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फ्यूज बल्बों के अद्भुद समारोह में!

आज फिर से प्रस्तुत है एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट- अपनी शुरू की ब्लॉग-पोस्ट्स में मैंने अपने जीवन के कुछ प्रसंगों, कुछ घटनाओं के बारे में लिखा था। आज जयपुर नगरी से जुड़ा एक बहुत पुराना प्रसंग दोहरा रहा हूँ।

श्रेष्ठ नवगीतकार श्री कुमार शिव जी की मृत्यु का दुखद समाचार मिला, उनकी स्मृति में यह ब्लॉग पोस्ट दुहरा रहा हूँ|

हज़ारों मील लंबे रास्ते तुझको बुलाते,
यहाँ दुखड़े सहने के वास्ते तुझको बुलाते
है कौन सा वो इंसान यहाँ पर जिसने दुख ना झेला।
चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला ।


फिलहाल जीवन के एक पड़ाव की बात कर रहा हूँ। मैंने 30 सितंबर,1980 की रात में दिल्ली छोड़ी क्योंकि 1अक्तूबर,1980 को मुझे आकाशवाणी, जयपुर में कार्यग्रहण करना था, हिंदी अनुवादक के रूप में। बहुत पुरानी बात है ना!

इत्तफाक से 2 अक्तूबर,1980 को ही वहाँ, रामनिवास बाग में, प्रगतिशील लेखक सम्मेलन था, शायद प्रेमचंद जी की स्मृतियों को समर्पित था यह सम्मेलंन। यह आयोजन काफी चर्चित हुआ था क्योंकि महादेवी जी इस आयोजन की मुख्य अतिथि थीं और अपने संबोधन में उनका कहना था कि हम जंगली जानवरों के लिए अभयारण्य बना रहे हैं, परंतु मनुष्यों के लिए भय का परिवेश बन रहा है।

महादेवी जी के वक्तव्य पर वहाँ मौज़ूद राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री- जगन्नाथ पहाड़िया नाराज़ हो गए, वो बोले कि ‘महादेवी जी की कवितायें तो कभी भी मेरी समझ में नही आईं, मैं यहाँ साहित्यकारों के लिए कुछ अनुदान की घोषणा करने आया था, अब नहीं करूंगा। सत्ता के नशे में चूर पहाड़िया ये समझ ही नहीं पाए कि महादेवी होने का मतलब क्या है! बाद में काफी दिनों तक इस पर बहस चली और जगन्नाथ पहाड़िया को माफी मांगनी पड़ी थी।

खैर मुझे यह आयोजन किसी और कारण से भी याद है। इस तरह की संस्थाओं पर, विशेष रूप से जिनके साथ ‘प्रगतिशील’ शब्द जुड़ा हो, उन पर सभी जगह कम्युनिस्टों का कब्ज़ा रहा है। उनके लिए किसी का कवि या कहानीकार होना उतना आवश्यक नहीं है, जितना कम्युनिस्ट होना। वैसे मुझे सामान्यतः इस पर कोई खास आपत्ति नही रही है। वहाँ जाने से पहले मैं काफी समय से कवितायें, गीत आदि लिख रहा था और विनम्रतापूर्वक बताना चाहूंगा कि अनेक श्रेष्ठ साहित्यकारों से मुझे प्रशंसा भी प्राप्त हो चुकी थी।

जयपुर जाते ही क्योंकि इस आयोजन में जाने का अवसर मिल गया तो मुझे लगा कि यह अच्छा अवसर है कि यहाँ कविता पाठ करके, स्थानीय साहित्यकारों के साथ परिचय प्राप्त कर लिया जाए। रात में जब कवि गोष्ठी हुई तो मैंने भी अपनी एक ऐसी रचना का पाठ कर दिया, जिसके लिए मैं दिल्ली में भरपूर प्रशंसा प्राप्त कर चुका था। यह घटना भुलाना काफी समय तक मेरे लिए बहुत कठिन रहा। कोई रचना पाठ करता है तब रचना बहुत अच्छी न हो तब भी प्रोत्साहन के लिए ताली बजा देते हैं। लेकिन वहाँ मुझे लगा कि किसी ने मेरी कविता जैसे सुनी ही नहीं थी। ऐसा सन्नाटा मैंने वहाँ देखा। शायद उन महान आयोजकों को इस बात का अफसोस था कि एक अनजान व्यक्ति ने कविता-पाठ कर कैसे दिया!

