बस्ती में ख़ंजर बोलते हैं!

ज़ुबां ख़ामोश है डर बोलते हैं,
अब इस बस्ती में ख़ंजर बोलते हैं|

राजेश रेड्डी

वो ख़ंजर लेके आया है!

तबस्सुम उसके होठों पर है उसके हाथ में गुल है,
मगर मालूम है मुझको वो ख़ंजर लेके आया है|

राजेश रेड्डी

सभी कुछ मुआफ है, जानी!

वो मेरी पीठ में खंज़र उतार सकता है,
के जंग में तो सभी कुछ मुआफ है, जानी|

राहत इन्दौरी

भेस बदल कर मेरी तलाश में है!

बस एक वक़्त का ख़ंजर मेरी तलाश में है,
जो रोज़ भेस बदल कर मेरी तलाश में है|

कृष्ण बिहारी ‘नूर’