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अब दो आलम में, उजाले ही उजाले होंगे!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

अभिव्यक्ति, कविता, शेर-ओ-शायरी, ये सब ऐसे काम नहीं है कि जब चाहा लिख लिया और उसमें गुणवत्ता भी बनी रहे।

 

 

दो शेर याद आ रहे हैं इस संदर्भ में-

 

हम पे दुखों के पर्बत टूटे, तब हमने दो-चार कहे,
उसपे भला क्या बीती होगी, जिसने शेर हजार कहे।
(डॉ. बालस्वरूप राही)

 

एक अच्छा शेर कहके, मुझको ये महसूस हुआ,
बहुत दिनों के लिए फिर से मर गया हूँ मैं।
(डॉ. सूर्यभानु गुप्त)

सचमुच जब कोई रचनाकार कोई अच्छी रचना लिखता है, शेर तो उसकी सबसे छोटी, लेकिन अपने आप में मुकम्मल इकाई है, तो उसके बाद यह चुनौती उसके सामने होती है कि इससे ज्यादा अच्छी रचना अपने पाठकों/श्रोताओं के सामने रखे।

बहुत अधिक कष्ट और चुनौतियां होती हैं ईमानदारी से प्रभावी अभिव्यक्ति को अंजाम देने के लिए। असल में एक अच्छा सृजनशील रचनाकार, दिल से एक अच्छा प्रेमी होता है, जो अक्सर पूरी दुनिया से प्रेम करता है।

मैं बसाना चाहता हूँ, स्वर्ग धरती पर,
आदमी जिसमें रहे बस आदमी बनकर,
उस नगर की हर गली तैयार करता हूँ।
आदमी हूँ, आदमी से प्यार करता हूँ॥

वैसे किसी एक व्यक्ति अथवा शक्ति के प्रति अनन्य प्रेम भी अद्वितीय रचनाओं का आधार बन सकता है, लेकिन ऐसे उदाहरण बहुत कम और दिव्य होते हैं, जैसे तुलसीदास और उनके ईष्ट श्रीराम, सूरदास और उनके दुलारे श्याम मनोहर।

खैर हम लौकिक सृजन के बारे में ही, हल्की-फुल्की बातें करेंगे। एक गज़ल जो गुलाम अली जी ने गाई है, लेखक हैं परवेज़ जालंधरी,बड़े सुंदर बोल हैं और बड़ी कठिन शर्तें हैं चाहत की-

जिनके होठों पे हंसी, पांव में छाले होंगे,
हाँ वही लोग तेरे चाहने वाले होंगे।

 

शमा ले आए हैं हम, जल्वागह-ए-जाना से
अब दो आलम में उजाले ही उजाले होंगे।

 

मय बरसती है, फज़ाओं में नशा तारीं है,
मेरे क़ातिल ने कहीं जाम उछाले होंगे।

 

हम बड़े नाज़ से आए थे तेरी महफिल में,
क्या खबर थी, लब-ए-इज़हार पे ताले होंगे।

आज के लिए इतना ही काफी है, वैसे तो कहते हैं ना- हरि अनंत, हरिकथा अनंता, साहित्य के बारे में भी ये बात लागू होती है।

नमस्कार

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पर अपने सपनों को पंख कब मिले!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

 

 

बहुत सी बार ऐसा होता है कि कोई कविता शुरू करते हैं, कुछ लाइन लिखकर रुक जाते हैं। फिर आगे नहीं बढ़ पाते, लेकिन वो लाइनें भी दिमाग से नहीं मिट पातीं।

कविता की ये पंक्तियां, कभी दीपावली के आसपास ही लिखी थीं। बहुत साल पहले, कब, ये याद नहीं है। पंक्तियां इस तरह हैं-

हम भी अंबर तक, कंदील कुछ उड़ाते
पर अपने जीवन में रंग कब घुले।
हमको तो आकर हर भोर किरण
दिन का संधान दे गई,
अनभीगे रहे और बारिश
एक तापमान दे गई।
आकाशी सतहों पर लोट-लोट जाते,
पर अपने सपनों को पंख कब मिले॥

आज, अचानक ये अधूरा गीत याद आया, तो सोचा कि इसको भी यहाँ, अपनी डिजिटल स्मृतियों में स्थापित कर दूं।

अब अपना ये पुराना, अधूरा गीत साझा करने के बाद, जगजीत सिंह जी की गाई, कैफी साहब की लिखी एक लोकप्रिय गज़ल के एक दो शेर याद आ रहे हैं, वो भी शेयर कर लेता हूँ-

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो,
क्या गम है जिसको छिपा रहे हो।
आंखों में नमी, हंसी लबों पर,
क्या हाल है, क्या दिखा रहे हो।
बन जाएंगे ज़हर पीते-पीते
ये अश्क़ जो पीते जा रहे हो।

शायद ज़िंदगी में ऐसा तो चलता ही रहता है, कोई कैफी साहब जैसा शायर उसको इतनी खूबसूरती से बयां कर देता है।
आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

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Ideas are like a flowing river?

