तुमने भी अगर देखा है!

क्या ग़लत है जो मैं दीवाना हुआ, सच कहना,
मेरे महबूब को तुमने भी अगर देखा है|

मजरूह सुल्तानपुरी

और करे दीवाना क्या!

जब शहर के लोग न रस्ता दें क्यूं बन में न जा बिसराम करें।
दीवानों की सी न बात करे तो और करे दीवाना क्या॥

इब्ने इंशा

कुछ अक्ल ठिकाने आई!

आजकल फिर दिल-ए-बर्बाद की बातें है वही,
हम तो समझे थे के कुछ अक्ल ठिकाने आई|

‘कैफ़’ भोपाली