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कैसा मौसम है ये!

आज हम ऐसे समय में चल रहे हैं जिसकी न किसी ने पहले कल्पना की होगी और निश्चित रूप से किसी ने इसकी कामना तो नहीं ही की होगी| जी हाँ कोरोना की महामारी का यह काल, पूरी मानव जाति को इसने त्रस्त करके रखा है| सब यही सोचते रहते हैं कि कब यह दौर समाप्त होगा, कब हम पहले की तरह अपनी ज़िंदगी जी पाएंगे|


हम पहले फिल्मों आदि में देखते थे कि किसी दूसरे ग्रह के प्राणियों के चेहरे कुछ अलग तरह के होते हैं, या जैसा ‘पेपा पिग’ आदि में हम देखते हैं, आज इंसानों की हालत कुछ वैसी ही हो गई है|


मैं अब गोवा में रहता हूँ (यद्यपि फिलहाल बंगलौर में हूँ)| गोवा जैसे अनेक नगर और राज्य तो ऐसे हैं जिनकी आमदनी का मुख्य स्रोत ही पर्यटन है| लेकिन फिलहाल जहां अर्थव्यवस्था पर अनेक गंभीर संकट आए हैं, वहीं पर्यटन पर तो शायद इस महामारी की मार सबसे ज्यादा पड़ी है|


ऐसे में कवि बिहारी जी की एक सतसई याद आ गई, जिसमें वह प्रेमी नायक द्वारा सिर्फ अपने नयनों से ही की जाने वाली विभिन्न अभिव्यक्तियों का बहुत सुंदर चित्रण कराते हैं –


कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात।
भरे भौन मैं करत हैं नैननु ही सब बात॥


इस सतसई के प्रसंग को याद करके ये खयाल आया कि जब प्रेमी-प्रेमिका नयनों के माध्यम से ही ये सारे संप्रेषण, ये अभिव्यक्ति करते हैं, तब वे भले ही कोई शब्द न बोलते हों, परंतु उनके होंठ, उनकी नासिका, उनके गाल आदि भी कुछ योगदान उनके इस संप्रेषण में करते हैं, जैसे गालों में गड्ढे पड़ जाना, जैसे कहते हैं सुर्ख लाल हो जाना आदि| मतलब ऐसी बॉडी लैंग्वेज़, जिसका संबद्ध उनके चेहरे से ही है| आज मुह पर मास्क लगाकर, जबकि केवल आँखें ही दिखाई देती हैं, आँखों से ही किया जाने वाला, ये संप्रेषण कुछ और मुश्किल हो जाता न बिहारी जी!


कहते हैं न- ‘बरबादियों का जश्न मनाता चला गया’| तो इस तरह की बातें सोचकर ही हम कोरोना से कह सकते हैं कि ऐसी मुसीबत हमने पहले नहीं देखी है, लेकिन हम मनुष्य, हम भारतवासी इसका सामना करने के लिए तैयार हैं| एक तरह से हमारे सक्रिय जीवन-काल से यह अवधि, शायद कुल मिलाकर 7-8 महीने की, कम हो गई है| हम आशा करते हैं कि तब तक कोरोना वेक्सीन के कारण और हमारे सम्मिलित प्रयासों के बल पर इस दुष्ट दानव का अंत हो जाएगा|


सामाजिकता की सारी गतिविधियों को, सारे आयोजनों को इस दुष्ट महामारी ने ध्वस्त करके रख दिया है| कई ऐसी घटनाएँ हुईं कि जरा सी लापरवाही बहुत महंगी पड़ गई| जैसे एक विवाह में दूल्हा कहीं से बीमारी लेकर आ गया था और वैवाहिक आयोजन के माध्यम से बहुत सारे लोगों को अपने साथ लेकर चला गया| इसलिए इस माहौल में बहुत फूँक-फूँक कर कदम रखने की ज़रूरत है| यह समय बहादुरी दिखाने का बिलकुल नहीं है| कहते हैं न कि ‘दिल की बाज़ी, जो हारा- वही जीता’ इसी तरह इस दुष्ट महामारी का मुक़ाबला धैर्य और सावधानी के साथ करना होगा| इसको चुनौती देने से काम नहीं चलेगा|

यही कामना है कि मानव समुदाय इस संकट पर शीघ्र विजय प्राप्त करे और हम सभी फिर से अपना जीवन पूर्णता के साथ जी सकें| जहां मन हो वहाँ आने-जाने का मौसम फिर से लौटकर आए|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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कोरोना और उसका टीका!

