क़ातिल की निगाहों की तरह!

ग़म बढे़ आते हैं क़ातिल की निगाहों की तरह,
तुम छिपा लो मुझे, ऐ दोस्त, गुनाहों की तरह|

सुदर्शन फाक़िर