We are living in an interactive world, every moment we impress others and get impressed by others too. There is a famous principle of dilectics, which says that many a times when we are not able to convince the other person with our ideas on a given subject, we accept his ideas and vice-versa . So there is a continuous flow of ideas between people and society as a whole.

 

 

I had active interest in literature, presentation, public speaking etc. I always loved to play with words. Often in my office years it happened that I coined an expression, used some phrase to describe some person or situation in an interesting way. Often it happened that I listened to that expression of mine from say 8-10 persons and may be one or two of them used that expression with the prefix ‘as you said’, otherwise mostly people used it in a way that it was their own creation. Sometimes it came to my mind that it would have been better if they recognized my copyright on that. But frankly speaking I might have also done so and we may accept it as our own piece of creativity.

I remember another example of those days when I was active in writing poetry and reciting them in some poetic symposia. It once happened that I used the characters of Munshi Prem Chand Ji, namely ‘Hori’ and ‘Dhaniya’ to present my ideas in a poem. After a few days I listened to a poem presented my other poet friend using these two characters. But to my utter surprise, it was clear from his expression that he didn’t know that ‘Hori’ was the male character and in fact hero of the novel and ‘Dhaniya’ was a lady, his wife. Sometimes people copy others not even understanding the context.

In the world of creative writing in fact there are people who survive on copying others mostly. Anyway I think the dangers from copying the ideas of others could be real in the field of science, inventions etc.. As it was presented in a movie that a computer engineer copied the computer program developed by another person, who developed it after very hard work, but ultimately the copycat got exposed.

It may also be a real danger in the field of marketing where a person works hard and makes a dent in the market and another person reaps the fruits of that fraudulently. It is also seen that people make presentations before their bosses by stealing the ideas of others, just for getting some more opportunities. But ultimately a person who has a creative mind would succeed and a copycat can’t survive in the long run.
But other than a few specific fields, the flow of ideas should be unrestricted and normally there is no need for them to be barred from adoption by others .

These are my humble thoughts on the #IndiSpire prompt- How do you react when you come to realize that your idea has been copied? What would you like to say to the copycat? #Copycat .

Thanks for reading.


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अपनी छोटी-सी ज़मीन पर , अपनी उगा फसल!

आज स्व. रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। इस गीत में रंजक जी ने नए कवियों को संबोधित करते हुए यह संदेश दिया है कि वे मौलिकता पर पूरा ध्यान दें। अक्सर यह होता है कि लोग तेजी से आगे बढ़ने के लिए दूसरों की नकल करने लगते हैं, बहुत से लोग तो ऐसे भी होते हैं जो दूसरों की काव्य पंक्तियां, अभिव्यक्तियां अपने नाम से प्रकाशित/ प्रसारित कर लेते हैं।

मौलिकता ही वास्तव में रचनाकार की अपनी पहचान बनाती है और सच्चे रचनाकार को ख्याति दिला सकती है। प्रस्तुत है स्व. रमेश रंजक जी की यह रचना-

 

 

वक़्त तलाशी लेगा
वह भी चढ़े बुढ़ापे में
सँभल कर चल ।
कोई भी सामान न रखना
जाना-पहचाना,
किसी शत्रु का, किसी मित्र का
ढंग न अपनाना,
अपनी छोटी-सी ज़मीन पर
अपनी उगा फसल
सँभल कर चल ।
ख्वारी हो सफ़ेद बालों की
ऐसा मत करना,
ज़हर जवानी में पी कर ही
जीती है रचना,
जितना है उतना ही रख
गीतों में गंगाजल,
वे जो आएंगे
छानेंगे कपड़े बदल-बदल,
सँभल कर चल ।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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सुबह का सूर्य भी रथ से उतरकर, सुनेगा जुगनुओं का हुक्मनामा!