हमारे देश में भी कोरोना की महामारी पिछले 3-4 महीने से कहर बरपा कर रही है और इस समय यह अपने चरम पर है| पहले  हम आंकड़ों की दृष्टि से काफी पीछे थे, लेकिन अब बढ़ते-बढ़ते विश्व में तीसरे नंबर पर आ गए हैं|

 

 

ज्योतिषियों ने कहा था कि अभी जो चंद्रग्रहण पड़ा था उसके बाद कोरोना का प्रभाव घटना शुरू हो जाएगा| मन होता है कि कम से कम इस मामले में ज्योतिषियों की भविष्यवाणी सच हो जाए|

अभी पिछले दिनों बाबा रामदेव ने कोरोना की दवा खोज लेने का दावा किया था, जिसे एलोपैथी के महाविद्वानों से तो समर्थन मिलना ही नहीं था, आयुष मंत्रालय ने भी ना-नुकर करने के बाद ‘इम्यूनिटी बूस्टर’ के तौर पर ही इस दवा को बेचने की अनुमति दी है| यह भी दुआ करने का मन हो रहा है कि भले ही इस दवा से हो, कोरोना के अंत की शुरूआत हो जाए|

बाबा रामदेव की घोषणा के बाद एक बात तो हुई है कि जो एलोपैथिक दवा की खोज कर रही संस्थाएं यह बता रही थीं कि वे अगस्त-सितंबर के बाद ही वेक्सीन तैयार कर पाएँगी, उन्होंने अब कहना शुरू कर दिया है कि दवा तैयार है और जल्दी ही उसके ट्रायल शुरू हो जाएंगे|

स्पष्ट है कि एलोपैथी दवा-कंपनियों का बड़ा नेटवर्क है, इससे कमीशनखोरी का भी काफी बड़ा तंत्रजाल जुड़ा है| कोई अगर सस्ती आयुर्वेदिक दवा से कोरोना का इलाज संभव बना देगा तो इनके मोटी कमाई वाले सपनों का क्या होगा?

मुझे नहीं मालूम कि बाबा रामदेव की यह दवाई कितनी कारगर होगी, लेकिन ऐसा लगता है कि इससे कोरोना के मामलों पर कुछ लगाम लगेगी| मैं जानता हूँ कि डेंगू के मामलों में भी बाबा रामदेव की दवा काफी कारगर हुई थी| लेकिन इतना जरूर है कि इस दवा के बाज़ार में आ जाने से एलोपैथी के महारथी भी वेक्सीन को तैयार करने में जल्दी करेंगे और अपने मोटी कमाई के सपनों पर भी लगाम लगाएंगे|

यही दुआ है कि हमारे देश को और पूरी दुनिया को इस दुष्ट महामारी से शीघ्र छुटकारा मिले|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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क्या जाने किस भेष में बाबा!

 

हमारे यहाँ बहुत पुरानी मान्यता है और उस मान्यता को मान्यता देते हुए, एक फिल्मी गीत भी था-

 

बड़े प्यार से मिलना सबसे, दुनिया में इंसान रे,
क्या जाने किस भेष में बाबा, मिल जाए भगवान रे!

 

देखा जाए तो हमारे प्रधान मंत्री मोदी जी ने इस विचार को खूब प्रचारित किया है और वे दुनिया भर में राष्ट्राध्यक्षों से गले मिलते रहे हैं| अपने देश में राहुल बाबा ने भी इस सिद्धान्त को प्रतिपादित किया, मोदी जी से गले मिलकर| वैसे वो गले मिलना कम अपितु दबोचना या गले पड़ना अधिक था, जब वे बैठे हुए मोदी को ऊपर से दबोचकर गले मिले थे| वे उस समय सिद्ध यह करना चाहते थे कि उनको मोदी जी से किंचित भी नफरत नहीं है| शायद यही सिद्ध करने के लिए उन्होंने कुछ दिन बाद ही यह कहा था कि लोग मोदी जी को डंडों से मारेंगे!

खैर बड़े लोगों के बारे में क्या बात करें, मैं इस समय कहना यह चाह रहा था कि युगों से चली आ रही यह मान्यता अब बदल गई है| बहुत लंबे समय से मोदी जी देश से बाहर नहीं गए हैं, विदेशी नेताओं से बात होती भी है तो फोन पर या वीडियो कान्फ्रेंसिंग के द्वारा| सो गले मिलने का तो अब सवाल ही नहीं है, हाथ मिलाना भी वर्जित है|

मुझे बशीर बद्र जी का एक शेर याद आ रहा है-

कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिजाज का शहर है, ज़रा फासले से मिला करो!

 

वैसे ये बात आज किसी शहर की नहीं पूरी दुनिया की हो गई है| और नया मुहावरा आज का यह हो गया है-

दूरी रखकर मिलना सबसे, देते हैं बतलाय रे,
जाने  किस बंदे से तुमको ‘कोरोना’ लग जाए रे!