खैर वहाँ एक-दो रचनाकारों को सुना, जिनसे बाद में घनिष्ठ परिचय बना, उनमें से एक हैं कृष्ण कल्पित, जो अभी शायद आकाशवाणी महानिदेशालय में कार्यरत हैं। उनके एक प्रसिद्ध गीत की कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं-

राजा-रानी प्रजा मंतरी, बेटा इकलौता
मां से कथा सुनी थी, जिसका अंत नहीं होता।

बिना कहे महलों में कैसे आई पुरवाई,
राजा ने दस-बीस जनों को फांसी लगवाई।

राम-राम रटता रहता था, राजा का तोता।
मां से कथा सुनी थी जिसका अंत नहीं होता॥


आकाशवाणी, जयपुर में 3 साल रहा, बहुत अच्छे कलाकारों और कवियों से वहाँ मुलाकात हुई। एक थे लाज़वाब तबला वादक ज़नाब दायम अली क़ादरी, बहुत घनिष्ठ संबंध हो गए थे हमारे। मेरे बच्चे का जन्मदिन आया तो वो स्वयं घर पर आए और घंटों तक गज़लें प्रस्तुत कीं। आकाशवाणी में वे तबला वादक थे, परंतु वे गायन के कार्यक्रम प्रस्तुत करते थे। वो बोलते भी थे कि सरकार को हाथ बेचे हैं , गला नहीं। इसके बाद जब तक हम वहाँ रहे, ऐसे अवसरों पर वे आकर कार्यक्रम करते रहे। एक बार हमारे मकान मालिक के बच्चे का जन्मदिन था, उनसे कहा तो बोले, शर्माजी आप तो हमारे घर के आदमी हैं, अगर हम हर किसी के यहाँ ऐसे ही गायेंगे,तो क्या ये ठीक होगा?

वहाँ रहते हुए आकाशवाणी की कई कवि गोष्ठियों में भाग लिया। स्वाधीनता दिवस के अवसर पर रिकॉर्ड की जा रही एक कवि गोष्ठी याद आ रही है, उसमें केंद्र निदेशक श्री गिरीश चंद्र चतुर्वेदी भी स्टूडियो में बैठे थे। प्रसिद्ध गीतकार कुमार शिव जी का नंबर आया तो वे बोले, यह गीत मैंने अपने जन्मदिन पर लिखा था, प्रस्तुत कर रहा हूँ-

काले कपड़े पहने हुए सुबह देखी,
देखी हमने अपनी सालगिरह देखी।


इस पर केंद्र निदेशक तुरंत उछल पड़े, नहीं ये गीत नहीं चलेगा, कोई और पढ़िए। वास्तव में वह गीत स्वतंत्रता दिवस से ही जोड़कर देखा जाता।

उनके एक और गीत की पंक्तियां आज तक याद हैं-

फ्यूज़ बल्बों के अद्भुद समारोह में
रोशनी को शहर से निकाला गया।


आकाशवाणी में मेरी भूमिका हिंदी अनुवादक की थी, इस प्रकार मैं प्रशासन विंग में था, लेकिन मेरी मित्रता वहाँ प्रोग्राम विंग के क्रिएटिव लोगों के साथ अधिक थी। एक पूरा आलेख आकाशवाणी के कार्यकाल पर लिखा जा सकता है, लेकिन फिलहाल इतना ही।

अंत में जयपुर के एक और अनन्य शायर मित्र को याद करूंगा- श्री मिलाप चंद राही। बहुत अच्छे इंसान और बहुत प्यारे शायर थे। जयपुर में रहते हुए ही एक दिन यह खबर आई कि दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। उनकी इन पंक्तियों के साथ उनको याद कर रहा हूँ-

रवां-दवां थी, सियासत में रंग भरते हुए,
लरज़ गई है ज़ुबां, दिल की बात करते हुए।

ये वाकया है तेरे शहर से गुज़रते हुए,
हरे हुए हैं कई ज़ख्म दिल के भरते हुए।

मुझे पता है किसे इंतज़ार कहते हैं,
कि मैंने देखा है लम्हात को ठहरते हुए।

खुदा करे कि तू बाम-ए-उरूज़ पर जाकर
किसी को देख सके सीढ़ियां उतरते हुए।

नजर-नवाज़ वो अठखेलियां कहाँ राही,
चले है बाद-ए-सबा अब तो गुल कतरते हुए।


आज के लिए इतना ही, नमस्कार।

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किसान आंदोलन और कम्युनिस्टों के मंसूबे!

