत को जानें अवश्य,
पर उसके कड़ुए दंश से घायल न हों।
वे ये तो जानें कि जमीन पथरीली है,
पर उससे उनके नाज़ुक पैर न छिलें,
कोशिश तो यहाँ तक होती है कि उनके पांव
जहाँ तक संभव हो-
पथरीली जमीन को छुएं भी नहीं।
खिलौनों, बादलों, खुले आसमान
और परीलोक को ही वे, अपनी दुनिया मानते रहें।
सचमुच कितने भाग्यशाली हैं ये बच्चे-
यह खयाल तब आता है, जब-
कोई दुधमुहा बच्चा, चाय की दुकान में
कप-प्लेट साफ करता है।
दुकान में चाय-नाश्ता बांटते समय
जब कुछ टूट जाता है उससे, तब
ग्राहक या दुकानदार, पूरी ताकत से
उसके गाल पर, अपनी घृणा के हस्ताक्षर करता है।
सपनों की दुनिया से अनजान ये बच्चे,
जब कहीं काम या भीख मांगते दिखते हैं,
तब आता है खयाल मन में-
कि ये बच्चे, देश का भविष्य हैं!
अपनी पूरी ताकत से कोई छोटा बच्चा
जब रिक्शा के पैडल मारता है,
तब कितनी करुणा से देखते हैं उसको आप!
हम बंटे रहें-
जातियों, संप्रदायों, देशों और प्रदेशों में,
पर क्या कोई ऐसी सूरत नहीं कि
बच्चों को हम, बच्चों की तरह देखें।
कोशिश करें कि ये नौनिहाल-
स्वप्न देखने की अवधि, तालीम की उम्र
ठीक से गुज़ारें
और उसके बाद, ज़िंदगी की लड़ाई में
अपने बलबूते पर, प्रतिभा के दम पर
शामिल हों।
क्या हम सब रच सकते हैं
इस निहायत ज़रूरी सपने को-
अपने परिवेश में!

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-13 : मन के सुर राग में बंधें

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज तेरहवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

उस समय जो कविताएं किसी हद तक ‘परफेक्ट’ लगती थीं उनको मित्रों के बीच, गोष्ठियों में पढ़ देता था। बहुत सी पांडुलिपियां ऐसी होती थीं जिनको लेकर तसल्ली नहीं होती थी।

ऐसी ही कुछ कागज़ पर सुरक्षित कविताएं, जिनको मैंने उस समय फाइनल नहीं माना और बाद में उनको फाइनल रूप देने का समय नहीं मिला, आज की तारीख में सोचता हूँ कि उनको ‘जैसी हैं, जहाँ हैं, वैसी शेयर कर लेता हूँ।

एक कविता आज प्रस्तुत है-

 

 

मुझमें तुम गीत बन रहो
मुझमें तुम गीत बन रहो,
मन के सुर राग में बंधें।

 

वासंती सारे सपने
पर यथार्थ तेज धूप है,
मन की ऊंची उड़ान है
नियति किंतु अति कुरूप है,
साथ-साथ तुम अगर चलो,
घुंघरू से पांव में बंधें।

 

मरुथल-मरुथल भटक रही
प्यासों की तृप्ति कामना,
नियमों के जाल में बंधी
मन की उन्मुक्त भावना,
स्वाति बूंद सदृश तुम बनो
चातक मन पाश में बंधे।

 

जीवन के ओर-छोर तक
सजी हुई सांप-सीढ़ियां,
डगमग हैं अपने तो पांव
सहज चलीं नई पीढ़ियां।
पीढ़ी की सीढ़ी उतरें,
नूतन अनुराग में बंधें।

 

यौवन उद्दाम ले चलें,
मन का बूढ़ापन त्यागें,
गीतों का संबल लेकर
एक नए युग में जागें।
तुम यदि संजीवनी बनो
गीत नव-सुहाग में बंधें।

 

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

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नमस्कार।

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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-11, महानगर धुआंधार है!

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज ग्यारहवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

लीजिए आज इस क्रम की इस ग्यारहवीं पोस्ट में तीन और रचनाओं को शेयर कर रहा हूँ-

पहली कविता- बस गांव को याद करके लिखी गई है, कैसे होते थे गांव, कैसी छवि हमारे मन में है गांवों की और आज कैसे हो गए हैं।

 

गांव के घर से

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

बेखौफ चले आइए
यहाँ अभी भी कुछ लोग हैं।
घर की दीवारों पर जो स्वास्तिक चिह्न बने हैं,
इन्हीं पर कई बार टूटी हैं चूड़ियां,
टकराए हैं माथे।
कभी यह एक जीवंत गांव था,
लेकिन आज, हर जीवित गंध- एक स्मारक है,
जमीन का हर टुकड़ा, लोगों की गर्दन पर गंडासा है।
धुएं का आकाश रचती चिमनियां, और यंत्र संगीत,
न जाने कहाँ उड़ा ले गया- उन गंध पूरित लोगों को।
एक, शहर में- सही गलत का वकील है,
पड़ौस को उससे बड़ी उम्मीदें हैं।

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

 