ये आज का बदला हुआ समय है, बदली हुई संस्कृति है| देखते हैं आज की स्थिति से गले मिलने वाली उस पुरानी हालत में पहुँचने तक कितना समय लगेगा| लेकिन तब तक अपना खयाल रखिए|

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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कोरोना संकट- जनता, सरकार और विपक्ष!

आज एक बार फिर से मैं कोरोना संकट और लॉक डाउन के अनुभव के बारे में बात कर रहा हूँ| मैं वैसे पणजी, गोवा में रहता हूँ लेकिन लॉक-डाउन की पूरी अवधि बंगलौर में गुज़री है| लगे हाथ यहाँ के एक विशेष अनुभव का भी ज़िक्र कर दूँ| बंगलौर के हेगड़े नगर में एक विशाल रिहायशी कॉम्प्लेक्स में रह रहा हूँ, 17वीं मंज़िल पर और लॉक-डाउन के दौरान 17वीं मंज़िल से नीचे नहीं उतरा हूँ| हाँ तो एक विशेष अनुभव जिसका मैं ज़िक्र कर रहा था, वो यह कि हमारी सोसायटी में, दिन में सामान्यतः 20-25 बार बिजली जाती है, कुछ ही देर में वापस आ जाती है, शायद ‘बैक अप’ के कारण, परंतु इन्टरनेट जाता है तो उसके आने में अधिक टाइम लग जाता है| होता यह है कि कई बार जब रात में बिजली जाती है तो यह सोचकर संतोष होता है कि बिजली विभाग वाले अभी भी काम कर रहे हैं!

 

 

खैर मैं बात कर रहा था भारतवर्ष में लॉक डाउन के अनुभव के बारे में| हमारे देश ने एक सच्चे जन नायक के नेतृत्व में लॉक डाउन का प्रारंभ किया तथा क्रमशः इसके विभिन्न चरणों में हम इस महा संकट का मुक़ाबला कर रहे हैं| मोदी जी परिस्थितियों के संबंध में मुख्य मंत्रियों और विशेषज्ञों की सलाह लेने के बाद आगामी कदमों का निर्णय लेते हैं तथा समय-समय पर जनता के साथ एक सच्चे जन-नायक, एक अभिभावक की तरह संवाद करते हैं| परंतु उनके राजनैतिक विरोधी तो स्वाभाविक रूप से उनमें एक तानाशाह को ही देखते हैं, क्योंकि मोदी जी के कारण ही जनता ने उन्हें कचरे के डिब्बे में फेंक दिया है|

लॉक डाउन लागू होने के समय यह आवश्यक था कि जो जहां है, वहीं रहे और हम इस बीच चिकित्सा व्यवस्था और अन्य आवश्यक ढांचे का निर्माण कर सकें, तब तक संक्रमण अधिक न फैल पाए और हम इसमें व्यापक रूप से सफल हुए हैं, इसका प्रमाण अनेक बड़े देशों के मुक़ाबले हमारी स्थिति देखकर समझा जा सकता है|

कुछ लोग शायद ये कह सकते हैं कि हमारा वर्तमान नेतृत्व कोरोना के खतरे के बारे में पहले से नहीं जानता था, इसलिए वह परिस्थितियों का अध्ययन करने के बाद ही उनका उपाय खोजता है| शायद कोई राहुल गांधी जैसा महाज्ञानी और त्रिकालदर्शी नेता होता तो वह कोरोना को यहाँ बिलकुल पनपने ही नहीं देता| खैर मैं इस विषय में अधिक चर्चा नहीं करना चाहूँगा!

आज हम कोरोना संकट से निपटने की दृष्टि से बेहतर स्थिति में हैं और हमें धीरे-धीरे सावधानी के साथ सामान्य स्थितियाँ बहाल करने की ओर आगे बढ़ना है| इस बीच प्रवासी मजदूरों की घर वापसी का एक बड़ा संकट आया| इस संकट में कुछ स्थानों पर विपक्षी सरकारों द्वारा न केवल प्रवासी मजदूरों पर ध्यान न दिया जाना अपितु उनको वापस जाने के लिए उकसाना भी शामिल था|

इस संदर्भ में यह प्रश्न भी उठाया जाता है कि क्यों उत्तर प्रदेश और बिहार के मजदूर इतनी बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर के रूप में कार्य करते हैं| इस संदर्भ में हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि इन दो प्रदेशों में लंबे समय तक ऐसी क्षेत्रीय पार्टियों ने शासन किया है, जिनके पास केवल जातिवादी राजनीति थी, यह हिसाब था कि किनको ‘चार जूते’ मारने हैं| विकास तो उनका एजेंडा था ही नहीं, बस कुछ जाति और संप्रदायों को साथ लेकर उनको सत्ता में बने रहना था| वे चाहे यू पी में मुलायम सिंह, मायावती और अखिलेश यादव हों या बिहार में चारा घोटाले के महानायक- लालू प्रसाद यादव हों|