किसान नेताओं के साथ सरकार की वार्ता के एक और दौर में सफलता नहीं मिल पाई, कम्युनिस्ट लोग और हताश कांग्रेसी प्रसन्न होंगे कि उनके मंसूबे अभी तक कामयाब हो रहे हैं| मैं विशेष रूप से इस सच्चाई का उल्लेख करना चाहूँगा कि इस आंदोलन के नेतृत्व में 40 किसान संघों के नेता हैं, जिनमें से कोई अपने को दूसरे किसी दूसरे से कम नहीं समझता| किसी आंदोलन के संबंध में वार्ता का नतीजा तब निकलना संभव होता है, जब उसका एक नेता हो और उसके साथ मुद्दों पर चर्चा करके समझौता किया जा सके| भीड़ को कोई बात समझाई जा सकती है क्या?

विशेष रूप से कम्युनिस्टों को ऐसा वातावरण बने रहने से बहुत सुख मिलता है| साम्यवाद का जो दर्शन है वो एक ऐतिहासिक सच्चाई है| कोई समय था जब रूस में या चीन में इस दर्शन की सार्थकता थी| लेकिन आज लगभग पूरा विश्व इस पार्टी को नकार चुका है (मैं दर्शन की बात नहीं करूंगा, उसकी ऐतिहासिक प्रासंगिकता हो सकती है)|


अपने देश में देखें तो पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक कम्युनिस्ट शासन रहा| बंगाल जो कभी औद्योगिक दृष्टि से अत्यंत संपन्न प्रदेशों में गिना जाता था, वहाँ इन लोगों ने कोई उद्योग नहीं पनपने दिया और आज बंगाल गरीबी का एक बहुत बड़ा शो-रूम बन गया है|


कम्युनिस्ट दर्शन देखा जाए तो अधूरा दर्शन है| जो व्यवस्था चल रही है उसको छिन्न-भिन्न कर दोगे| खास तौर पर भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में तो आंदोलनों, हड़तालों के अधिकार का दुरुपयोग करते हुए आप ये काम कर ही सकते हैं| और अगर आप किसी तरह सफल हो जाते हैं और आपकी व्यवस्था लागू हो जाती है, तब क्या होता है?


मैंने कहीं पढ़ा था कि ख्रुश्चेव के बाद के एक नेता, अपने भाषण में उनकी आलोचना कर रहे थे, भीड़ में से एक व्यक्ति ने पूछा जब वे गलत काम कर रहे थे, तब आप कहाँ थे? उन नेताजी ने पूछा ये प्रश्न किसने पूछा है, हाथ उठाएँ?कोई जवाब नहीं आया| वो नेता बोले मैं उस समय वहीं था, जहां इस समय आप हैं! यह भी कहा जाता है कि किसी बड़े नेता के भाषण के बाद जो पहले ताली बजाना बंद कर देता उसको विद्रोही मान लिया जाता है| और ‘थियानमान चौक’ का नरसंहार तो आपको याद ही होगा, इससे आप समझ सकते हैं कि कम्युनिस्ट विरोध को किस तरह बर्दाश्त करते हैं!


लेकिन जब से मोदी सरकार आई है तब से कम्युनिस्ट विशेष रूप से सक्रिय हैं| लोगों से आपको वोट तो मिलते नहीं हैं, कोई सकारात्मक काम आप नहीं कर सकते, लेकिन लोगों को भड़का तो सकते हैं, भ्रमित तो कर सकते हैं| इतने बड़े देश में आपको विशेष रूप से पंजाब और थोड़े बहुत अन्य एक-दो राज्यों के कुछ किसान मिल गए, बाकी आपके कार्यकर्ता! रास्ते रोकने के लिए तो इतना बहुत है!


