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Can I be my own Hero?

I remember the good old days, when the heroes, the leading characters in novels, stories and movies, fought all odds, the evil powers etc. and in the end came out winners, scratch free. People also expected some divine power to come as a hero and save them. They themselves, while awaiting for such wonders, can at the most sit in prayer.


However, times gradually changed, it happened all over the world but I would give examples of India and that too Hindi world of writing and movies. Great Novelist Munshi Prem Chand ji who is called ‘warrior of the pen’ (Kalam Ka Sipahi) initially wrote many novels and short stories, with a moral that ‘truth is always the winner’. But later he gave away this ideal and hopefulness and accepted that our life is not to prove some golden principles and we have to live our lives, the way it flows, we may keep hope to the extent possible, but have to keep prepared to accept failures, idealism was finally lost and Prem chand Ji wrote novels like- Godan, Gaban and short stories like – Poos Ki Raat. We find the lead characters who are worthless, live on the earnings of the house lady and when she dies, they consume the money given by villagers for her last rituals on drinking wine and say ‘She was great, after death also she made us drink wine and have a good feast’.


In movies we find film makers like Raj Kapur, who portray a person as a hero, who comes from a village to a big city for earning, initially gets fooled by people but eventually becomes so shrewd that he pays back the cunning people, in their own coin. Here the hero can do everything, even pick pocketing. A song from RK film says-


Shehzaade talwar se khele, main ashqon se khelun’ (The Princes played with swords, I play with tears’).


So, the total concept of a hero is changed. A person who sincerely fights with the situations he faces in life, is a hero of his own life story. There is a film ‘Fir Subah hogi’ by Raj Kapur Ji, in which There is a song-‘Wo Subah kabhi to Aayegi’ (Some day we would witness that day-break, full of hope) and another song says-


Chin-O-Arab hamaara, Hindostaan hamaara, rehne ko ghar nahi hai, saara jahaan hamaara’ (The hero says that the whole world is our own, but we don’t have a roof over our head).


So, the concept about life has changed, in stories, novels, movies and also in our life. We are not born to create miracles. We have to face our life situations, with courage and sincerity, that is all we can do.
Thus, I don’t have any hesitation in saying that, not only me but everybody in the world who loves all human beings and faces the situations arising before him or her with courage and sincerity is a hero or a heroine of his or her life story.

This is my humble submission on the #IndiSpire prompt- Do you consider yourself to be the heroine or hero of your life’s story and try to script a superhit? #HeroineHero .


Thanks for reading.


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लूटकेस की यात्रा!

आज बात कर लेते हैं हॉटस्टार पर रिलीज़ हुई फिल्म- ‘लूटकेस’ को देखने के अनुभव के बारे में| क्षमा करें मैं अपने आप को क्रिटिक की भूमिका में रखकर देखने की हिम्मत नहीं कर सकता, बस इस फिल्म को देखने के अनुभव के बारे में बात कर लेता हूँ|


हाँ तो इस फिल्म का नायक कुणाल खेमू एक आम आदमी है, जो एक प्रेस में काम करता है, प्रेस का मालिक उसको ईमानदार मानता है और उसको इसके लिए एक बार ईनाम भी दिया जाता है| हाँ तो जिस प्रकार किसी आम ईमानदार इंसान के दिन बीतते हैं, वैसे ही फिल्म के नायक नंदन कुमार (कुणाल खेमू) के भी दिन बीतते हैं| जब वह किसी मामले में पैसे नहीं दे पाता तो पत्नी पूछती है कि ‘कुछ पैसे अपनी बहन को दे दिए क्या?’ और हाँ दिन वैसे ही बीत रहे होते हैं, जैसे किसी आम ईमानदार व्यक्ति के बीतते हैं!


ऐसे में नायक को अचानक दो हजार के नोटों की गड्डियों से भरा एक विशाल सूटकेस मिलता है| शुरू में अपनी ईमानदारी और भय से लड़ने के बाद वह उस सूटकेस को उठाकर किसी तरह अपने घर तक पहुँच जाता है| इन नोटों को लेकर अपने घर तक पहुँचने और फिर उनको अपनी अति ईमानदार पत्नी से छिपाकर रखने का संघर्ष भी देखने लायक होता है|


इन नोटों का, इस विशाल धनराशि का इस्तेमाल कर पाना भी उस छोटे-छोटे सपनों वाले आम आदमी के लिए लगभग असंभव है| हाँ इतना अवश्य है कि अब उसकी पत्नी और बेटे को अपनी मनवांछित सुविधाएं बड़े आराम से मिल जाती हैं और पत्नी को यह नहीं कहना पड़ता कि ‘अपनी बहन को पैसे दे दिए क्या?’ लेकिन नायक की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह पैसे को संभालकर कहाँ रखे और कैसे उनका उपयोग करे| एक तरीका है बस कि मकान खरीद लिया जाए लेकिन यह काम भी नकद पैसे से करना संभव नहीं है|