मैं आशा करता हूँ कि यूपी और बिहार की वर्तमान सरकारें ऐसी व्यवस्था करेंगी कि इन प्रदेशों से मजदूरों का पलायन भविष्य में कम से कम हो| क्योंकि वैसे तो एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में रोजगार के लिए जाना कोई बड़ी बात नहीं है, बड़ी संख्या में लोग विदेशों में भी जाते हैं|

अंत में एक प्रसंग याद आ रहा है, लालू प्रसाद जी के जमाने के बिहार का| मैं उन दिनों जमशेदपुर के पास, हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की मुसाबनी माइंस में काम करता था, जो अब झारखंड में हैं, उस समय बिहार में ही था, क्योंकि झारखंड राज्य बाद में बना था| हाँ तो हिंदुस्तान कॉपर की माइंस और कारखाने के बीच 8 किलोमीटर लंबी सार्वजनिक सड़क थी, जो जर्जर हालत में थी| उस कंपनी की तरफ से बिहार सरकार को पत्र लिखकर इस बात की अनुमति मांगी गई कि वे अपने खर्च पर उस सड़क की मरम्मत कर दें| इसके उत्तर में तब की बिहार सरकार से अनेक शर्तें लगाई गईं, जैसे कि सड़क पर पूरा अधिकार सरकार का रहेगा, सरकार कुछ खर्च नहीं करेगी और एक शर्त यह भी कि सरकार का एक इंजीनियर कंपनी का मेहमान बनकर काम को सुपरवाइज़ करेगा| हिंदुस्तान कॉपर प्रबंधन द्वारा यह शर्त स्वीकार नहीं की गई कि घोटालेबाज सरकार का प्रतिनिधि उनके काम को सुपरवाइज़ करे, उसमें अनावश्यक अड़ंगे लगाए और इस प्रकार वह काम नहीं हुआ|

फिर से, कोरोना संकट के बारे में बात करते हुए इतना ही कहूँगा कि हम इस अभूतपूर्व संकट का पूरी हिम्मत और विश्वास के साथ मुकाबला कर रहे हैं, और हमे विश्वास है कि हम अवश्य सफल होंगे|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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कोरोना के असहाय शिकार!

आज कोरोना के खतरे के बाद देश में बनी परिस्थितियों की चर्चा कर रहा हूँ| कितनी भयंकर विपदा यह संपूर्ण मानव जाति पर आई है, ये आप सभी जानते हैं| चीन से शुरू होकर कोरोना के इस दैत्य ने इटली, अमरीका आदि में जैसी तबाही मचाई है, शुक्र है हम अभी वैसी स्थिति में नहीं हैं और ईश्वर ने चाहा तो वैसा यहाँ नहीं होगा, लेकिन जो हुआ है वह भी बहुत डराने वाला है| आज इन परिस्थितियों पर ही कुछ चर्चा कर लेते हैं|

 

 

समाचार चैनल ‘टीवी 18’ के एक एंकर हैं – प्रतीक त्रिवेदी जो ‘भैया जी कहिन’ नाम से चर्चा का एक लोकप्रिय कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं| शाम के समय प्रसारित होने वाला यह कार्यक्रम पहले आउटडोर लोकेशन से सीधे प्रसारित होता था, जिनमें एक लोकेशन अक्सर कनॉट प्लेस की होती थी| काफी भीड़ एकत्रित होती थी इस कार्यक्रम में! अब तो लोगों को इकट्ठा करने वाले कार्यक्रम बंद ही हैं| बहस के कार्यक्रम भी अब स्काइप आदि के माध्यम से चर्चा द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं|

हाँ तो ‘भैया जी’ ने भी जहां तक मुझे याद है 2-3 दिन तो स्टूडिओ से कार्यक्रम प्रस्तुत किए, लेकिन उसके बाद उन्होंने बाहर लोकेशन्स पर जाना शुरू कर दिया| एक लंबी डंडी वाला माइक अब वे इस्तेमाल करते हैं, जिससे दूर खड़े होकर प्रश्न पूछे जा सकते हैं| अब भी वे बाज़ारों, बैंकों, अस्पतालों आदि में जाकर प्रश्न पूछते हैं और बहस के लिए जबकि उनके मेहमान स्काइप के माध्यम से जुडते हैं, वे बाहर की ही किसी लोकेशन पर होते हैं और वहाँ से ही कार्यक्रम का संचालन करते हैं| अक्सर कनॉट प्लेस का उनका शॉट दिखाया जाता है, जिसमें वे कहते हैं – यहाँ पर ही हजारों लोगों की भीड़ जमा होती थी| कुछ स्थितियाँ अतीत की ऐसी होती हैं, जिनकी कमी हमें खलती है| हमें भरोसा है की वे परिस्थितियाँ फिर से वापस लौटेंगी|