आज सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। जब अपनी नियोजक कंपनी के लिए मैं कवि सम्मेलनों का आयोजन किया करता था तब अनेक बार उनसे मिलने का अवसर मिला, बहुत सहृदय व्यक्ति और अत्यंत उच्च कोटि के रचनाकार हैं। उनके अनेक गीत मन पर अंकित हैं। राष्ट्र, राष्ट्रभाषा और रचनाकर के स्वाभिमान को लेकर उनकी अनेक अत्यंत प्रभावशाली रचनाएं हैं।
आज उनका जो गीत शेयर कर रहा हूँ, वह एक व्यंग्य गीत है, जिसमें यह अभिव्यक्त किया गया है कि आज हर क्षेत्र में, लोगों के पास चिंतन-मनन, संवेदन और भावनाओं की गहराई नहीं है लेकिन अहंकार अक्सर प्रदर्शित होता रहता है। लीजिए प्रस्तुत है यह भावपूर्ण गीत-

 

 

नज़रिए हो गये छोटे हमारे,
मगर बौने बड़े दिखने लगे हैं।
चले इंसानियत की राह पर जो,
मुसीबत में पड़े दिखने लगे है।

 

समय के पृष्ठ पर हमने लिखी थी
छबीले मोर पंखों से ऋचाएँ,
सुनी थी इस दिशा में उस दिशा तक
अंधेरो ने मशालों की कथाएँ।
हुए हैं बोल अब दो कौड़ियों के,
कलम हीरे- जड़े दिखने लगे हैं।

 

हुआ होगा कही ईमान मँहगा
यहाँ वह बिक रहा है नीची दरों पर,
गिरा है मोल सच्चे आदमी का
टिका बाज़ार कच्चे शेयरों पर,
पुराने दर्द से भीगी नज़र को
सुहाने आँकड़े दिखने लगे हैं।

 

हमारा घर अजायब घर बना है
सपोले आस्तीनों में पले हैं,
हमारा देश हैं खूनों नहाया
यहाँ के लोग नाखूनों फले हैं,
कहीं वाचाल मुर्दे चल रहे है
कही ज़िंदा गड़े दिखने लगे हैं।

 

मुनादी द्वारका ने यह सुना दी
कि खाली हाथ लौटेगा सुदामा,
सुबह का सूर्य भी रथ से उतरकर
सुनेगा जुगनुओं का हुक्मनामा,
चरण जिनके सितारों ने छुए वे
कतारों में खड़े दिखने लगे हैं।

 

यहाँ पर मज़हबी अंधे कुए हैं
यहाँ मेले लगे है भ्रांतियों के
लगी है क्रूर ग्रहवाली दशा भी,
महूरत क्या निकालें क्रांतियों के
सगुन कैसे विचारें मंज़िलो के,
हमें सूने घड़े दिखने लगे हैं।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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ले न पाए हम प्रशंसा-पत्र कोई भीड़ से – किशन सरोज

भारतीय गणतंत्र दिवस के अवसर पर सभी को हार्दिक बधाई।

कल ही मैंने प्रसिद्ध गीत कवि स्व. श्री किशन सरोज जी का स्मरण करते हुए उनका एक गीत शेयर किया था, आज मन हो रहा है कि उनका एक और गीत शेयर कर लूं। प्रेम के और विरह के गीतों के सुकुमार बादशाह, किशन सरोज जी का एक और गीत प्रस्तुत है-

 

 

बाँह फैलाए खड़े,
निरुपाय, तट के वृक्ष हम
ओ नदी! दो चार पल, ठहरो हमारे पास भी ।

 

चाँद को छाती लगा
फिर सो गया नीलाभ जल
जागता मन के अंधेरों में
घिरा निर्जन महल
और इस निर्जन महल के
एक सूने कक्ष हम
ओ भटकते जुगनुओ ! उतरो हमारे पास भी ।

 

मोह में आकाश के
हम जुड़ न पाए नीड़ से
ले न पाए हम प्रशंसा-पत्र
कोई भीड़ से
अश्रु की उजड़ी सभा के,
अनसुने अध्यक्ष हम
ओ कमल की पंखुरी! बिखरो हमारे पास भी ।

 

लेखनी को हम बनाए
गीतवंती बाँसुरी
ढूंढते परमाणुओं की
धुंध में अलकापुरी
अग्नि-घाटी में भटकते,
एक शापित यक्ष हम
ओ जलदकेशी प्रिये! सँवरो हमारे पास भी ।

 

-किशन सरोज

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-1

जैसा मैंने कल लिखा था, चाहता हूँ कि अपनी रचनाएं, जितनी उपलब्ध हैं, और याद आ रही हैं, एक बार यहाँ शेयर कर लूं, जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। वैसे तो मेरा संपादकों से, कविता के संप्रभुओं से कभी कोई निकट का नाता नहीं रहा।

