अब उठता नहीं धुआँ!

चूल्हे नहीं जलाए कि बस्ती ही जल गई,
कुछ रोज़ हो गए हैं अब उठता नहीं धुआँ|

गुलज़ा

बस्ती में ख़ंजर बोलते हैं!

ज़ुबां ख़ामोश है डर बोलते हैं,
अब इस बस्ती में ख़ंजर बोलते हैं|

राजेश रेड्डी

और फैला है धुआँ मेरा!

किसी बस्ती को जब जलते हुए देखा तो ये सोचा,
मैं ख़ुद ही जल रहा हूँ और फैला है धुआँ मेरा|

बेकल उत्साही