लॉक डाउन बढ़ता ही जा रहा है, जरूरत तो यही है कि पूरे अनुशासन के साथ, सभी मिलकर इस स्थिति का सामना करें, परंतु सभी के लिए ऐसा करना संभव नहीं है| कुछ लोगों के लिए दो जून की रोटी का प्रबंध करना भी संभव नहीं है और जबकि प्रदेश की सरकारों द्वारा ऐसा दावा तो किया जा रहा है कि सभी के भोजन और आर्थिक सहायता का प्रबंध किया जा रहा है, लेकिन ये सरकारी प्रयास कितने प्रभावी होते हैं, ये विचारणीय है|

एक समस्या जो भारत में विशेष रूप से है, वह है प्रवासी मजदूरों की| अन्य शहरों में पढ़ने वाले छात्रों को तो पिछले दिनों उनके घरों तक पहुंचाने का काम किया गया और अब मजदूरों को उनके मूल स्थान पर ले जाने का काम भी शुरू किया गया है| मजदूरों को वापस ले जाने का ये काम एक तो आसान नहीं है, ऐसे मजदूर असंख्य हैं| इसके अलावा अब जरूरत इस बात की भी है कि लॉक डाउन को धीरे-धीरे सावधानी के साथ खोला जाए| और जहां ये मजदूर अभी हैं, वहाँ ये रोजगार के लिए आए हैं और रोजगार इनको यहाँ ही मिल पाएगा| इन परिस्थितियों में आवश्यकता इस बात की है कि इनका हौसला बढ़ाया जाए, आवश्यक सहायता सुनिश्चित की जाए और इनको यथाशीघ्र कमाई का साधन उपलब्ध कराया जाए, क्योंकि अभी लौट जाने पर जल्दी ही इनको फिर वापस आने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा|

महाराष्ट्र में रेल पटरी पर हुई 16 मजदूरों की मृत्यु एक हृदय विदारक घटना थी और हमको इस विषय में सोचने के लिए विवश करती है कि इन प्रवासी मजदूरों की स्थिति पर गंभीरता पूर्वक विचार करने और इनको सहायता और परामर्श प्रदान करने और इनका हौसला बढ़ाने की आवश्यकता है|

आज के लिए इतना ही
नमस्कार|

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Corona, Lock Down and Masks!

Today again talking about the Pandemic Covid-19, lock down regulations etc. There is a question asked whether I wear mask, and when was the first time I saw somebody wearing a mask etc.

 

 

Let me say that I have been watching people wearing masks since long time. The reason for people wearing masks being that I lived in Delhi-NCR area and some people there had wearing masks their just because the air quality there sometimes becomes so unbearable due to massive pollution. Further there have been spread of Bird-flu etc. during several previous years and that is also a reason that I have been seeing people wearing masks since long.

However this time reason for wearing masks is much more serious than the previous occasions. The pandemic of Corona virus is such a grave threat to humanity that it has made the whole world remain indoors. The big powers, the rich nations which initially ignored this threat,  spread from Wuhan area of China, paid a very heavy price for their casualness. The spread of this disease is so fast that its patients grow in multiples, through social contacts, therefore remaining indoors and maintaining social distancing is the most effective way to stop the spread of this dreaded disease.

Yes one thing I would like to admit that I have never worn a mask till date. My son and daughter in law go outdoors for purchasing etc. and they wear mask then. I have not moved out from the 17th floor residence, where we are with my son in Bangalore, not gone out of our house even, so use of mask was not needed. I was a regular evening walker before start of lock-down, but now walk also is done indoors.

I feel that while some people may remain indoors like me, this option is not available to everybody, especially for those who work in essential services, medical staff, police, vendors for supply of daily need items etc. for them the use of masks is a great help and very useful.

I feel that our dealing with this dreaded virus was very effective since we implemented lock-down and social distancing in time, but like our film scripts, their came a notorious villain called – Maulana Saad of Tabligi Jamaat, who kept thousands of people in his ‘Marqaz’ gathering in Nizamuddin Delhi area, for so many days, even when assembly of more than 50 persons was not allowed. This gathering included many people from such countries, where spread Corona has been very serious and further these foreign people traveled and hided themselves in Mosques in different parts of our country. Still there are some people who have not come out and might be acting as big spreaders of this disease.

Further it is quite shameful that in some areas of our country, there are people of one community hiding and attacking police and medical personnel, who go there for their treatment etc. It is really not understandable how these people can act in such an uncultured and inhuman way, against those who are not caring about themselves but taking great risk to save other people.