एक बात और, मैं हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

यह भी उल्लेख कर दूं कि मेरा जन्म दिल्ली में 23 अगस्त, 1950 को हुआ था, अधिकांश रचनाकर्म भी 1970 से 1980 के बीच दिल्ली-शाहदरा में हुआ, थोड़ा बहुत उसके बाद जयपुर, झारखंड, मध्य प्रदेश में लगभग 1990 तक हुआ। उसके बाद कविता लेखन बंद हो गया, गद्य कुछ मात्रा में लिखता रहा।

आज से मैं अपनी रचनाओं को विनम्रतापूर्वक शेयर कर रहा हूँ, ताकि रिकॉर्ड रह सके और आशा है कि आपको यह रचनाएं पसंद आएंगी। कविताओं को शेयर करने की शुरुआत उस गीत से कर रहा हूँ, जिसके आधार पर मैंने अपने ब्लॉग का नाम रखा था।

एक बात का उल्लेख और कर दूं कि दिल्ली-शाहदरा से अपनी यात्रा प्रारंभ करने के बाद, सेवा के दौरान देश में अनेक स्थानों पर रहने और 2010 में सेवानिवृत्ति के बाद, मैं पिछले लगभग 3 वर्षों से पणजी, गोआ में रह रहा हूँ।

लीजिए आज से रचनाओं को शेयर करना प्रारंभ कर रहा हूँ-

 

गीत

आसमान धुनिए के छप्पर सा!

 

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

 

यहाँ वहाँ चिपक गए बादल के टुकड़े
धुनिए के छप्पर सा आसमान हो गया।

 

मुक्त नभ में, मुक्त खग ने प्रेम गीत बांचे
थक गए निहारते नयन,
चिड़ियाघर में मोर नहीं नाचे,
छंदों में अनुशासित
मुक्त-गान खो गया॥

 

क्षितिजों पर लाली,
सिर पर काला आसमान
चिकनी-चुपड़ी, गतिमय
कारों की आन-बान,
पांवों पर चलने के
छींट-छींट विधि-विधान,
उमड-घुमड़ मेघ
सिर्फ कीच भर बिलो गया।
धुनिए के छप्पर सा आसमान हो गया॥

 

एक और अधूरी सी अभिव्यक्ति-

लिए चौथ का अपशकुनी चंदा रात
जाने हम पर कितने और ज़ुल्म ढाएगी,
कहने को इतना है, हर गूंगी मूरत पर
चुप रहकर सुनें अगर, उम्र बीत जाएगी।

 

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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रोशनी को शहर से निकाला गया!

कभी हुआ कि घर में कामवाली अपने साथ अपने 5-6 साल के बेटे को ले आई, वह बच्चा घर में इधर-उधर घूमता है, कमर से हाथ पीछे करके निरीक्षण करता है, ये अच्छी बात है कि उसको यह एहसास नहीं है कि यहाँ उसकी मां की स्थिति क्या है! मुझे कभी लगता है कि मेरा बचपन भी ऐसा ही था, हालांकि मेरी मां को किसी के घर में काम नहीं करना पड़ा, लेकिन हम घर में करने के लिए कुछ काम लेकर आते थे, जैसे माला में मोती पिरोना आदि। मुझे अभी तक याद है कि अपने एक अमीर रिश्तेदार के घर में डाइनिंग टेबल और उसके ऊपर एक टोकरी में रखे ढेर सारे फल देखकर मुझे बहुत अचंभा हुआ था!

खैर सपनों की उड़ान तो वहाँ से ही शुरू होती है ना, जहाँ हम शुरू में होते हैं। मैंने अपने सेवाकाल के बारे में संक्षेप में लिखा, जहाँ समय पर पढ़ाई पूरी न कर पाने के कारण कोई मंज़िल सामने नज़र नहीं आती थी, वहाँ रु. 100 प्रतिमाह से लेकर उससे लगभग 100 गुना तक जाना, अपने आप में संतोषजनक तो कहा ही जा सकता है।

लेकिन मेरा स्वप्न कभी भी, या कहूं जबसे सोचना-समझना, लिखना शुरू किया, तब से यह कभी नहीं था कि मैं सेवा में किस स्तर तक अथवा कितने वेतन तक पहुंचूंगा! संघर्ष के दिनों के मेरे एक वरिष्ठ साथी थे श्री कुबेर दत्त, पता नहीं अब वे जीवित हैं या नहीं, मेरे पास उनके कई पत्र, पोस्ट कार्ड सुरक्षित रखे रहे, बहुत समय तक, वो अक्सर यही लिखते थे कि मैं तुमसे बहुत बात करना चाहता हूँ। वे दूरदर्शन में बहुत सफल प्रोड्यूसर और डाइरेक्टर रहे, बहुत से अच्छे प्रोग्राम उन्होंने तैयार किए लेकिन ये भी लागता है कि वे वहाँ जाकर कला की दृष्टि से समाप्त भी होते गए। उनके दो गीतों से पंक्तियां उद्धृत करने का मन हो रहा है, एक बहुत सुंदर गीत उनका बेरोज़गारी के दिनों का, उसकी पंक्तियां हैं-