उधर इस पैसे के जो असली मालिक थे, राजनीति और अपराध की दुनिया के चरित्र- एक तो विधायक जी- गजराज राव और दूसरे गैंगस्टर – विजय राज, दोनों ही मंजे हुए कलाकार हैं| इन लोगों के लिए इतनी बड़ी रकम का व्यवहार करना कोई बड़ी बात नहीं है और हाँ उन लोगों के संघर्ष के बीच ही यह सूटकेस सड़क पर छूट गया था, जहां से यह नायक, इस सामान्य नागरिक के हाथ लग गया और वह इसको संभालने में ही परेशान है और उसके व्यवहार में भी उसका यह असमंजस झलकने लगा और शायद उसी के बल पर नेताजी का पाला हुआ पुलिस वाला उस तक पहुँच जाता है|


इस पुलिस वाले को पैसे के साथ रखी फाइल के माध्यम से नेताजी के काले कारनामों का पता चलता है और वह भी खुद इस पैसे को रख लेना चाहता है| लेकिन वहाँ नेताजी, गैंगस्टर और पुलिस वाला, सब एक-दूसरे का पीछा करते हैं और अंत में सब निपट जाते हैं| एक बार फिर से लूट का वह बैग नायक के सामने होता है, अब वह क्या करेगा!कुल मिलाकर इस फिल्म को देखने में भरपूर आनंद आया|


आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|


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शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए!

आज मैं फिर से एक बार दुष्यंत कुमार जी की एक गज़ल शेयर कर रहा हूँ। जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है, दुष्यंत कुमार जी आपात्काल में लिखी गई अपनी गज़लों के कारण बहुत प्रसिद्ध हुए थे। मैंने पहले भी उनकी कुछ गज़लें शेयर की हैं।

आज की इस गज़ल में जन-साधारण का उनके कष्टपूर्ण जीवन की ओर ध्यान दिलाते हुए, यह आवाह्न किया गया है कि अब इन कष्टों का अंत होना चाहिए और इसके लिए प्रत्येक जीर्ण-शीर्ण मनुष्य को विद्रोह की मुद्रा में आगे बढ़ना चाहिए और एक सशक्त जन-आंदोलन प्रारंभ होना चाहिए।

 

 

लीजिए प्रस्तुत है उनकी यह प्रसिद्ध गज़ल-

 

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

 

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

 

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

 

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

 

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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अपना घर तो गिरा, दरोगा के घर नए उठे!

 

आज डॉ. शांति सुमन जी का लिखा एक नवगीत याद आ रहा है, जो बहुत साल पहले झारखंड में आयोजित एक कवि सम्मेलन में पहली बार उनके मुंह से सुना था। उस समय मैं हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की मुसाबनी माइंस में कार्यरत था, जो काफी पहले बंद हो चुकी हैं, यह शायद 1984-85 की बात है।

अक्सर यह गीत अचानक याद आ जाता है, जिसमें गांव के परिवेश में, बड़ी सरल भाषा में आम इंसानों की व्यथा का प्रभावी वर्णन किया गया है। वास्तव में बहुत अच्छा नवगीत है, लीजिए इसका आनंद लीजिए-

 

 

थाली उतनी की
उतनी ही
छोटी हो गई रोटी।
कहती बूढ़ी दादी
अपने गाँव की,
सबसे बूढ़ी दादी
अपने गाँव की ।

 

फेन फूल से
उठे मगर
राखों के ढेर हुए,
धँसे हुए
आँखों के किस्से
हम मुठभेड़ हुए,
भूख हुई
अजगर -सी
सूखी तन
की बोटी-बोटी
कहती बड़की काकी
अपने गांव की,
सबसे सुन्दर काकी
अपने गांव की ।

 

अपना तो घर
गिरा, दरोगा के
घर नए उठे,
हाथ और मुंह के
रिश्ते में
ऐसे रहे जुटे,
सिर से पांवों
की दूरी अब
दिन-दिन
होती छोटी ।
कहती नवकी भौजी
अपने गाँव की,
सबसे गोरी भौजी
अपने गाँव की ।

 

करना होगा
खत्म हमें यह,
सूद उगाही लहना,
लापरवाह
व्यवस्था के
खूँटे में बँधकर रहना
नाम भूख का
रोटी पर, 
जीतेगी अपनी गोटी ।
कहती रानी बहना
अपने गांव की,
सबसे प्यारी बहना
अपने गांव की ।

 

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

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