Definitely the Medical staff going door to door for testing and treatment of people, police personnel who maintain the lock-down in various areas and of course the media people and those carrying things door to door and all those who work in the essential services, are the masked superheroes and we are proud of them.

This is my humble submission on the #IndiSpire prompt- Are you using a mask to protect yourself from Covid-19? What do you think of masks? When was the first time you saw someone with a mask? What about masked superheroes? According to you, which masked superhero can save Planet Earth now? #AnythingAboutMask

Thanks for reading.

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चुनौती कोरोना और लॉक डाउन की!

एक बार फिर से आज कोरोना के बारे में चर्चा करने का मन है। यद्यपि हमारे देश का निष्पादन पश्चिम के देशों के मुकाबले कहीं अच्छा रहा है, शायद इसमें जलवायु और बचपन में लगने वाले टीकों का भी कुछ योगदान हो। लेकिन जो भी हो, ऐसा स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि पिछले कुछ दिनों से मामले निरंतर बढ़ रहे हैं और पूरी संभावना है कि लॉक डाउन की अवधि को और बढ़ाना पड़ेगा।

 

हमारी राष्ट्रीय सरकार और प्रदेश सरकारों द्वारा काफी कदम उठाए जा रहे हैं, जो संभव है इस अचानक आई महामारी के संदर्भ में पर्याप्त न हों। ऐसे में कुछ नागरिकों का व्यवहार ऐसा भी है जिससे लगता है कि उनका इरादा सरकार के प्रयासों को फेल कराने का ही हो। उन्होंने जैसे ऐसा माना हुआ है कि वे तो मरेंगे ही बहुत से लोगों को और साथ में लेकर मरेंगे। ऐसे लोगों के साथ वही व्यवहार किया जाना चाहिए, जैसा शातिर अपराधियों के साथ किया जाता है।

मुझे पूरा विश्वास है कि हम सब मिलकर इस महासंकट का मुकाबला सफलतापूर्वक कर ही लेंगे। बहुत सी समस्याएं इसके साथ और भी जुड़ी हैं जिनसे निपटना होगा, जैसे फसलें खेतों में तैयार हैं, उनकी कटाई के लिए मजदूर और उनको बाजार तक पहुंचाने के लिए यातायात के साधन, उसकी अनुमति अभी नहीं है। इन सबका भी समाधान खोजना होगा। सरकार द्वारा यथासंभव आसपास ही कृषि उत्पादों की खरीद और उनको गोदाम तक पहुंचाने के प्रयास किए जाएंगे।

सबसे बड़ी समस्या मेरे विचार में उन लोगों की है जो दैनिक मजदूर हैं, रोज कुआं खोदकर पानी पीते हैं। हमने देखा कि किस प्रकार उनकी भगदड़ मची थी जब वे जान की परवाह ने करते हुए उत्तर प्रदेश और बिहार की तरफ अपने घरों के लिए चल दिए थे!
सरकार द्वारा गरीब और बेसहारा लोगों को भोजन और कुछ आमदनी उपलब्ध कराने के प्रयास किए गए हैं, लेकिन मैं एक बार फिर से दोहराना चाहता हूँ कि सरकार के लिए सब लोगों तक पहुंचना संभव नहीं होता। जैसे एक उदाहरण तो टैक्सी चलाने वालों का ही है, जो बहुत बड़ी संख्या में आज बेकार बैठे हैं।

मेरा यही विनम्र अनुरोध है कि आर्थिक रूप से मजबूत लोग, जो दूसरों की मदद करने में सक्षम हैं, वे अपने आसपास ऐसे लोगों की तलाश करें और उनकी यथासंभव मदद करें, जिससे वे संकट की इस घड़ी से सुरक्षित बाहर आ सकें। खास तौर पर ऐसे लोग, जो किसी से मदद नहीं मांग पाते, वे यह भी नहीं बता पाते कि उनकी हालत बहुत खराब है। कहीं ऐसा न हो कि किसी को हमारे होते हुए कोई बदहाली में प्राण त्यागने पड़ें अथवा अत्यंत कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़े। यह हमारी सरकार और प्रत्येक जागरूक नागरिक के लिए परीक्षा की घड़ी है और मुझे विश्वास है कि हम इस चुनौती का भली प्रकार सामना करेंगे।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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Utilising Lockout time!

Today I would write about my experience and routine activity during Lockout. I have been a retired person for last 10 years. Before that I worked near Lucknow. After retirement I shifted to Gurgaon, lived there for around 5 years and then shifted to Gurgaon.

 

 

I have been mostly living at home for last 10 years, except going for evening walk for an hour and sometimes going for an outing or family visit. So Lockout has not made a great difference in my routine. One more thing my second son lives in Bangalore and we came here on visit with a plan to stay for almost 2 months, however when we were about to return to Goa, this period of Lockout started and all flights also were cancelled and it then depended solely on end of lockout that we could think of going back.

