तो वो याद दिलाए ख़ुद भी!

ऐसा ज़ालिम कि अगर ज़िक्र में उसके कोई ज़ुल्म,
हमसे रह जाए तो वो याद दिलाए ख़ुद भी|

अहमद फ़राज़

क़ातिल की निगाहों की तरह!

ग़म बढे़ आते हैं क़ातिल की निगाहों की तरह,
तुम छिपा लो मुझे, ऐ दोस्त, गुनाहों की तरह|

सुदर्शन फाक़िर