कोई सूरत नहीं रिहाई की!

मैं ही मुल्ज़िम हूँ मैं ही मुंसिफ़ हूँ,
कोई सूरत नहीं रिहाई की|

बशीर बद्र

गुनहगार की तरह!

‘मजरूह’ लिख रहे हैं वो अहल-ए-वफ़ा का नाम,
हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह|

मजरूह सुल्तानपुरी   

किसको इल्ज़ाम दूँ मैं!

किसको इल्ज़ाम दूँ मैं किसको ख़तावार कहूँ,
मेरी बरबादी का बाइस तो छुपा है मुझमें|

राजेश रेड्डी