मुझे लगता है कि उच्चतम न्यायालय को ऐसे मामलों में रुचि लेकर निर्देश देने चाहिएं, क्योंकि सरकार की आगे बढ़ने की सीमाएं हैं| देशहित में यह ज़रूरी है कि कम्युनिस्टों के ऐसे मंसूबों को नाकाम किया जाए जिसमें वे संसद में पारित किसी कानून के विरोध में जनजीवन को अस्त-व्यस्त करके सरकार को ब्लैक-मेल करना चाहते हैं| अगर किसी कानून का विरोध करना है तो जनसामान्य को बाधा पहुंचाए बिना आप यह काम करें और कानून को न्यायालय में चुनौती दें, लेकिन उसमें भी तो इन कम्युनिस्टों की आस्था नहीं है|


आज ऐसे ही किसान आंदोलन के बहाने कम्युनिस्टों की अव्यावहारिक और विध्वंसक भूमिका के बारे में बात करने का मन हुआ, तो ये बातें कह दीं|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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Farmars’ Agitation, Is It So?

An agitation is going on in the name of Farmers, no doubt innocent farmers have been involved in it, since the organisers are keeping them in fear for things that do not exist.


Government has made all efforts to convince the agitation leaders, but they have not come here to get convinced by any logic! They came to Delhi borders with arrangements for staying for around 6 months, was it necessary if they wanted to fight for some real problems and get them resolved.

This is the second major show in the series, they may continue with more in future, if the Government and the Supreme Court do not take some solid effort to stop such nusaince!


Yes, I am saying, it is nusaince, though it is being done in the name of farmers, they are being misguided and made to remain out in cold creating such a baseless narrative, creating artificial fear.


As Modi ji said about Shaheen Bagh incident, ‘It was not a sudden incident but a well planned experiment’. After success of that experiment in Delhi, so many Shaheen Baghs were created in different parts of the country.


To great extent, it was Corona Scare, that helped in ending the Shaheen Bagh nusaince. In case of Shaheen bagh, they were Old ladies who were sitting there for dharna, actually it were these experimenting cowards, who were remaining behind the scenes and making these ladies their shields. This time here are the farmers, who are being used as a shield.


The country bore some non-performing governments for a long time, who somehow remained in power, by pleasing all and didn’t take any major decision. The present Modi government is bold enough to take decisions. The decision regarding CAA and the present decision regarding Farming reforms have been bold and revolutionary decisions, making the farmer free from bondage of money-lenders who took their yields for lesser payment. The farmer has been given extra options to sell his crops and there is no binding conditions against him in this system, but it appears that the middlemen are the main force behind the movement.


The drafts for these new laws were discussed and developed during the time of congress government but they were not bold enough, to take these decisions. Though they mentioned in their election manifesto that they would be doing this.Further they didn’t implement the recommendations of Swaminathan Committee. Which is a great boon for the farmer, like MSP, that has been implemented. Now they are creating illusion by presenting wrong narrative.


One major force behind these movements, be it against CAA or Farming Laws, are the communists and the congress, whom public has thrown in the dustbin. They somehow want to earn some relevance through such acts.


One thing is very clear, as Honourable Supreme Court has also said. You have the right to protest but you can’t block. You can’t hold the civic life to ransom, by blocking roads and destroying the business. They are giving great trouble to common people.


BJP has also been organising ‘Kisan Sammelans’ across the country and I find that the number of farmers participating there is much more than those in protest. The only thing is that they are not giving any trouble to anybody.


And I wonder what kind of sponsors this movement(?) has got. There are five-star facilities of Gym, imported foot massagers put around a room in a row and what not? Who is sponsoring all that, and what would he get out of this.


My sympathies are always with farmers, also those who got involved in this movement being misguided by such rejected leaders, be those communists, who normally act against the country they live in (except may be in the case of Russia and China).


I wish that the government and the court may resolve this problem soon, since those sponsoring the agitation leaders are in no mood to end this.

I would like to reiterate some basic points here-

Laws are made by the national parliament and would continue to be made there, not on roads. If you have some problems you can protest in a democratic way. At present the government is coming forward and discussing the issues, but when they say- ‘We simply want these laws to be withdrawn’. That only means you are blackmailing the government.

The appropriate authority to review the laws made by government is the supreme court, if you have faith in ‘rule of law’ you should go there and demand justice.

But the problem is that you are not fighting for justice. You just want to bring government on knees and in some way earn some relevance, while you have completely been rejected by people of India.


This is my humble submission on the #IndiSpire prompt- The farmers’ agitation is going on for long. Do you think the government is failing to address the grievances of the farmers and is being autocratic? Or is the government as magnanimous as the Prime Minister claims? #FarmersAgitation


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