फिर दर्द कोई बोने का!

जो फ़स्ल ख़्वाब की तैयार है तो ये जानो,
कि वक़्त आ गया फिर दर्द कोई बोने का|

जावेद अख़्तर

लेकिन कब ऐसा होता है!

पहले भी कुछ लोगों ने जौ बो कर गेहूँ चाहा था,
हम भी इस उम्मीद में हैं लेकिन कब ऐसा होता है|

जावेद अख़्तर

पके खेत सी शादाब लगे!

घर के आंगन मैं भटकती हुई दिन भर की थकन,
रात ढलते ही पके खेत सी शादाब लगे|

निदा फ़ाज़ली