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लूटकेस की यात्रा!

आज बात कर लेते हैं हॉटस्टार पर रिलीज़ हुई फिल्म- ‘लूटकेस’ को देखने के अनुभव के बारे में| क्षमा करें मैं अपने आप को क्रिटिक की भूमिका में रखकर देखने की हिम्मत नहीं कर सकता, बस इस फिल्म को देखने के अनुभव के बारे में बात कर लेता हूँ|


हाँ तो इस फिल्म का नायक कुणाल खेमू एक आम आदमी है, जो एक प्रेस में काम करता है, प्रेस का मालिक उसको ईमानदार मानता है और उसको इसके लिए एक बार ईनाम भी दिया जाता है| हाँ तो जिस प्रकार किसी आम ईमानदार इंसान के दिन बीतते हैं, वैसे ही फिल्म के नायक नंदन कुमार (कुणाल खेमू) के भी दिन बीतते हैं| जब वह किसी मामले में पैसे नहीं दे पाता तो पत्नी पूछती है कि ‘कुछ पैसे अपनी बहन को दे दिए क्या?’ और हाँ दिन वैसे ही बीत रहे होते हैं, जैसे किसी आम ईमानदार व्यक्ति के बीतते हैं!


ऐसे में नायक को अचानक दो हजार के नोटों की गड्डियों से भरा एक विशाल सूटकेस मिलता है| शुरू में अपनी ईमानदारी और भय से लड़ने के बाद वह उस सूटकेस को उठाकर किसी तरह अपने घर तक पहुँच जाता है| इन नोटों को लेकर अपने घर तक पहुँचने और फिर उनको अपनी अति ईमानदार पत्नी से छिपाकर रखने का संघर्ष भी देखने लायक होता है|


इन नोटों का, इस विशाल धनराशि का इस्तेमाल कर पाना भी उस छोटे-छोटे सपनों वाले आम आदमी के लिए लगभग असंभव है| हाँ इतना अवश्य है कि अब उसकी पत्नी और बेटे को अपनी मनवांछित सुविधाएं बड़े आराम से मिल जाती हैं और पत्नी को यह नहीं कहना पड़ता कि ‘अपनी बहन को पैसे दे दिए क्या?’ लेकिन नायक की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह पैसे को संभालकर कहाँ रखे और कैसे उनका उपयोग करे| एक तरीका है बस कि मकान खरीद लिया जाए लेकिन यह काम भी नकद पैसे से करना संभव नहीं है|


उधर इस पैसे के जो असली मालिक थे, राजनीति और अपराध की दुनिया के चरित्र- एक तो विधायक जी- गजराज राव और दूसरे गैंगस्टर – विजय राज, दोनों ही मंजे हुए कलाकार हैं| इन लोगों के लिए इतनी बड़ी रकम का व्यवहार करना कोई बड़ी बात नहीं है और हाँ उन लोगों के संघर्ष के बीच ही यह सूटकेस सड़क पर छूट गया था, जहां से यह नायक, इस सामान्य नागरिक के हाथ लग गया और वह इसको संभालने में ही परेशान है और उसके व्यवहार में भी उसका यह असमंजस झलकने लगा और शायद उसी के बल पर नेताजी का पाला हुआ पुलिस वाला उस तक पहुँच जाता है|


इस पुलिस वाले को पैसे के साथ रखी फाइल के माध्यम से नेताजी के काले कारनामों का पता चलता है और वह भी खुद इस पैसे को रख लेना चाहता है| लेकिन वहाँ नेताजी, गैंगस्टर और पुलिस वाला, सब एक-दूसरे का पीछा करते हैं और अंत में सब निपट जाते हैं| एक बार फिर से लूट का वह बैग नायक के सामने होता है, अब वह क्या करेगा!कुल मिलाकर इस फिल्म को देखने में भरपूर आनंद आया|


आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|


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शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए!

आज मैं फिर से एक बार दुष्यंत कुमार जी की एक गज़ल शेयर कर रहा हूँ। जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है, दुष्यंत कुमार जी आपात्काल में लिखी गई अपनी गज़लों के कारण बहुत प्रसिद्ध हुए थे। मैंने पहले भी उनकी कुछ गज़लें शेयर की हैं।

आज की इस गज़ल में जन-साधारण का उनके कष्टपूर्ण जीवन की ओर ध्यान दिलाते हुए, यह आवाह्न किया गया है कि अब इन कष्टों का अंत होना चाहिए और इसके लिए प्रत्येक जीर्ण-शीर्ण मनुष्य को विद्रोह की मुद्रा में आगे बढ़ना चाहिए और एक सशक्त जन-आंदोलन प्रारंभ होना चाहिए।

 

 

लीजिए प्रस्तुत है उनकी यह प्रसिद्ध गज़ल-

 

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

 

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

 

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

 

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

 

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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अपना घर तो गिरा, दरोगा के घर नए उठे!

 

आज डॉ. शांति सुमन जी का लिखा एक नवगीत याद आ रहा है, जो बहुत साल पहले झारखंड में आयोजित एक कवि सम्मेलन में पहली बार उनके मुंह से सुना था। उस समय मैं हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की मुसाबनी माइंस में कार्यरत था, जो काफी पहले बंद हो चुकी हैं, यह शायद 1984-85 की बात है।

अक्सर यह गीत अचानक याद आ जाता है, जिसमें गांव के परिवेश में, बड़ी सरल भाषा में आम इंसानों की व्यथा का प्रभावी वर्णन किया गया है। वास्तव में बहुत अच्छा नवगीत है, लीजिए इसका आनंद लीजिए-

 

 

थाली उतनी की
उतनी ही
छोटी हो गई रोटी।
कहती बूढ़ी दादी
अपने गाँव की,
सबसे बूढ़ी दादी
अपने गाँव की ।

 

फेन फूल से
उठे मगर
राखों के ढेर हुए,
धँसे हुए
आँखों के किस्से
हम मुठभेड़ हुए,
भूख हुई
अजगर -सी
सूखी तन
की बोटी-बोटी
कहती बड़की काकी
अपने गांव की,
सबसे सुन्दर काकी
अपने गांव की ।

 

अपना तो घर
गिरा, दरोगा के
घर नए उठे,
हाथ और मुंह के
रिश्ते में
ऐसे रहे जुटे,
सिर से पांवों
की दूरी अब
दिन-दिन
होती छोटी ।
कहती नवकी भौजी
अपने गाँव की,
सबसे गोरी भौजी
अपने गाँव की ।

 

करना होगा
खत्म हमें यह,
सूद उगाही लहना,
लापरवाह
व्यवस्था के
खूँटे में बँधकर रहना
नाम भूख का
रोटी पर, 
जीतेगी अपनी गोटी ।
कहती रानी बहना
अपने गांव की,
सबसे प्यारी बहना
अपने गांव की ।

 

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

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