यहां भी है वहां भी!

आज एक बार फिर से मैं अपने अत्यंत प्रिय शायर ज़नाब निदा फ़ाज़ली साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| इस ग़ज़ल में वास्तव में उन्होंने भारत और पाकिस्तान के संदर्भ में अपनी बात कही है और बताया है कि धार्मिक उन्माद में बहने वाले लोग इधर भी हैं और उधर भी| जो सज्जन हैं वे दोनों तरफ परेशान रहते हैं और कट्टर लोगों को दोनों तरफ काफी हद तक संरक्षण प्राप्त है| वास्तव में सच्चा हिन्दू हो या मुसलमान हो, वह कभी दूसरे का नुकसान नहीं करना चाहता लेकिन राजनीति ऐसे कट्टर लोगों की फसल तैयार कराती है|

लीजिए आज प्रस्तुत है निदा फ़ाज़ली साहब कि यह बहुत सुंदर और सार्थक ग़ज़ल –

इंसान में हैवान
यहां भी है वहां भी,
अल्लाह निगहबान
यहां भी है वहां भी|

खूंख्वार दरिंदों के
फक़त नाम अलग हैं,
शहरों में बयाबान
यहां भी है वहां भी|

रहमान की क़ुदरत हो
या भगवान की मूरत,
हर खेल का मैदान
यहां भी है वहां भी |

हिन्दी भी मज़े में है
मुसलमां भी मज़े में,
इंसान परेशान
यहां भी है वहां भी |


उठता है दिलो जां से
धुआं दोनों तरफ़ ही,
ये मीर का दीवान
यहां भी है वहां भी |


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मिट्टी को बादल में गूँथें, चाक चलाएँ!

स्वर्गीय निदा फ़ाजली साहब मेरे प्रिय शायर रहे हैं, उनकी अनेक रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज एक रचना उनकी शेयर कर रहा हूँ, जो बताती है कि जाति-धर्म के भेदभाव कितने बेमानी हैं| इस कविता में वह कहते हैं कि बच्चे बनकर आइए वही काम करें जो ऊपर वाला करता है, विभिन्न रूप और वेशभूषा के लोग बनाना और फिर उनको नए सांचे में ढाल देना|


लीजिए प्रस्तुत है, निदा फ़ाज़ली साहब की यह सुंदर रचना-

आओ
कहीं से थोड़ी सी मिट्टी भर लाएँ,
मिट्टी को बादल में गूँथें
चाक चलाएँ,
नए-नए आकार बनाएँ|

किसी के सर पे चुटिया रख दें
माथे ऊपर तिलक सजाएँ,
किसी के छोटे से चेहरे पर
मोटी सी दाढ़ी फैलाएँ|

कुछ दिन इनसे जी बहलाएँ,
और यह जब मैले हो जाएँ,


दाढ़ी चोटी तिलक सभी को,
तोड़-फोड़ के गड़-मड़ कर दें|
मिली हुई यह मिट्टी फिर से
अलग-अलग साँचों में भर दें,

– चाक चलाएँ
नए-नए आकार बनाएँ|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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