Again as I said before for me, as a person living retired life for last 10 years, this lockout does not make much difference. Yes for those working from home now, like my son it has made a great difference. Further I could also move out anytime I wanted for short visits outside from my 17th floor residence, come to ground level, which I have not done till now after the lockout, might be it is more than required under these conditions, evening walk also discontinued.

Yes the main activity I get involved has been blogging and surfing the net, I also do work on some translation assignments, but during this period I have not received any such assignment also. I write blog posts and try to read blog posts written by fellow bloggers and on TV have been mostly watching news and debates, which include the debates conducted by Arnab Goswami, Amish Devgan and the one by Rohit Sardana. I still watch these to some extent but during this special period I have been watching some special programs with family.

Besides watching some nice movies, which included Oscar award winning first South Korean movie- ‘ Parasite. Other than that A TV serial which was telecast long back, we are watching now a days. That Hindi serial is ‘Devon ke dev Mahadev’. We have viewed 3 seasons of this serial, very long and interesting mythological serial. We are enjoying it a lot. Till now ‘Sati’ has ended her life, has born again and now about to meet Mahadev for the first time as Parvati.

Other than the above serial and a few movies, which we watch on Hotstar, YouTube etc. etc. We also watched a serial ‘Special Ops’ regarding secret operations to neutralize terrorist acts of  enemy country, conducted in other countries, it was a very nice serial and gave an insight about how secret mission are conducted.

I may mention two other serials that we had watched earlier but people can watch them during Lockout, one is ‘Out Of Love’ and the other ‘Mirzapur’. The first one is very daring serial regarding breaking of love life and revenge and the other regarding Gangs and Mafias operating in some areas.

This is something I could remember about my activities during Lockout. This is my humble submission on the #IndiSpire prompt – What are you doing in this lockout ? Housework ? Creative activities ? Praying ? #lockout

Thanks for reading.

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कोरोना के खतरे के बीच!

आजकल दुनिया भर में फैली कोरोना की महामारी, हजारों लोग इस भयावह रोग की भेंट चढ़ चुके हैं, ऐसे में  आज के वातावरण के बारे में कुछ बात करने का मन है। यह एक ऐसा वातावरण है, जिसका अनुभव मुझे तो अपने जीवन-काल में कभी नहीं हुआ है। ऐसी महामारी जो पूरी दुनिया में बुरी तरह फैली है और जिसका प्रसार भी इतनी तेजी से होता है कि ऐसा उदाहरण कोई दूसरा ध्यान में नहीं है।

 

 

चीन से प्रारंभ हुई इस महामारी के दुनिया पर पड़े प्रभाव को देखते हुए, भारतवर्ष में इसके लिए ऐसे उपाय किए गए जिन्हें काफी प्रभावी कहा जा सकता है, परंतु ये देश इतना बड़ा है, इतनी जटिलताएं हैं यहाँ कि कोई भी उपाय प्रभावी रूप से लागू करना संभव नहीं है।

आज हमने अपने देश को पूरी दुनिया से काट लिया है, जैसा कि अनेक देशों ने किया हुआ है, विदेशों से भारतीय लोगों को भी यहाँ लाया गया, सभी जगह लॉकडाउन को प्रभावी रूप से लागू करने का प्रयास किया गया है। सभी स्कूल, कॉलेज, दफ्तर आदि बंद हैं, लोग ‘वर्क फ्रॉम होम’ कर रहे हैं, जहाँ संभव है। ये सब संभावना है कि व्यापार को, हमारी और पूरी दुनिया की इकॉनोमी को गंभीर नुकसान होगा, वो सब देखा जाएगा बाद में, लेकिन पहले लोगों को इस महामारी से बचाना है। सबसे बड़ी समस्या है उन दैनिक मजदूरों की जो रोज कुंआ खोदते है और रोज पानी पीते हैं। उनके जो नियोजक हैं, उनसे अनुरोध किया गया है कि वे उनको वेतन आदि दें, लेकिन असंगठित क्षेत्र में यह सुनिश्चित करना लगभग असंभव है।

दिल्ली में मैंने देखा है, गुड़गांव बॉर्डर के पास और अन्य स्थानों पर भी, दैनिक मजदूर इस प्रकार रहते हैं जैसे पिंजरे में, एक कमरे में 2-3 से लेकर 7-8 लोग तक, वे लोग आज के समय में ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ का पालन तो अपने कमरों में रहते हुए भी नहीं कर सकते। उन लोगों पर इस लॉक आउट का सबसे ज्यादा असर पड़ा, क्योंकि उनके नियोजक उनको इस हालत में कुछ नहीं देने वाले। सरकार द्वारा जो व्यापक पहल की गई है उसका भी उनको शायद ठीक से संदेश नहीं पहुंच पाया और अचानक भारी भीड़ दिल्ली से और अन्य महानगरों से पैदल ही निकल पड़ी; उनके लिए बीमारी से ज्यादा बड़ा सवाल भूख का था। देखिए अब कितनों को प्रशासन के लोग रोक पाते हैं, जहाँ भी शेल्टर होम में उनको रखा जा सके।