नक्काशी करते हैं नंगे जज़्बातों पर, लिखते हैं गीत हम नकली बारातों पर,
बची-खुची खुशफहमी, बाज़ारू लहज़े में, करते हैं विज्ञापित कदम-दर-कदम।

एक गीत जो उन्होंने दूरदर्शन में सेवारत रहते हुए लिखा था, उसकी पंक्ति याद आ रही है-

उस पुराने चाव का, प्यार के बहलाव का,
दफ्तरों की फाइलें, अनुवाद कर पाती नहीं।

कुल मिलाकर बहुत से काम ऐसे हैं जो दूर से बहुत आकर्षक लगते हैं, जैसे दूरदर्शन में कार्यक्रम प्रोड्यूस करने वाला काम! मैंने भी आकाशवाणी में काम किया है, यद्यपि मैं प्रशासन में था, कलाकारों का सात बहुत मिला, लेकिन अक्सर लगता था कि कला प्रस्तुति के ऊपर दफ्तर की औपचारिकताएं ज्यादा हावी रहती हैं।

बहरहाल मैं यही कहना चाहता हूँ कि हमेशा से मेरा सपना अपनी कला के बल पर, कविताओं के बल पर नाम कमाने का था। मुझे राज कपूर जी का उदाहरण याद आता है, कितनी अच्छी टीम बनाई थी उन्होंने। इस टीम के एक सदस्य शैलेंद्र जी, वे इप्टा में नाटकों आदि के लिए डायलॉग और गीत लिखते थे, पृथ्वीराज जी ने उनसे प्रभावित होकर कहा कि मेरा बेटा फिल्म बना रहा है, उसके लिए गीत लिखो, शुरू में तो शैलेंद्र जी ने मना कर दिया लेकिन बाद में आर्थिक तंगी के कारण वे तैयार हो गया और हमें यह महान रचनाकर मिल गया!

मुझे नीता जी का किस्सा याद आ रहा है, जो उन्होंने कहीं शेयर किया था, उस समय उनका ‘सरनेम’ क्या था, पता नहीं। उन्होंने नृत्य का एक कार्यक्रम प्रस्तुत किया था जिसे मुकेश अंबानी ने देखा और उनको बहुत पसंद किया। बाद में उनके घर फोन आया, उन्होंने उठाया, उधर से आवाज आई-‘मैं धीरूभाई अंबानी बोल रहा हूँ’, उनको लगा कि कोई मजाक कर रहा है, और उन्होंने कहा- ‘मैं क्लिओपेट्रा बोल रही हूँ (शायद कोई और नाम था)’ और फोन रख दिया। ऐसा एक से अधिक बार हुआ बाद में उनके पिता से धीरूभाई जी की बात हुई और उन्होंने बताया कि उनका बेटा ‘मुकेश’ नीता जी से विवाह करना चाहता और इस प्रकार किस्मत धकेलते हुए उनके पास चली आई।

तो यह खेल है किस्मत का और सपनों का, मेरा सपना रहा है कि रचनात्मकता के आधार पर मैं अपना स्थान बनाऊं, कविता में, अनुवाद में भी मैं देखता हूँ कि भ्रष्ट अनुवाद करने वाले आसनों पर डेरा जमाए हैं और कोशिश करते हैं कि कोई वास्तव में क्रिएटिव व्यक्ति वहाँ घुसकर उनके नकलीपन को चुनौती न दे पाए। एक कवि की गीत पंक्ति याद आती है-

फ्यूज़ बल्बों के अद्भुद समारोह में,
रोशनी को शहर से निकाला गया।

बाकी सपनों का क्या है, वो रुकते थोड़े ही हैं आने से, कभी लगता है कि किसी प्रसिद्ध प्रोड्यूसर ने कुछ पढ़ा, वह मुरीद हो गया और उसने मुंबई बुला लिया, क्या मुंबई जाने के लिए व्यक्ति का भिक्षुक वाली स्थिति में पहुंचना जरूरी है।

बातें। तो बहुत हैं और सपने भी, लेकिन आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

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