और कविता की ये पंक्तियां, कभी दीपावली के आसपास ही लिखी थीं। बहुत साल पहले, कब, ये याद नहीं है। पंक्तियां इस तरह हैं-

हम भी अंबर तक, कंदील कुछ उड़ाते
पर अपने जीवन में रंग कब घुले।
हमको तो आकर हर भोर किरण
दिन का संधान दे गई,
अनभीगे रहे और बारिश
एक तापमान दे गई।
आकाशी सतहों पर लोट-लोट जाते,
पर अपने सपनों को पंख कब मिले॥

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

अपने एक अधूरे गीत को शेयर कर रहा हूँ, अधिकांश समय मैंने महानगर दिल्ली में बिताया है, कविता के मंचों पर भी कभी-कभार जाता था और अक्सर ऐसे मंचों पर जाने वालों से मित्रता थी, सो कुछ भाव इस पृष्ठभूमि से जुड़े हुए इस गीत में आ गए, यह गीत वैसे मैंने किसी गोष्ठी में पढ़ा भी नहीं है-

महानगर धुआंधार है
बंधु आज गीत कहाँ गाओगे!
ये जो अनिवार, नित्य ऐंठन है-
शब्दों में व्यक्त कहाँ होती है,
शब्द जो बिखेरे भावुकता में,
हैं कुछ तो, मानस के मोती हैं।
मौसम अपना वैरागी पिता-
उसको किस राग से रिझाओगे।
बंधु आज गीत कहाँ गाओगे॥

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।

नमस्कार।

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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-10, ज़िंदगी एक अंधा कुआं!

मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज दसवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

लीजिए आज इस क्रम की इस दसवीं पोस्ट में तीन और रचनाओं को शेयर कर रहा हूँ|

पहली कविता- हमारी राष्ट्रीय प्रगति, जनकल्याण के लिए हुए प्रयासों की पड़ताल, एक कवि के नजरिये से इस गीत में की गई है, निरंतर एक प्रक्रिया सी चलती है जिसमें सारा आशावाद धुल जाता है-

लेकिन दृश्य नहीं बदला है!

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

 

मीठे सपनों को कडुवाई आंखों को
दिन रात छला है।
कितने दर्पण तोड़े तुमने
लेकिन दृश्य नहीं बदला है।

 

बचपन की उन्मुक्त कुलांचे
थकी चाल में रहीं बदलती,
दूध धुली सपनीली आंखें
पीत हो गईं- जलती-जलती,
जब भी छूटी आतिशबाजी-
कोई छप्पर और जला है।

 

कितने दर्पण तोड़े तुमने
लेकिन दृश्य नहीं बदला है।।

 

अब अपनी एक कविता शेयर कर रहा हूँ, जैसी मुझे याद है अभी तक, क्योंकि गीत तो याद रह जाते हैं, स्वच्छंद कविता को याद रखने में दिक्कत होती है, यह कविता वास्तव में अपने देश से दूर रहते हुए उसको याद करने का एक प्रसंग है-

 

काबुलीवाला, खूंखार पठान-
जेब में बच्ची के हाथ का जो छापा लिए घूमता है,
उसमें पैबस्त है उसके वतन की याद।

 

वतन जो कहीं हवाओं की महक,
और कहीं आकाश में उड़ते पंछियों के
सतरंगे हुज़ूम के बहाने याद आता है,
आस्थाओं के न मरने का दस्तावेज है।

 

इसकी मिसाल है कि हम-
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई होने के नाते नहीं
नागरिक होने के नाते बंधु हैं,
सहृदय होने के नाते सखा हैं,

 

वतन हमसे आश्वासन चाहता है-
कि अब किसी ‘होरी’ के घर और खेत-
महाजनी खाते की हेरे-फेर के शिकार नहीं होंगे,

 

कि ‘गोबर’ शहर का होकर भी-
दिल में बसाए रखेगा अपना गांव
और घर से दूर होकर भी
हर इंसान को भरोसा होगा-
कि उसके परिजन सदा सुरक्षित हैं।

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

 

और अंत में, एक गीत, आज जो ज़िंदगी हम जी रहे हैं, उसको देखने का एक अलग नज़रिया, जहाँ कोई आस्था, कोई विश्वास हमें सहारा देने के लिए नहीं है, लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-

 

ज़िंदगी आज की एक अंधा कुआं
जिसमें छाया नहीं, जिसमें पानी नहीं
प्यास के इस सफर के मुसाफिर हैं सब,
कोई राजा नहीं, कोई रानी नहीं।

 

अब न रिश्तों मे पहली सी वो आंच है,
आस्था के नगीने फक़त कांच हैं,
अब लखन भी नहीं राम के साथ हैं,
श्याम की कोई मीरा दिवानी नहीं।

 

हमने बरसों तलाशा घनी छांव को,
हम बहुत दूर तक यूं ही भटका किए,
अब कोई आस की डोर बाकी नहीं
अब किसी की कोई मेहरबानी नहीं।

 

कृष्ण गुलशन में क्या सोचकर आए थे,
न हवा में गमक, न फिजां में महक,
हर तरफ नागफनियों का मेला यहाँ,
कोई सूरजमुखी, रातरानी नहीं।

 

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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