वैसे लॉक डाउन को इस भगदड़ ने भारी नुकसान पहुंचाया है और इससे हमारे प्रयासों पर काफी बुरा प्रभाव पड़ सकता है।

यही कामना है कि हमारे सम्मिलित प्रयास इस महामारी पर विजय पाने में सफल होंगे और वे लोग जो ऐसे में सामूहिक रूप से पलायन कर रहे हैं और वे लोग जो कोरोना के मरीजों को कहीं भी छिपाकर इस समस्या को और गंभीर बनाने में योगदान कर रहे हैं, उनसे अनुरोध है कि यह देशद्रोह ही नहीं मानवता के साथ अन्याय है।

इन परिस्थितियों में हमारे चिकित्सक, पुलिस और सेना, अर्धसैनिक बलों के जो लोग जनहित में अपनी ड्यूटी कर रहे हैं और मीडियाकर्मी आदि-आदि, जो भी लोग अपनी जान को जोखिम में डालकर अपना कर्त्तव्य निभा रहे हैं, वे आदर के पात्र हैं। मैंने कहीं पढ़ा था आज दुनिया में जितने कोरोना पीड़ित हैं, उनमें से लगभग 15% स्वास्थ्य कर्मी हैं। वे विशेष रूप से हमारे लिए आदरणीय हैं।

आइए हम सभी मिलकर आज इंसानियत के दुश्मन के रूप में उभरकर आई इस कोरोना महामारी को परास्त करें।

 

आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।

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आज सड़क के जीव उदास हैं!

आज बाबा नागार्जुन जी की एक प्रसिद्ध कविता याद आ रही है- ‘अकाल और उसके बाद’। इस कविता में अकाल के प्रभाव को बड़े सुंदर तरीके से दर्शाया गया है। जब घर में चूल्हा जलता है तब केवल घर के मानव सदस्य ही तृप्त नहीं होते अपितु ऐसे अनेक जीव भी भोजन पाते हैं, जिनमें से कुछ पर तो हमारा ध्यान जाता है और कुछ पर नहीं।

आजकल दुनिया में जो कोरोना की महामारी फैली है, हजारों लोग इस भयावह रोग की भेंट चढ़ चुके हैं, ऐसे में यह भी हुआ है कि हमने खुद को अपने घरों में बंद कर लिया है। मानव समाज की रक्षा के लिए यह एक प्रभावी कदम लगता है, लेकिन हम देखते हैं कि जब हम बाहर निकलते हैं, तब वहाँ भी अनेक ऐसे जीव हैं जिनका पेट हमारे कारण ही भरता है। कुछ के सामने तो हम स्वयं खाने के लिए कुछ डाल देते हैं और कुछ को हमारे खाने-पीने की गतिविधियों के परिणामस्वरूप कुछ मिल जाता है। आजकल सड़कों पर वे प्राणी, मैं यहाँ श्वान अथवा सड़क के कुत्तों और गायों का तो ज़िक्र कर ही सकता हूँ, वैसे तो अनेक जीव हैं, हम जहाँ चाट ठेले पर, चाय की दुकान या रेस्टोरेंट में कुछ खाते-पीते हैं, तब हम इनके आगे कुछ डालें य न डालें, इनको कुछ मिल ही जाता है। आजकल वे कितनी आस से देखते होंगे, यही खयाल आता है।

 

 

खैर मानव-जाति को इस महामारी से शीघ्र छुटकारा मिले, इस कामना के साथ, लीजिए प्रस्तुत है इससे बिल्कुल अलग परिस्थिति की यह कविता, जिसमें घर के भीतर के प्राणी अभाव झेलते हैं, जबकि आजकल इसका सामना बाहर के प्राणी इस अभाव का सामना कर रहे हैं, कोरोना की महामारी जल्द दूर हो यह इन मूक प्राणियों के लिए भी अच्छा रहेगा।

लीजिए प्रस्तुत है बाबा नागार्जुन जी की यह कविता-

 

अकाल और उसके बाद

 

कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिन तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त।

 

दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद।

 

मानव मात्र की भलाई के लिए और विशेष रूप से भारत में सड‌क के जीवों के लिए भी यह कामना है कि इस दुष्ट रोग का शीघ्र नाश हो।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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